विज्ञान चर्चा – डार्विन का विकासवाद

नमस्कार, विज्ञान चर्चा में आपका स्वागत है. सबसे पहले एक सूचना विज्ञान चर्चा अब हर माह की अंतिम शनिवार को होगी.पिछली चर्चा में मैंने दो महत्वपूर्ण विज्ञान चिठ्ठाकारों के ब्लॉग का उल्लेख नही किया, आज की चर्चा में मुख्यतः उन्ही दो चिठ्ठों की चर्चा होगी डार्विन के विकासवाद के सापेक्ष.

मैंने अपने चिठ्ठे में ईश्वर की अवधारणा से सम्बंधित एक लेख में “विकासवाद” का सन्दर्भ दिया…कई लोगों के मेल और टिप्पणियाँ ऐसी भी आईं की पहले विकासवाद क्या है वह बताएँ…तब मुझे लगा की हो सकता है, मित्रों ने विकासवाद पर पहले अच्छी सामग्री प्रकाशित की है वो सबकी नज़रों में आने से रह गई हों ..इसलिए आज मैं सिर्फ उसी से सम्बंधित ब्लॉग पोस्टों का जिक्र कर रही हूँ.

विकासवाद पर जो दो अच्छी लेखमालाएं मेरी नज़रों से गुजरी उसमे से एक मेरे मित्र और “भारतीय भुजंग” ब्लॉग में मेरे सह-लेखक श्री अरविन्द मिश्र जी द्वारा रचित है, और दूसरी मेरे प्रिय चिठ्ठाकार उन्मुक्त जी द्वारा. इस लिए आप यहाँ मुझपर पूर्वाग्रह का आरोप लगाने को स्वतंत्र है.

सबसे पहले साईं ब्लॉग पर डार्विन से सम्बंधित जो लेख मुझे उल्लेखनीय लगे वो हैं…


भूमिका
इस पोस्ट में आपको डार्विन के जन्म और बचपन की जानकरी मिलेगी.
नेचुरल सेलेक्सन का सिद्धांत सही है कोई अनुकूलन नही हुआ?!
बीगल की यात्रा (1831-1836)-मशहूर जलपोत एच0एम0एस0 बीगल पूरे पाँच वर्षों (1831-1836) तक समुद्री यात्रा पर रहा जहाँ डार्विन ने प्रकृति के विविधता भरे रुप को शिददत के साथ देखा-परखा.
– आखिर कितनी प्रजातियाँ हैं जीवों की धरती पर?
– जीवाश्मिकी के सापेक्ष विकासवाद के प्रमाण.
डार्विन की मृत्यु (19 अप्रैल, 1882).
मानव एक नंगा कपि है.
– जब धर्म ने मानी अपनी गलती.


कोई शक नही मित्र अरविन्द जी ने डार्विन के जीवन और उसके कार्यों पर एक शानदार लेखमाला लिखी ..अब दूसरी लेखमाला की ओर चलते हैं. उन्मुक्त जी का मंतव्य (जहाँ तक मुझे समझ आया) विकासवाद और मजहबी विवाद को सामने रखने का रहा ..उनके चिठ्ठे के वो लेख जो डार्विन के विकासवाद और उसपर हुए मुकदमों की जानकारी देते हैं , वो हैं ..(आशा है लेखों का क्रम बिगड़ने के लिए वो मुझे क्षमा कर देंगे).


डार्विन, विकासवाद, और मज़हबी रोड़े – (भूमिका)
श्रंखला की इस कड़ी में, डार्विन के शुरुवाती जीवन के बारे में चर्चा है.
– इस चिट्ठी में चर्चा का विषय है डार्विन का व्यक्तित्व
डार्विन का विश्वास, बाईबिल से, क्यों डगमगाया?
बहस – ३० जून, १८६० को, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संग्रहालय में थॉमस हक्सले और बिशप सैमुअल विलबफोर्स के बीच.
यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायगी
‘इंटेलिजेन्ट डिज़ाईन’- सृजनवादियों का नया पैंतरा. अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से दो बार हार जाने के बाद भी मज़हबी कट्टरवादियों ने हार नहीं मानी। उन्होनें अपना पैंतरा बदल दिया। इस चिट्ठी में उनकी इस चाल और उस पर टैमी किट्ज़मिलर बनाम डोवर एरिया स्कूल डिस्ट्रिक्ट मुकदमें में हुऐ फैसले की चर्चा है.
– डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को पढ़ाने पर स्कोपस् के विरूद्व बीसवीं शताब्दी में दाण्डिक मुकदमा चला। इसे मन्की ट्रायल (Monkey trial) के रूप में भी जाना जाता है.
– सृजनवादियों के अनुसार, विकासवाद उष्मागति के दूसरे नियम का उल्लंघन करता है.


अब कुछ सामग्री दो अन्य चिठ्ठों से –


– विकासवाद के सिद्धांत का विरोध करने वालों में एक अहम नाम है हरवर्ट स्पेंसर का जिन्होंने ‘सरवाइवल ऑफ द फीटेस्ट’ का सिद्धांत देकर डार्विन का विरोध किया.

– रचनाकार पर डार्विन की आत्मकथा.


..शेष फिर कभी आज के लिए इतना ही ..फिर मिलते हैं अगले माह की अंतिम शनिवार को ..यदि मुझे मनोविज्ञान पर लिखने का वक्त मिला अगली चर्चा का विषय शायद वही हो. आपका दिन सार्थक हो.

– लवली.

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यह प्रविष्टि डार्विन का विकासवाद, लवली कुमारी में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

28 Responses to विज्ञान चर्चा – डार्विन का विकासवाद

  1. Arvind Mishra कहते हैं:

    डार्विन की द्विशती जयंती का समापन करता चिट्ठाचर्चा का यह अनुष्ठान सामयिक और समीचीन है -मैं व्यक्तिगत तौर पर इस पूरे वैश्विक आयोजन में उन्मुक्त जी की निष्ठा ,लगन और और प्रतिबद्ध समर्पण से अभिभूत हुआ हूँ !आभार !

  2. अच्छी चर्चा। डार्विन का विकासवाद तो नए युग के लिए प्रस्थानबिंदु है।

  3. शरद कोकास कहते हैं:

    विज्ञान से सम्बन्धित चिठ्ठों की चर्चा का यह उपक्रम अच्छा है । इसमे उन चिठ्ठों को भी शामिल किया जा सकता है जिनमे वैज्ञानिक दृष्टि के विकास का आग्रह है । इसलिये कि विज्ञान में आस्था रखने वाले वैज्ञानिक दृष्टि भी रखते हो यह ज़रूरी नहीं । आपका दिन शुभ हो.शुभ और अशुभ मानना अन्धविश्वास है । आपका दिन अच्छा हो .. good day

  4. अजय कुमार झा कहते हैं:

    एक विज्ञान चिट्ठा ये भी है कल की दुनिया …शायद आपने देखा हो ..मुझे तो रुचिकर लगता है …विज्ञान आधारित चिट्ठों और विषयों की चर्चा अच्छी चल रही है अजय कुमार झा

  5. @शरद जी अच्छा पकड़ा, मेरा ध्यान इस ओर नही गया था 🙂 … शुभ को सार्थक से रिप्लेस कर देती हूँ ..धन्यवाद.

  6. सुन्दर चर्चा!विज्ञान से सम्बन्धित पोस्ट चुनने के लिए बधाई!

  7. अनिल कान्त : कहते हैं:

    इस तरह से अलग अलग विषयों पर चर्चा देखकर अच्छा लगता है

  8. संगीता पुरी कहते हैं:

    चिट्ठा चर्चा में अलग से विज्ञान की चर्चा देखकर अच्‍छा लगा .. पर शुभ और सार्थक का अंतर मेरी समझ में नहीं आया !!

  9. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    चर्चा अच्छी रही. अरविन्द जी की टिप्पणी महत्वपूर्ण है.

  10. cmpershad कहते हैं:

    डार्विन की द्विशताब्दि वर्ष में इस चर्चा में उनके बारे में पढना अच्छा लगा। वैसे, मैंने भी अपने ब्लाग पर इस महान विभूति पर एक लेख दिया था 🙂

  11. रंजना कहते हैं:

    is post ko smhalkar rakh liya hai,kai link to padh daale hain baki bhi padhungi…Aabhar.

  12. बहुत अच्छी और संग्रहणीय चर्चा। इसे बुकमार्क करके रखना पड़ रहा है। इन लिंक्स को फुरसत में एक-एक करके पढ़ना पड़ेगा। डॉ. अरविन्द और उन्मुक्त जी की प्रशंसा मुक्त कंठ से की जानी चाहिए और लवली जी की भी।लवली जी, आपने चिट्ठा चर्चा को एक बेहतरीन आयाम दे दिया है। शुक्रिया।

  13. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    आपकी इस चर्चा से एक नया आयाम तो जुड़ ही गया है चिट्ठा-चर्चा में ! विज्ञान के चिट्ठों की चर्चा के अलावा ऐसी प्रविष्टियों की चर्चा भी की जानी चाहिये, जिनमें विज्ञान की अंशभूत सामग्री या जैसा कि शरद जी ने कहा, वैज्ञानि्क दृष्टि के विकास का आग्रह हो ! बहुत से ऐसे चिट्ठे भी होंगे जिनकी एकाध प्रविष्टियाँ वैज्ञानिक सन्दर्भॊं को छूती होंगी-उन्हेंभी खयाल में रखें ।

  14. Udan Tashtari कहते हैं:

    यह उत्तम कार्य शुरु हुआ. लवली जी को साधुवाद!!

  15. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    विकास को लेकर दिग्भ्रमित सोच को चार्ल्स डार्विन ने एक सम्मोहिनी अवधारणा दी, पर्याप्त विवेचन और तर्क जुटाये और हिट हो गये !जिज्ञासु मानव की उत्सुकता ने ’ द ऑरिज़िन ऑफ़ स्पेसीज़ ’ को हाथों-हाथ लिया, उनकी अवधारणाओं से जन्में विवादों ने उन्हें और अधिक लोकप्रिय बना दिया । अपने को ' फ़िटेस्ट ’ करार दिये जाने की फ़ँतासी ने उनकी परिकल्पना को जैसे सर्वग्राह्य और अपरिहार्य सा बना दिया । उत्साहित डार्विन ने इसको भूगर्भशास्त्र एवँ मृदाविज्ञान तक और भी आगे बढ़ाया ।लोग सुविधापूर्वक यह भूल जाते हैं कि, स्वयँ डार्विन ने लिखा है ’ It is not the strongest of the species that survive, nor the most intelligent, but the one most responsive to change. In the struggle for survival, the fittest win out at the expense of their rivals because they succeed in adapting themselves best to their environment ’ यह एक तरह से उनके चिंतन का निचोड़ है , पर वस्तुनिष्ठ विज्ञान की दृष्टि से तमाम प्रमाण और साक्ष्य अभी सामने आने बाकी हैं ।मैं यह स्वीकार करता हूँ कि सृष्टि का वर्तमान स्वरूप एकाएक किसी चमत्कार का परिणाम भले न हो, पर उनके द्वारा प्रतिपादित अवधारणाओं ( Theories ) ने विकासवाद के आधुनिक स्वरूप की आधारशिला रखी । चिट्ठाजगत पर इस ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये डाक्टर अरविन्द मिश्र और चिट्ठाचर्चा तक इसे लाने वाली श्रीमती लवली जी बधाई के पात्र हैं । पर अभी बहुत काम बाकी है !

  16. ज्ञानदत्त G.D. Pandey कहते हैं:

    चर्चा अच्छी रही. दिनेशराय जी की टिप्पणी महत्वपूर्ण है.

  17. उन्मुक्त कहते हैं:

    लवली जी, आपने मुझे अपने प्रिय चिट्ठकार की श्रेणी में रख कर मेरा सम्मान बढ़ाया – आपका आभार। अरविन्द जी, आपको कार्य के प्रति मेरी निष्ठा ,लगन और प्रतिबद्ध समर्पण अच्छा लगा इससे मुझे आगे कार्य करने में प्रेणना मिली। यह भी सच है कि मेरे द्वारा डार्विन की श्रंखला लिखने का बहुत बड़ा कारण आप ही थे।

  18. Arvind Mishra कहते हैं:

    डॉ. अमर कुमार ने सचमुच डार्विन का सारभूत ही प्रस्तुत कर दिया-और यहाँ स्पेंसर का 'योग्यतम का चयन ' सिद्धांत खारिज हो जाता है .सरल तरीके से कहें तो विकास की प्रक्रिया में कारण नहीं बल्कि परिणाम के तौर पर वह प्रजाति जो ज़रा भी अन्य सह्जातों से बेहतर हो जाती है और बदलावों के प्रति सहज ही अनुकूलित हो रहती है -योग्यतम बन जाती है संतति संवहन की सतत सफलता हासिल करती चलती है !

  19. यह विषय चर्चा के लिए खुला रहेगा ..इसपर आगे बात होगी.

  20. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    बहुत अच्छा लगा यह चर्चा देखकर। आगे की चर्चा का इंतजार रहेगा।

  21. अर्कजेश कहते हैं:

    डार्विन के कार्यों से संबंधित पोस्‍टों को विस्‍तार से समेटती हुई चर्चा ।

  22. Ashok Pandey कहते हैं:

    लवली जी के चर्चा करने से चिठ्ठा चर्चा के जायके में विविधता और विशिष्‍टता आयी है। आज की विज्ञान चर्चा तो विशिष्‍ट है ही।

  23. स्वप्नदर्शी कहते हैं:

    nice!But to appreciate Darwin fully, it is important to discuss the existing scientific theories, and work of other scientists at that time and the advent of industrial era, which was anyway shaking the old feudal society of europe.Many scientists before Darwin, collected and classifed the diverse living ceratures. Often the emphasis on Darwin's work is given, specially in the Indian science on, the method and the collection of inumerable species. But indeed it is the interpretation of this biodiversity, which led this unprecedentant theory and this why Darwin is important.

  24. रचना कहते हैं:

    लवली जी के चर्चा करने से चिठ्ठा चर्चा के जायके में विविधता और विशिष्‍टता आयी है। sahii shabd mil hi gayae kament mae daene kae liyae

  25. चलिए, इसी बहाने भूले बिसरों को भी याद कर लिया गया।

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