Monthly Archives: अप्रैल 2007

मेरे क्षीण महीन भी क्यों लिख दिए अपराध ?

कुछ दिनों से पाठकों की मांग थी – टिप्पणियों के जरिए नहीं, और न ही ई-संपर्कों से. बल्कि सिक्स्थ सेंस से. इसीलिए प्रस्तुत है फ़रमाइशी, व्यंज़लमय चिट्ठा-चर्चा. **-** उनके धीर गंभीर थे फिर भी छोड़ दिएमेरे क्षीण महीन भी लिख … पढना जारी रखे

चिट्ठा चर्चा, रविरतलामी, chitha charcha में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ

कल (की) कथा वाया बाईपास

चिट्ठाचर्चा हम नित प्रतिदिन एक कठिन काम बनता जा रहा है कारण साफ है पोस्‍टों की संख्‍या बढ़ रही है, इतनी पोस्‍टें समेटना तो छोडिए देख भर पाना कठिन होता जा रहा है। हम तो ऐसी कोशिश भी नहीं करने … पढना जारी रखे

चिट्ठाचर्चा, मसिजीवी, chitha charcha, masijeevi में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ

इंटरनेट के तार के पंछी

अनूप ने डपटकर पूछा क्यों आजकल बड़ा जी चुराते हो चिट्ठा चर्चा से। कहीं ऐसा तो नहीं कि शनिवार को चर्चा न करने का कोई धार्मिक तोड़ निकाल लाये हो। मैंने कहा नहीं चिट्ठे इतने लिखे जाने लगे हैं कि … पढना जारी रखे

debashish में प्रकाशित किया गया | 7 टिप्पणियाँ

एक चिट्ठे की चर्चा!!!

आज तो मैने ठान लिया है. आज मैं बस एक चिट्ठे की चर्चा करुँगा. ये जो रोज रोज ५० पोस्टें आ रही हैं, किस किस की बात करुँ. यह चिट्ठाजगत के लिये तो अच्छी बात है और मेरी शुभकामनायें हैं … पढना जारी रखे

उड़न तश्तरी, चिट्ठाचर्चा, समीर लाल, chitha charcha में प्रकाशित किया गया | 8 टिप्पणियाँ

बनती एक गज़ल

समय अगर हमको मिल पाता बनती एक गज़लकिन्तु आज बस पढ़ना केवल, बनती एक गज़ल आये वे फिर चूमा फिर वो चले गये निज पथ परकहाँ गये वे ढूँढ़ रही है नजर अभी भी सत्वर व्यवसायिकता की उड़ान ले दॄश्य … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ

दूरदर्शन का अदूरदर्शी चेहरा…

पिछले दिनों भारतीय टीवी समाचार चैनलों ने हिन्दी चिट्ठाकारों को इतना आंदोलित और उद्वेलित कर दिया कि अंततः उन्होंने विरोध स्वरूप अपने कम्प्यूटर के कुंजीपट उठा ही लिए. सुनील तथा रीतेश को एक तालिबानी किशोर द्वारा एक मासूम व्यक्ति का … पढना जारी रखे

चिट्ठा चर्चा, रविरतलामी, chithha charcha में प्रकाशित किया गया | 11 टिप्पणियाँ

एक डुबकी दार्शनिक व्यंग्यवाद की निर्मल स्रोतस्विनी में

आज मन जरा दार्शनिक हो चला है ! दूरदर्शन के जमाने भी एक बार यह तकलीफ हम झेल चुके हैं , सो बेखटके कह सकते हैं की जाके पैर न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई ! दर्शन भी … पढना जारी रखे

चिट्ठा चर्चा, नीलिमा, chitha charcha, chithacharcha, neelima में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ