सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं

नया वर्ष और ये नया दशक क्या शुरू हुआ, बैठे-बिठाये हमने ये नया रोग पाल लिया…चर्चा-रोग। हुआ यूँ कि हुआ कुछ भी नहीं था, कोई लक्षण भी नहीं नजर आये थे। हाँ, इतना जरूर है कि एक बचपन से किस्म-किस्म के रोगों को पालने का शौक जरूर अब तलक बरकरार है। कश्मीर की इस ठिठुराती सर्दी में मेरे ये तमाम रोग मुझे गर्म रखते हैं। कश्मीर का जिक्र छिड़ ही गया है तो मेरी तलाश बताती है कि हिंदी ब्लौग-जगत में मेरे अलावा कश्मीर के घाटी वाले इलाके से बस एक और ब्लौगर हैं- उस्मान और वो मेरा कश्मीर नाम से ब्लौग चलाते हैं। एक नजर डालिये उस ज़ानिब, कई पहलू देखने को मिलेंगे कश्मीर के। उनके किसी पुराने पोस्ट पर कभी एक बड़ी विनम्र-सी टिप्पणी भी की थी मैंने। इच्छा है कि एक बार मिलूँ उनसे। उस्मान की आखिरी पोस्ट पिछले साल 18 अक्टूबर की लिखी हुई है, जिसमें वो कहते हैं और बड़ा ही वाजिब कहते हैं:-

अधिकांश फौजियों की निगाह से कश्मीर का हर बाशिंदा आतंकवादी या आतंकियों को पनाह देने वाला है। आम कश्मीरी की नजर में हर फौजी जुल्म करने वाला है। घाटी छोड़ चुके कश्मीरी पंडितों के लिए कश्मीर का सच अलग है और कश्मीर के गाँवों में रहने वाले उन मासूमों के लिए अलग, जिनके लिए आतंकवादी भी उतने ही डरावने हैं जितने वर्दी वाले लोग।

उस्मान को पढ़िये और उन्हें और-और लिखने के लिये प्रोत्साहित कीजिये। उनकी कुछ बातों से भले ही मैं सहमत न होऊँ, लेकिन वक्त की दरकार है कि यहाँ कश्मीर की ये वर्तमान पीढ़ी पूरे मुल्क से परोक्ष तौर पर जुड़े।

दूसरी तरफ, इस कश्मीर-वादी के धवल-श्वेत रंग से परे इक नीले रंग के दो अलग-अलग कंट्रास्ट… एक नंदनी की कविता में तो दूजा किशोर की कहानी में…जहाँ शब्दों के कुछ बड़े ही हसीन चित्र बनाते हैं, वहीं दोनों पोस्ट के शीर्षक एक कविता जैसा कुछ। यूँ कि :-
रंग उड़े होर्डिंग पर
बैठा वो नीलकंठ
स्मृतियों का
नीला गाढ़ा रसायन रचता है

कहीं और बधाईयों की किंकर्तव्यविमूढ़ता में उलझा प्रशांत @ पीडी कुछ इस तरह से अपनी व्यथा को साझा करता है:-

मुझसे औपचारिकता निभाना किसी भी क्षण में बेहद दुष्कर कार्य रहा है, और उससे अच्छा खुद को एक अहंकारी व्यक्ति कहलाना अधिक आसान लगता है.. मजाक में कहूँ तो, “अगर मनुष्य एक सामजिक प्राणी है तो मुझमें शत-प्रतिशत मनुष्य वाला गुण शर्तिया तौर से नहीं है..”

…तो कहीं और, दिल्ली की सर्दी से ब्रेक लेकर उत्तरांचल की पहाड़ियों पर विचरता अपना कुमाऊँनी भूल्ला दर्पण अपने सेलेक्टिव लव के जरिये प्रेम पर{और प्रेमिका पर} पर अनुभव बाँटता हुआ एकदम से अपनी उम्र से बड़ा नजर आने लगता है:-

…प्रेम वास्तविकता के धरातल पे होना पसंद नहीं करता. वो किसी परी कथा सा होना पसंद करता है. विरोधाभासों से परिपूर्ण. वास्तव में प्रेम की उम्र रोमांच की उम्र होती है. ‘यूथ’ . हाँ यदि प्रेम बुढ़ापे में हुआ करे तो थोड़ी रेशनल हो.

पोस्ट लिखे जाने तक ये दार्शनिक भूल्ला उधर उन पहाड़ियों पर ही विचर रहा था…और इधर चीन से अपना विचरन संपन्न करके नीरज जी बड़ी प्यारी-सी ग़ज़ल सुनाते हैं। दो शेर चुरा लाया हूँ यहाँ:-

बाजुओं पर यकीन है जिनको
दूर उनसे कहां किनारे हैं
दिन अकेले ही काट लो ‘नीरज’
रात में चाँद है सितारे हैं

उधर एक ओर विरह-वेदना में अकेले दिन काटते प्रवीण पाण्डेय अपनी श्रीमति जी के समय-पूर्वागमन से मायके जाने के सूख को जब नया आयाम देते हैं अपनी अद्‍भुत लेखनी के जरिये तो वहीं दूसरी ओर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी उसी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में छुट्टी के विकट नतीजे पर एक बेमिसाल छंद से उसी आयाम को नयी ऊँचाईयाँ देते हैं।

लखनऊ की सर्दी में कंपकापाती सड़कों पर बिना गियर बदले पचास की स्पीड से ड्राइव करते हुये अपने ब्लौग-जगत के कथित आलसी महोदय की ये आत्ममुग्ध प्रोफाइल कम-से-कम आपसब की एक दृष्टि का फेरा तो माँगती ही है कि उनकी बकबक में भी नायाब बातें होती हैं:-

पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं
तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता

…और हरबार की तरह मनीष जी की वार्षिक संगीतमाला अपनी उल्टी गिनती के साथ शुरू हो चुकी है 25वें पायदान वाले गीत के साथ। हर वर्ष की शुरूआत में ये एक खास आकर्षण रहता फिल्म-संगीत पसंद करने वाले ब्लौगरों के लिये। वहाँ मनीष जी के ब्लौग पर भले ही अमीन सायनी की आवाज लापता हो, लेकिन लुत्फ़ वही अपने पुराने जमाने वाले बिनाका गीतमाला का ही मिलता है और संग में गीत-विशेष से जुड़ी कुछ अंदरूनी जानकारियाँ भी। आप भी शामिल हों इस मस्त श्रृंखला में मनीष जी के साथ।

…फिलहाल इतना ही। हाँ, इस नये साल की शुरूआत पर एक सदी से सुसुप्तावस्था में पड़े कुछ ब्लौगरों को झिंझोड़ कर जगाना चाहता हूँ। जागोsssss ! मीनाक्षी !! अपूर्व !!! लवली !!!! आभा !!!!! और ताहम !!!!! आपसब को भी कुछ सोये हुये ब्लौगरों की खबर हो तो मुझे बतायें। तमाम संकलकों को तो पहले हमसब ने तरह-तरह के इल्ज़ाम लगा कर इतना दुत्कारा और अब उनकी रहस्यमयी गुमशुदगी पर झुंझलाये फिर रहे हैं। मैं तो फिलहाल अपने व्यक्तिगत ब्लौग-रोल से ही काम चला रहा हूँ।

विदा! आपसब को नये साल की खूब-खूब सारी शुभकामनायें…! कोशिश करूँगा कि अपने इस नये-नवेले रोग के साथ नियमित रहूँ इस मंच पर कि इन दिनों फुरसतों से खासी यारी हो रखी है अपनी। चलते-चलते ये फ़िराक गोरखपुरी साब का एक विख्यात शेर:-

पाल ले इक रोग नादां जिन्दगी के वास्ते
सिर्फ सेहत के सहारे जिन्दगी कटती नहीं

About bhaikush

attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि गौतम राजरिशी में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s