Monthly Archives: मई 2007

चिट्ठाजगत में चटपटिया का प्रवेश

नये चिट्ठाकारों में एक नाम और जुड़ गया है, मुकेशजी सोनी अपनी चटपटी शैली में चिट्ठाजगत को चटपटा बना देने का प्रयास कर रहें है, उनके चिट्ठे पर “कागलो” पढ़िये, राजस्थानी भाषा में है, समझ ना आये तो टिप्पणी कर … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ

किस किस का अब ज़िक्र करें हम

कितनी चिट्ठों की चर्चायें कीं, पर किसने पढ़ी बताओऔर अगर न चर्चा हो तो कोई शोर नहीं होता हैफिर फिर कर यह प्रश्न उठा जब मैं चर्चा करने बैठा हूँक्यों मैं जाग जाग लिखता हूँ, जब सारा आलम सोता है … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ

कौन हो तुम ?

तीन दिनों की छुट्टी से जब वापिस लौटे, नारद गायबचिट्ठा चर्चा फिर भी अक्रनी, कैसे हो ये बड़ा अजायबतंग आ चुके तो साहिर की गज़लों को फिर पढ़कर देखाकोई कहता उसकी लाइफ़ हुई महासागर में नायब कितनी बार गई दुहराई, … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 1 टिप्पणी

मैं जलकुकड़ी

दोस्तों, इन संकलित चिट्ठों की ख़ासियत ये है कि इनमें से अधिकतर नारद से जुड़े नहीं हैं, हिन्दी में नए नवेले हैं और प्रायः दूसरी भाषाओं – मसलन अंग्रेज़ी से हिन्दी लेखन की ओर नए-नए आकर्षित हुए हैं. आपसे गुज़ारिश … पढना जारी रखे

चिट्ठा चर्चा, रविरतलामी, chithacharcha में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ

चरचा चलिबे की चलाइए न

कल की शनीचरी चिट्ठाचर्चा का घोटाला देखकर बहुत हैरानी नही हुई क्योंकि हम इस दर्द और दौर से परिचित हैं । फिर भी साहस बटोर बटोर कर काम करने बैठते हैं । 🙂खैर रविवारी चर्चा के लिए समस्त चिट्ठों को … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ

ज्वालन के जाल बिकराल बरसत है

दिल्ली की गर्मी सर घुमा देती है । आज चर्चा को लू लग गयी या शनिदेव की कुदृष्टि? समझ नही आया।यहाँ हमारे लाल ने छुट्टियाँ होते ही घर में हडकम्प मचा दिया है।खैर अंत भला सो सब भला। हमारा लाल … पढना जारी रखे

Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ

हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं

“हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं”, आपको ये पंक्तियाँ याद होगी, आज मजरूह सुल्‍तानपुरी की बरसी पर उनके जीवन-काल का संक्षिप्त ब्योरा लेकर हाज़िर हुए हैं श्री यूनुस ख़ान अपने चिट्ठे रेडियो-वाणी में तो गौरव प्रताप गुनगुना … पढना जारी रखे

गिरिराज जोशी "कविराज" में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ