ज्वालन के जाल बिकराल बरसत है

दिल्ली की गर्मी सर घुमा देती है । आज चर्चा को लू लग गयी या शनिदेव की कुदृष्टि? समझ नही आया।यहाँ हमारे लाल ने छुट्टियाँ होते ही घर में हडकम्प मचा दिया है।खैर अंत भला सो सब भला। हमारा लाल सोया और हमने मौका पाया चर्चा का।

तो यह रहे 25मई के चिट्ठे सारे।

गर्मीहमे लग रही है ,और गर्मीके संस्मरण सुना रहे है प्रमोद जी।

तपते चेहरे के साथ मनोज घर में ऐसे दाखिल होता मानो बेहोश होकर गिर पड़ेगा. दांत के
बीच जीभ दाबे बाबूजी भी लकड़ी वाला काला छाता बंद करके ऐसे अंदर आते जैसे युद्ध से
लौट रहे हों. मुन्नी भागकर सुराही से लोटा भर पानी लेकर लौटती

और हिमाचल् न्यूज़ ब्यूरो नेकाव्य शैली मे खबर सुनाई —-

आधी रात – रोशनी गुल – पंखें बन्द!
एक मच्छर नाक पर,आंख पर, गाल पर, बार-बार आक्रमण
……….एक ख्याल,एक मच्छर हिल गया, खूं खोरी पर,खायेगा नही, तब तक जायेगा नहीं
मैं इस अन्याय के, अंधियारे में,बेबस हूं लाचार हूं

पर हैरानी कि हिमाचल में भी अगर गर्मीका यह आलम्है तो ………………….खैर नीलिमा जी हम जैसे पीडितो के लिये ठेले पर हिमालय रख कर ले आयी है किन्नौर

दीपक बाबू याद दिला गये मज़दूर की जो आत्मसम्मान से जाता है।

रोजी-रोटी की तलाश मेंनिकल जाता है
अपने घर से दूर
दूसरों के लिए महल बनाता
खुद झौंपडी में रहता
कहलाता है मजदूरअपने ख़ून-पसीने से
सींचता है विकास का वृक्ष
पर उसके लिए लगे
फल होते अति दूर

बचपन में पढी एक कविता याद आ गयी -“मैं मज़दूर,मुझे देवों की बस्ती से क्या/अगणित बार धरा पर मैने स्वर्ग बनाए……”

इसलिये राज लेख सन्देश दे रहे हैं सदा चलने का क्योंकि चलना है नाम ज़िन्दगी का —–

उनके क़दमों पर सुख और आनन्द
बिछ्ता है कालीन की तरह
वह नहीं थामते
कभी दामन
बेबसी का
उनके लिए
चलना नाम है जिन्दगी का

रचना सिंह अपनी कविता में प्यार से ऊपर विश्वास को महत्व दे रही हैं।

प्यार नहीं विश्वास हूँ मै तुम्हारा
क्योकि प्यार के बिना तो रहा जा सकता है
पर विश्वास के बिना जीना व्यर्थ है

समाज वाद की वास्तविकता को बताया जा रहा है सुमनसौरभ में सौरभ मालवीय द्वारा—-

वहीं समाजवाद कोई निश्चित विचारधारा नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि समाजवाद वैसी
टोपी है, जिसको सब पहनना चाहते हैं जिसके फलस्वरूप उसकी शक्ल बिगड़ गई। समाजवाद
विचारधारा कहीं सफल नहीं हो सकी। यह समाज में समानता की बात जरूर करता, लेकिन जो
परिणाम विभिन्न देशों और अपने देश में देखने को मिले वे बिल्कुल विपरीत हैं। इसी
प्रकार समाज में समता की बात करने वाले साम्यवाद ने लोगों की आशाओं पर पानी फेरा।
साम्यवाद एक शोषणविहीन समाज का सपना दिखाता है। उसका साध्य अवश्य पवित्र है, लेकिन
साधन ठीक उसके उल्टे अत्यंत गलत हैं। वह हिंसा को सामाजिक क्रांति का जनक मानता है
और दुनियाभर में साम्यवादी विचारधारा के नाम पर जितनी हत्याएं की गईं उसका विवरण
दिल दहला देता है।

पंडिज्जी , यानी संजीव तिवारी जी ने नवतपा की जानकारी दी है —-

जेष्ठ माह में जब सूर्य सबसे ठंडा ग्रह चंद्र के नक्षत्र रोहिणी ( ईस पर सूर्य
का भी अधिकार है ) वृष राशि मे प्रवेश करता है तभी नवतपा शुरु होता है । आज शाम
सूर्य रोहिणी में प्रवेश करेगा उसी समय से नवतपा शुरू हो जायेगा जो ९ दिन
चलेगा।

पर हमें तो बढिया लगा सेनापति की कविता जो उन्होने साथ दी है । काश वे गर्मीसेबचने का भी कोई उपाय हमें बत देते ।

और प्रतिबिम्ब में बाईस्कोप दिखाया रतलामी जी ने ,बादलो को घिरते देखा मसिजीवी ने और अतुल ने बडे होकर समुद्र में तैरने की इच्छा जताई [अभी पता नही वे और कितने बडे होना चाहते हैं 🙂 ]आर सी मिश्रा प्रेमी युगल को कैद करते है कैमरा में

विहिप उपाध्यक्ष गिरिराज्किशोर से बातचीत को दर्ज किया है मोहल्ला ने। उपाध्यक्ष की बातें अजीब हैं ।अविनाश कहते हैं—-

आमतौर पर हम मोहल्‍ले में वैसी आवाज़ों को जगह देते रहे हैं, जो अल्‍पसंख्‍यक के
सुर की होती है। अभिव्‍‍यक्ति की आज़ादी के सुर को भी आप इसमें से जोड़ सकते हैं।
इन्‍हीं वजहों से हमें अपनों से भी लानतें मिलीं, क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि
दो-तीन सौ लोगों की इस ब्‍लॉग केंद्रित वर्चुअल दुनिया में सांप्रदायिकता जैसे
मुद्दों का क्‍या मतलब है।

साथ ही मसिजीवी आगाह करते है कि इसे आम हिन्दू के विचारो का प्रतिनिधित्व न माना जाये ।

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3 Responses to ज्वालन के जाल बिकराल बरसत है

  1. Udan Tashtari कहते हैं:

    एक चर्चा उड़ जाने के बाद भी बड़ी हिम्मत से आपने फिर चर्चा की-साधुवाद. बढ़िया रही.

  2. Divine India कहते हैं:

    अच्छी चर्चा रही…बधाई!!

  3. अनूप शुक्ला कहते हैं:

    आप धन्य हैं जो इस गर्मी में एक बार चर्चा उड़ने के बाद फिर चर्चा की पतंग उड़ा ले गयीं चिट्ठाचर्चा के आकाश में। शुक्रिया। अच्छी चर्चा के लिये बधाई!

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