….इस देश में देशभक्ति बड़ी सस्ती चीज़ है

कल की चर्चा में नीरज बसलियाल की टिप्पणी थी-

हम टिप्पणी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले गरीब ब्लोगरों को कितना राशन मिलेगा|

टिप्पणी देखते ही लगा कि कुछ खास ग्राहक है। गये ब्लॉग तो देखा नाम है कांव-कांव। पीछे गये तो रामकथा – डेमोक्रेसी काण्ड दिखा जिसके नीचे डिक्लेमर था-(अगर इस कहानी के पात्र काल्पनिक है, तो ये वास्तविकता नहीं, बहुत बड़ा षड्यंत्र है|) लोगों की प्रतिक्रियायें से अंदाजा लगा कि बंदा बिंदास है और लेखन झकास।

नीरज गोस्वामीजी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुये इस पोस्ट के कुछ अंश छांट के धर दिये हमारी सुविधा के लिये:

1.आम चुनाव से चुने गए ख़ास आदमियों को ही शोषण का हक होगा
2.चश्मा उनके व्यक्तित्व से कुछ यों जुड़ गया था कि वे अब पर्दा गिराकर ही चश्मा उतारते थे|
3.फैसले का तो पता नहीं क्या हुआ , लेकिन 4.जज साहब को शाम को अपने कपाल पर अमृतांजन बाम लगाना पड़ा
5.कुलवंती थी या धनवंती … पता नहीं, कल न्यूजपेपर में पढ़ लेंगे यार
6.यह मेड इन चाइना फोल्डेड कुटिया थी
7.इस देश में देशभक्ति बड़ी सस्ती चीज़ है , पाकिस्तान को चार गाली दो और देशभक्त बन जाओ|
8.राम को अर्धनिद्रा में लगा कि वे आडवाणी हैं और सुमंत अटल बिहारी, तो लक्ष्मण गडकारी|
9.भरत कह उठेंगे कि भरत का काटा हुआ तो चप्पल भी नहीं पहन पाता

नीरज जी ने आगे लिखा:

ये पोस्ट मुझे डा. ज्ञान चतुर्वेदी जी के व्यंग उपन्यास “मरीचिका” की याद दिला गयी…अगर आपने ये उपन्यास अभी तक नहीं पढ़ा है तो फ़ौरन से पेश्तर इसे खरीद कर पढ़ें..आपके लेखन को भी उसे पढ़ कर नयी धार मिलेगी ये मुझे विशवास है…

पोस्ट और उस पर आई टिप्पणियां देखकर नीरज बसलियाल से यही कहना है कि उनके जैसे लोग राशन की दुकान तक नहीं आते ,राशन खुद उन तक चलकर आता है उनकी जरूरत के हिसाब से बस वे चालू रहें।

नीरज की पोस्ट पर नीरज गोस्वामीजी की टिप्पणी पढ़ते हुये मुझे याद आया कि नीरज जी ने ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास मरीचिका कुश को भेंट किया था। उसका परिणाम थी कुश के द्वारा लिखी कुछ बेहतरीन पोस्टें जिनमें से पहली पोस्ट का एक अंश है:

गुरुजी अपनी कुटिया से निकले.. पीछे पीछे दो चेले उनकी लॅपटॉप पट्टीका उठाए.. आ रहे थे.. सभी ब्लॉगर अपनी अपनी जगह पर खड़े हो गये.. और झुक कर गुरुजी को प्रणाम किया.. कुछ गुरुजी जी के प्रिय ब्लॉगर तो इतना झुके की नीचे ज़मीन पर बैठा एक कीड़ा उनकी नाक में घुस गया.. उनमे से एक आध ने तो ज़ोर से छींक कर उस कीड़े को वायु मंडल की नमी को सादर समर्पित किया..

गुरुजी ने सबको बैठने के लिए कहा.. और स्वयं अपनी लॅपटॉप पट्टीका खोलकर बैठ गये..

सभी ब्लॉगर सहमे हुए से बैठे थे.. की गुरुजी पता नही इनमे से किसकी ब्लॉग खोल कर शुरू हो जाए.. सबकी नज़रे गुरुजी के चेहरे पर टिकी थी..

कुश पता नहीं फ़िर कब इस स्टाइल में लिखेंगे दुबारा।

सतीश सक्सेनाजी ने तो अपनी राय रख ही दी:

ब्लॉग जगत में निर्मल हास्य या तो है ही नहीं या लोगों को हँसना नहीं आता

यह पढ़ते हुये रागदरबारी के लेखक श्रीलाल शुक्ल जी बातचीत ध्यान आई। – उनका कहना था:

  • हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है। हम मजाक की बात पर चिढ़ जाते हैं। व्यंग्य -विनोद और आलोचना सहन नहीं कर पाते।
  • हिंदी में हल्का साहित्य बहुत कम है। हल्के-फ़ुल्के ,मजाकिया साहित्य, को लोग हल्के में लेते हैं। सब लोग पाण्डित्य झाड़ना चाहते हैं।
  • गांवों में जो हंसी-मजाक है , गाली-गलौज उसका प्रधान तत्व है। वहां बाप अपनी बिटिया के सामने मां-बहन की गालियां देता रहता है। लेखन में यह सब स्वतंत्रतायें नहीं होतीं। इसलिये गांव-समाज हंसी-मजाक प्रधान होते हुये भी हमारे साहित्य में ह्यूमर की कमी है।
  • इसी बीच जबलपुर में राष्ट्रीय कार्यशाला हो ली। इस मौके पर शानदार रिपोर्ट और जानदार कवरेज हुआ।

    समीरलाल के वहां होते हुये इस कार्यशाला को केवल राष्ट्रीय कहना कुछ हजम नहीं हुआ। या तो बैनर ठीक से छपा नहीं या यह समीरलाल का कद कम करने की साजिश है। दोनों ही बातें गड़बड़ हैं। हैं कि नहीं? 🙂

    पिछले दिनों एक और उल्लेखनीय कार्यक्रम हुआ। सीमा गुप्ता जी ने जानकारी देते हुये अपने ब्लॉग पर लिखा:

    “अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन के छठे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 23 – 30 November 2010 को उज़्बेकिस्तान की राजधानी “ताशकंत” में मेरे दुसरे काव्य संग्रह “दर्द का दरिया” का विमोचन DR. Lari Azad जी के हाथो संपन हुआ. आज ए.आई. पी.सी के गौरवशाली आश्रय के अंतर्गत मेरे दुसरे काव्य संग्रह का दो भाषाओँ हिंदी और उर्दू में एक साथ प्रकाशित होना किसी महान उपलब्धि से कम नहीं है.

    सीमाजी को बहुत-बहुत बधाई।

    फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर कभी। मिलते हैं ब्रेक के बाद।

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    चिट्ठाचर्चा को राशन की दुकान मत बनाइये

    ब्लॉगिंग करने को फ़िर मन आया कई दिनों के बाद
    पोस्टों पर बेमतलब टिपियाया कई दिनों के बाद
    भाईचारे का भभ्भड़ देखा फ़िर कई दिनों के बाद
    टिप्पणियों से खिल गयीं बांछे फ़िर कई दिनों के बाद।

    यहां-वहां लड़-भिड़कर आया वो कई दिनों के बाद
    भैया जी ने बेमतलब समझाया कई दिनों के बाद
    नखरेवाली के नक्शे देखे फ़िर कई दिनों के बाद
    बिना बात सबको हड़काया फ़िर कई दिनों के बाद । फ़ुरसतिया

    चिट्ठाचर्चा बहुत दिन से नहीं हुई। इस बीच कई सा्थियों ने आग्रह भी किया करने का। विनीत कुमार ने कहा –चिट्ठाचर्चा को क्या आपने राशन की दुकान बना दिया दिया है कि महीने में सिर्फ़ एक ही दिन खुले। उधर हमारे डा. अमर कुमार ने चर्चाकारों को अभय दान देते हुये लिखा:

    मेरे प्रिय चर्चाकारों, आप सब जहाँ कहीं भी हो, कृपया लौट आओ..
    अब कोई तुम्हें उलाहना न देगा, यहाँ तक की मैं भी कुछ नहीं कहूँगा ।
    कम से कम अपना कुशल मँगल देने तो आ ही सकते हो,
    माना कि, इधर ढँग का कुछ भी नहीं लिखा जा रहा है,
    लेकिन, चर्चाकार तो वही जो बिना विषय अपनी उड़ावै

    इस बीच कानपुर के डा.पवन कुमार मिश्र ने भी कानपुर ब्लागर्स एसोसियेशन की शुरुआत और फ़िर एक हड़बड़िया मुलाकात करके लिखने का क्रम तोड़ने में भूमिका अदा की।

    इस बीच देखा कि ब्लॉग जगत में तमाम परिवर्तन आये हैं। सतीश सक्सेना जी ने भाईचारे, इंसानियत और देशभक्ति के बाद सांप्रदायिक सद्भाव का काम भी हाथ में लिया और इस पर अच्छी पोस्टें लिखनी शुरू की हैं। उन्होंने जब भारत मां के मुस्लिम बच्चों के बारे में लिखा तो मुझे लगा आगे कभी भारत मां के पारसी, सिख, इसाई बच्चों से भी परिचय करायेंगे लेकिन वे तेलियार चले गये वहां तल्ख हो गये और फ़िर टिप्पणी के विवसता की बात करते हुये फ़ाइनली जवानी की बात करने लगे।

    इस बीच मासूम जी ने अमन की बात करनी शुरू की और कुछ बेहतरीन लोगों की रचनायें अपने ब्लॉग पर पोस्ट की। जैसे देखिये इस्मत जी ने लिखा:

    चंद हैं फ़ितना परस्ती की यहां ज़िंदा मिसाल
    कहते कुछ हैं ,करते कुछ ,मक़सद कुछ इन का और है

    इसके बाद के पैगाम आप यहां देख सकते हैं।

    सतीश सक्सेना जी ने मासूम भाई सुझाया कि वे अनूप शुक्ला से भी अमन का पैगाम लिखवा लें। मुझे लगा कि शायद सतीश जी अमन में हमारे मसखरेपन को शामिल करवाना चाहते हैं। हम कोई पैगाम देंगे तो लोग भले न हंसे हमको खुद हंसी आयेगी कि हम भी पैगाम देने लगे।

    यह भी हो सकता है कि सतीश जी ने व्यंग्य लिखना शुरू किया है उसी की कड़ी का कोई कमेंट हो यह कि अनूप शुक्ला से अमन का पैगाम लिखवाया जाये। 🙂

    इस बीच देखा सतीश पंचम पूरी तन्मयता के साथ शब्दों को लम्बा करने में लगे हैं। इस बारे में विस्तार से फ़िर कभी लेकिन यह उनकी रेलवे शौचालय कथा देखिये।

    फ़िलहाल इतना ही। अभी तो दुकान खोली है अब क्या पता नियमित ही हो जाये कुछ दिन के लिये।

    ऊपर वाला फ़ोटो पिछले दिनों कलकत्ता प्रवास के दौरान एक सुबह का है। बाकी के चित्र देखना चाहें तो इस कड़ी पर देख सकते हैं http://www.facebook.com/album.php?aid=85630&id=1037033614&l=3692c2e1d6

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    सोमवार (०८.११.२०१०) की चर्चा

    नमस्कार मित्रों!

    मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं।

    दीपावली के पटाखों की गूंज से मन थोड़ा शांत हुआ तो चर्चा के लिए कुछ ब्लॉग्स की खोज में निकला। अपने मन को सकून देने के लिए अपना-अपना तरीक़ा होता है। कुछ प्रकृति की शरणस्थली में चले जाते हैं। मैं पुस्तकें पढता हूं। कविता कौमुदी से गिरिधर शर्मा की पंक्तोयों में कहें तो

    मैं जो नया ग्रंथ विलोकता हूं,

    भाता मुझे वो नव मित्र सा है।

    देखूं उसे मैं नित बार-बार,

    मानो मिला मित्र मुझे पुराना॥

    पर मेरी भी वही स्थिति है जो प्रेमचन्द ने ‘विविध प्रसंग’ मे कहा है, कि

    “पुस्तक पढना तो चाहते हैं, पर गांठ का पैसा ख़र्च करके नहीं।”

    हां पुस्तकालय में पुस्तकें मिल जाती हैं। बेकन ने कहा था,

    “पुस्तकालय ऐसे मंदिरों की तरह हैं जहां प्राचीन संतों-महात्माओं के सद्गुणों से परिपूर्ण तथा निर्भ्रांत पाखंडरहित अवशेष सुरक्षित रखे जाते हैं।”

    अब हम ठहरे ब्लॉगर। ब्लॉगजगत में पुस्तकालय ढूंढने निकले तो कुछ उसी तरह से सजा एक ब्लॉग मिला जिसका नाम था ‘पुस्तकायन’। जब आप इसकी पोस्ट पढ रहे होते हैं तो इसके बैकग्राउंड में रैकों पर सजी पुस्तकें किसी पुस्तकालय में बैठे होने का बोध कराती रहती हैं।

    इस ब्लॉग के आमंत्रण वाक्य काफ़ी प्रेरित करते हैं,

    यह एक सम्मिलित प्रयास है… अपने पाठन का अधिक से अधिक लाभ उठाने और उसकी महक दूसरों तक पहुँचाने का … पुस्‍तकायन ब्‍लॉग इसके सभी सदस्‍यों का समान रूप से बिना रोक टोक के है … इस ब्‍लॉग पर सभी तरह की विचाराधारा या कोई खास विचाराधारा न रखते हुए भी सदस्‍य बना जा सकता है। आलोचनात्‍मक, वस्‍तुनिष्‍ठ और शालीन प्रस्‍तुति अपेक्षित है ।

    इसके उत्स में इसके ब्लॉगस्वामी  का कहना है,

    अकसर पढते हुए…किताबों से गुजरते हुए…कुछ अंश..पंक्तियाँ…पैराग्राफ हमें काफी पसंद आते हैं …प्रभावित करते हैं…सामान्‍य से ज्‍यादा सम्‍प्रेषित हो जाते हैं…चौंकाते हैं… कभी अपनी शैली से, शिल्‍प से, आलंकारिकता से और कभी विचारों के नएपन से… ऐसे में उन्‍हें साझा करने का मन करता है… कई बार इसी तरह दूसरे मित्रों के द्वारा हम अच्‍छी किताबों से परिचित हो जाते हैं… इसी जरूरत की उपज है यह ब्‍लॉग… आप कोई पुस्‍तक पढ रहे हैं, … पुस्‍तक का नाम, प्रकाशक का नाम, प्रकाशन वर्ष का विवरण देकर लिखिए पुस्‍तक के पसंदीदा अंश…साथ ही अपनी आलोचनात्‍मक विचार भी रख सकते हैं पुस्‍तक के बारे में, लेखक के बारे में… कम से कम या अधिक से अधिक जितना भी लिखना चाहें…
    साथ ही कहानी, लम्‍बी कविता या प्रभावशाली लेख की भी संदर्भ सहित विवेचनात्‍मक प्रस्‍तुति दी जा सकती है

    मुझे तो ये बातें इतनी प्रेरक लगीं कि मैं तो झट से इसका सदस्य बन गया। आप भी बनिए ना!

    वाल्तेयर की कई बातें काफ़ी प्रेरक हैं। जैसे उन्होंने यह कहा,

    “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूंगा।”

    इसी तरह पुस्तकों के संदर्भ में मुझे उनकी यह सूक्ति याद आती है,

    “मनुष्यों के सदृश्य ही पुस्तकों के साथ भी यह बात है कि बहुत थोड़ी संख्या में ही महत्वपूर्ण कार्य करती हैं, शेष का भीड़ में लोप हो जाता है।”

    ब्लॉग के संदर्भ में भी यही बात है। ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण ब्लॉग की चर्चा करना आज की चिट्ठा चर्चा का मेरा उद्देश्य है। आइए इसी तरह के एक और ब्लॉग पर आपको लिए चलते हैं।

    साइरस का कथन है,

    “अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।”

    जहां एक ओर ‘पुस्तकायन’ अच्छी समझ विकसित करने में सहायक है वहीं अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें निरंतर सामग्री मुहैया करता ब्लॉग है स्वास्थ्य-सबके लिए । कुमार राधारमण इसके ब्लॉगस्वामी हैं। स्वास्थ्य संबंधी अद्यतन जानकारी यहां पाया जा सकता है।

    मैंने इसके ब्लॉगस्वामी से पूछा कि क्या कारण है कि जबकि कई डाक्टर साहित्य का ब्लॉग चला रहे हैं,तब आपने साहित्य का छात्र होने के बावजूद स्वास्थ्य का ब्लॉग चलाने की सोची? तो उन्होंने बताया कि

    मैं काफी समय से महसूस कर रहा था कि अखबारों में स्वास्थ्य के संबंध में काफी भ्रामक खबरें छपती हैं। रोज़ नए अनुसंधान से लोगों को भरमाया जाता है मगर बाद में सालों साल उन अनुसंधानों का कोई अता-पता नहीं चलता। इसलिए लोगों तक ठोस खबरें ही पहुंचाई जानी चाहिए। मेरी कोशिश रही है कि केवल वही ख़बरें लूं जिनमें दवाओं के ट्रायल चूहों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि मनुष्य पर भी उनके प्रयोग कुछ हद तक उत्साहवर्द्धक रहे हों क्योंकि जो बीमार है,वह संबंधित खबर को बहुत आशा और गंभीरता के साथ देखता है,उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।”

    अभी हाल में ही एक पोस्ट आया है मोटापा घटाने में सहायक है घृतकुमारी

    मैंने जब उनसे जनना चाहा आपके ब्लॉग पर हर चिकित्सा विधासे जुड़ी खबरें दिखती हैं…….
    तो उनका उत्तर था – हां,ठीक कह रहे हैं। ब्लॉगिंग शुरु करने से पहले मैंने गौर किया कि स्वास्थ्य के विषय में ब्लॉग पर कैसी सामग्री उपलब्ध है। मैंने देखा कि एलुवेरा से ही फुंसी से लेकर एड्स तक का इलाज़ करने का दावा करता है, तो कोई सिर्फ आयुर्वेद से। मैं मानता हूं कि ये एकांगी दृष्टिकोण हैं। कोई भी चिकित्सा विधा स्वयं में पूर्ण नहीं है, सब एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए,जहां कहीं भी संभव हो, सभी विधाओं में इलाज़ के विकल्पों की ओर ध्यानाकर्षण किया जाना चाहिए। कुछ हद तक इसलिए भी कि कई कारणों से कई बार रोगी किसी विधा विशेष में ही समाधान जानना चाहता है।
    राधारमण जी खुद कोई चिकित्सक नहीं हैं। कुतूहलवश मैंने जानना चाहा अखबार में छपी खबरों की प्रामाणिकता आप कैसे जाचते हैं?
    तो कहते हैं  – यह एक बड़ी चुनौती है। मैं अपने स्तर से केवल इतना कर सकता हूं कि उन खबरों को प्राथमिकता दूं,जिनमें डाक्टरों को कोट किया गया हो अथवा जो स्वयं डाक्टरों द्वारा लिखे गए हों। फिर भी चूक की संभावना तो रहती है।

    इस तरह के ब्लॉग जिस पर समाज को कुछ खास किस्म की जनकारी दी जा रही हो न केबराबर टिप्पणी देख कर उसके ब्लॉगस्वामी को दाद देनी पड़ती है। जब मैंने राधारमण जी से पूछा, – क्या परिश्रम की तुलना में नगण्य टिप्पणियां देखकर मन हतोत्साहित नहीं होता?
    उनका उत्तर था – नहीं। अनिवार्यताओं को टिप्पणी की दरकार नहीं होती। फिर, ब्लॉग जगत में टिप्पणी के मायाजाल से सभी परिचित हैं। मैं इस दलदल का हिस्सा नहीं बन पाउंगा। पाठकों का ब्लॉग पर आना ही बहुत है,टिप्पणी करें न करें।

     

    स्वास्थ संबंधी यदि आपको कुछ रोग निवारक आसान नुस्खे. चाहिए तो मिलिए dr.aalok dayaram से उनके इस ब्लॉग पर। इस ब्लाग में सामान्य एवं जटिल रोगों में हितकारी घरेलू इलाज का विवेचन किया गया है। डा.आलोक का कहना है इन नुस्खों के घटक पदार्थ आसानी से प्राप्त हो सकते हैं और सावधानी पूर्वक उपयोग करने से इनके कोइ दुष्परिणाम भी नहीं होते हैं।

    पढने योग्य इनके अन्य ब्लाग हैं–

    अगर बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद एक बहुत प्रभावी धारणा थी तो वर्त्तमान सदी में यह एक पिछड़ेपन की धारणा मात्र है। आधुनिकता का संघर्ष जो अपूर्ण रह गया, वह तब तक चलता रहेगा जब तक एक सामान्य बात पूर्ण तौर पर प्रतिष्ठित नहीं होती – वह है ‘मानव ही सबसे बड़ा सच है उससे बढ़कर और कुछ नहीं! इसी की जनपक्षधर चेतना का सामूहिक मंच है जनपक्ष।

    एक और ऐसा ही ब्लॉग है जो समाज सेवा में लगा है। इसका नाम है भाषा,शिक्षा और रोज़गार। इसके ब्लॉगस्वामी खुद को शिक्षामित्र कहलाना पसंद करते हैं। उनका कहना है “रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे, कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं.!” दिन भर में अनगिनत पोस्ट डालते हैं, सभी शिक्षा जगत से संबंधित। उद्देश्य है लोगों को इस विषय से संबंधित जानकारी एक जगह सहज सुलभ हो और सबसे पहले हो।   शिक्षामित्र से जब मैंने पूछा कि अगर वे कुमार जलजला टाइप टिप्पणी कहीं नहीं कर रहे, तो फिर अपने नाम से ब्लॉगिंग क्यों नहीं?जवाब मिला – नाम में क्या रखा है, मैं बेनामियों की प्रतिष्ठा के लिए काम कर रहा हूं।
    मेरा दूसरा सवाल था – ब्लॉगिंग के लिए भाषा,शिक्षा और रोज़गार विषय क्यों? शिक्षामित्र का तर्क था-अपनी-अपनी पसंद है। ब्लॉगिंग शुरु करने के पहले, मैंने गौर किया कि ब्लॉग पर क्या-क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा। मैंने पाया कि न सिर्फ ब्लॉग पर, बल्कि देश की किसी वेबसाईट पर भी इन विषयों पर सामग्री उपलब्ध नहीं है। मुझे लगा कि गूगल के सुझाव के मुताबिक ही बाकी लोग तो व्यक्तिगत अनुभव और घर के फोटो आदि शेयर कर ही रहे हैं, तो मुझे कोई ऐसा फील्ड खोजना चाहिए जिसमें कोई काम नहीं हो रहा या नाममात्र काम हो रहा है। पूछते हैं,”यों भी, क्या आप सोचते हैं कि किसी को आपके अनुभव या कविता-कहानी में वास्तविक दिलचस्पी है? ऐसा नहीं है। लोग इसलिए ऐसी सामग्री देखते हैं कि सर्वत्र वही सब उपलब्ध है। आप जरूरत की दूसरी सामग्री देंगे, तो वह भी चलेगा।”
    मगर इसका रेस्पांस कैसा है? आपके ब्लॉग पर टिप्पणियां तो नहीं के बराबर हैं, फिर इस प्रकार के ब्लॉग का आप क्या भविष्य देख रहे हैं? शिक्षामित्र का दो टूक कहना है – मैंने यह ब्लॉग टिप्पणी के लिए शुरु नहीं किया है। इसलिए टिप्पणी वाले कॉलम में साफ घोषणा भी की गई है कि टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। मोटे तौर पर रेस्पांस भी ठीक ही है। लगभग 250 पेज रोज़ पढ़े जा रहे हैं। अब तो कई पाठक नौकरी के लिए बायोडाटा भी मेल करने लगे हैं। कई अन्य पाठक करिअर के संबंध में व्यक्तिगत प्रश्न का उत्तर चाहते हैं।   क्या इतनी सफलता कम है?”

    Laughing out loudइस सप्ताह इतना ही। इसी तरह के ब्लॉग्स लेकर फिर आऊंगा। तब तक के लिए विदा।

    मनोज कुमार में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

    हसरतसंज -मासूम मोहब्बत के कुछ प्यारे किस्से

    image मैं फिजिक्स का विद्यार्थी हूँ और होम साइंस की किताब चुपके से पढ़ रहा हूँ । पढने के बाद अंगडाई लेता हूँ जैसे हवाई जहाज कैसे बनता है, जान लिया हो । बाहर देहरी पर दस्तक हुई है, चुपके से किताब को यथास्थान रख देता हूँ और फिजिक्स के डेरीवेशन की किसी पंक्ति पर लटक जाता हूँ । उसकी होम साइंस

    टिफिन रखती है और चल देती है । मुड़कर वापस आती है “अच्छा वैसे किसकी शक्ल बिगाड़ने की कोशिश थी” । मैं शरमा जाता हूँ । “देखो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा है” कहती हुई बैठ जाती है । मैं गणितज्ञ होने की कोशिश में लग जाता हूँ । वो होम साइंस के शस्त्र निकाल लेती है । उसकी होम साइंस

    कमरे में उसकी खुशबु घुल सी गयी है । लम्बी साँस लेता हूँ और सर्किल बनाकर रुक जाता हूँ । याद हो आता है, उसे उसका चेहरा बहुत प्यारा है । सोचकर मुस्कुरा उठता हूँ , हमारी पसंद कितनी मिलती है । उसकी होम साइंस

    वो दोपहार को छत पर कपडे पसारने आई है । मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ । वो कह रही है “हमारा हाथ छोडो” । हम प्रत्युत्तर में कहते हैं “अगर नहीं छोड़ा तो” । तो “अम्मा….” । वो तेज़ आवाज़ देती है । मैं हाथ छोड़ देता हूँ । “बस डर गए” कहती हुई, खिलखिलाकर चली जाती है ।फ़िक्शन

    अँधेरा घिर आया है । छत पर महफ़िल जमी है । अम्मा आवाज़ देकर उसे बुला रही हैं । नीचे से आवाज़ आ रही है “आ रहे हैं” । सीढ़ियों पर मैं खड़ा हूँ । हमारा आमना-सामना हुआ है । वो आगे को बढ़ने लगती है । हम हाथ पकड़ लेते हैं । वो कुछ नहीं कहती । हम पास खींच लेते हैं । और उसके कानों के पास जाकर कहते हैं “आवाज़ दो फिर भी नहीं छोड़ेंगे” । वो मुस्कुरा उठती है ।फ़िक्शन

    बारिश बीतती तो आसमान उजला-उजला निखर आता । और तब, जब भी आसमान में इन्द्रधनुष को देखता तो जी करता कि इन साहब के कुछ रंग चुराकर पेंटिंग बनाऊँ । तमाम कोशिशों के बावजूद में असफल होता और इन्द्रधनुष मुँह चिढ़ाता सा प्रतीत होता । नानी कहती “अरे बुद्धू, उससे भी कोई रंग चुरा सकता है भला” । मैं नाहक ही पेंटिंग करने का प्रयत्न करता । मैं मासूम उड़ती चिड़िया को देखता, तो मन करता कि इसको पेंटिंग में उतार लूँ । कई बार प्रयत्न करता और हर दफा ही, कभी एक टाँग छोटी हो जाती तो कभी दूसरी लम्बी ।मैं और बचपन का वो इन्द्रधनुष

    कहती थी ना मैं “ईश्वर सबको कोई न कोई हुनर देता है । तुझे गणित जैसे विषय में उन्होंने अच्छा बनाया और अब देख कितने बच्चे तुझसे पढने आते हैं । तुझे आदर मिलता है, उनका प्यार मिलता है । दुनिया में जो सबसे अधिक कीमती है, वो तुझे बिन माँगे मिल रहा है ।” मैं और बचपन का वो इन्द्रधनुष

    उसके गालों पर डिम्पल थे । कितनी क्यूट लगती थी, जब वो हँसती । गुस्सा तो जैसे नाक पर रखा रहता उसके, जब भी मोनिटर-मोनिटर खेलती । हाँ, वो हमारी क्लास की मोनिटर जो थी । और मेरा नन्हा-मुन्ना सा दिल धड़क-धड़क के इतनी आवाजें करता कि बुरा हाल हो जाता ।बचपन की मोहब्बत

    वो एक दिन बोली “तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते थे ना । अब तो हम दोस्त हैं न ।”
    मैंने कहा “धत, दोस्ती ऐसे थोड़े होती है ।”
    “तो कैसे होती है ?”
    “गर्ल फ्रेंड तो गाल पर किस करती है ।”
    “अच्छा तो लो” और उसने मेरे गाल पर किस कर लिया ।

    यारों अपनी तो लाइफ सेट हो गयी । अब वो मेरी गर्ल फ्रेंड बन गयी….बचपन की मोहब्बत

    उसका आज जन्मदिन है और ये बात मुझे उसके पिछले जन्म दिन के बाद से ही याद है । न मालूम क्यों, जबकि मैंने ऐसा कोई प्रयत्न भी नहीं किया । याद हो आता है कि अभी चार रोज़ पहले उसने मेरे गाल को चूमा था । उस बात पर ठण्डी साँस भरता हूँ । उसके होठों के प्रथम स्पर्श का ख्याल मन को सुख देकर चला गया है ।स्मृतियों से वो एक दिन

    “हैप्पी बर्थ डे, माय लव” सुनकर वो खिलखिला जाती है । उसे गुलाब और कार्ड देते हुए गले लग जाता हूँ । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से हम यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं । मैं स्वंय को अलग करता हूँ । उसके गालों को चूम कर “हैप्पी बर्थ डे” बोलता हूँ । वो आँखों में झाँक कर प्यार की गहराई नाप रही है शायद । “अच्छा तो अब मैं चलूँ” ऐसा मैं कुछ समय बाद बोलता हूँ और पलट कर चलने को होता हूँ । वो हाथ पकड़ लेती है । हम फिर से एक दूसरे से चिपके हुए हैं । पहली बार उसकी गर्म साँसों और होठों को महसूस कर रहा हूँ ।स्मृतियों से वो एक दिन

    हरी घास के एकतरफ बनी हुई पगडंडियों पर तुम नंगे पैर दौडे जा रही हो और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ । डर रहा हूँ कहीं तुम गिर ना जाओ । किन्तु तुम यूँ लग रही हो जैसे हवा ने तुम्हारा साथ देना शुरू कर दिया है । राह में वो सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा तमाम रंग-बिरंगे गुब्बारे लेकर खड़े हुए हैं । हरे, लाल, पीले, गुलाबी, नीले, हर रंग में रंगे हुए गुब्बारे । तुम उन्हें देखकर ऐसे खुश हो रही हो जैसे एक मासूम बच्ची हो । उन गुब्बारों में एक रंग मुझे तुम्हारा भी जान पड़ता है, मासूमियत का रंग या शायद प्यार का रंग या फिर ख़ुशी का रंग । तुम, मैं और हमारी असल सूरतें

    खुशियाँ बिखेरती हुई तितलियाँ अपने अपने घरों को चली जाती हैं । तुमने मेरा हाथ फिर से पकड़ लिया है और हम चहलकदमी करते हुए अपने दरवाजे तक पहुँच गए हैं । फिर तुम अचानक से मेरे गाल को चूम कर दरवाजा खोलकर अन्दर चली जाती हो । मैं मुस्कुराता हुआ तुम्हारे साथ आ जाता हूँ ।
    सुबह उठ कर तुम मेरे सीने पर अपने सर को रख कर बोल रही हो “कहाँ ले गए थे मुझे” । और मैं तुम्हारे बालों को चूमकर कहता हूँ “हमारी पसंदीदा जगह” । तुम मुस्कुरा जाती हो । तुम, मैं और हमारी असल सूरतें

    एटीएम और क्रेडिट कार्ड पर खड़े समाज में ठहाकों के मध्य कभी तो तुम्हारा दिल रोने को करता होगा । दिखावे के उस संसार में क्या तुम्हारा दम नहीं घुटता होगा । चमकती सड़कों, रंगीन शामों और कीमती कपड़ों के मध्य कभी तो तुम्हें अपना गाँव याद आता होगा । कभी तो दिल करता होगा कच्चे आम के बाग़ में, एक अलसाई दोपहर बिताने के लिए । कभी तो स्मृतियों में एक चेहरा आकर बैचेन करता होगा ।

    फिर भी अगर तुम्हें कहीं सुकून बहता दिखे, तो एक कतरा मेरे लिए भी सुरक्षित रखना । शायद कभी किसी मोड़ पर हमारी मुलाकात हो जाए । वैसे भी, अभी भी कुछ उधार बनता है तुम पर । सुकून

    ये कुछ पोस्टों के अंश हैं –हसरतगंज ब्लॉग की। कल इनको देखा तो एक साथ सब पढ़ गया। बहुत अच्छा लगा। सोचा आपको भी पढ़वायें। मासूम मोहब्बत के प्यारे से किस्से।

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    पुराने डायरी का पन्ना डायरी से निकलकर नेट पर पहुंचा। कांधे से तिल बरामद!

     
    1.पर्यटन क्या है? : खबरदार जो किसी ने बताया कि सूटकेस भर कर घर लौटना पर्यटन है।
    2.फ़ुरसत में… भ्रष्‍टाचार पर बतिया ही लूँ !: अरे बतियाते रहेंगे कि कुछ अंजाम भी देंगे।

    3.……….क्या चीज है यह जिंदगी ?: बूझॊ तो जानें
    4.काश्मीर को आज़ाद होना चाहिए — भूखे नंगे हिंदुस्तान से — अरुंधती रॉय: का ही जुमला हो सकता है यह!
    5.एक ठो कुत्ता रहा …:ऊ भर जिंदगी खंभा खोजता रहा। 
    6.हिन्दी न्यूज़ चैनलों की घड़ी ठीक हो गई क्या?: घड़ी का छोड़िये लोग वक्त बदलने की मांग कर रहे हैं।
    7.मुखरित मौन …: शब्द का बहिष्कार!
    8.हम तो हैं मुसाफिर….: टिप्पणी की तलाश में!
    9.सरदार पटेल को याद करें: एक दिन की ही तो बात है कर लेते हैं।
    10.पुराने डायरी का पन्ना: डायरी से निकलकर नेट पर पहुंचा। कांधे से तिल बरामद!
    11.निशाचरण: रे दुखवा रे जा जा ओ रतिया के छैला
    12.प्रभा खेतान और ‘पीली आंधी’: शब्दों के सफ़र पर।

     13.फ़िक्शन: छत पर चांदनी और हमारी बेगम अख्तर!

    14.” पल जो हमने साथ गुजारे थे.. “: अब उनका कापी पेस्ट हो रहा है।
    15.इस हमाम में सभी नंगे हैं: और पानी का कहीं अता-पता नहीं।

    16.शरद ऋतु में काव्य खिलता है: ठिठुरते हुये?

    17.मेरी प्रेम कुटी में आना: रोने का इंतजाम पूरा है वहां!

    18.वर्धा-हिंदी का ब्लॉगर बड़ा शरीफ़ टाइप का जीव होता है: जरा-जरा सी बात पर खुश हो जाता है।

    19.दुनिया का सबसे अच्छा संदेश…खुशदीप: के अलावा कौन दे सकता है।

    20.नमस्कार !: बीस पोस्ट में अंतिम नमस्कार! बड़ा तेज ब्लॉग है।

    21.“घर से ऑफिस के बीच”: एक बेचारा नौकरी शुदा आदमी फ़ंस गया।

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    सस्ते पैनो से भी लिखी जा सकती है अच्छी कविता…….

    प्लेटफोर्म पर किताबो में सर गडाए बैठी है कुछ .ये कवियों के प्रेम की शिकार महिलाए है जो खूब किताबे पढ़ती है ओर रोते रोते कवियों को गालिया दिया करती है ………………..
    अच्छी चीजों से जुड़ा सबसे बड़ा विकार है की उन्हें इतना बार दोहराया जाता है की उनका होना एक मामूली सा हो जाता है कि उनकी अच्छाई एक उबाऊ अच्छाई में बदल जाती है ………

     कथा देश में गीत चतुर्वेदी……..
    पढना भी एक सतत प्रक्रिया है .जो कभी ख़त्म नहीं होती  ..उम्र बीतते बीते अक्सर आप पुरानी किताबों को उठाकर दोबारा पढ़ते है ओर उनके भीतर नए अर्थो को पाते है …ओर कभी ..कभी किसी लेखक को बरसो बाद उसकी वेव लेंथ में जाकर पकड़ पाते है ….ओर लिखना ? एक लेखक कभी कभी लिखने के बारे में भी लिखता है …..

     

    जब आप नहीं लिख रहे होते, तब आप क्या कर रहे होते हैं? मैं ज़्यादातर समय नहीं लिख रहा होता। ज़्यादातर मैं पढ़ रहा होता हूं, संगीत सुन रहा होता हूं, कोई फिल्म देख रहा होता हूं या यूं ही नेट सर्फ कर रहा होता हूं। मैंने पाया है, ईमानदारी से, कि जिन वक्तों में मैं नहीं लिख रहा होता, वह मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि असल में मैं उन्हीं वक्तों में लिख रहा होता हूं।

    अच्छी चीज़ों का सबसे बड़ा गुण या अवगुण यह है कि आप पर उसका कोई भी असर पड़े, उससे पहले वह आपको भरमा देती है। अच्छी कविता तो सबसे पहले भरमाती है। वह आपके फैसला करने की क्षमता को कुंद करती है और फैसला देने की इच्छा के लिए उत्प्रेरक बन जाती है। वह तुरत आपके मुंह से यह निकलवाती है- यह क्या बला है भला? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर वह धीरे-धीरे आपमें प्रविष्ट होती है। यही समय है, जब आपकी ग्रहण-क्षमता की परीक्षा होनी होती है। आप उसे अपने भीतर कितना लेते हैं, इसमें अच्छी रचना का कम, आपका गौरव ज़्यादा होता है।

    गीत जी को  किसी औपचारिक परिचय की जरुरत नहीं है ..यदि आप कंप्यूटर का एक   इस्तेमाल कुछ अच्छी चीजों को  पढने के लिए  करने वाले में से एक है तो उनका  ब्लॉग   भाषा शब्दों ओर संवेदनाओं के कई   नये स्तरों को अपनी तरह से परिभाषित करता है .उनके पास विचारो की एक नैसर्गिक जमीन है…पूरा लेख पढने के  उनके ब्लॉग बैतागवाडी  पर यहाँ क्लिक करिए

    साहिर से बरसो पहले एक नज़्म लिखी थी “.वो सुबह कभी तो आएगी..”….उम्मीद से लबालब.भरी हुई….पर आजकल की  नौजवान पीढ़ी सपनो को भी खुरच कर उसके नीचे की तहों को जांचना  चाहती  है …उसे  फतांसी से गुरेज नहीं है …पर  इस दुनिया में कुछ विलक्षण होने की उम्मीद   भी नहीं….

      श्रीश यथार्थ से सीधे भिड़ते है … 

    मुझे उम्मीद नही है,
    कि वे अपनी सोच बदलेंगे..
    जिन्हें पीढ़ियों की सोच सँवारने का काम सौपा है..!
    वे यूँ ही बकबक करेंगे विषयांतर.. सिलेबस आप उलट लेना..!

    उम्मीद नही करता उनसे,
    कि वे अपने काम को धंधा नही समझेंगे..
    जो प्राइवेट नर्सिंग होम खोलना चाहते हैं..!
    लिख देंगे फिर एक लम्बी जांच, …पैसे आप खरच लेना.

    दुर्भाग्य  से  हकीक़त  का  कोई  वैकल्पिक  स्रोत   नहीं  होता ….सो सीधी मुठभेड़ अनिवार्य है ..बौदिक मुहावरों की परत उतारे बगैर ….पोलिटिकली अन करेक्ट होने का खतरा उठाते हुए  …..तल्खी के थोडा नजदीक ……..
    दर्पण अपना हस्तक्षेप  जारी रखते है

    पास्ट -परफेक्ट ,प्रेजेंट -टेस

    वो क्रांतियों के दिन थे.
    और हम,
    मार दिए जाने तक जिया करते थे.
    सिक्कों में चमक थी.
    उंगलियाँ थक जाने के बाद चटकती भी थीं.
    हवाएं बहती थीं,
    और उसमें पसीने की गंध थी.
    पथरीले रास्तों में भी छालों की गिनतियाँ रोज़ होती थी.
    रोटियां,
    तोड़के के खाए जाने के लिए हुआ करती थीं.
    रात बहुत ज्यादा काली थी,
    जिसमें,
    सोने भर की जगह शेष थी.
    और सपने डराते भी थे.
    अस्तु डर जाने से प्रेम स्व-जनित था.

    ओम जिंदगी की हकीक़तो को कोमल  तरीके से टटोलने वाले कवि है .वे बिना पेचीदा हुए …..रिश्तो पर अपना फ़िल्टर रखते है …ओर उनकी जटिलताओ  आसानी से बयां …..उनके पास कई रंग है कुछ ठहरे हुए …कुछ मिले जुले ..इच्छाओ के अँधेरे में ये रंग अलग चमकते है

    यह बिलकुल हीं रात है
    और इसकी परिधि के भीतर

    ठीक चाँद इतनी खाली जगह है
    और बाकी सभी जगह अमावस बिछी हुई है

    इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
    मेरी कविता है
    और उसे लिख देना
    तुम्हें पा लेने जैसा है

    पर तुमने जाते हुए
    वक्त को दो हिस्सों में बाँट दिया था
    और वक्त का वो हिस्सा जिसमें कवितायेँ
    लिखी जानी थी,
    अतीत में गिर गया है

    महेन भी एक युवा कवि है …उनकी अपनी अलग संवेदनाये है ….अपनी अलग बैचेनिया ……अपने नजरिये ……..वे मानवीय जिजीविषाओ की   रोजमर्रा की कुछ साधारण घटनाओं में से  उम्मीद तलाशते है ….ओर अपने सपने बचाए रखते है…….उनका पता है हलंत

    थोड़ी सी उद्दिग्नता बची रहेगी ह्रदय में
    आँखों मे बची रहेगी सुंदरता देखने की थोड़ी बहुत समझ
    शब्दों में अर्थ खोजने की हिम्मत बची रहेगी
    बची रहेगी अभी कुछ दिन और जीने की इच्छा
    थोड़ी सी उदासी बची रहेगी हँसी के साथ
    उष्णता बची रहेगी स्पर्श में थोड़ी बहुत
    शिशु की मुस्कान में बची रहेगी थोड़ी उम्मीद
    और पुलक बची रहेगी एक लड़की की चुप्पी में
    जब हम जानेंगे अभी बचा हुआ है
    थोड़ा बहुत प्रेम हमारे आसपास

    कविताओ से गुजरते हुए ये भी सवाल उठता है के इसकी कितनी आवश्यकता है ?….दरअसल कविता है क्या ….इस सवाल का एक जवाब प्रियंकर जी कुछ यूँ देते है

    कविता हमारे अंतर्जगत को आलोकित करती है । वह भाषा की स्मृति है । खांटी दुनियादार लोगों की जीवन-परिधि में कविता कदाचित विजातीय तत्व हो सकती है, पर कविता के लोकतंत्र में रहने वाले सहृदय सामाजिकों के लिये कविता – सोशल इंजीनियरिंग का — प्रबोधन का मार्ग है । कविता मनुष्यता की पुकार है । प्रार्थना का सबसे बेहतर तरीका । जीवन में जो कुछ सुघड़ और सुन्दर है कविता उसे बचाने का सबसे सशक्त माध्यम है । कठिन से कठिन दौर में भी कविता हमें प्राणवान रखती है और सीख देती है कि कल्पना और सपनों का संसार अनंत है ।कविता एक किस्म का सामाजिक संवाद है ।

    उपरोक्त पंक्तिया उनके ब्लॉग  पर ६ अगस्त की पोस्ट से ली गयी है …….बिना उनका शुक्रिया अदा किये हुए …..मुझे लगा कविता का  इतना बेहतर   परिचय बांटना उचित है…….ओर आखिर में अपने फेवरेट शायर को याद करते हुए उनकी एक नज़्म के साथ…….

    दिल्ली – पुरानी दिल्ली की दोपहर

    लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
    चारपाई बुनने वाला जब
    घंटा घर वाले नुक्कड़ से, कान पे हाथ रख कर
    इक हांक लगता था – ’चार पाई. बनवा लो…’
    खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे.. डेढ़ बजा है..
    दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा

    ’जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन’

    गुलज़ार 


    डॉ .अनुराग में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

    सोमवार १८.१०.२०१० की चर्चा

    नमस्कार मित्रों!

    मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं।

    आज विजयदशमी है। असुरों पर विजय के उपलक्ष्य में हम विजयादशमी का पर्व मनाते हैं।  बिना विनय के विजय नहीं टिकती। आज कोलकाता में “मांएर बिदाई” है। पिछले चार पांच दिनों के उत्सवीय माहौल के बाद आज सेनूर खेला होगा और फिर कोला-कोली। हम सब एक दूसरे से गले मिलेंगे। प्रेम-सौहार्द्र और भाईचारे का प्रतीक। विनय हो तो यह भी टिकाऊ है वरना … यहां तो हर कोई … समझदार है।

    वर्धा चर्चा की चर्चा की आंच चारो तरफ़ फैली है। हम अपने लिए आचार संहिता बना लें। तभी हमारे आचरण में बदलाव आएगा। हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। ये मैं नहीं कहता। कहीं पढा था। मन किया तो लिख दिया। दुनिया बदलने का काम आसान नहीं। पर हौसला होना चाहिए।

    ये माना है मुश्किल सफ़र ज़िन्दगी का,

    मगर कम न हो हौसला आदमी का.

    ये भी मैं नहीं कहता। ये कहना है कुँवर कुसुमेश जी का! (title unknown) उनकी ग़ज़ल का शीर्षक है अंधरों से कोई भी डरने न पाए / अंधरों पे कब्ज़ा रहे रोशनी का!

    पर सवाल है कि इसे समझे कोई तब ना। कहते हैं

    समझने को तैयार कोई नहीं है,

    किसे फ़र्क समझाऊँ नेकी-बदी का.

    जुलाई से ब्लॉगिंग कर रहे हैं। इन तीन-चार महींनो में महज़ तीन पोस्ट आई है, जो इस बात का द्योतक है कि वो कंटेट और क्वालिटी में विश्‍वास रखते हैं, क्वांटिटी में नहीं। एक और क्वालिटी के पोस्ट में वो कहते हैं,

    विरासत को बचाना चाहते हो ,

    कि अस्मत को लुटाना चाहते हो.

    तुम्हारी सोंच पे सब कुछ टिका है,

    कि आख़िर क्या कराना चाहते हो.

    बहुत संवेदनशील और जिम्मेदारियों का एहसास करने वाली रचना लिखते हैं कुंवर जी, यह तो आभास हमें हो ही गया है, और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में इनकी पोस्ट इस बात की तसदिक करेगी। कुंवर जी मूलतः एक कवि हैं और इनके तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

    इनकी रचनाओं का उत्कर्ष ही यही है कि यह जीवन के ऐसे प्रसंगों से उपजी है जो निहायत गुपचुप ढंग से हमारे आसपास सघन हैं लेकिन हमारे तई उनकी कोई सचेत संज्ञा नहीं बनती। कुंवर जी उन प्रसंगों को चेतना की मुख्य धारा में लाकर पाठकों से उनका जुड़ाव स्थापित करते है।

    दौरे- मुश्किल से जो बचा जाये,

    मुश्किलों में वही फँसा जाये .

    ये उलट – फेर का ज़माना है,

    आजकल किसको क्या कहा जाये.

    इनकी रचनाएं एक ऐसी संवेद्य रचनाएं हैं जिसमें हमारे यथार्थ का मूक पक्ष भी बिना शोर-शराबे के कुछ कह कर पाठक को स्पंदित कर जाता है। मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को समय के ठहराव के बिम्ब पर प्रवाहित इनकी ग़ज़लें मन को बहुत झकझोड़ती हैं। रचनाएं भाषा शिल्‍प और भंगिमा के स्‍तर पर समय के प्रवाह में मनुष्‍य की नियति को संवेदना के समांतर, दार्शनिक धरातल पर अनुभव करती और तोलती है।  

    new parichay

    अब एक कार्टून

    कार्टून:- रावण के बाक़ी मुंहों का जुगाड़ भी हो गया…

    दहन होगा ना इस पुतले का …?!

     

    My Photoमेरे ऊपर पूछे गए प्रश्‍न का उत्तर मिले या ना मिले राजेन्द्र स्वर्णकार जी बड़े अच्छी बात कह गए हैं, दोहों में। देखिए शस्वरं पर उनकी पोस्ट कितने रावण !

    हालाकि इस विषय पर मैं उनसे न सहमत होते हुए पुरातन पंथी कहलाना पसंद करूंगा पर उनकी सोच कहीं न कहीं सही ज़रूर है। एक और दिक़्क़्त आई मुझे कि उनके ब्लॉग पर ताला लगा हुआ है इसलिए कुछ कोट करना मेरे लिए संभव नहीं है। हां टिप्पणियों से ही कुछ बातें और उस पोस्ट की विशेषता समझाने की कोशिश करता हूं।

    दोहों के विषय में क्या कहा जाए सभी आईना दिखा रहे हैं …..! रावण कहाँ नहीं दिखता …’यहाँ’ भी और समाज में भी …..!! अपनी रचना में उन्होंने कहा है रावण दहन के पीछे इतना धन व्यय करने के बजाए गरीबों को बाँट दिया जाये …जलने के बाद भी रावण कहाँ मरते हैं …..वो तो हम सब में जिन्दा है ….!!  अगर किसी एक का भी घर ग़रीबी की मार झेल रहा है तो रावण कहां मरा? अगर अशिक्षा, भुखमरी जैसी स्थिति है तो इसका मतलब किसी न किसी रूप में रावण का विद्यमान होना ही है!

    लीक से हटकर सोचने का साहस बहुत कम लोग करते हैं। राजेन्द्र जी ने किया है। मुझे पोस्ट अच्छी लगी और रवाण दहन की परंपरा बंद हो इस से इत्तेफ़ाक़ न रखते हुए भी यह मानता हूं कि सचमुच आज रावण चारों ओर दिखाई दे रहे हैं , विभिन्न रूपों में। पर दहन न कर क्या हम जो चाहते हैं पा लेंगे? हां यह अवश्य है कि आज के परिवेश में विचारों में परिवर्तन की ज़रुरत है। एक और टिप्पणी अच्छी लगी उसे भी पेश करता हूं, ये टिप्पणी उन्हीं कुंवर जी की है जिनकी चर्चा ऊपर कर आया हूं-

    लेखन में ज़बरदस्त मेसेज और शैल्पिक कसाव देखने को मिलता है. मेरा भी एक दोहा देख लें:-
    राम तुम्हारी भी रही, लीला अपरम्पार.
    एक दशानन मर गया, पैदा हुए हज़ार
    .

      पुनश्च :

    राजेन्द्र जी ने मेल से अपनी पोस्ट भेजी है, कुछ चुने हुए दोहे लगा रहा हूं-

    काग़ज़ और बारूद का पुतला लिया बनाय !

    घट में रावण पल रहा , काहे नहीं जलाय ?!

    लाख – करोड़ों खर्च कर’ हाथ लगावें आग !

    इससे बेहतर , बदलिए दीन – हीन के भाग !!

    लाखों हैं बेघर यहां , लाखों यहां ग़रीब !

    मत फूंको धन , बदलदो इनका आज नसीब !!

    हर बदहाली दहन हो , जिससे देश कुरूप !

    रोग अशिक्षा भुखमरी , रावण के सौ रूप !!

    विजय पर्व आधा अगर , इक राजा इक रंक !

    पूर्ण विजय होगी , मिटे जब हिंसा – आतंक !!

    आइए अब आपको एक यथार्थ से रू-ब-रू करवाते हैं। जैसा कि आपको मालूम है कि हम ब्लॉग की चर्चा कर रहे हैं तो यह भी एक ब्लॉग ही होगा। इस पर रेखा श्रीवास्तव जी बता मेरा फोटोरही हैं कि कुछ लोग आज भी (लिंक है) संकीर्ण मानसिकता के शिकार हैं और पुनर्विवाह हो जाने के बाद भी एक विधवा को सधवा मानने को तैयार नहीं हैं। आहत स्वर में कहती हैं,

    “हम कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं और हमारी सोच कहीं कहीं हमें कितना पिछड़ा हुआ साबित कर देती है? हमें अपने पर शर्म आने लगती है.”

    इस आलेख में सदियों से मौजूद स्‍त्री विषय कुछेक प्रश्‍न ईमानदारी से उठाए गए हैं। अपनी शिकायत दर्ज कराई गई है  स्‍त्री नियति की विविध परतों को उद्घाटित किया गया है और भेद-भाव की शिकार स्‍त्री को विद्रोह के लिए प्रेरित भी किया है।

     

    चाहते हो गर 

    अग्नि से बचना 

    तो ,

    जुगुप्सा की प्यास पर 

    काबू पाओ 

    मिल जायेंगे फिर 

    मीठे झरने 

    बस तुम 

    चिंगारी को 

    मत हवा दिखाओ …

    My Photoकहना है संगीता स्वरूप जी का। अपनी पोस्ट जुगुप्सा की प्यास के ज़रिए संयत कवित्‍व से भरपूर कविता द्वारा वो बताती हैं कि

    बढ़ जाती है तब

    जुगुप्सा की प्यास 

    न ही कोई शीतल 

    झरना  बहता है   

    अपने – अपने 

    अहम के दावानल में 

    फिर इंसान 

    स्वयं ही 

    स्वयं को झोंकता है .

    उनका व्‍यापक सरोकार निश्चित रूप से मूल्‍यवान है। काव्‍यभाषा सहज है। इनमें कल्पना की उड़ान भर नहीं है बल्कि जीवन के पहलुओं को देखने और दिखाने की जद्दोजहद भी है।

    एक और पोस्ट रेखा जी का आज द्रवित कर गया। पोस्ट का शीर्षक है समझौते से मौत तक ! पोस्ट है नारी ब्लॉग पर। ब्लॉग खुलते ही एक गाना शुरु हो जाता है , फ़िल्म साधना का

    जिस कोख में इनका जिस्म ढला

    उस कोख का कारोबार लिया

    जिस कोख से जनमे कोपल बन कर

    उस तन का करोबार किया

    औरत ने जनम दिया मरदों को

    मरदों ने उन्हें बाज़ार दिया

    रेखा जी कहती हैं

    “दहेज़ हत्याओं पर अभी अंकुश नहीं लगा है और न ही लगेगा जब तक कि दहेज़ देने और लेने वाले इस समाज का हिस्सा बने रहेंगे. फिर जब देने वाले को अपनी बेटी से अधिक घर और प्रतिष्ठा अधिक प्यारी होती है और समाजमें अपनी वाहवाही से उनका सीना चौड़ा हो जाता है तो फिर क्यों आंसूं बहायें?”

    एक दहेज के कारण हुई मौत का हवाला देते हुए कहती हैं

    “दहेज़ के विवाद को समझौते या किसी तरह से खुद को बेच कर लड़के वालों की मांग पूरी करने की हमारी आदत ही हमारी बेटियों की हत्या का कारण बनता है. जहाँ बेटी सताई जाती है, वहाँ के लोगों की मानसिकता जानने की कोई और कसौटी चाहिए? अगर नहीं तो समझौतों की बुनियाद कब तक उसकी जिन्दगी बचा सकती है? इनके मुँह खून लग जाता है वे हत्यारे पैसे से नहीं तो जान से ही शांत हो पाते हैं. ऐसे लोग विश्वसनीय कभी नहीं हो सकते हैं. इसमें मैं किसी और को दोष क्यों दूं? इसके लिए खुद माँ बाप ही जिम्मेदार है , जिन्होंने अपनी सामर्थ्य से अधिक दहेज़ माँगने वालों के घर में रिश्ता किया. उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दीजिये. अब मूल्य और मान्यताएं बदल रहीं है. बेटी किसी पर बोझ नहीं है वह अपना खर्च खुद उठा सकती है. उस घर में मत भेजिए कि उसके जीवन का ही अंत हो जाये.”

    अंत में एक अपील भी है उनकी –

    संकल्प करें की दहेज़ लोलुप परिवार में बेटी नहीं देंगे उसको सक्षम बना देंगे और उसको आहुति नहीं बनने देंगे.

    रेखा जी हम आप की बात से पूरी तरह सहमत हैं। आपके इस संकल्प को हमने दशकों पहले लिया था। एक बहन खो चुके हैं इस कुप्रथा के कारण, क्योंकि ह्मने संकल्प लिया था कि न दहेज लेंगे, न देंगे। उसकी मौत ने तोड़ा नहीं हमें, बल्कि संकल्प और भी दृढ हुआ है। क़नूनन जो सजा दिलवा सकते थे दिलवाई। हम तो जो देहेज लेकर शादी करता है उसकी बारात या शादी का हिस्सा भी नहीं बनते, चाहे वह कितना भी घनिष्ठ संबंधी ही क्यों न हो!

    मैंने शुरु में दो लाइन कही थी, फिर कहने का मन बन गया। हम अपने लिए आचार संहिता बनालें। तभी हमारे आचरण में बदलाव आएगा। हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता।

    मेरी पसंद

    My Photoआज की मेरी पसंद है रचना दीक्षित की कविता आसरा। अपना परिचय देते हुए कहती हैं

    “रचना हूँ मैं रचनाकार हूँ मैं , सपना हूँ मैं या साकार हूँ मैं, रिश्तों में खो के रह गया संसार हूँ मैं, शून्य में लेता नव आकार हूँ मैं, अपने आप को ही खोजता इक विचार हूँ मैं, लेखनी में भाव का संचार हूँ मैं, स्वयं से ही पूंछती की कौन हूँ मैं, इसी से रहती अक्सर मौन हूँ मैं,”

    प्रकृति से कविता में बहुत कम आए दो वृक्षों के बिम्बों का सहारा लेकर कवयित्री अपने पाठक को एक गहरा चिंतन आवेग सौंपती है जिसके स्पंदन से पाठक बच नहीं पाता। इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। रचना जी की इस कविता में से भावनाऒं का ऐसा रस उठा कि हमें कई पल रुक कर उन नीम और गुर्च के पेड़ों को निहारने पर विवश कर गया। जिंदगी के कई शेड्स इस कविता में ऐसी काव्‍यभाषा में प्रकट हुए हैं, जो मुझे यह कहने पर विवश कर रहे हैं कि रचना जी आप आज के समय की समर्थ कवयित्री हैं ।

    दूर से निहारती हूँ तुम्हें.

    सुना है,

    गुणों का अकूत भंडार हो तुम.

    वैसे, हूँ तो मैं भी.

    तुम में भी एक दोष है,

    और मुझ में भी.

    तुम्हारा असह्य कड़वापन,

    जो शायद तुम्हारे लिए राम बाण हो

    और मेरा, दुर्बल शरीर.

    मुझे चाहिए,

    एक सहारा सिर्फ रोशनी पाने के लिए.

    सोचती हूँ फिर क्यों न तुम्हारा ही लूँ.

    अवगुण कम न कर सकूँ तो क्या,

    गुण बढ़ा तो लूँ.

    आओ हम दोनों मिलकर

    कुछ नया करें.

    किसी असाध्य रोग की दवा बनें.

    दूर से निहारती हूँ तुम्हें,

    जानती हूँ, मैं अच्छी हूँ,

    पर बहुत अच्छी बनना चाहती हूँ.

    कहते हैं,

    नीम पर चढ़ी हुई गुर्च बहुत अच्छी होती है.

    बोलो! क्या दोगे मुझे आसरा,

    अपने चौड़े विशाल छतनार वक्षस्थल पर?

    आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।

    मनोज कुमार में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

    वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की कुछ और पोस्टों की चर्चा

    वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन में जो लोग आये थे उन्होंने अपने संस्मरण लिखना जारी रखा। प्रवीण पाण्डेय जी ने लिखा था-

    इस विषय में मेरी पोस्ट आनी शेष है, वक्तव्यों के देवता तो गांधीजी का आश्रम देखने के बाद ही तैयार हो गयी थी। उनकी कर्मशीलता का चित्रण आज के सामाजिक परिवेश के आधार पर था, ब्लॉगर सम्मेलन से तनिक भी सम्बद्ध न था।

    उनकी पोस्ट का इंतजार है। श्रीमती अजित गुप्त जी ने कल लिखा था:

    अनूप जी उम्‍दा चर्चा है। मेरी भी शाम को पोस्‍ट आ रही है। बस शाम का ही मुहुर्त्त निकला है।

    और उचित मुहूर्त पर उन्होंने अपनी पोस्ट लगाई। वर्धा सम्मेलन के बारे में लिखते हुये उन्होंने लिखा:


    अजित गुप्त

    साहित्‍य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्‍मेलन, सेमिनार और कार्यशालाएं नित्‍य प्रति होती हैं लेकिन ब्‍लागिंग के क्षेत्र में विधिवत कार्यशालाओं का प्रारम्‍भ करने का श्रेय श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी को जाता है। अभी हम जैसे कई लोग जो ब्‍लागिंग के क्षेत्र से नए जुड़े हैं, समझ नहीं पाए हैं, ब्‍लागिंग और ब्‍लागर की मानसिकता। कभी एक परिवार सा लगने लगता है तो कभी एकदम ही आभासी दुनिया मात्र। मेरे जैसा व्‍यक्ति जो नदी में डूबकर नहीं चलता बल्कि किनारे ही अपनी धुन में चलता है, के लिए एक नवीन अनुभव था।

    आचार संहिता पर अपनी राय जाहिर करते हुये उन्होंने लिखा:

    यहाँ बात आचार-संहिता की करनी थी, लेकिन सभी ने किसी भी व्‍यावहारिक या सैद्धान्तिक प्रतिबन्‍धों को नकार दिया। लेकिन हमारे नकारने से तो दुनिया चलती नहीं कि हमने कह दिया कि बिल्‍ली मुझे नहीं देख रही और हम कबूतर की तरह आँख बन्‍द कर बैठ जाएंगे। बिल्‍ली तो आ चुकी है, सायबर कानून भी बन चुके हैं और हम मनमानी के दौर से कहीं दूर जिम्‍मेदारी के दौर तक आ प‍हुंचे हैं। वो बात अलग है कि हमें अभी पता ही नहीं कि कानून का शिकंजा हम पर कस चुका है।

    सुरेश चिपलूनकर ने भी अपनी पोस्ट के बारे में सूचना देते हुये बताया:

    एक ठो छोटी सी पोस्ट हमहूं ठेल दिये हैं… वर्धा की रिपोर्ट “जरा हट के” 🙂
    उसे पढ़कर कुछ लोग “हट” लेंगे… और कुछ “खिसक” लेंगे… 🙂

    वर्धा की घटनाओं का जिक्र करते हुये सुरेश जी ने बताया:


    अजित गुप्त

    जो बात अब तक किसी को पता नहीं थी कि श्री अनूप शुक्ल का “पसन्दीदा शब्द” कौन सा है, अब यह राज़ नहीं रहा… वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन के दौरान दो दिनों में अनूप शुक्ल द्वारा 84 बार “हिन्दूवादी ब्लॉगर” शब्द का उच्चारण किया गया, इससे सिद्ध होता है कि यही उनका सबसे प्रिय शब्द है… अतः सभी ब्लॉगर्स से अनुरोध है कि भविष्य में वे अनूप जी को उनके इसी प्रिय शब्द से पुकारें…

    सुरेश जी की पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुये विवेक सिंह ने लिखा:

    साड्डे नाल रहोगे तो ऐसी ही पोस्ट लिखोगे । मजेदार । इमेज से निकल रहे हो आप । बधाई !

    सुरेश जी को वर्धा में कुछ लोगों ने टोका कि वे जितने गुस्से में अपनी फ़ोटो में दिखते हैं सच उसके एकदम अलग है। लोगों की समझाइश का सम्मान करते हुये सुरेश जी ने अपनी पोस्ट लिखते ही अपनी फ़ोटो बदल ली। यह होता है जनभावना का सम्मान और दबाब।

    अनीता कुमार जी ने भी जनभावना का सम्मान करते हुये लिखना शुरू किया और अपने संस्मरण लिखे। लिखकर उन्होंने बताया भी :


    अजित गुप्त

    वर्धा मीट में अनूप जी ने परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य की तरह स्नेह भरी डांट लगायी, फ़िर से कलम उठाने के लिए प्रेरित किया। अपने परिचय में जब हम ने कुछ ज्यादा कहने से संकोच किया तो उन्हों ने मेरी लिखी एक पोस्ट का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि किसी जमाने में हम ठीक ठाक लिख लेते थे और अब भी अगर फ़िर से लिखना शुरु कर दें तो ठीक ठाक लिख ही लेगें। तो अनूप जी ये पोस्ट आप को समर्पित- अच्छी है या बुरी आप की किस्मत्…

    अब चूंकि जिसको पोस्ट समर्पित की गयी उसकी खिंचाई का रिवाज है इसलिये उन्होंने परम्परा का निर्वाह करते हुये लिखा:

    खूब मजा आया…अनूप जी, जो सबकी मौज लेते रहते है, उनकी कविता जी ने ऐसी मौजिया खबर ली कि उनसे कुछ बोलते न बना।

    लेकिन चूंकि खिंचाई का कोटा कविता पूरा कर चुकीं थी इसलिये उन्होंने अपनी राय जाहिर की:

    अनूप जी की क्लास लेने का अपना सुख है, विशेषकर यह कि वे सर झुकाए अच्छी बच्चे की तरह डपट सुनते झेलते रहते हैं और कत्तई बुरा नहीं मानते. व्यक्तित्व का यह बड़प्पन बड़ी चीज है. वैसे इस बार आप साथ थीं तो खबर और मौज लेने में कुछ अधिक आनंद आया.


    लखनऊ से आये जाकिर अली’रजनीश’ ने अपनी बात कहते हुये खुलासा किया:


    अजित गुप्त

    अनूप जी से यूँ तो स्टेशन पर ही मुलाकात हो गयी थी, पर न जाने क्यों पूरे सम्मेलन के दौरान वे और उनकी बातों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। जब भी उनसे बात हुई, जानबूझकर वे डॉ0 अरविंद मिश्र का जिक्र ले ही आए। और जब भी मिश्र जी का नाम आए, वे कोई भी चुटकी लिए बिना न रह सके। अपनी बातों के दौरान उन्होंने कई बार दोहराया कि उनसे चुटकी लेने में उन्हें विशेष आनन्द आता है। अरविंद जी, सुन रहे हैं आप?

    अरविन्द मिश्र की कमी तो सच में खल रही थी। दूर बैठकर अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त करने में उनके वक्तव्यों में वो बात नहीं आ रही जो वे वहां मौजूद रहकर कर पाते। हालांकि जाकिर भाई ने काफ़ी कुछ अरविन्द जी की कमी को भरसक दूर करने का प्रयास किया और बताया:

    अनूप शुक्ल जी, ब्लॉग जगत के नारीवादी समर्थक ब्लॉगर माने जाते हैं। मेरे दिमाग में यह बात हमेशा गूँजती रहती है। इसलिए मैंने सोचा था कि इस बात का गहराई से अध्ययन किया जाए। और नतीजे सचमुच चौंकाने वाले थे। प्रोग्राम के दो दिनों में मेरी जब भी उनपर नजर पड़ी, वे 75 प्रतिशत से अधिक बार किसी न किसी नारी ब्लॉगर का उत्साह वर्द्धन करते मिले। कार्यक्रम में पहली बार पधारी नवोदित ब्लॉग गायत्री शर्मा, जोकि ब्लॉग पर शोध कार्य भी कर रही है, का उन्होंने विशेष ध्यान रखा।

    अरविन्द मिश्र ने इस बात को कहने का सही तरीका बताते हुये लिखा:

    शुकुल महराज को एक्सपोज करने की भी जरूरत है क्या ? पहले से ही वे खुल चुके हैं -अभी तो चिट्ठाचर्चा पर नारीय झुकाव वाली पोस्ट आने वाली ही होगी -फोटू शोटू के साथ …वे एक घोषित नारी सहिष्णु ब्लॉगर हैं !

    इस तरह वर्धा सम्मेलन ने अनूप शुक्ल की छवि नारी विरोधी से नारी समर्थक की कर दी। दो साल पहले उन्होंने अपनी छवि के आधार पर लिखा था:

    मठाधीश हैं नारि विरोधी
    बेवकूफ़ी की बातें करते।
    हिन्दी की न कोई डिगरी
    बड़े सूरमा बनते फ़िरते॥

    अविनाश वाचस्पतिजी ने अपनी बात कहते हुये लिखा:


    अजित गुप्त

    इसी प्रकार की आपत्तियां, आरोप-प्रत्‍यारोप आदि इस हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सेमिनार के संबंध में भी ब्‍लॉग पोस्‍टों में नजर आए, जिनसे इस सेमिनार की सार्थकता स्‍वयं सिद्ध हुई है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को इससे बल प्राप्‍त हुआ है। इस दौरान पोस्‍टों में, जो सवाल सबसे अधिक चर्चा में आए, वे ये हैं कि, किन ब्‍लॉगरों को बुलाया गया है, क्‍यों बुलाया गया है, उनका चयन किस आधार पर किया गया है और आचार संहिता की जरूरत ही क्‍या है आदि। इसी संदर्भ में पूर्व में आयोजित इलाहाबाद वाले ब्‍लॉगर सम्‍मेलन की अव्‍यवस्‍थाओं और अनियमितताओं का भी जिक्र किया गया।

    इन बातों पर अपनी राय जाहिर करते हुये उन्होंने लिखा:

    विचार तो यह होना चाहिए कि एक सुखद शुरूआत हुई है, मुझे नहीं बुलाया गया तो कोई बात नहीं, जिसको बुलाया गया, हैं तो वे भी हिन्‍दी ब्‍लॉगर ही। हम सबमें से ही एक हैं। एक हैं तो नेक भी होंगे, पर हम खुद कितने नेक हैं, यह सोचने की जहमत हम नहीं उठाते हैं। इसकी जगह होता यह है कि मैं तो सबसे धुरंधर ब्‍लॉगर हूं, मेरे बिना ऐसे आयोजन की कोई सार्थकता ही नहीं है, उपयोगिता नहीं है, कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, इससे बचना होगा और सब्र करना होगा।

    इस आयोजन के सूत्रधार रहे सिद्धार्थ त्रिपाठी ने भी अपनी बात कहना शुरू किया:


    अजित गुप्त

    जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।

    आगे अपनी बात कहते हुये उन्होंने लिखा:

    मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

    चर्चा जारी रहेगी। तब तक आप वर्धा में आये साथी ब्लॉगरों के फ़ोटो यहां देखें।

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    वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की कुछ पोस्टों की चर्चा

    वर्धा में हुये दो दिनिया मिलन-जुलन की इसकी पहले की कहानियां वहीं से लिखीं गयीं थीं। उधर बोला जा रहा था इधर लिखा जा और कुछ भाई लोग अपने उधर से टिपियाते भी जा रहे थे।

    पिछली पोस्ट लिखने तक सम्मेलन का ब्लॉगरों के हिस्से का मामला निपट चुका था। जिन लोगों का जिक्र किया मैंने पिछली पोस्टों में उसके अलावा जाकिर अली रजनीश, जय कुमार झा और अशोक कुमार मिश्र ने अपने विचार रखे। इसके बाद आई एक्स्पर्ट पवन दुग्गल ने आई टी कानूनों की जानकारी दी।

    ब्लॉग के बारे आई. टी. कानून से संबंधित जानकारी देते हुये उन्होंने बताया कि यदि आपकी बात किसी को बुरी और अपने खिलाफ़ लगती है और उसके द्वारा बताये या नोटिस देने के बाद आप उसे तुरंत अपने ब्लॉग से हटा लेते हैं तो आपके खिलाफ़ कोई मामला नहीं बनता।

    सुरेश चिपलूनकर ने एक सवाल पूछा था कि यदि आप किसी दूसरी साइट या अखबार का मसाला इस्तेमाल करते हैं और उसका जिक्र भी करते हैं और आपकी बात किसी को बुरी लगती है तो क्या साइट या अखबार के साथ आपको खिलाफ़ भी मुकदमा बनता है। इस पर उनका कहना था कि हां ऐसे मामले में भी आप पार्टी बन सकते हैं। लेकिन यदि आप सूचना या नोटिस मिलने के बाद अपने ब्लॉग या साइट से वह सामान उतार लेते हैं और खेद प्रकट करते हैं तो आपके खिलाफ़ कोई मामला नहीं बनता।

    अगर यह बात सच है तो फ़िर स्नैप शॉट लेकर धरने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिये।

    पवन दुग्गल ने साइबर मसले से जुड़े कुछ मनोरंजक किस्से भी सुनाये जैसे कि:

    १. एक जगह पुलिस ने छापा मारा और केवल मानीटर उठाकर ले गयी। सी पी यू छोड़ गयी। बाद में मानीटर इधर-उधर कर दिये और मामला रफ़ा-दफ़ा।

    २. एक जगह सबूत के लिये ली गयी पुलिसिया च अदालतिया अंदाज में फ़्लॉपियां सूजे से छेदकर नत्थी करके अदालत में पेश की गयीं। जाहिर है फ़्लॉपी पर कुछ भी पढ़ने में न आया।

    ३. एक जगह पीसी उठाकर ले गये पुलिस अधिकारी के घर में बच्चों ने होमवर्क किया! गणित के सवाल। इसी बिना पर छूट गया मामला कि इसमें तो कुछ है ही नहीं सिवाय गणित के सवालों के।

    वर्धा से लौटकर तमाम लोगों ने अपने संस्मरण लिखे हैं उनमें से कुछ का जिक्र यहां करते हैं!

    संजय बेंगाणी को वर्धा सम्मेलन की तीन बातें यादगार लगीं:
    १.देर शाम को हिन्दी के महान कवियों की कविताएं पूरे सुर-ताल में सुनना!
    २.अधिवक्ता पवन दुग्गल द्वारा सायबर अपराध पर हिन्दी में जानकारी दिया जाना!
    ३.रवि रतलामीजी की दूरस्थ प्रस्तुति और उसकी भाषा. पहली बार लगा चिट्ठाकारिता की अपनी भाषा में कोई तो बोला. पहला ही वाक्य था, संहिता को गोली मारो. साहित्य की भाषा से विद्रोह.

    इसके अलावा संजय बेंगाणी ने सिद्धार्थजी व उनके सहयोगी जो जी-जान से जुटे रहे सम्मेलन को सफ़ल बनाने में उनकी मन से प्रशंसा की अभी एक और पोस्ट वर्धा की यादों पर अंजय निकाल सकते हैं।

    जय कुमार झा ने हिन्दी ब्लॉगिंग सम्मेलन सफ़ल बनाने में पर्दे के पीछे के हीरों का जिक्र किया तारीफ़ सहित।

    डॉ महेश सिन्हा ने भी वर्धा सम्मेलन से लौटने के किस्से बताये कि कैसे वे बाल-बाल बचे। इस पोस्ट में आलोक धन्वा के वक्तव्य का अश भी है जिसके एक भाग पर संजय बेंगाणी को त्वरित एतराज हुआ (इसके बारे में फ़िर कभी)

    रवीन्द्र प्रभात जे जितने सलीके और प्रभावशाली अंदाज में अपनी बातें रखीं ब्लॉग के बारे में सम्मेलन में उतने ही बल्कि और सुघड़ तरीके से तस्वीरें और रपट पेश की। अभी तक उनकी तीन रपटें आ चुकी हैं। आगे और जारी हैं देखिये:

  • कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी
  • कैमरे में कैद वर्धा में आयोजित संगोष्ठी की सच्चाई
  • अविस्मरणीय रहा वर्धा में आयोजित संगोष्ठी का दूसरा दिन
  • फ़ोटो के साथ विवरण/संवाद पेश करने का अंदाज रवीन्द्र प्रभात का बहुत अच्छा लगा।

    विवेक सिंह ने भी वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच ) लिखा। अब सच क्या और झूठ क्या लेकिन विवेक की भोली शक्ल और भले व्यवहार को देखकर कविताजी ने उनके पिछले सारे पाप क्षमा कर दिये यह कहते हुये -अरे तू तो बच्चा है।

    संजीत त्रिपाठी ने भी अपने संस्मरण लिखे। संजीत के साथ अनिल पुसदकर को भी आना था लेकिन आये नहीं। डा.महेश सिन्हा संजीत को लेकर आये। संजीत से मिलना भी एक मजेदार अनुभव रहा।

    प्रवीण पाण्डेय जी ने भी अपने अंदाज में सारा कुछ देखा-भाला और बताया–वक्तव्यों के देवता

    कविता जी ने दो दिन के सारे घटनाक्रम की रिपोर्ट बहुत सलीके से पेश की! सभी घटनाओं के बारे में इतने अच्छे तरीक से वे ही लिख सकती हैं। ऐसी रपट जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया जाना मुमकिन नहीं।

    यशवंत ने अपनी संस्मरणात्मक रपट में तो अपना दिल ही उड़ेलकर रख दिया। इस रपट में उन्होंने अपने बारे में भी बताया:

    मेरी दिक्कत है कि मैं किसी से बहुत जल्दी अभिभूत हो जाता हूं और किसी से भी बहुत जल्दी फैल जाता हूं.

    कुछ लोगों को आत्मीयता से लबालब भरी पोस्ट पढ़कर शायद यह लगे कि यह बहुत जल्द अविभूत व्यक्ति के संस्मरण हैं लेकिन चूंकि मैं वहां था और इन सब अनुभवों का गवाह रहा इसलिये कह सकता हूं जो यशवंत ने लिखा वह सच है। यह अलग बात है कि इस तरह हर कोई लिख नहीं पाता। अद्भुत संस्मरण है यह इस सम्मेलन के बारे में।

    और बाकी रपटों के बारे में जारी रहेगी। तब ताक आप ये बांच लें और अन्य लोगों के संस्मरण भी आ जायेंगे तब तक। ठीक है न!

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    साला न कहें भाई साहब कहें


    सबेरे के नास्ते के बाद हम लोग सेवाग्राम देखने गये। दस मिनट की दूरी पर स्थित आश्रम में आज सुबह सबसे पहले शायद हमारी टीम ही पहुंची। गांधी जी से जुड़ी तमाम वस्तुएं देखीं। गांधी जी दिन प्रतिदिन की दिनचर्यी का विवरण देखकर हम सभी को एक बार फ़िर लगा -गांधीजी अद्भुत व्यक्तित्त्व थे। कई लोगों ने इस बात को वहां रखे रजिस्टर में भी लिखी।

    गांधी आश्रम के बाद हम पास ही स्थित विनोबा भावे जी का आश्रम देखने गये। आश्रम के पास बहती पवनार नदी की तरफ़ सब पहले गये। वहां फ़ोटो सोटो हुये। आश्रम से हम लोग सुबह नौ बजे लौट आये।

    लौटकर नाश्ता करते हुये आलोक धन्वा जी का कविता पाठ सुना। उनका वक्तव्य रिकार्ड किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कल कही बातें भी दोहराई। गुजरात दंगो पर उनकी बात पर संजय बेंगाणी की त्वरित प्रतिक्रिया थी कि जब यह वक्तव्य पोस्ट किया जायेगा तब वे अपनी टिप्पणी करेंगे। संजय बेंगाणी ने यह भी कहा कि उनको तो दुनिया बहुत अच्छी लगती है।

    नाश्ते के बाद शुरु हुये सत्र में ब्लागरों ने अपने विचार व्यक्त किये। शुरुआत सुरेश चिपलूनकर ने की। नये ब्लागरों को अपनी तरफ़ से उन्होंने ब्लागिंग के गुर सिखाये। उन्होने बताया कि दूसरे के ब्लाग पर टिप्पणी करना सबसे अच्छा तरीका ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिये। तत्थात्मक बातें लिखनी चाहिये। सामग्री स्रोत का लिंक देना चाहिये। माडरेटर के बारे में उन्होंने बताया कि विरोधी बातों का शालीलना से जबाब देना चाहिये। बहुत गुस्सा आये तो आप साले की जगह भाईसाहब शब्द का इस्तेमाल करते हुये कह सकते हैं- भाई साहब आप बहुत हरामी हैं।

    हर्षवर्धन त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत वर्धा विश्वविद्यालय को और खासकर विभूति नारायण राय और सिद्धार्थ त्रिपाठी को इस बात को धन्यवाद देते हुये कही कि उनके सहयोग से यह संभव हुआ कि ब्लॉगिंग पर बातचीत करने के लिये मंच मुहैया कराया। हर्षवर्धन ने आचारसंहिता को सिरे से खारिज करते हुये यह बताया आप जो भी लिखें पूरी बात पक्की जानकारी से लिखे। उन्होंने विस्फ़ोट,मोहल्ला,भड़ास, अर्थकाम.काम का उदाहरण देते हुये बताया इन ब्लाग में उद्यमिता के माडल के रूप में लिया जाना चाहिये। हम समय और आवश्यक्ता के अनुरूप के साथ बदलते हैं। आज यशवंत सिंह उतने ही आक्रामक नहीं हैं जितने शुरुआती दिनों में थे। वे आज ज्यादा समझदार से हुये हैं। यह वित्तीय जरूरत से पैदा यह समझ है। और ब्लागिंग अनामी ब्लागर के बारे में अपनी राय रखते हुये हर्षवर्धन ने कहा कि व्यक्तिगत हिसाब निपटाने के लिये बेमानी ब्लाग लिखना अनुचित है लेकिन जनहित में संस्थागत लड़ाइयां लड़ने के लिये बेनामी की आवश्यकता पड़ सकती है। उनका मानना है कि ब्लाग पर विश्वनीयता बनाये रखे के लिये खबरें तथ्यात्मक होनी चहिये।

    रवीन्द्र प्रभात ने अपने ओजपूर्ण वक्तव्य में बताया कि हम अच्छे बनें, धनात्मक रहें, खुश रहें। हम अपनी पत्नी को नहीं बदल सकते है, साथ जुड़े अन्य लोगों को नहीं। लेकिन हम प्रयास कर सकते हैं कि अपने आप को बदल सकते हैं। कई उदाहरण देते हुये उन्होंने बताया कि कैसे हम अच्छे विचार ब्लागर बन सकते हैं।

    अविनाश वाचस्पति ने कहा कि आचार संहिता की बात अगर न भी मानें तो मन की बात माननी चाहिये और ऐसी बातें करने से बचना चाहिये जिससे लोगों को बुरा लग सकता है।

    प्रवीण पाण्डेय ने राजा बेटा की तरह अपना और अपने ब्लॉग का परिचय देते हुये दुविधा जाहिर की वे उन लोगों के सामने अपनी बात कहने आये हैं जिनको पढ़ते हुये उन्होंने ब्लॉगिंग शुरु की। इसे वे अपना सम्मान समझे या यह कि उनको कठिन इम्तहान में खड़ा कर दिया गया है। प्रवीण जी ने अपनी ब्लाग यात्रा के बारे में बताया कि टिप्पणियों और वुधवासरीय पोस्ट से शुरु कर के वे अब अपने ब्लाग पर लिखने लगे हैं- न दैन्यम न पलायनम।

    प्रवीण जी ने अतियों से बचने के अपने सहज स्वभाव के बारे में बताते हुये नदी के उदाहरण के माध्यम से बताते हुये बताया कि अतियों पर चलने वाले लोग या तो किनारे पर रुक जाते हैं या भंवर में फ़ंस जाते हैं। लिखने से ज्यादा पढ़ने और जितनी टिप्पणियां उनको मिलती हैं उससे पांच गुनी ज्यादा करने की बात भी प्रवीण जी ने कही।

    सुश्री गायत्री शर्मा ने अपने ग्रुप का प्रस्तुतिकरण करते हुये ब्लागिंग की सामाजिक उपयोगिता पर समूह के विचार पेश किया। उन्होंने सुनामी ब्लॉग का उदाहरण देते हुये ब्लॉग की सामाजिक उपयोगिता के बारे में अपनी बात कही। गायत्री शर्मा की बातचीत अलग से पूरी टेप में पेश की गयी है।

    कल की तरह आज भी दो मिनट छीनकर यशवंत सिंह मंच पर आ गये हैं। उनका कहना है कि हम हिंदी पट्टी के लोग अतियों में जीते हैं। या तो हम अराजक हो जाते हैं या फ़िर बेहद भावुक। अंग्रेजी के लोग तार्किक होते हैं इसलिये वे गाली और गप्प को कम तथ्य को ज्यादा तरजीह देते हैं। हम हिंदी वाले गाली और गप्पों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तथ्य पर कम। यशवंत ने अपनी यादों का जिक्र करते हुये यह कहा कि शायद पिछले समय में उन्होंने भी एक आम हिंदी ब्लॉगर की तरह अतियों पर रहते हुये तमाम बेवजह बातें और दूसरों को दुख पहुंचाने वाली पोस्टें लिखीं। लेकिन अब समय के साथ हमारी सोच में बदलाव आया है और अब वे इस तरह की दूसरों को दुख पहुंचाने वाली बेवजह पोस्टें लिखना बंद कर दिया है।

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