यहां वहां से उठाकर रखे कुछ अधूरे पूरे सफ्हे

शब्द शब्द होते है …उन्हें किसी लिबास की आवश्यकता क्यों……न किसी नेमप्लेट की…….कभी कभी उन्हें गर यूं ही उधेड़ कर सामने रखा जाए तो……
.
(एक)

हर दिन की तरह, अल्सुबह की नरमी आँखों में भारती रही, दोपहर का सूरज चटकता रहा और सुरमई शाम का जाता उजाला स्वाद बन जीभ पर तैरता रहा.. जिस बीच कई दिनों से खुद से लापता रहने के बाद मौसम के चेहरे पर खुशियाँ तलाशने में जुटना और इस कवायद में एक स्वप्निल जगह का बनना और ठहर जाना.. सब कुछ के बावजूद खुद को पा लेने वाले अपने ही अंदाज़ में. लेकिन खुद को पाना कभी खुद से लापता रहने वाली लुका छिपी के बीच वाली जगह में अभिवादन और खेद सहित लौटी – लौटाई गयी इच्छाएं ठूस-ठूस कर एक नुकीले तार में पिरोकर टांग दी गयी थी… मजबूत, कमज़ोर, छोटी, बड़ी, इस या उस तरह की.. अब यदि उनमे से किसी एक इच्छा को उतार कर निकलना फिर टटोलने का मन हो तो बाकी को भी उतारना और फिर उन्ही रास्तों, पतझड़ी मौसम की उदासियों की तरह गुज़ारना होता, सच के झूट में तब्दील होता एक पहाड़.. जहाँ तक हांफते हुए दौड़ना, पहुंचना फिर लौटना.. सांसो की आवा-जाही के साथ तार से बिंधी इच्छाओं को उतारना- संवारना… एक कातर नज़र डालना और पलटकर फिर टांग देना

(दो)
क्या किया जाना है?
आवेदनपत्र भरो
और नत्थी करो बायोडाटा

जीवन कितना भी बड़ा हो
बायोडाटा छोटे ही अच्छे माने जाते हैं.

स्पष्ट, बढ़िया, चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज़ है
लैंडस्केपों की जगह ले लेते हैं पते
लड़खड़ाती स्मृति ने रास्ता बनाना होता है ठोस तारीख़ों के लिए.

अपने सारे प्रेमों में से सिर्फ़ विवाह का ज़िक्र करो
और अपने बच्चों में से सिर्फ़ उनका जो पैदा हुए

(तीन)

आज लिखने बैठा तो कुछ प्रश्न मन में आये – मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ? 
बाउ के बहाने पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक निहायत ही उपेक्षित ग्रामक्षेत्र की भूली बिसरी गाथाओं की कथामाला हो या सम्भावनाओं की समाप्ति के कई वर्षों के बाद बीते युग में भटकता प्रेम के तंतुओं की दुबारा बुनाई करता मनु हो, मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ? 
मैं वर्तमान पर कहानियाँ क्यों नहीं लिख रहा?
अंतिम प्रश्न – जाने कितनों ने ऐसे विषयों पर लिख मारा होगा, तुम कौन सा नया कालजयी तीर चला रहे हो?  
उत्तर भी आये हैं – तुम इसलिए लिख रहे हो कि लिखे बिना रह ही नहीं सकते। कभी वर्तमान पर भी लिखने लगोगे। कहानियाँ समाप्त कहाँ होती हैं?

लिखते हुए सोचा बस है, तुम और इंटेलेक्चुअल हो गई होगी। आयु, परिवेश, सहचर और बच्चों के प्रभाव तुम पर पड़े होंगे क्या? इसे पढ़ोगी भी? पत्र है यह? कहाँ अटके हो मनु? – यह सब तुम्हारे मन में आएँगे क्या? 

कभी कभी बहक किसी को भीतर तक हिला जाती है। दादा! बहकने वालों को पता ही नहीं होता और दूसरों के रास्ते खो जाते हैं… 

(चार)
साँसें बारीक काटकर
भर लें आ
सौ सीसियों में..
“ऊँची ऊँचाई” पर जब
हाँफने लगें रिश्ते
तो
उड़ेलना होगा
फटे फेफड़ों में
इन्हीं सीसियों को

होमियोपैथी की खुराक
देर-सबेर असर तो करेगी हीं!!

(पांच )
बाँध लो कस के सीट बेल्ट अपनी
रास्ते में बहुत ही मिलते हैं
तेज झटके एस्टेरॉयड से,
देख लो बस यहीं से बैठे हुए
दूर से तुम शनी के वो छल्ले
अगर छू दोगी उन्हें तुम जानां
उनकी औकात बस रह जायेगी
एक मामूली बूम रिंग जितनी,
बहुत तारीक़* सी सुरंगें हैं
आगे जा कर ब्लैक होलों की
डर लगे गर..मुझे पकड़ लेना,
ध्यान देना कहीं इसी ज़ानिब
एक आवाज़ का ज़जीरा है
पिछले साल के उस झगडे में
तुमने दी थीं जो गालियाँ मुझको
सब सुनाऊंगा, झेंप जाओगी,
ये ‘स्टॉप’ पहले आसमां का है,
सात आसमानों के सात स्टॉप होते हैं,
ये जो नेब्युला* देखती हो ना
ये हामिला सी लगती है
एक तारे का जन्म होगा अब,
बहुत ही दूर निकल आये हैं
चलो अब लौट ही चलें वापस
जिया सालों की ये जो दूरी है
चंद मिनटों में तय हो जाती है
खयाली कार से अगर जाओ,
अब तो वापिस ही लौट आये हैं
ज़रा देखो न सफर में अपने
चाँद भी जम गया है शीशों पर
ज़रा ठहरो एक घडी तुम भी
ज़रा ये वाइपर चलाने दो…. !

(छह )

(सात )

विकिलीक्‍स जैसा कुछ करने के लिए मंशा चाहिए। वह हमारी नहीं है। हम किसी भी सच्‍चाई से ज्‍यादा खुद से प्‍यार करते हैं – यह सच है। और विकिलीक्‍स माध्‍यमों (प्रिंट, ध्‍वनि, टीवी, वेब) का मसला नहीं है – वह सच्‍चाई से कुर्बान हो जाने की हद तक प्‍यार करने का मसला है। ये जिद जब किसी में आएगी, तो वह किसी भी माध्‍यम का इस्‍तेमाल करके विकिलीक्‍स जैसा काम कर जाएगा।
हमारे यहां और हमारे पड़ोस में कई सारी ऐसी चीजें हैं, जिसके दस्‍तावेजों को खोजा जाना चाहिए। बल्तिस्‍तान का मसला, कश्‍मीर पर सियासी फायदों से जुड़े रहस्‍य, मणिपुर को लेकर सरकारी पॉलिसी, युद्धों में आदेशों की फाइलें, गुजरात, 26/11… हमारे सामने किसी का भी पूरा सच मौजूद नहीं है। हमारे टेलीविजन सरकारी जबान को ही सच मानते हैं और जो सूत्रों से जानते हैं, उनमें विस्‍मयादिबोधक चिन्‍ह लगाते हैं। अपनी तरह से सच तक पहुंचने की जहमत नहीं उठाते।
एक बात यह भी है कि हम गरीब देश हैं और हमारे यहां अपनी दिलचस्पियों के साथ वयस्‍क होने की इजाजत नहीं है। हम दूसरों की उम्‍मीदों के हमदम होते हैं और हमारी ख्‍वाहिशों का कोई मददगार नहीं होता। हम हिंदी पढ़ते-पढ़ते साइंस पढ़ने लगते हैं। पत्रकारिता करते करते पीआर करने लगते हैं और आंदोलन करते करते संसद खोजने लगते हैं। ऐसे में कौन बनेगा जूलियन असांजे, एक अजीब सवाल है और फिलहाल तो विकल्‍प गिनाने के नाम पर दूर दूर तक कोई प्रतीक भी नहीं है।

चलते चलते-
चिठ्ठा चर्चा के एक बेहद गंभीर पाठक फिलहाल गले के केंसर के ओपरेशन के बाद   अस्पताल में है …अपने जीवट व्यक्तित्व ओर लगभग निडर स्वभाव के मुताबिक उन्होंने केंसर से भी दो दो हाथ कर  लिये है…..उन्हें अच्छी फिल्मे देखने का बेहद शौंक है ….उनके स्वास्थ्य की बेहतर शुभ कामनायो सहित …….विश्व सिनेमा की एक बेहतरीन फिल्म  का एक द्रश्य डॉ अमर कुमार के वास्ते

http://www.youtube.com/v/vWTL9AFrxUo?fs=1&hl=en_US

डॉ .अनुराग में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

सोमवार (१३.१२.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों! मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं सोमवार की चर्चा के साथ। कुछ दिन के अंतराल के बाद आया हूं। ऐसी कोई खास व्यस्तता न होते हुए भी कुछ ऐसा होता गया कि इस मंच से चर्चा करने का समय निकाल नहीं पाया।

मेरा फोटोआज की चर्चा शुरु करते हैं संजय ग्रोवर जी के एक नए ब्लॉग सरल की डायरी से। इस पर इन्होंने एक कथा पोस्ट की है जिसका शीर्षक है सारांश-2 .. एक व्यंग्य कथा के ज़रिए संजय जी व्यवस्था के विकृत चहरे को अपने कलम की साधना से उकेरने का बेहतर प्रयास किया  है। कहानी का एक अंस है

बाहर हवा जिस तरफ़ बह रही है, सारे फूल-पत्ते-धूल-धक्कड़ और इंसान उसी दिशा में उड़ रहे हैं। पड़ोसी जो गुण्डों के चलते रोहिनी से कटे-कटे रहते थे, अब गुण्डों के होते रोहिनी के साथ आ खड़े होते हैं। रोहिनी और सोनी, गुण्डों के साथ मिलकर नारी-मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ातीं हैं। विष्णु आज-कल हर शाम गुण्डों के लिए फूल लाता है।

सारांश -२ हिला देने वाली ‘कथा ‘है। आंधी के साथ निर्जीव बस्तुएं बहती हैं –सूखे .निर्जीव पत्ते और धूल . .संवेदनाएं जब , जिन लोगों की मर जाती हैं ऐसी ही आंधी की प्रतीक्षा करते हैं। संजय ग्रोवर की कहानी से गुज़रना एकदम नए अनुभव से गुज़रना है क्योंकि इसमें यथार्थ इकहरा नहीं है, बल्कि यहां आज के जटिलतम यथार्थ को उघाड़ते अनेक स्तर हैं।

कुमार राधारमण पेश कर रहे हैं एक बेहद ज़रूरी आलेख प्लास्टिक से ज्यादा खतरनाक है तंबाकू! हालाकि सुप्रीम कोर्ट ने गुटखा और पान मसाला की प्लास्टिक पाउच में बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सुनाया है। फैसला स्वागत योग्य है लेकिन इससे तंबाकू के उपयोग, उससे होने वाली स्वास्थ्य हानि और ब़ढ़ते खतरनाक रोगों में कोई कमी आ जाएगी ऐसा नहीं लगता।

तंबाकू के ब़ढ़ते खतरे और जानलेवा दुष्प्रभावों के बावजूद इससे निपटने की हमारी तैयारी इतनी लचर है कि हम अपनी मौत को देख तो सकते हैं लेकिन उसे टालने की कोशिश नहीं कर सकते। यह मानवीय इतिहास की एक त्रासद घटना ही कही जाएगी कि कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की सक्रियता के बावजूद स्थिति नहीं संभल रही। क्या तंबाकू के खिलाफ इस जंग में हमें हमारी नीयत ठीक करने की जरूरत नहीं है?

तम्बाकू धीमे जहर के रूप में समाज के सभी वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है। तम्बाकू के लिए जनजागरण में मीडिया के साथ ब्लॉगजगत की भी अहम भूमिका हो सकती है। और इसमें राधारमण जी आपने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है इस पोस्ट को लगा कर।

आज की सच्चाई पर एक लडकी के मनोभावों को दर्शाती सुन्दर रचना पेश की है एक बेफिक्र दिखने वाली लड़की अरुण चन्द्र रॉय ने।

वह जोमेरा फोटो

३०  वर्षीया लड़की

हाथ में कॉफ़ी का मग लिए

किसी बड़े कारपोरेट हाउस के

दफ्तर की बालकनी की रेलिंग से

टिकी है बेफिक्री से

वास्तव में

नहीं है उतनी बेफिक्र

जितनी रही है दिख .

भय की कई कई परतें

मस्तिष्क पर जमी हुई हैं

जिनमे देश के आर्थिक विकास के आकड़ो से जुड़े

उसके अपने लक्ष्य हैं
जिन्हें पूरा नहीं किये जाने पर

वही होना है जो होता है

आम घर की चाहरदीवारी में

एक भय है

उन अनचाहे स्पर्शों का

जो होता है

हर बैठक के बाद होने वाले ‘हाई टी’ के साथ

वह बचना चाहती है उनसे

जैसे बचती हैं घरेलू औरते आज भी

एक भय

परछाई की तरह

करता है उसका पीछा

लाख सफाई देने पर भी कि

नहीं है उसका किसी से

कोई अफेयर

तमाम भय के बीच

जब सूख जाते हैं उसके ओठ

एक ब्रांडेड लिप-ग्लोस का लेप चढ़ा

तैयार हो जाती है वह

एक और मीटिंग के लिए

उतनी ही बेफिक्री से.

वास्तव में

जितनी बेफिक्र नहीं है वह.

बहुत ही यथार्थवादी कविता है…..चेहरे के अंदर का छुपा कशमकश बयाँ करती हुई …जिनसे लोंग या तो सचमुच अनभिज्ञ होते हैं या दिखावा करते हैं…जान कर भी ना जानने का..

इस कविता का उत्कर्ष ही यही है कि यह जीवन के ऐसे प्रसंगों से उपजी है जो निहायत गुपचुप ढंग से हमारे आसपास सघन हैं लेकिन हमारे तई उनकी कोई सचेत संज्ञा नहीं बनती। आपने उन प्रसंगों को चेतना की मुख्य धारा में लाकर पाठकों से उनका जुड़ाव स्थापित किया है। नारी मन की गहराई, उसका अन्तर्द्वन्द्व, नारी उत्पीडन, मान-अपमान में समान भावुक मन की उमंगे, संवेदनशीलता, सहिष्णुता आदि पर काव्य में अभिव्यक्ति दी गई है, जो कि वस्तुतः सुलझी हुई वैचारिकता की प्रतीक है।

दोस्त ! प्रेम के लिये वर्ग दृष्टि ज़रूरी है शरद कोकास जी की कविता है जो इस भूमिका के साथ शुरु होती है

प्रेम में सोचने पर भी प्रतिबन्ध..? ऐसा तो कभी देखा न था ..और उस पर संस्कारों की दुहाई ..। और उसका साथ देती हुई पुरानी विचारधारा ..कि प्रेम करो तो अपने वर्ग के भीतर करो.. । लेकिन ऐसा कभी हुआ है ? ठीक है , प्यार के बारे में सोचने पर प्रतिबन्ध है, विद्रोह के बारे में सोचने पर तो नहीं । फिर वह विद्रोह आदिम संस्कारों के खिलाफ हो , दमन के खिलाफ हो या अपनी स्थितियों के खिलाफ़ ..।  देखिये ” झील से प्यार करते हुए ” कविता श्रंखला की अंतिम कविता में यह कवि क्या कह रहा है …

 मेरा फोटो

मैं झील की मनाही के बावज़ूद

सोचता हूँ उसके बारे में

और सोचता रहूंगा

उस वक़्त तक

जब तक झील

नदी बनकर नहीं बहेगी

और बग़ावत नहीं करेगी

आदिम संस्कारों के खिलाफ ।

इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जीवन को उसकी विस्‍तृति में बूझने का यत्‍न करने वाले कवि हैं। जो मिल जाए, उसे ही पर्याप्‍त मान लेने वाले न तो दुनिया के व्‍याख्‍याता होते हैं और न ही दुनिया बदलने वाले। दुनिया वे बदलते हैं जो सच को उसके सम्‍पूर्ण तीखेपन के साथ महसूस करते हैं और उसे बदलने का साहस भी रखते हैं।

Devendra Gehlod ने जख़ीरा पर प्रस्तुत किया है शेख इब्राहीम “ज़ौक”- परिचय

खाकानी-ए-हिंद शेख इब्राहीम “ज़ौक” सन १७८९ ई. में दिल्ली के एक गरीब सिपाही शेख मुह्ब्ब्द रमजान के घर पैदा हुए | १९ साल कि उम्र में आपने बादशाह अकबर के दरबार में एक कसीदा सुनाया | इस कसीदे का पहला शेर यह है-

जब कि सरतानो-अहद मेहर का ठहरा मसकन,

आबो-ए-लोला हुए नखो-नुमाए-गुलशन |

ग़ालिब भी ज़ौक कि शायरी के प्रसंशक थे बस उन्हें ज़ौक कि बादशाह से निकटता पसंद नहीं थी

कहते है ‘ज़ौक’ आज जहा से गुजार गया,

क्या खूब आदमी था खुदा मग्फारत करे |

आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।

मनोज कुमार में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

माचिस एक आग का घर है…..जिसमें बावन सिपाही रह्ते हैं.

लिखते रहना एक अच्छी जिद है ….किताबी पन्नो के बरक्स कंप्यूटर भी बड़ी  सहूलियत से किसी   भी वक़्त अपने स्क्रीन पर बहुत कुछ अच्छा लिखा दिखा सकता है .टेक्नो लोजी ने  पाठको को न केवल बढाया है ..अलबत्ता परस्पर संवाद की एक गुंजाइश को पुख्ता भी किया है…संस्मरण लिखना दरअसल अपने तजुरबो को आज में देखना है ….एक अच्छा  संस्मरण  लिखने वाला  संस्मरणों  की  न केवल अंगुली पकड़ कर चलता है … बल्कि हमें भी उन गलियों के भीतर ले चलता है ..नवीन नैथानी जी  ने लिखो यहाँ वहां पर ऐसे कई यादो को दोहराना शुरू किया है ….शीर्षक  ब्लॉग से ली गयी कुछ पंक्तियों से लिया गया है

खैर एक रोज दर्द साह्ब के साथ अजब वाकया पेश आया. वे टिप-टाप मे बैठे थे कि दो महिलायें एक सूर्ख गुलाब लिये दर्द साहब को पूछती चली आयीं.थोडा सकुचाते ,कुछ हिचकिचाते हुए उन्होंने वह गुलाब कुबूल किया – मेज के किनारे रखा और प्रदीप गुप्ता को उधार की चाय का आर्डर दिया.दर्द साहब सूर्ख गुलाब का सबब समझ नहीं पा रहे थे .तभी वहां हरजीत का आगमन हुआ.उसने मंजर देखा , प्रदीप गुप्ता से कुछ बात की और फिर उस सार्वजनिक पोस्टर -स्थल से अवधेश की पैरोडी हटाकर एक नया शे’र चस्पां कर दिया
शराबो- जाम के इस दर्जः वो करीब हुए
जो दर्द भोगपुरी थे गटर-नसीब हुए
इसे पढ़्कर दर्द भोगपुरी ने ,जाहिर है, राहत की सांस ली

कुछ ऐसी ही बैचेनियो को एक केलिडोस्कोप में हथकड़ रखता है …..इस  बैचेनी में याद आते कुछ किरदार  भी है ….यहाँ नेरेटर संस्मरण  का हिस्सा भी बनता है …उसके फ्लो में .हस्तक्षेप नहीं करता …मसलन

दो महीने तक मैं रोज शाम को उनके पास जाता था. वे मुझसे पंजा, पांव, आँख, भोहें, कोहनी जैसे शरीर के अंग बनवाते रहे. उन्होंने अगले पायदान पर मुझे एक किताब दी जिसमें सब नंगे स्केच थे. उनको देखना और फिर उन पर काम करना बेहद मुश्किल था. मैं तब तक नौवीं कक्षा में आ चुका था और मेरी जिज्ञासाएं चरम पर थी. मैंने कुछ और महीने फिगर पर काम किया. वे मुझसे खुश तो होते लेकिन मुझमे ऐसी प्रतिभा नहीं देख पाए थे कि मेरे जैसा शिष्य पाकर खुद को भाग्यशाली समझ सकें. एक दिन मैंने कहा “मुझसे पेंसिलें खो जाती है शायद मुझे इनसे प्यार नहीं है.” उन्होंने पीक से मुंह हल्का करके कहा “बेटा ये राज बब्बर फाइन आर्ट में मेरा क्लासफेलो था, इसने लिखित पर्चे नक़ल करके पास किये है मगर देखना एक दिन फिर से ये पेन्सिल जरुर पकड़ेगा.”

पूरी पोस्ट पढियेगा ….ओर इस नेरेशन में डूब जाइयेगा……..

सागर अप्रत्याशित लेखक है ….थोड़े विद्रोही तेवर वाले कवि……उनकी कविता मुझे कई बार हतप्रभ करती है …..नंगे यथार्थ से उन्हें रोमानटीसाइज़ उनका फेवरेट शगल है ….उनकी कई प्रतिक्रियाये कई रेखाचित्रो के सामान्तर चलती है .कई बार आगे फलांग जाती है …बतोर कवि .वे मुझे कभी हड़बड़ी में नहीं दिखते … उनकी बैचेनिया बनी रहे ….
मसलन अपनी कविता  पिता : मुंह फेरे हुए एक स्कूटर 
में वे कुछ यूँ दिखते है

आओ ग्लास में उडेलें थोड़ी सी शराब
कि अब तो तुम्हारे शर्ट भी मुझको होने लगे हैं, जूते भी 
कि पड़ोस का बच्चा मुझे अंकल कह बुलाने लगा है 

तुम खोलो ना राज़ 
कि किस लोहे ने तुम्हारी तर्जनी खायी थी
कि दादी के बाद वो कौन है जीवित गवाह
जिसने तुम्हें हँसते देखा था आखिरी बार
(अब तुम्हारा गिरेबान पकड़ कर पूछता हूँ)
बाकी साल तो रहने दिया 
पर मुंह फेरने से पहले यह तो बता दो
कि पचहत्तर, चौरासी, इक्यानवे, सत्तानवे और निन्यानवे में कौन – कौन सा इंजन तुमपे गुज़रा ?

आओ ग्लास में उडेलें थोड़ी सी शराब
और करें बातें ऐसी कि जिससे खौल कर गिर जाए शराब.

क ओर कवि निखिल आनंद गिरि भी अपनी विशिष्ट  मौलिकता के संग  संबंधो के कई   जटिल व्याकरणों पर अपनी माइक्रोस्कोप धरते  है ….ओर  आहिस्ता से आदमी के भीतर सेंध लगाते है .उनकी कविता “रात चाँद ओर आलपिन ‘..ऐसे एक शोट का क्लोज़ अप लेती है 
 इस कविता को पढ़ते हुए  आप जान जाते है ….स्त्री को समझने का एक चौकन्नापन उनके भीतर मौजूद है ……

अभी बाक़ी हैं रात के कई पहर,
अभी नहीं आया है सही वक्त
थकान के साथ नींद में बतियाने का….
उसने बर्तन रख दिए हैं किचन में,
धो-पोंछ कर…
(आ रही है आवाज़….)
अब वो मां के घुटनों पर करेगी मालिश,
जब तक मां को नींद न आ जाए..
अच्छी बहू को मारनी पड़ती हैं इच्छाएं…
चांदनी रातों में भी…
कमरे में दो बार पढ़ा जा चुका है अखबार….
उफ्फ! ये चांदनी, तन्हाई और ऊब…
पत्नी आती है दबे पांव,
कि कहीं सो न गए हों परमेश्वर…
पति सोया नहीं है,
तिरछी आंखों से कर रहा है इंतज़ार,
कि चांदनी भर जाएगी बांहों में….
थोड़ी देर में..
वो मुंह से पसीना पोंछती है,
खोलती है जूड़े के पेंच,
एक आलपिन फंस गई है कहीं,
वो जैसे-तैसे छुड़ाती है सब गांठें
और देखती है पति सो चुका है..
अब चुभी है आलपिन चांदनी में…
ये रात दर्द से बिलबिला उठी है….
सुबह जब अलार्म से उठेगा पति,
और पत्नी बनाकर लाएगी चाय,
रखेगी बैग में टिफिन (और उम्मीद)
एक मुस्कुराहट का भी वक्त नहीं होगा…
फिर भी, उसे रुकना है एक पल को,
इसलिए नहीं कि निहार रही है पत्नी,
खुल गए हैं फीते, चौखट पर..
वो झुंझला कर बांधेगा जूते…
और पत्नी को देखे बगैर,
भाग जाएगा धुआं फांकने..
आप कहते हैं शादी स्वर्ग है…
मैं कहता हूं जूता ज़रूरी है…
और रात में आलपिन…

किशोर .……वे रचनात्मक निर्वासन  की देहरी पर नहीं बैठते ..लिखकर अपने आप को एक्सटेंड करते है ..हिंदी ब्लॉग में उन जैसे लेखको की  उपस्थिति को मै आवश्यक मानता हूँ ..जिनके विम्ब उनके भीतरी शोर को ख़ामोशी से अभिव्यक्त  करते है

 चौराहा भीड़ से ऊबा हुआ था. चिल्लपों से थक कर उसने अपने कानों में घने बाल उगा लिए थे. वह किसी स्थिर व्हेल मछली की तरह था. सम्भव है कि उसे सब रास्तों का सच मालूम हो गया था और वह सन्यस्थ जीवन जी रहा था. इस सन्यास में देह को कष्ट दिये जाने का भाव नहीं दिखाई पड़ता था. कई बार ऐसा लगता था कि चौराहा वलय में घूर्णन कर रहे मसखरों और कमसिन लड़कियों की कलाबाजियां देखने जैसा जीवन जी रहा था. उसको किसी नवीन और अप्रत्याशित घटना की आशा नहीं थी. सीढ़ियों को अपनी ओर आते देख कर भी कौतुहल नहीं जगा.

चौराहे ने एक लम्बी साँस भरी और खुद का पेट सीने में छुपा लिया. चौराहों और सीढ़ियों का भी सदियों पुराना रिश्ता था. चौराहों के माथे को खुजाने के लिए कनखजूरे इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ कर आया करते थे.
चौराहे ने पीपल की ओर देखा. पीपल ने दलदल के पानी सोखू युक्लीप्टिस पेड़ों की ओर देखा. युक्लीप्टिस ने कौवों के पांखों में खुजली की. कौवों ने देखा कि बिना सीढ़ियों की छतें बहुत सुरक्षित दिखने लगी थी. मुंडेरों तक पहुँचने के लिए अब आदमी को आदमी के ऊपर खड़ा होना होगा.

हते है भीड़ की स्मरण शक्ति कम होती है .ओर भारतीय समाज एक भीड़ जैसा ही है ….हम अपने जमीर के मैले होने का अक्सर जिक्र करते है पर उसे दुरस्त करने का प्रयास नहीं…..हम दरअसल अपनी सहूलियत से असूलो को चुनने वाले समाज की ओर बढ़ रहे है ….जहाँ विरोध सैदान्तिक नहीं होता है …व्यक्ति ओर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को देख कर तय किया जाता है .…राडिया टेप काण्ड ओर विकिलीक्स के खुलासे आहिस्ता आहिस्ता धुंधले पड़ने लगेगे … सच के भी कई मुगालते होते है …..प्रसून वाजपेयी उन्ही मुगालतो पर बात करते है

असल में राडिया के फोन टैप से सामने आये सच ने पहली बार बडा सवाल यही खड़ा किया है कि अपराध का पैमाना देश में होना क्या चाहिये। लोकतंत्र का चौथा खम्भा, जिसकी पहचान ही ईमानदारी और भरोसे पर टिकी है उसके एथिक्स क्या बदल चुके हैं। या फिर विकास की जो अर्थव्यवस्था कल तक करोड़ों का सवाल खड़ा करती थी अगर अब वह सूचना तकनालाजी , खनन या स्पेक्ट्रम के जरीये अरबो-खरबो का खेल सिर्फ एक कागज के एनओसी के जरीये हो जाता है तो क्या लाईसेंस से आगे महालाइसेंस का यह दौर है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस तमाम सवालो पर फैसला लेगा कौन। लोकतंत्र के आइने में यह कहा जा सकता है कि न्यायपालिका और संसद दोनो को मिलकर कर यह फैसला लेना होगा। लेकिन इसी दौर में जरा भ्रष्टाचार के सवाल पर न्यायापालिका और संसद की स्थिति देखें। देश के सीवीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि भ्रष्टाचार का कोई आरोपी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले पद सीवीसी पर कैसे नियुक्त हो सकता है। तब एटार्नी जनरल का जबाव यही आया कि ऐसे में तो न्यायधिशो की नियुक्ति पर भी सवाल उठ सकते हैं। क्योकि ऐसे किसी को खोजना मुश्किल है जिसका दामन पूरी तरह पाक-साफ हो। वही संसद में 198 सांसद ऐसे हैं, जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप बकायदा दर्ज हैं और देश के विधानसभाओ में 2198 विधायक ऐसे हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। जबकि छह राज्यो के मुख्यमंत्री और तीन प्रमुख पार्टियो के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती ऐसी हैं, जिन पर आय से ज्यादा संपत्ति का मामला चल रहा है। वहीं लोकतंत्र के आईने में इन सब पर फैसला लेने में मदद एक भूमिका मीडिया की भी है। लेकिन मीडिया निगरानी की जगह अगर सत्ता और कारपोरेट के बीच फिक्सर की भूमिका में आ जाये या फिर अपनी अपनी जरुरत के मुताबिक अपना अपना लाभ बनाने में लग जाये तो सवाल खड़ा कहां होगा कि निगरानी भी कही सौदेबाजी के दायरे में नहीं आ गई। यानी लोकतंत्र के खम्भे ही अपनी भूमिका की सौदेबाजी करने में जुट जाये और इस सौदेबाजी को ही मुख्यधारा मान लिया जाये तो क्या होगा।

चलते चलते .

मारी नैतिक  बैचेनी अपनी लक्ष्मण रेखा बड़ी चतुराई से चुनती है …..हम उन्ही  बहसों को हाईलाईट करते बुद्धिजीवियों के तर्कों को सुनते है जिन पर सार्वजानिक सहमति बन सके …सवाल फफूंद लगे इस लोकतंत्र पर रेग्मार्क कर साफ़ करने का नहीं ….सवाल ये भी है के क्या कर्तव्यो को याद दिलाने की जिम्मेवारी इस देश में सिर्फ कोर्ट की है ?
क्या हम वाकई एक आदर्श विहीन समाज की ओर बढ़ रहे है ….? सोच कर देखिये


http://www.youtube.com/v/E08xaBem240?fs=1&hl=en_US&color1=0x234900&color2=0x4e9e00

हम सभी को आत्म निरीक्षण की आवश्यकता है ….मीडिया को ही नहीं…आखिर समाज के विकास की भागेदारी सामूहिक ही होती है ..
http://www.youtube.com/v/FuI62uvk34I?fs=1&hl=en_US

डॉ .अनुराग में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

….इस देश में देशभक्ति बड़ी सस्ती चीज़ है

कल की चर्चा में नीरज बसलियाल की टिप्पणी थी-

हम टिप्पणी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले गरीब ब्लोगरों को कितना राशन मिलेगा|

टिप्पणी देखते ही लगा कि कुछ खास ग्राहक है। गये ब्लॉग तो देखा नाम है कांव-कांव। पीछे गये तो रामकथा – डेमोक्रेसी काण्ड दिखा जिसके नीचे डिक्लेमर था-(अगर इस कहानी के पात्र काल्पनिक है, तो ये वास्तविकता नहीं, बहुत बड़ा षड्यंत्र है|) लोगों की प्रतिक्रियायें से अंदाजा लगा कि बंदा बिंदास है और लेखन झकास।

नीरज गोस्वामीजी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुये इस पोस्ट के कुछ अंश छांट के धर दिये हमारी सुविधा के लिये:

1.आम चुनाव से चुने गए ख़ास आदमियों को ही शोषण का हक होगा
2.चश्मा उनके व्यक्तित्व से कुछ यों जुड़ गया था कि वे अब पर्दा गिराकर ही चश्मा उतारते थे|
3.फैसले का तो पता नहीं क्या हुआ , लेकिन 4.जज साहब को शाम को अपने कपाल पर अमृतांजन बाम लगाना पड़ा
5.कुलवंती थी या धनवंती … पता नहीं, कल न्यूजपेपर में पढ़ लेंगे यार
6.यह मेड इन चाइना फोल्डेड कुटिया थी
7.इस देश में देशभक्ति बड़ी सस्ती चीज़ है , पाकिस्तान को चार गाली दो और देशभक्त बन जाओ|
8.राम को अर्धनिद्रा में लगा कि वे आडवाणी हैं और सुमंत अटल बिहारी, तो लक्ष्मण गडकारी|
9.भरत कह उठेंगे कि भरत का काटा हुआ तो चप्पल भी नहीं पहन पाता

नीरज जी ने आगे लिखा:

ये पोस्ट मुझे डा. ज्ञान चतुर्वेदी जी के व्यंग उपन्यास “मरीचिका” की याद दिला गयी…अगर आपने ये उपन्यास अभी तक नहीं पढ़ा है तो फ़ौरन से पेश्तर इसे खरीद कर पढ़ें..आपके लेखन को भी उसे पढ़ कर नयी धार मिलेगी ये मुझे विशवास है…

पोस्ट और उस पर आई टिप्पणियां देखकर नीरज बसलियाल से यही कहना है कि उनके जैसे लोग राशन की दुकान तक नहीं आते ,राशन खुद उन तक चलकर आता है उनकी जरूरत के हिसाब से बस वे चालू रहें।

नीरज की पोस्ट पर नीरज गोस्वामीजी की टिप्पणी पढ़ते हुये मुझे याद आया कि नीरज जी ने ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास मरीचिका कुश को भेंट किया था। उसका परिणाम थी कुश के द्वारा लिखी कुछ बेहतरीन पोस्टें जिनमें से पहली पोस्ट का एक अंश है:

गुरुजी अपनी कुटिया से निकले.. पीछे पीछे दो चेले उनकी लॅपटॉप पट्टीका उठाए.. आ रहे थे.. सभी ब्लॉगर अपनी अपनी जगह पर खड़े हो गये.. और झुक कर गुरुजी को प्रणाम किया.. कुछ गुरुजी जी के प्रिय ब्लॉगर तो इतना झुके की नीचे ज़मीन पर बैठा एक कीड़ा उनकी नाक में घुस गया.. उनमे से एक आध ने तो ज़ोर से छींक कर उस कीड़े को वायु मंडल की नमी को सादर समर्पित किया..

गुरुजी ने सबको बैठने के लिए कहा.. और स्वयं अपनी लॅपटॉप पट्टीका खोलकर बैठ गये..

सभी ब्लॉगर सहमे हुए से बैठे थे.. की गुरुजी पता नही इनमे से किसकी ब्लॉग खोल कर शुरू हो जाए.. सबकी नज़रे गुरुजी के चेहरे पर टिकी थी..

कुश पता नहीं फ़िर कब इस स्टाइल में लिखेंगे दुबारा।

सतीश सक्सेनाजी ने तो अपनी राय रख ही दी:

ब्लॉग जगत में निर्मल हास्य या तो है ही नहीं या लोगों को हँसना नहीं आता

यह पढ़ते हुये रागदरबारी के लेखक श्रीलाल शुक्ल जी बातचीत ध्यान आई। – उनका कहना था:

  • हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है। हम मजाक की बात पर चिढ़ जाते हैं। व्यंग्य -विनोद और आलोचना सहन नहीं कर पाते।
  • हिंदी में हल्का साहित्य बहुत कम है। हल्के-फ़ुल्के ,मजाकिया साहित्य, को लोग हल्के में लेते हैं। सब लोग पाण्डित्य झाड़ना चाहते हैं।
  • गांवों में जो हंसी-मजाक है , गाली-गलौज उसका प्रधान तत्व है। वहां बाप अपनी बिटिया के सामने मां-बहन की गालियां देता रहता है। लेखन में यह सब स्वतंत्रतायें नहीं होतीं। इसलिये गांव-समाज हंसी-मजाक प्रधान होते हुये भी हमारे साहित्य में ह्यूमर की कमी है।
  • इसी बीच जबलपुर में राष्ट्रीय कार्यशाला हो ली। इस मौके पर शानदार रिपोर्ट और जानदार कवरेज हुआ।

    समीरलाल के वहां होते हुये इस कार्यशाला को केवल राष्ट्रीय कहना कुछ हजम नहीं हुआ। या तो बैनर ठीक से छपा नहीं या यह समीरलाल का कद कम करने की साजिश है। दोनों ही बातें गड़बड़ हैं। हैं कि नहीं? 🙂

    पिछले दिनों एक और उल्लेखनीय कार्यक्रम हुआ। सीमा गुप्ता जी ने जानकारी देते हुये अपने ब्लॉग पर लिखा:

    “अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन के छठे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 23 – 30 November 2010 को उज़्बेकिस्तान की राजधानी “ताशकंत” में मेरे दुसरे काव्य संग्रह “दर्द का दरिया” का विमोचन DR. Lari Azad जी के हाथो संपन हुआ. आज ए.आई. पी.सी के गौरवशाली आश्रय के अंतर्गत मेरे दुसरे काव्य संग्रह का दो भाषाओँ हिंदी और उर्दू में एक साथ प्रकाशित होना किसी महान उपलब्धि से कम नहीं है.

    सीमाजी को बहुत-बहुत बधाई।

    फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर कभी। मिलते हैं ब्रेक के बाद।

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    चिट्ठाचर्चा को राशन की दुकान मत बनाइये

    ब्लॉगिंग करने को फ़िर मन आया कई दिनों के बाद
    पोस्टों पर बेमतलब टिपियाया कई दिनों के बाद
    भाईचारे का भभ्भड़ देखा फ़िर कई दिनों के बाद
    टिप्पणियों से खिल गयीं बांछे फ़िर कई दिनों के बाद।

    यहां-वहां लड़-भिड़कर आया वो कई दिनों के बाद
    भैया जी ने बेमतलब समझाया कई दिनों के बाद
    नखरेवाली के नक्शे देखे फ़िर कई दिनों के बाद
    बिना बात सबको हड़काया फ़िर कई दिनों के बाद । फ़ुरसतिया

    चिट्ठाचर्चा बहुत दिन से नहीं हुई। इस बीच कई सा्थियों ने आग्रह भी किया करने का। विनीत कुमार ने कहा –चिट्ठाचर्चा को क्या आपने राशन की दुकान बना दिया दिया है कि महीने में सिर्फ़ एक ही दिन खुले। उधर हमारे डा. अमर कुमार ने चर्चाकारों को अभय दान देते हुये लिखा:

    मेरे प्रिय चर्चाकारों, आप सब जहाँ कहीं भी हो, कृपया लौट आओ..
    अब कोई तुम्हें उलाहना न देगा, यहाँ तक की मैं भी कुछ नहीं कहूँगा ।
    कम से कम अपना कुशल मँगल देने तो आ ही सकते हो,
    माना कि, इधर ढँग का कुछ भी नहीं लिखा जा रहा है,
    लेकिन, चर्चाकार तो वही जो बिना विषय अपनी उड़ावै

    इस बीच कानपुर के डा.पवन कुमार मिश्र ने भी कानपुर ब्लागर्स एसोसियेशन की शुरुआत और फ़िर एक हड़बड़िया मुलाकात करके लिखने का क्रम तोड़ने में भूमिका अदा की।

    इस बीच देखा कि ब्लॉग जगत में तमाम परिवर्तन आये हैं। सतीश सक्सेना जी ने भाईचारे, इंसानियत और देशभक्ति के बाद सांप्रदायिक सद्भाव का काम भी हाथ में लिया और इस पर अच्छी पोस्टें लिखनी शुरू की हैं। उन्होंने जब भारत मां के मुस्लिम बच्चों के बारे में लिखा तो मुझे लगा आगे कभी भारत मां के पारसी, सिख, इसाई बच्चों से भी परिचय करायेंगे लेकिन वे तेलियार चले गये वहां तल्ख हो गये और फ़िर टिप्पणी के विवसता की बात करते हुये फ़ाइनली जवानी की बात करने लगे।

    इस बीच मासूम जी ने अमन की बात करनी शुरू की और कुछ बेहतरीन लोगों की रचनायें अपने ब्लॉग पर पोस्ट की। जैसे देखिये इस्मत जी ने लिखा:

    चंद हैं फ़ितना परस्ती की यहां ज़िंदा मिसाल
    कहते कुछ हैं ,करते कुछ ,मक़सद कुछ इन का और है

    इसके बाद के पैगाम आप यहां देख सकते हैं।

    सतीश सक्सेना जी ने मासूम भाई सुझाया कि वे अनूप शुक्ला से भी अमन का पैगाम लिखवा लें। मुझे लगा कि शायद सतीश जी अमन में हमारे मसखरेपन को शामिल करवाना चाहते हैं। हम कोई पैगाम देंगे तो लोग भले न हंसे हमको खुद हंसी आयेगी कि हम भी पैगाम देने लगे।

    यह भी हो सकता है कि सतीश जी ने व्यंग्य लिखना शुरू किया है उसी की कड़ी का कोई कमेंट हो यह कि अनूप शुक्ला से अमन का पैगाम लिखवाया जाये। 🙂

    इस बीच देखा सतीश पंचम पूरी तन्मयता के साथ शब्दों को लम्बा करने में लगे हैं। इस बारे में विस्तार से फ़िर कभी लेकिन यह उनकी रेलवे शौचालय कथा देखिये।

    फ़िलहाल इतना ही। अभी तो दुकान खोली है अब क्या पता नियमित ही हो जाये कुछ दिन के लिये।

    ऊपर वाला फ़ोटो पिछले दिनों कलकत्ता प्रवास के दौरान एक सुबह का है। बाकी के चित्र देखना चाहें तो इस कड़ी पर देख सकते हैं http://www.facebook.com/album.php?aid=85630&id=1037033614&l=3692c2e1d6

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    सोमवार (०८.११.२०१०) की चर्चा

    नमस्कार मित्रों!

    मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं।

    दीपावली के पटाखों की गूंज से मन थोड़ा शांत हुआ तो चर्चा के लिए कुछ ब्लॉग्स की खोज में निकला। अपने मन को सकून देने के लिए अपना-अपना तरीक़ा होता है। कुछ प्रकृति की शरणस्थली में चले जाते हैं। मैं पुस्तकें पढता हूं। कविता कौमुदी से गिरिधर शर्मा की पंक्तोयों में कहें तो

    मैं जो नया ग्रंथ विलोकता हूं,

    भाता मुझे वो नव मित्र सा है।

    देखूं उसे मैं नित बार-बार,

    मानो मिला मित्र मुझे पुराना॥

    पर मेरी भी वही स्थिति है जो प्रेमचन्द ने ‘विविध प्रसंग’ मे कहा है, कि

    “पुस्तक पढना तो चाहते हैं, पर गांठ का पैसा ख़र्च करके नहीं।”

    हां पुस्तकालय में पुस्तकें मिल जाती हैं। बेकन ने कहा था,

    “पुस्तकालय ऐसे मंदिरों की तरह हैं जहां प्राचीन संतों-महात्माओं के सद्गुणों से परिपूर्ण तथा निर्भ्रांत पाखंडरहित अवशेष सुरक्षित रखे जाते हैं।”

    अब हम ठहरे ब्लॉगर। ब्लॉगजगत में पुस्तकालय ढूंढने निकले तो कुछ उसी तरह से सजा एक ब्लॉग मिला जिसका नाम था ‘पुस्तकायन’। जब आप इसकी पोस्ट पढ रहे होते हैं तो इसके बैकग्राउंड में रैकों पर सजी पुस्तकें किसी पुस्तकालय में बैठे होने का बोध कराती रहती हैं।

    इस ब्लॉग के आमंत्रण वाक्य काफ़ी प्रेरित करते हैं,

    यह एक सम्मिलित प्रयास है… अपने पाठन का अधिक से अधिक लाभ उठाने और उसकी महक दूसरों तक पहुँचाने का … पुस्‍तकायन ब्‍लॉग इसके सभी सदस्‍यों का समान रूप से बिना रोक टोक के है … इस ब्‍लॉग पर सभी तरह की विचाराधारा या कोई खास विचाराधारा न रखते हुए भी सदस्‍य बना जा सकता है। आलोचनात्‍मक, वस्‍तुनिष्‍ठ और शालीन प्रस्‍तुति अपेक्षित है ।

    इसके उत्स में इसके ब्लॉगस्वामी  का कहना है,

    अकसर पढते हुए…किताबों से गुजरते हुए…कुछ अंश..पंक्तियाँ…पैराग्राफ हमें काफी पसंद आते हैं …प्रभावित करते हैं…सामान्‍य से ज्‍यादा सम्‍प्रेषित हो जाते हैं…चौंकाते हैं… कभी अपनी शैली से, शिल्‍प से, आलंकारिकता से और कभी विचारों के नएपन से… ऐसे में उन्‍हें साझा करने का मन करता है… कई बार इसी तरह दूसरे मित्रों के द्वारा हम अच्‍छी किताबों से परिचित हो जाते हैं… इसी जरूरत की उपज है यह ब्‍लॉग… आप कोई पुस्‍तक पढ रहे हैं, … पुस्‍तक का नाम, प्रकाशक का नाम, प्रकाशन वर्ष का विवरण देकर लिखिए पुस्‍तक के पसंदीदा अंश…साथ ही अपनी आलोचनात्‍मक विचार भी रख सकते हैं पुस्‍तक के बारे में, लेखक के बारे में… कम से कम या अधिक से अधिक जितना भी लिखना चाहें…
    साथ ही कहानी, लम्‍बी कविता या प्रभावशाली लेख की भी संदर्भ सहित विवेचनात्‍मक प्रस्‍तुति दी जा सकती है

    मुझे तो ये बातें इतनी प्रेरक लगीं कि मैं तो झट से इसका सदस्य बन गया। आप भी बनिए ना!

    वाल्तेयर की कई बातें काफ़ी प्रेरक हैं। जैसे उन्होंने यह कहा,

    “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूंगा।”

    इसी तरह पुस्तकों के संदर्भ में मुझे उनकी यह सूक्ति याद आती है,

    “मनुष्यों के सदृश्य ही पुस्तकों के साथ भी यह बात है कि बहुत थोड़ी संख्या में ही महत्वपूर्ण कार्य करती हैं, शेष का भीड़ में लोप हो जाता है।”

    ब्लॉग के संदर्भ में भी यही बात है। ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण ब्लॉग की चर्चा करना आज की चिट्ठा चर्चा का मेरा उद्देश्य है। आइए इसी तरह के एक और ब्लॉग पर आपको लिए चलते हैं।

    साइरस का कथन है,

    “अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।”

    जहां एक ओर ‘पुस्तकायन’ अच्छी समझ विकसित करने में सहायक है वहीं अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें निरंतर सामग्री मुहैया करता ब्लॉग है स्वास्थ्य-सबके लिए । कुमार राधारमण इसके ब्लॉगस्वामी हैं। स्वास्थ्य संबंधी अद्यतन जानकारी यहां पाया जा सकता है।

    मैंने इसके ब्लॉगस्वामी से पूछा कि क्या कारण है कि जबकि कई डाक्टर साहित्य का ब्लॉग चला रहे हैं,तब आपने साहित्य का छात्र होने के बावजूद स्वास्थ्य का ब्लॉग चलाने की सोची? तो उन्होंने बताया कि

    मैं काफी समय से महसूस कर रहा था कि अखबारों में स्वास्थ्य के संबंध में काफी भ्रामक खबरें छपती हैं। रोज़ नए अनुसंधान से लोगों को भरमाया जाता है मगर बाद में सालों साल उन अनुसंधानों का कोई अता-पता नहीं चलता। इसलिए लोगों तक ठोस खबरें ही पहुंचाई जानी चाहिए। मेरी कोशिश रही है कि केवल वही ख़बरें लूं जिनमें दवाओं के ट्रायल चूहों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि मनुष्य पर भी उनके प्रयोग कुछ हद तक उत्साहवर्द्धक रहे हों क्योंकि जो बीमार है,वह संबंधित खबर को बहुत आशा और गंभीरता के साथ देखता है,उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता।”

    अभी हाल में ही एक पोस्ट आया है मोटापा घटाने में सहायक है घृतकुमारी

    मैंने जब उनसे जनना चाहा आपके ब्लॉग पर हर चिकित्सा विधासे जुड़ी खबरें दिखती हैं…….
    तो उनका उत्तर था – हां,ठीक कह रहे हैं। ब्लॉगिंग शुरु करने से पहले मैंने गौर किया कि स्वास्थ्य के विषय में ब्लॉग पर कैसी सामग्री उपलब्ध है। मैंने देखा कि एलुवेरा से ही फुंसी से लेकर एड्स तक का इलाज़ करने का दावा करता है, तो कोई सिर्फ आयुर्वेद से। मैं मानता हूं कि ये एकांगी दृष्टिकोण हैं। कोई भी चिकित्सा विधा स्वयं में पूर्ण नहीं है, सब एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए,जहां कहीं भी संभव हो, सभी विधाओं में इलाज़ के विकल्पों की ओर ध्यानाकर्षण किया जाना चाहिए। कुछ हद तक इसलिए भी कि कई कारणों से कई बार रोगी किसी विधा विशेष में ही समाधान जानना चाहता है।
    राधारमण जी खुद कोई चिकित्सक नहीं हैं। कुतूहलवश मैंने जानना चाहा अखबार में छपी खबरों की प्रामाणिकता आप कैसे जाचते हैं?
    तो कहते हैं  – यह एक बड़ी चुनौती है। मैं अपने स्तर से केवल इतना कर सकता हूं कि उन खबरों को प्राथमिकता दूं,जिनमें डाक्टरों को कोट किया गया हो अथवा जो स्वयं डाक्टरों द्वारा लिखे गए हों। फिर भी चूक की संभावना तो रहती है।

    इस तरह के ब्लॉग जिस पर समाज को कुछ खास किस्म की जनकारी दी जा रही हो न केबराबर टिप्पणी देख कर उसके ब्लॉगस्वामी को दाद देनी पड़ती है। जब मैंने राधारमण जी से पूछा, – क्या परिश्रम की तुलना में नगण्य टिप्पणियां देखकर मन हतोत्साहित नहीं होता?
    उनका उत्तर था – नहीं। अनिवार्यताओं को टिप्पणी की दरकार नहीं होती। फिर, ब्लॉग जगत में टिप्पणी के मायाजाल से सभी परिचित हैं। मैं इस दलदल का हिस्सा नहीं बन पाउंगा। पाठकों का ब्लॉग पर आना ही बहुत है,टिप्पणी करें न करें।

     

    स्वास्थ संबंधी यदि आपको कुछ रोग निवारक आसान नुस्खे. चाहिए तो मिलिए dr.aalok dayaram से उनके इस ब्लॉग पर। इस ब्लाग में सामान्य एवं जटिल रोगों में हितकारी घरेलू इलाज का विवेचन किया गया है। डा.आलोक का कहना है इन नुस्खों के घटक पदार्थ आसानी से प्राप्त हो सकते हैं और सावधानी पूर्वक उपयोग करने से इनके कोइ दुष्परिणाम भी नहीं होते हैं।

    पढने योग्य इनके अन्य ब्लाग हैं–

    अगर बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद एक बहुत प्रभावी धारणा थी तो वर्त्तमान सदी में यह एक पिछड़ेपन की धारणा मात्र है। आधुनिकता का संघर्ष जो अपूर्ण रह गया, वह तब तक चलता रहेगा जब तक एक सामान्य बात पूर्ण तौर पर प्रतिष्ठित नहीं होती – वह है ‘मानव ही सबसे बड़ा सच है उससे बढ़कर और कुछ नहीं! इसी की जनपक्षधर चेतना का सामूहिक मंच है जनपक्ष।

    एक और ऐसा ही ब्लॉग है जो समाज सेवा में लगा है। इसका नाम है भाषा,शिक्षा और रोज़गार। इसके ब्लॉगस्वामी खुद को शिक्षामित्र कहलाना पसंद करते हैं। उनका कहना है “रोज़ी-रोटी का मसला सुलझे, कविता-कहानियां भी तभी सुहाती हैं.!” दिन भर में अनगिनत पोस्ट डालते हैं, सभी शिक्षा जगत से संबंधित। उद्देश्य है लोगों को इस विषय से संबंधित जानकारी एक जगह सहज सुलभ हो और सबसे पहले हो।   शिक्षामित्र से जब मैंने पूछा कि अगर वे कुमार जलजला टाइप टिप्पणी कहीं नहीं कर रहे, तो फिर अपने नाम से ब्लॉगिंग क्यों नहीं?जवाब मिला – नाम में क्या रखा है, मैं बेनामियों की प्रतिष्ठा के लिए काम कर रहा हूं।
    मेरा दूसरा सवाल था – ब्लॉगिंग के लिए भाषा,शिक्षा और रोज़गार विषय क्यों? शिक्षामित्र का तर्क था-अपनी-अपनी पसंद है। ब्लॉगिंग शुरु करने के पहले, मैंने गौर किया कि ब्लॉग पर क्या-क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा। मैंने पाया कि न सिर्फ ब्लॉग पर, बल्कि देश की किसी वेबसाईट पर भी इन विषयों पर सामग्री उपलब्ध नहीं है। मुझे लगा कि गूगल के सुझाव के मुताबिक ही बाकी लोग तो व्यक्तिगत अनुभव और घर के फोटो आदि शेयर कर ही रहे हैं, तो मुझे कोई ऐसा फील्ड खोजना चाहिए जिसमें कोई काम नहीं हो रहा या नाममात्र काम हो रहा है। पूछते हैं,”यों भी, क्या आप सोचते हैं कि किसी को आपके अनुभव या कविता-कहानी में वास्तविक दिलचस्पी है? ऐसा नहीं है। लोग इसलिए ऐसी सामग्री देखते हैं कि सर्वत्र वही सब उपलब्ध है। आप जरूरत की दूसरी सामग्री देंगे, तो वह भी चलेगा।”
    मगर इसका रेस्पांस कैसा है? आपके ब्लॉग पर टिप्पणियां तो नहीं के बराबर हैं, फिर इस प्रकार के ब्लॉग का आप क्या भविष्य देख रहे हैं? शिक्षामित्र का दो टूक कहना है – मैंने यह ब्लॉग टिप्पणी के लिए शुरु नहीं किया है। इसलिए टिप्पणी वाले कॉलम में साफ घोषणा भी की गई है कि टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। मोटे तौर पर रेस्पांस भी ठीक ही है। लगभग 250 पेज रोज़ पढ़े जा रहे हैं। अब तो कई पाठक नौकरी के लिए बायोडाटा भी मेल करने लगे हैं। कई अन्य पाठक करिअर के संबंध में व्यक्तिगत प्रश्न का उत्तर चाहते हैं।   क्या इतनी सफलता कम है?”

    Laughing out loudइस सप्ताह इतना ही। इसी तरह के ब्लॉग्स लेकर फिर आऊंगा। तब तक के लिए विदा।

    मनोज कुमार में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

    हसरतसंज -मासूम मोहब्बत के कुछ प्यारे किस्से

    image मैं फिजिक्स का विद्यार्थी हूँ और होम साइंस की किताब चुपके से पढ़ रहा हूँ । पढने के बाद अंगडाई लेता हूँ जैसे हवाई जहाज कैसे बनता है, जान लिया हो । बाहर देहरी पर दस्तक हुई है, चुपके से किताब को यथास्थान रख देता हूँ और फिजिक्स के डेरीवेशन की किसी पंक्ति पर लटक जाता हूँ । उसकी होम साइंस

    टिफिन रखती है और चल देती है । मुड़कर वापस आती है “अच्छा वैसे किसकी शक्ल बिगाड़ने की कोशिश थी” । मैं शरमा जाता हूँ । “देखो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा है” कहती हुई बैठ जाती है । मैं गणितज्ञ होने की कोशिश में लग जाता हूँ । वो होम साइंस के शस्त्र निकाल लेती है । उसकी होम साइंस

    कमरे में उसकी खुशबु घुल सी गयी है । लम्बी साँस लेता हूँ और सर्किल बनाकर रुक जाता हूँ । याद हो आता है, उसे उसका चेहरा बहुत प्यारा है । सोचकर मुस्कुरा उठता हूँ , हमारी पसंद कितनी मिलती है । उसकी होम साइंस

    वो दोपहार को छत पर कपडे पसारने आई है । मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ । वो कह रही है “हमारा हाथ छोडो” । हम प्रत्युत्तर में कहते हैं “अगर नहीं छोड़ा तो” । तो “अम्मा….” । वो तेज़ आवाज़ देती है । मैं हाथ छोड़ देता हूँ । “बस डर गए” कहती हुई, खिलखिलाकर चली जाती है ।फ़िक्शन

    अँधेरा घिर आया है । छत पर महफ़िल जमी है । अम्मा आवाज़ देकर उसे बुला रही हैं । नीचे से आवाज़ आ रही है “आ रहे हैं” । सीढ़ियों पर मैं खड़ा हूँ । हमारा आमना-सामना हुआ है । वो आगे को बढ़ने लगती है । हम हाथ पकड़ लेते हैं । वो कुछ नहीं कहती । हम पास खींच लेते हैं । और उसके कानों के पास जाकर कहते हैं “आवाज़ दो फिर भी नहीं छोड़ेंगे” । वो मुस्कुरा उठती है ।फ़िक्शन

    बारिश बीतती तो आसमान उजला-उजला निखर आता । और तब, जब भी आसमान में इन्द्रधनुष को देखता तो जी करता कि इन साहब के कुछ रंग चुराकर पेंटिंग बनाऊँ । तमाम कोशिशों के बावजूद में असफल होता और इन्द्रधनुष मुँह चिढ़ाता सा प्रतीत होता । नानी कहती “अरे बुद्धू, उससे भी कोई रंग चुरा सकता है भला” । मैं नाहक ही पेंटिंग करने का प्रयत्न करता । मैं मासूम उड़ती चिड़िया को देखता, तो मन करता कि इसको पेंटिंग में उतार लूँ । कई बार प्रयत्न करता और हर दफा ही, कभी एक टाँग छोटी हो जाती तो कभी दूसरी लम्बी ।मैं और बचपन का वो इन्द्रधनुष

    कहती थी ना मैं “ईश्वर सबको कोई न कोई हुनर देता है । तुझे गणित जैसे विषय में उन्होंने अच्छा बनाया और अब देख कितने बच्चे तुझसे पढने आते हैं । तुझे आदर मिलता है, उनका प्यार मिलता है । दुनिया में जो सबसे अधिक कीमती है, वो तुझे बिन माँगे मिल रहा है ।” मैं और बचपन का वो इन्द्रधनुष

    उसके गालों पर डिम्पल थे । कितनी क्यूट लगती थी, जब वो हँसती । गुस्सा तो जैसे नाक पर रखा रहता उसके, जब भी मोनिटर-मोनिटर खेलती । हाँ, वो हमारी क्लास की मोनिटर जो थी । और मेरा नन्हा-मुन्ना सा दिल धड़क-धड़क के इतनी आवाजें करता कि बुरा हाल हो जाता ।बचपन की मोहब्बत

    वो एक दिन बोली “तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते थे ना । अब तो हम दोस्त हैं न ।”
    मैंने कहा “धत, दोस्ती ऐसे थोड़े होती है ।”
    “तो कैसे होती है ?”
    “गर्ल फ्रेंड तो गाल पर किस करती है ।”
    “अच्छा तो लो” और उसने मेरे गाल पर किस कर लिया ।

    यारों अपनी तो लाइफ सेट हो गयी । अब वो मेरी गर्ल फ्रेंड बन गयी….बचपन की मोहब्बत

    उसका आज जन्मदिन है और ये बात मुझे उसके पिछले जन्म दिन के बाद से ही याद है । न मालूम क्यों, जबकि मैंने ऐसा कोई प्रयत्न भी नहीं किया । याद हो आता है कि अभी चार रोज़ पहले उसने मेरे गाल को चूमा था । उस बात पर ठण्डी साँस भरता हूँ । उसके होठों के प्रथम स्पर्श का ख्याल मन को सुख देकर चला गया है ।स्मृतियों से वो एक दिन

    “हैप्पी बर्थ डे, माय लव” सुनकर वो खिलखिला जाती है । उसे गुलाब और कार्ड देते हुए गले लग जाता हूँ । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से हम यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं । मैं स्वंय को अलग करता हूँ । उसके गालों को चूम कर “हैप्पी बर्थ डे” बोलता हूँ । वो आँखों में झाँक कर प्यार की गहराई नाप रही है शायद । “अच्छा तो अब मैं चलूँ” ऐसा मैं कुछ समय बाद बोलता हूँ और पलट कर चलने को होता हूँ । वो हाथ पकड़ लेती है । हम फिर से एक दूसरे से चिपके हुए हैं । पहली बार उसकी गर्म साँसों और होठों को महसूस कर रहा हूँ ।स्मृतियों से वो एक दिन

    हरी घास के एकतरफ बनी हुई पगडंडियों पर तुम नंगे पैर दौडे जा रही हो और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ । डर रहा हूँ कहीं तुम गिर ना जाओ । किन्तु तुम यूँ लग रही हो जैसे हवा ने तुम्हारा साथ देना शुरू कर दिया है । राह में वो सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा तमाम रंग-बिरंगे गुब्बारे लेकर खड़े हुए हैं । हरे, लाल, पीले, गुलाबी, नीले, हर रंग में रंगे हुए गुब्बारे । तुम उन्हें देखकर ऐसे खुश हो रही हो जैसे एक मासूम बच्ची हो । उन गुब्बारों में एक रंग मुझे तुम्हारा भी जान पड़ता है, मासूमियत का रंग या शायद प्यार का रंग या फिर ख़ुशी का रंग । तुम, मैं और हमारी असल सूरतें

    खुशियाँ बिखेरती हुई तितलियाँ अपने अपने घरों को चली जाती हैं । तुमने मेरा हाथ फिर से पकड़ लिया है और हम चहलकदमी करते हुए अपने दरवाजे तक पहुँच गए हैं । फिर तुम अचानक से मेरे गाल को चूम कर दरवाजा खोलकर अन्दर चली जाती हो । मैं मुस्कुराता हुआ तुम्हारे साथ आ जाता हूँ ।
    सुबह उठ कर तुम मेरे सीने पर अपने सर को रख कर बोल रही हो “कहाँ ले गए थे मुझे” । और मैं तुम्हारे बालों को चूमकर कहता हूँ “हमारी पसंदीदा जगह” । तुम मुस्कुरा जाती हो । तुम, मैं और हमारी असल सूरतें

    एटीएम और क्रेडिट कार्ड पर खड़े समाज में ठहाकों के मध्य कभी तो तुम्हारा दिल रोने को करता होगा । दिखावे के उस संसार में क्या तुम्हारा दम नहीं घुटता होगा । चमकती सड़कों, रंगीन शामों और कीमती कपड़ों के मध्य कभी तो तुम्हें अपना गाँव याद आता होगा । कभी तो दिल करता होगा कच्चे आम के बाग़ में, एक अलसाई दोपहर बिताने के लिए । कभी तो स्मृतियों में एक चेहरा आकर बैचेन करता होगा ।

    फिर भी अगर तुम्हें कहीं सुकून बहता दिखे, तो एक कतरा मेरे लिए भी सुरक्षित रखना । शायद कभी किसी मोड़ पर हमारी मुलाकात हो जाए । वैसे भी, अभी भी कुछ उधार बनता है तुम पर । सुकून

    ये कुछ पोस्टों के अंश हैं –हसरतगंज ब्लॉग की। कल इनको देखा तो एक साथ सब पढ़ गया। बहुत अच्छा लगा। सोचा आपको भी पढ़वायें। मासूम मोहब्बत के प्यारे से किस्से।

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