Category Archives: आलोक

बरखा प्रभाव – स्ट्राइसेंड प्रभाव को देसी नाम मिला

यह चर्चा आलोक कुमार ने मुझे डाक से भेज आदेश दिया की एक फरवरी को छापा जाए, वजह उन का “चौडाबाजा” (ब्राडबैंड) बज नहीं रहा। कोई भूल चूक लेनी देनी हो तो उन को बताया जाए, अपना काम खत्म। विपुल … पढना जारी रखे

आलोक, चर्चा, रविवार में प्रकाशित किया गया | 15 टिप्पणियाँ

२६ जनवरी के पहले एक दूरदर्शन समाचारीय चर्चा

ठहरो यार अभी तक कुछ दिलचस्प मिला नहीं है। क्या है न कि लोग गणतन्त्र दिवस की छुट्टी मना रहे हैं तो लिखने वाले कम हैं। इसलिए शुरू करते हैं दूरदर्शन। अचरज की बात है न कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया आने … पढना जारी रखे

आलोक में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ

आज की मस्ती चर्चा

इतवार का दिन है तो चर्चा भी मस्ती भरी होनी चाहिए। यानी फ़िलम विलम, गाने वाने, चुटकुले शुटकुले, घूमना फिरना। तो आइए हम आपको पेश करते हैं इस हफ़्ते के सनसनीखेज लेख। मरना ही है तो खा कर ही मरूँगा … पढना जारी रखे

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आज की भरपेट चर्चा

आर्यपुत्र प्रातः ८ बजे उठ गए। सूर्योदय हो चुका था किंतु उन्होंने कलियुग और रविवार के मेल से यह अनुमान लगाया कि संभवतः आज उन्हें सूर्योदयोपरांत उठने वाला पाप नहीं लगेगा। तदनंतर मक्की की दो तंदूरी रोटियाँ, मिर्ची और लहसुन … पढना जारी रखे

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भूखे भजन न होय हवाला

क्या है भई, फिर एक चिट्ठा चर्चा लाद डाली। भूख से पेट कुलबुला रहा है, और यहाँ चिट्ठाचर्चा भी करनी है। सुबह से एक वड़ा और दो पकौड़े खाए हैं, और एक गिलास चाय पी है। लगता है आज तो … पढना जारी रखे

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आज की 111 लेखों की तकनीकी चर्चा

शाम के १९:४८ बज गए। फ़ुरसतिया जी सोच रहे थे कि पिछली बार तो इस आर्य पुत्र से लिखवा के खुद को धर्म संकट में डलवा दिया था, आज तो इसने अब तक कुछ लिखा ही नहीं। क्या करूँ, लिखने … पढना जारी रखे

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आज की चिट्ठा खिचड़ी

फुरसतिया देव ने कल आह्वान किया, “आर्यपुत्र! तुम चिट्ठाचर्चा क्यों नहीं करते? कब तक हमीं कलम घिसते रहेंगे? आखिर हमें भी कुछ और काम होते हैं!” आर्यपुत्र जी अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए शुक्रवार की रात ऐसे सोए कि शनिवार – … पढना जारी रखे

आलोक, २०.१२.२००८ में प्रकाशित किया गया | 23 टिप्पणियाँ