आज हम एक उतावले समय में जी रहे हैं

आज 25 दिसंबर है। क्रिसमस का त्योहार मनाया जा रहा है दुनिया भर में। पूरा यूरोप कुड़कुड़ा रहा है मारे बर्फ़ानी माहौल के। जिधर देखो उधर बर्फ़ नजर आ रही है। सड़क पर बर्फ़, छतों पर बर्फ़, गाड़ियों पर बर्फ़, हवाई जहाजों पर। जिधर देखो उधर बर्फ़। काश इस बर्फ़ को संजों कर रखा जा सकता और फ़िर गर्मी के मौसम में निकाल दिया जाता थोक के भाव।

बहरहाल सभी को क्रिसमस की शुभकामनायें देते हुये मामला आगे बढ़ाते हैं। आइये आप भी साथ चलिये न! लेकिन चलने के पहले आप ये समाचार देख लीजिये। शिखा वार्ष्णेय की इस रपट में उन्होंने बताया है कि कैसी बदहाली का माहौल है लंदन के एयरपोर्ट पर इस कड़क समय में। हुलिया बिगड़ गया है कस्टमर सेवाओं का। एयरपोर्ट किसी रेलवे प्लेटफ़ार्म सरीखा लग रहा है। आगे क्या बतायें आप खुदै देख लीजिये उनकी रपट में।

अपने देश के लोगों की एक फ़ुल टाइम अदा है अपने अतीत पर गर्व करने की। लाल्टू जी ने इस पर अपनी राय बताते हुये लिखा:

कई बार मुझे लगता है कि काश हम एक महान संस्कृति महान देश कहलाने के दबाव से मुक्त हो पाते तो सचमुच हमारा ध्यान हमारी कमियों की ओर जाता और अपनी ऊर्जा महानता के नाम पर सीना पीटने के या विरोध की आवाज़ से डरने के बजाय बेहतर समाज और देश के निर्माण में लगा पाते. पर ऐसा होता तो लोगों को बेवकूफ बना कर देश को लूट रहे महान लोगों की क्या हस्ती रहती!

ऐसे ही घूमते हुये अनुराग वत्स के ब्लॉग सबद पर जाना हुआ। हिन्दी के वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण ने साहित्य अकादमी द्वारा महत्तर-सदस्यता पर्दान किया जाने के अवसर पर २० दिसंबर को जो स्वीकृति वकतव्य दिया उसको यहां पोस्ट किया गया है। कुंवर नारायण जी को इस वर्ष का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा:

आज हम एक उतावले समय में जी रहे हैं. इस ज़ल्दबाज़ी में असंयम और बौखलाहट है. जो हम चाहते हैं, उसे तुरत झपट लेने की आपाधापी. यह हड़बड़ी भी एक तरह की हिंसा है — लड़भिड़ कर किसी तरह से आगे निकल जाने की होड़. यह बेसब्री हमारे अन्दर कुंठा और अधीरज को भड़काती है — उस अनुशासन को नहीं जिसका लक्ष्य महान-कुछ को प्राप्त करना होता है. मेरी एक कोशिश जहां अपने समय को ठीक-ठीक समझ सकने की रही है वहीं उसे स्वस्थ और स्थाई जीवनमूल्यों से जोड़ने की भी.

खुदा झूठ न बुलवाये कुंवर नारायण की यह बात पढ़ते हुये मुझे अपनी एक अनगढ़ तुकबंदी याद आ गयी:

ये दुनिया बड़ी तेज चलती है ,
बस जीने के खातिर मरती है।

पता नहीं कहां पहुंचेगी ,
वहां पहुंचकर क्या कर लेगी ।

बस तनातनी है, बड़ा तनाव है,
जितना भर लो, उतना अभाव है।

आगे कुंवर नारायण जी ने यह भी कहा:

”बाजारवाद” और ”उपभोक्तावाद” आज का कटु यथार्थ है जो हमारे रहन-सहन, रीति-रिवाजों, आपसी संबंधों और सांस्कृतिक चेतना को कई स्तरों पर तेज़ी से बदल रहा है. हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समय तमाम विकल्पों में से सही रास्ते चुन सकने की है. शायद इसीलिए इस समय को ”द्विविधाओं” और ”संदेहों” का समय कहना ज़्यादा ठीक लगता है.


आज समय कैसा चल रहा है यह बोधिसत्व की कविता में देखिये:

घरे-घरे दौपदी, दुस्सासन घरे-घरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

गली-गली कुरुक्षेत्र, मरघट दरे-दरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

देस भा अंधेर नगर, राजा चौपट का करे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

सीता भई लंकेस्वरी, राम रोवें अरे-अरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥


पूजा मतलब पूजा उपाध्याय जिनको मैं डा.पूजा कहता हूं उनकी गजब की अभिव्यक्ति के कारण को जब भी पढ़ता हूं तो लगता क्या लिखती हैं ये, कैसे लिखती हैं। तुम्हारे आने का कौन सा मौसम है जान? का एक अंश:

घर पर हूँ और सोच रही हूँ कि आज के सूचना और टेक्नोलोजी के ज़माने में ऐसा कैसे मुमकिन है कि कहीं तुम मुझे ढूंढ ना पाओ. जिस जमाने में ये सब कुछ नहीं था तब भी तुम मुझे ढूंढ निकालते थे…याद है वो नए साल का सरप्राइज जब तुम हॉस्टल की दीवारें फांद कर बस मुझसे मिलने आये थे एक लम्हे के लिए बस. वो लिफ्ट में जब तुमने कहा था ‘किस मी’ तुम्हें याद है कि चलती लिफ्ट के वो भागते सेकंड्स जब भी याद करती हूँ हमेशा स्लो मोशन में चलते हैं.

कहा भी न जाये रहा भी न जाये का शायद इसी को कहते हैं जब पूजा लिखती हैं:

बहुत साल हो गए जान…अफ़सोस कि मैं एक स्त्री हूँ इसलिए ये नहीं कह सकती…कि जान मैंने सात पैग व्हिस्की पी है, दो डब्बे सिगरेट फूंकी है और तब जा के कहने की हिम्मत कर पायी हूँ…काश कि ऐसा होता मेरी जान. पर मैंने कोई नशा नहीं किया है…तुम्हारी याद को ताउम्र जीते हुए, आज इस सांझ में तुम्हारी आँखों में आँखें डाल कर कहना चाहती हूँ ‘मुझे लगता है मुझे तुमसे प्यार हो गया है जान…काश तुम सामने होते तो तुम्हारे होठों को चूम सकती’.

अरुण रॉय की कविता का अंश देखिये। आगे आपका खुद मन होगा पढ़ने के लिये:

छीलते हुए मटर
गृहणियां बनाती हैं
योजनायें
कुछ छोटी, कुछ लम्बी
कुछ आज ही की तो कुछ वर्षों बाद की
पीढी दर पीढी घूम आती हैं
इस दौरान.


अपनी एक पोस्ट में अजित गुप्ता जी ने बताया लघु कहानी क्या है, कैसे लिखें:

लघुकथा में वर्णन की गुंजाइश नहीं है, जैसे चुटकुले में नहीं होती, सीधी ही केन्द्रित बात कहनी होती है। कहानी विधा में उपन्‍यास और कहानी के बाद लघुकथा प्रचलन में आयी है। उपन्‍यास में सामाजिक परिदृश्‍य विस्‍तार लिए होता है ज‍बकि कहानी में व्‍यक्ति, चरित्र, घटना जैसा कोई भी एक बिन्‍दु केन्द्रित विषय रहता है जिसमें वर्णन की प्रधानता भी रहती है लेकिन लघुकथा में दर्शन प्रमुख रहता है। लघुकथा का प्रारम्‍भ किसी व्‍यक्ति के चरित्र या घटना से होता है लेकिन अन्‍त पलट जाता है और अधिकतर सुखान्‍त होता है।

आज नीरज बसलियाल ने बताया कि कहानी कैसे लिखें:

लिखना एक ऑपरेशन जैसा है | ऑपरेशन थियेटर, एक परिवेश जो एक पूरी दुनिया है , आप अपनी कहानियाँ इसी परिवेश से तो चुराते हो | कभी गए हो वहाँ अन्दर ? गौर किया है कि वहाँ अन्दर जाने पर डर ख़त्म हो जाता है, लेकिन राहत मिले ऐसा भी नहीं |

लेकिन आप तो ब्लॉग लिखते हैं न! आप सोच रहे होगे कि कोई यह तो बताये ब्लॉग कैसे लिखा जाता है। तो देखिये ऐसे लिखा जाता है ब्लॉग :

लिखने का मजा तो यार तो तब है जब ऐसे लगे कि आमने-सामने बैठ के बतिया रहे हैं। अबे-तबे भी हो रही है और अरे-अरे, ऐसे नहीं-वैसे नहीं भी।

कोई तरतीब नहीं। एकदम बेतरतीब। मूड की बात। जैसे कोसी नदी। आज इधर कल किनारा बदल के सौ मील दूर। आज इधर डुबा रही हैं, अगले साल उधर मरणजाल डाल रही हैं। आदमी पानी के बीच पानी के लिये तरस रहा है। जल बिच मैन पियासा।

लेकिन लफ़ड़ा यह है कि ब्लॉग में लोग बेहतरीन और कालजयी लिखने के चक्कर में फ़ंस जाते हैं। अच्छा लिखने की चाहना माया है ब्लॉगिंग की राह में। देखिये:

लब्बो-लुआब यह कि अच्छा और धांसू च फ़ांसू लिखने का मोह ब्लागिंग की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। ये साजिश है उन लोगों द्वारा फ़ैलाई हुयी जो ब्लाग का विकास होते देख जलते हैं और बात-बात पर कहते हैं ब्लाग में स्तरीय लेखन नहीं हो रहा है। इस साजिश से बचने के लिये चौकन्ना रहना होगा। जैसा मन में आये वैसा ठेल दीजिये। लेख लिखें तो ठेल दें, कविता लिखें तो पेल दें।

ब्लॉगिंग में तात्कालिकता का बहुत महत्व है। ज्यादा सोच-समझकर लिखने में यही होता है फ़िर कि टापिक हाथ से निकल जाता है। हाथ आती है केवल मन पछितैहे अवसर बीते वाली मुद्रा।

अब देखिये उधर प्याज महंगा हुआ इधर शिव कुमार मिश्र ने पोस्ट ठेल दी और कह डाला:

आज उतनी भी मयस्सर न किचेन-खाने में
जितनी झोले से गिरा करती थी आने-जाने में

काजल कुमार ने भी कार्टून बना डाला। इसके बाद ही प्याज की कीमतें कुछ तो औकात में आ ही गयीं और टापिक हाथ से निकल गया। इसलिये हे संतजनों जो मन कह डालिये। आगे आने वाला समय न जाने कौन की करवट बैठे।

और अंत में

  • डा.अमर कुमार चकाचक और टिचन्न होने की राह में हैं। पिछ्ली चर्चा में उनक टिप्पणी थी:
    Wah Anup Ji, goya Dr. amar kumar na huye…Chittha-Havaldar ho gaye !
    Mauj le lo, guru.. main aspataliya se bhi Charcha par nazar rakhe huye hoon !
    Shabhi Shubhchitakon ko mere parivar ki taraph se Dhanyavad.
    Gyan ji ko sasharir dekha, pasand karne yogya hain !
    Bye Bye karne ki stage mein TaTa kyon jata ? Sangam hi sahi..Lekin surya dakhsinayan hain, so..Lautaya ja raha hoon.
    Rachna ji, Aaj Roman mein likhte huye bahut bura lag raha hai.. aapko bura nahin lagata ?:)

    इसके पहले आपको बता दें कि अपने बुजुर्गवार चंद्रमौलेश्वरजी भी आपरेशन थियेटर से निकलकर घर वालों की निगरानी में हैं। उन्होंने कल अमरकुमार जी के माध्यम से बताया:

    Dr. Amar ji, hum ek hi kashti ke sawar hain, sab thik ho jayega. sheghra swasth laabh kar laut aayiye iss dangal mein. mujhe bhi bura lag raha hai roman mein likhne ka par kya karen, baraha ne dhokha de diya🙂

    मेरा दुआ है कि दोनों सितारे जल्दी जल्दी स्वास्थ्य लाभ करें और ठसक के साथ जियें।

  • जिन साथियों को ब्लॉगपोस्टें देखने में परेशानी हो रही है वे हिन्दीब्लॉगजगत में जायें। काफ़ी पोस्टें वहां संकलित रहती हैं। काम चल जायेगा। बाकी जिनको पढ़ना है उनको खोजने के लिये गूगल बाबा की शरण लें।
  • बकिया फ़िर कभी अभी निकलना है एक पिकनिक के लिये। आप भी मजे करिये। क्रिसमस मुबारक।

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