सस्ते पैनो से भी लिखी जा सकती है अच्छी कविता…….

प्लेटफोर्म पर किताबो में सर गडाए बैठी है कुछ .ये कवियों के प्रेम की शिकार महिलाए है जो खूब किताबे पढ़ती है ओर रोते रोते कवियों को गालिया दिया करती है ………………..
अच्छी चीजों से जुड़ा सबसे बड़ा विकार है की उन्हें इतना बार दोहराया जाता है की उनका होना एक मामूली सा हो जाता है कि उनकी अच्छाई एक उबाऊ अच्छाई में बदल जाती है ………

 कथा देश में गीत चतुर्वेदी……..
पढना भी एक सतत प्रक्रिया है .जो कभी ख़त्म नहीं होती  ..उम्र बीतते बीते अक्सर आप पुरानी किताबों को उठाकर दोबारा पढ़ते है ओर उनके भीतर नए अर्थो को पाते है …ओर कभी ..कभी किसी लेखक को बरसो बाद उसकी वेव लेंथ में जाकर पकड़ पाते है ….ओर लिखना ? एक लेखक कभी कभी लिखने के बारे में भी लिखता है …..

 

जब आप नहीं लिख रहे होते, तब आप क्या कर रहे होते हैं? मैं ज़्यादातर समय नहीं लिख रहा होता। ज़्यादातर मैं पढ़ रहा होता हूं, संगीत सुन रहा होता हूं, कोई फिल्म देख रहा होता हूं या यूं ही नेट सर्फ कर रहा होता हूं। मैंने पाया है, ईमानदारी से, कि जिन वक्तों में मैं नहीं लिख रहा होता, वह मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि असल में मैं उन्हीं वक्तों में लिख रहा होता हूं।

अच्छी चीज़ों का सबसे बड़ा गुण या अवगुण यह है कि आप पर उसका कोई भी असर पड़े, उससे पहले वह आपको भरमा देती है। अच्छी कविता तो सबसे पहले भरमाती है। वह आपके फैसला करने की क्षमता को कुंद करती है और फैसला देने की इच्छा के लिए उत्प्रेरक बन जाती है। वह तुरत आपके मुंह से यह निकलवाती है- यह क्या बला है भला? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर वह धीरे-धीरे आपमें प्रविष्ट होती है। यही समय है, जब आपकी ग्रहण-क्षमता की परीक्षा होनी होती है। आप उसे अपने भीतर कितना लेते हैं, इसमें अच्छी रचना का कम, आपका गौरव ज़्यादा होता है।

गीत जी को  किसी औपचारिक परिचय की जरुरत नहीं है ..यदि आप कंप्यूटर का एक   इस्तेमाल कुछ अच्छी चीजों को  पढने के लिए  करने वाले में से एक है तो उनका  ब्लॉग   भाषा शब्दों ओर संवेदनाओं के कई   नये स्तरों को अपनी तरह से परिभाषित करता है .उनके पास विचारो की एक नैसर्गिक जमीन है…पूरा लेख पढने के  उनके ब्लॉग बैतागवाडी  पर यहाँ क्लिक करिए

साहिर से बरसो पहले एक नज़्म लिखी थी “.वो सुबह कभी तो आएगी..”….उम्मीद से लबालब.भरी हुई….पर आजकल की  नौजवान पीढ़ी सपनो को भी खुरच कर उसके नीचे की तहों को जांचना  चाहती  है …उसे  फतांसी से गुरेज नहीं है …पर  इस दुनिया में कुछ विलक्षण होने की उम्मीद   भी नहीं….

  श्रीश यथार्थ से सीधे भिड़ते है … 

मुझे उम्मीद नही है,
कि वे अपनी सोच बदलेंगे..
जिन्हें पीढ़ियों की सोच सँवारने का काम सौपा है..!
वे यूँ ही बकबक करेंगे विषयांतर.. सिलेबस आप उलट लेना..!

उम्मीद नही करता उनसे,
कि वे अपने काम को धंधा नही समझेंगे..
जो प्राइवेट नर्सिंग होम खोलना चाहते हैं..!
लिख देंगे फिर एक लम्बी जांच, …पैसे आप खरच लेना.

दुर्भाग्य  से  हकीक़त  का  कोई  वैकल्पिक  स्रोत   नहीं  होता ….सो सीधी मुठभेड़ अनिवार्य है ..बौदिक मुहावरों की परत उतारे बगैर ….पोलिटिकली अन करेक्ट होने का खतरा उठाते हुए  …..तल्खी के थोडा नजदीक ……..
दर्पण अपना हस्तक्षेप  जारी रखते है

पास्ट -परफेक्ट ,प्रेजेंट -टेस

वो क्रांतियों के दिन थे.
और हम,
मार दिए जाने तक जिया करते थे.
सिक्कों में चमक थी.
उंगलियाँ थक जाने के बाद चटकती भी थीं.
हवाएं बहती थीं,
और उसमें पसीने की गंध थी.
पथरीले रास्तों में भी छालों की गिनतियाँ रोज़ होती थी.
रोटियां,
तोड़के के खाए जाने के लिए हुआ करती थीं.
रात बहुत ज्यादा काली थी,
जिसमें,
सोने भर की जगह शेष थी.
और सपने डराते भी थे.
अस्तु डर जाने से प्रेम स्व-जनित था.

ओम जिंदगी की हकीक़तो को कोमल  तरीके से टटोलने वाले कवि है .वे बिना पेचीदा हुए …..रिश्तो पर अपना फ़िल्टर रखते है …ओर उनकी जटिलताओ  आसानी से बयां …..उनके पास कई रंग है कुछ ठहरे हुए …कुछ मिले जुले ..इच्छाओ के अँधेरे में ये रंग अलग चमकते है

यह बिलकुल हीं रात है
और इसकी परिधि के भीतर

ठीक चाँद इतनी खाली जगह है
और बाकी सभी जगह अमावस बिछी हुई है

इस वक्त उस खाली जगह को महसूसना हीं
मेरी कविता है
और उसे लिख देना
तुम्हें पा लेने जैसा है

पर तुमने जाते हुए
वक्त को दो हिस्सों में बाँट दिया था
और वक्त का वो हिस्सा जिसमें कवितायेँ
लिखी जानी थी,
अतीत में गिर गया है

महेन भी एक युवा कवि है …उनकी अपनी अलग संवेदनाये है ….अपनी अलग बैचेनिया ……अपने नजरिये ……..वे मानवीय जिजीविषाओ की   रोजमर्रा की कुछ साधारण घटनाओं में से  उम्मीद तलाशते है ….ओर अपने सपने बचाए रखते है…….उनका पता है हलंत
थोड़ी सी उद्दिग्नता बची रहेगी ह्रदय में
आँखों मे बची रहेगी सुंदरता देखने की थोड़ी बहुत समझ
शब्दों में अर्थ खोजने की हिम्मत बची रहेगी
बची रहेगी अभी कुछ दिन और जीने की इच्छा
थोड़ी सी उदासी बची रहेगी हँसी के साथ
उष्णता बची रहेगी स्पर्श में थोड़ी बहुत
शिशु की मुस्कान में बची रहेगी थोड़ी उम्मीद
और पुलक बची रहेगी एक लड़की की चुप्पी में
जब हम जानेंगे अभी बचा हुआ है
थोड़ा बहुत प्रेम हमारे आसपास

कविताओ से गुजरते हुए ये भी सवाल उठता है के इसकी कितनी आवश्यकता है ?….दरअसल कविता है क्या ….इस सवाल का एक जवाब प्रियंकर जी कुछ यूँ देते है

कविता हमारे अंतर्जगत को आलोकित करती है । वह भाषा की स्मृति है । खांटी दुनियादार लोगों की जीवन-परिधि में कविता कदाचित विजातीय तत्व हो सकती है, पर कविता के लोकतंत्र में रहने वाले सहृदय सामाजिकों के लिये कविता – सोशल इंजीनियरिंग का — प्रबोधन का मार्ग है । कविता मनुष्यता की पुकार है । प्रार्थना का सबसे बेहतर तरीका । जीवन में जो कुछ सुघड़ और सुन्दर है कविता उसे बचाने का सबसे सशक्त माध्यम है । कठिन से कठिन दौर में भी कविता हमें प्राणवान रखती है और सीख देती है कि कल्पना और सपनों का संसार अनंत है ।कविता एक किस्म का सामाजिक संवाद है ।

उपरोक्त पंक्तिया उनके ब्लॉग  पर ६ अगस्त की पोस्ट से ली गयी है …….बिना उनका शुक्रिया अदा किये हुए …..मुझे लगा कविता का  इतना बेहतर   परिचय बांटना उचित है…….ओर आखिर में अपने फेवरेट शायर को याद करते हुए उनकी एक नज़्म के साथ…….

दिल्ली – पुरानी दिल्ली की दोपहर

लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से, कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था – ’चार पाई. बनवा लो…’
खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे.. डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा

’जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन’

गुलज़ार 


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attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि डॉ .अनुराग में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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