वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की कुछ और पोस्टों की चर्चा

वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन में जो लोग आये थे उन्होंने अपने संस्मरण लिखना जारी रखा। प्रवीण पाण्डेय जी ने लिखा था-

इस विषय में मेरी पोस्ट आनी शेष है, वक्तव्यों के देवता तो गांधीजी का आश्रम देखने के बाद ही तैयार हो गयी थी। उनकी कर्मशीलता का चित्रण आज के सामाजिक परिवेश के आधार पर था, ब्लॉगर सम्मेलन से तनिक भी सम्बद्ध न था।

उनकी पोस्ट का इंतजार है। श्रीमती अजित गुप्त जी ने कल लिखा था:

अनूप जी उम्‍दा चर्चा है। मेरी भी शाम को पोस्‍ट आ रही है। बस शाम का ही मुहुर्त्त निकला है।

और उचित मुहूर्त पर उन्होंने अपनी पोस्ट लगाई। वर्धा सम्मेलन के बारे में लिखते हुये उन्होंने लिखा:


अजित गुप्त

साहित्‍य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्‍मेलन, सेमिनार और कार्यशालाएं नित्‍य प्रति होती हैं लेकिन ब्‍लागिंग के क्षेत्र में विधिवत कार्यशालाओं का प्रारम्‍भ करने का श्रेय श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी को जाता है। अभी हम जैसे कई लोग जो ब्‍लागिंग के क्षेत्र से नए जुड़े हैं, समझ नहीं पाए हैं, ब्‍लागिंग और ब्‍लागर की मानसिकता। कभी एक परिवार सा लगने लगता है तो कभी एकदम ही आभासी दुनिया मात्र। मेरे जैसा व्‍यक्ति जो नदी में डूबकर नहीं चलता बल्कि किनारे ही अपनी धुन में चलता है, के लिए एक नवीन अनुभव था।

आचार संहिता पर अपनी राय जाहिर करते हुये उन्होंने लिखा:

यहाँ बात आचार-संहिता की करनी थी, लेकिन सभी ने किसी भी व्‍यावहारिक या सैद्धान्तिक प्रतिबन्‍धों को नकार दिया। लेकिन हमारे नकारने से तो दुनिया चलती नहीं कि हमने कह दिया कि बिल्‍ली मुझे नहीं देख रही और हम कबूतर की तरह आँख बन्‍द कर बैठ जाएंगे। बिल्‍ली तो आ चुकी है, सायबर कानून भी बन चुके हैं और हम मनमानी के दौर से कहीं दूर जिम्‍मेदारी के दौर तक आ प‍हुंचे हैं। वो बात अलग है कि हमें अभी पता ही नहीं कि कानून का शिकंजा हम पर कस चुका है।

सुरेश चिपलूनकर ने भी अपनी पोस्ट के बारे में सूचना देते हुये बताया:

एक ठो छोटी सी पोस्ट हमहूं ठेल दिये हैं… वर्धा की रिपोर्ट “जरा हट के”🙂
उसे पढ़कर कुछ लोग “हट” लेंगे… और कुछ “खिसक” लेंगे…🙂

वर्धा की घटनाओं का जिक्र करते हुये सुरेश जी ने बताया:


अजित गुप्त

जो बात अब तक किसी को पता नहीं थी कि श्री अनूप शुक्ल का “पसन्दीदा शब्द” कौन सा है, अब यह राज़ नहीं रहा… वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन के दौरान दो दिनों में अनूप शुक्ल द्वारा 84 बार “हिन्दूवादी ब्लॉगर” शब्द का उच्चारण किया गया, इससे सिद्ध होता है कि यही उनका सबसे प्रिय शब्द है… अतः सभी ब्लॉगर्स से अनुरोध है कि भविष्य में वे अनूप जी को उनके इसी प्रिय शब्द से पुकारें…

सुरेश जी की पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुये विवेक सिंह ने लिखा:

साड्डे नाल रहोगे तो ऐसी ही पोस्ट लिखोगे । मजेदार । इमेज से निकल रहे हो आप । बधाई !

सुरेश जी को वर्धा में कुछ लोगों ने टोका कि वे जितने गुस्से में अपनी फ़ोटो में दिखते हैं सच उसके एकदम अलग है। लोगों की समझाइश का सम्मान करते हुये सुरेश जी ने अपनी पोस्ट लिखते ही अपनी फ़ोटो बदल ली। यह होता है जनभावना का सम्मान और दबाब।

अनीता कुमार जी ने भी जनभावना का सम्मान करते हुये लिखना शुरू किया और अपने संस्मरण लिखे। लिखकर उन्होंने बताया भी :


अजित गुप्त

वर्धा मीट में अनूप जी ने परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य की तरह स्नेह भरी डांट लगायी, फ़िर से कलम उठाने के लिए प्रेरित किया। अपने परिचय में जब हम ने कुछ ज्यादा कहने से संकोच किया तो उन्हों ने मेरी लिखी एक पोस्ट का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि किसी जमाने में हम ठीक ठाक लिख लेते थे और अब भी अगर फ़िर से लिखना शुरु कर दें तो ठीक ठाक लिख ही लेगें। तो अनूप जी ये पोस्ट आप को समर्पित- अच्छी है या बुरी आप की किस्मत्…

अब चूंकि जिसको पोस्ट समर्पित की गयी उसकी खिंचाई का रिवाज है इसलिये उन्होंने परम्परा का निर्वाह करते हुये लिखा:

खूब मजा आया…अनूप जी, जो सबकी मौज लेते रहते है, उनकी कविता जी ने ऐसी मौजिया खबर ली कि उनसे कुछ बोलते न बना।

लेकिन चूंकि खिंचाई का कोटा कविता पूरा कर चुकीं थी इसलिये उन्होंने अपनी राय जाहिर की:

अनूप जी की क्लास लेने का अपना सुख है, विशेषकर यह कि वे सर झुकाए अच्छी बच्चे की तरह डपट सुनते झेलते रहते हैं और कत्तई बुरा नहीं मानते. व्यक्तित्व का यह बड़प्पन बड़ी चीज है. वैसे इस बार आप साथ थीं तो खबर और मौज लेने में कुछ अधिक आनंद आया.


लखनऊ से आये जाकिर अली’रजनीश’ ने अपनी बात कहते हुये खुलासा किया:


अजित गुप्त


अनूप जी से यूँ तो स्टेशन पर ही मुलाकात हो गयी थी, पर न जाने क्यों पूरे सम्मेलन के दौरान वे और उनकी बातों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। जब भी उनसे बात हुई, जानबूझकर वे डॉ0 अरविंद मिश्र का जिक्र ले ही आए। और जब भी मिश्र जी का नाम आए, वे कोई भी चुटकी लिए बिना न रह सके। अपनी बातों के दौरान उन्होंने कई बार दोहराया कि उनसे चुटकी लेने में उन्हें विशेष आनन्द आता है। अरविंद जी, सुन रहे हैं आप?

अरविन्द मिश्र की कमी तो सच में खल रही थी। दूर बैठकर अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त करने में उनके वक्तव्यों में वो बात नहीं आ रही जो वे वहां मौजूद रहकर कर पाते। हालांकि जाकिर भाई ने काफ़ी कुछ अरविन्द जी की कमी को भरसक दूर करने का प्रयास किया और बताया:

अनूप शुक्ल जी, ब्लॉग जगत के नारीवादी समर्थक ब्लॉगर माने जाते हैं। मेरे दिमाग में यह बात हमेशा गूँजती रहती है। इसलिए मैंने सोचा था कि इस बात का गहराई से अध्ययन किया जाए। और नतीजे सचमुच चौंकाने वाले थे। प्रोग्राम के दो दिनों में मेरी जब भी उनपर नजर पड़ी, वे 75 प्रतिशत से अधिक बार किसी न किसी नारी ब्लॉगर का उत्साह वर्द्धन करते मिले। कार्यक्रम में पहली बार पधारी नवोदित ब्लॉग गायत्री शर्मा, जोकि ब्लॉग पर शोध कार्य भी कर रही है, का उन्होंने विशेष ध्यान रखा।

अरविन्द मिश्र ने इस बात को कहने का सही तरीका बताते हुये लिखा:

शुकुल महराज को एक्सपोज करने की भी जरूरत है क्या ? पहले से ही वे खुल चुके हैं -अभी तो चिट्ठाचर्चा पर नारीय झुकाव वाली पोस्ट आने वाली ही होगी -फोटू शोटू के साथ …वे एक घोषित नारी सहिष्णु ब्लॉगर हैं !

इस तरह वर्धा सम्मेलन ने अनूप शुक्ल की छवि नारी विरोधी से नारी समर्थक की कर दी। दो साल पहले उन्होंने अपनी छवि के आधार पर लिखा था:

मठाधीश हैं नारि विरोधी
बेवकूफ़ी की बातें करते।
हिन्दी की न कोई डिगरी
बड़े सूरमा बनते फ़िरते॥

अविनाश वाचस्पतिजी ने अपनी बात कहते हुये लिखा:


अजित गुप्त

इसी प्रकार की आपत्तियां, आरोप-प्रत्‍यारोप आदि इस हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सेमिनार के संबंध में भी ब्‍लॉग पोस्‍टों में नजर आए, जिनसे इस सेमिनार की सार्थकता स्‍वयं सिद्ध हुई है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को इससे बल प्राप्‍त हुआ है। इस दौरान पोस्‍टों में, जो सवाल सबसे अधिक चर्चा में आए, वे ये हैं कि, किन ब्‍लॉगरों को बुलाया गया है, क्‍यों बुलाया गया है, उनका चयन किस आधार पर किया गया है और आचार संहिता की जरूरत ही क्‍या है आदि। इसी संदर्भ में पूर्व में आयोजित इलाहाबाद वाले ब्‍लॉगर सम्‍मेलन की अव्‍यवस्‍थाओं और अनियमितताओं का भी जिक्र किया गया।

इन बातों पर अपनी राय जाहिर करते हुये उन्होंने लिखा:

विचार तो यह होना चाहिए कि एक सुखद शुरूआत हुई है, मुझे नहीं बुलाया गया तो कोई बात नहीं, जिसको बुलाया गया, हैं तो वे भी हिन्‍दी ब्‍लॉगर ही। हम सबमें से ही एक हैं। एक हैं तो नेक भी होंगे, पर हम खुद कितने नेक हैं, यह सोचने की जहमत हम नहीं उठाते हैं। इसकी जगह होता यह है कि मैं तो सबसे धुरंधर ब्‍लॉगर हूं, मेरे बिना ऐसे आयोजन की कोई सार्थकता ही नहीं है, उपयोगिता नहीं है, कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, इससे बचना होगा और सब्र करना होगा।

इस आयोजन के सूत्रधार रहे सिद्धार्थ त्रिपाठी ने भी अपनी बात कहना शुरू किया:


अजित गुप्त

जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।

आगे अपनी बात कहते हुये उन्होंने लिखा:

मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

चर्चा जारी रहेगी। तब तक आप वर्धा में आये साथी ब्लॉगरों के फ़ोटो यहां देखें।

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