साला न कहें भाई साहब कहें


सबेरे के नास्ते के बाद हम लोग सेवाग्राम देखने गये। दस मिनट की दूरी पर स्थित आश्रम में आज सुबह सबसे पहले शायद हमारी टीम ही पहुंची। गांधी जी से जुड़ी तमाम वस्तुएं देखीं। गांधी जी दिन प्रतिदिन की दिनचर्यी का विवरण देखकर हम सभी को एक बार फ़िर लगा -गांधीजी अद्भुत व्यक्तित्त्व थे। कई लोगों ने इस बात को वहां रखे रजिस्टर में भी लिखी।

गांधी आश्रम के बाद हम पास ही स्थित विनोबा भावे जी का आश्रम देखने गये। आश्रम के पास बहती पवनार नदी की तरफ़ सब पहले गये। वहां फ़ोटो सोटो हुये। आश्रम से हम लोग सुबह नौ बजे लौट आये।

लौटकर नाश्ता करते हुये आलोक धन्वा जी का कविता पाठ सुना। उनका वक्तव्य रिकार्ड किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कल कही बातें भी दोहराई। गुजरात दंगो पर उनकी बात पर संजय बेंगाणी की त्वरित प्रतिक्रिया थी कि जब यह वक्तव्य पोस्ट किया जायेगा तब वे अपनी टिप्पणी करेंगे। संजय बेंगाणी ने यह भी कहा कि उनको तो दुनिया बहुत अच्छी लगती है।

नाश्ते के बाद शुरु हुये सत्र में ब्लागरों ने अपने विचार व्यक्त किये। शुरुआत सुरेश चिपलूनकर ने की। नये ब्लागरों को अपनी तरफ़ से उन्होंने ब्लागिंग के गुर सिखाये। उन्होने बताया कि दूसरे के ब्लाग पर टिप्पणी करना सबसे अच्छा तरीका ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिये। तत्थात्मक बातें लिखनी चाहिये। सामग्री स्रोत का लिंक देना चाहिये। माडरेटर के बारे में उन्होंने बताया कि विरोधी बातों का शालीलना से जबाब देना चाहिये। बहुत गुस्सा आये तो आप साले की जगह भाईसाहब शब्द का इस्तेमाल करते हुये कह सकते हैं- भाई साहब आप बहुत हरामी हैं।

हर्षवर्धन त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत वर्धा विश्वविद्यालय को और खासकर विभूति नारायण राय और सिद्धार्थ त्रिपाठी को इस बात को धन्यवाद देते हुये कही कि उनके सहयोग से यह संभव हुआ कि ब्लॉगिंग पर बातचीत करने के लिये मंच मुहैया कराया। हर्षवर्धन ने आचारसंहिता को सिरे से खारिज करते हुये यह बताया आप जो भी लिखें पूरी बात पक्की जानकारी से लिखे। उन्होंने विस्फ़ोट,मोहल्ला,भड़ास, अर्थकाम.काम का उदाहरण देते हुये बताया इन ब्लाग में उद्यमिता के माडल के रूप में लिया जाना चाहिये। हम समय और आवश्यक्ता के अनुरूप के साथ बदलते हैं। आज यशवंत सिंह उतने ही आक्रामक नहीं हैं जितने शुरुआती दिनों में थे। वे आज ज्यादा समझदार से हुये हैं। यह वित्तीय जरूरत से पैदा यह समझ है। और ब्लागिंग अनामी ब्लागर के बारे में अपनी राय रखते हुये हर्षवर्धन ने कहा कि व्यक्तिगत हिसाब निपटाने के लिये बेमानी ब्लाग लिखना अनुचित है लेकिन जनहित में संस्थागत लड़ाइयां लड़ने के लिये बेनामी की आवश्यकता पड़ सकती है। उनका मानना है कि ब्लाग पर विश्वनीयता बनाये रखे के लिये खबरें तथ्यात्मक होनी चहिये।

रवीन्द्र प्रभात ने अपने ओजपूर्ण वक्तव्य में बताया कि हम अच्छे बनें, धनात्मक रहें, खुश रहें। हम अपनी पत्नी को नहीं बदल सकते है, साथ जुड़े अन्य लोगों को नहीं। लेकिन हम प्रयास कर सकते हैं कि अपने आप को बदल सकते हैं। कई उदाहरण देते हुये उन्होंने बताया कि कैसे हम अच्छे विचार ब्लागर बन सकते हैं।

अविनाश वाचस्पति ने कहा कि आचार संहिता की बात अगर न भी मानें तो मन की बात माननी चाहिये और ऐसी बातें करने से बचना चाहिये जिससे लोगों को बुरा लग सकता है।

प्रवीण पाण्डेय ने राजा बेटा की तरह अपना और अपने ब्लॉग का परिचय देते हुये दुविधा जाहिर की वे उन लोगों के सामने अपनी बात कहने आये हैं जिनको पढ़ते हुये उन्होंने ब्लॉगिंग शुरु की। इसे वे अपना सम्मान समझे या यह कि उनको कठिन इम्तहान में खड़ा कर दिया गया है। प्रवीण जी ने अपनी ब्लाग यात्रा के बारे में बताया कि टिप्पणियों और वुधवासरीय पोस्ट से शुरु कर के वे अब अपने ब्लाग पर लिखने लगे हैं- न दैन्यम न पलायनम।

प्रवीण जी ने अतियों से बचने के अपने सहज स्वभाव के बारे में बताते हुये नदी के उदाहरण के माध्यम से बताते हुये बताया कि अतियों पर चलने वाले लोग या तो किनारे पर रुक जाते हैं या भंवर में फ़ंस जाते हैं। लिखने से ज्यादा पढ़ने और जितनी टिप्पणियां उनको मिलती हैं उससे पांच गुनी ज्यादा करने की बात भी प्रवीण जी ने कही।

सुश्री गायत्री शर्मा ने अपने ग्रुप का प्रस्तुतिकरण करते हुये ब्लागिंग की सामाजिक उपयोगिता पर समूह के विचार पेश किया। उन्होंने सुनामी ब्लॉग का उदाहरण देते हुये ब्लॉग की सामाजिक उपयोगिता के बारे में अपनी बात कही। गायत्री शर्मा की बातचीत अलग से पूरी टेप में पेश की गयी है।

कल की तरह आज भी दो मिनट छीनकर यशवंत सिंह मंच पर आ गये हैं। उनका कहना है कि हम हिंदी पट्टी के लोग अतियों में जीते हैं। या तो हम अराजक हो जाते हैं या फ़िर बेहद भावुक। अंग्रेजी के लोग तार्किक होते हैं इसलिये वे गाली और गप्प को कम तथ्य को ज्यादा तरजीह देते हैं। हम हिंदी वाले गाली और गप्पों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तथ्य पर कम। यशवंत ने अपनी यादों का जिक्र करते हुये यह कहा कि शायद पिछले समय में उन्होंने भी एक आम हिंदी ब्लॉगर की तरह अतियों पर रहते हुये तमाम बेवजह बातें और दूसरों को दुख पहुंचाने वाली पोस्टें लिखीं। लेकिन अब समय के साथ हमारी सोच में बदलाव आया है और अब वे इस तरह की दूसरों को दुख पहुंचाने वाली बेवजह पोस्टें लिखना बंद कर दिया है।

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