वर्धा में भाषण जारी

टपके ब्लॉगर बहुत से, वर्धा में इक साथ
चमकाते हैं दांत सब मिला-मिलाकर हाथ।
मिला-मिलाकर हाथ, चाय सबने पी ली है
बाकी सब तो ठीक,कमी मच्छर जी की है।
विवेक सिंह यों कहें, नहीं वे अब तक चिपके
मच्छर काटे नहीं, यहां जोन ब्लॉगर टपके।

सब लोग हाल में आ गये हैं। सिद्धार्थ त्रिपाठी उद्धाटन उद्बोधन शुरू कर चुके हैं। मंच पर मुख्य वक्ता जगह ले चुके हैं। मंचासीन होने वाले लोग मंच पर रखी कुर्सियों पर विद्यमान हैं । विश्वविद्यालय के उपकुलपति जी कोचीन से हैं । अभी वे भाषण दे चुके हैं । उनका हिन्दी उच्चारण हालांकि कोचीनी है । पर उन्होंने हृदय की भाषा की दुहाई देदी है ।

अनूप जी फोटो खींच रहे हैं । मैं विवेक पोस्ट लिख रहा हूँ । यहां आखिरी वाली फ़ोटो भी अनूप जी ने खींची। इसमें विवेक सिंह लोटपोट पर नेट सटा रहे हैं।

विभूति नारायण जी कह रहे हैं। ब्लॉग अभिव्यक्ति का विस्फ़ोट है। इंटरनेट में सार्वजनिकता का विस्तार हुआ। रचनाकार सीधे पाठक तक पहुंच सकता है। इसने राष्ट्र राज्य की सीमायें तोड़ी हैं। हालांकि इसको रोकने की असफ़ल कोशिशें की। यह देखना होगा कि हम क्या यहां स्वच्छंद तो नहीं हो गये हैं। स्वतंत्रता की जगह कहीं हमने स्वछंदता का वरण तो नहीं कर लिया है। स्वतंत्रता की सीमा होती है। एक समझदार और सभ्य समाज के लिये जरूरी है कि उसके नागरिक अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींचे ताकि ऐसी स्थिति न आये कि राज्य को सेंसर लगाने की सोचना पड़े।

कुलपति जी कह रहे हैं यहां कुछ तकलीफ़ें हो सकती हैं। यह बनता हुआ विश्वविद्यालय है। यहां की असुविधाओं के लिये खेद है। लेकिन आशा है कि यहां सार्थक बातचीत होगी।

कुलपति जी बैठ चुके हैं। माइक फ़िर से सिद्धार्थ के पास है। और वे बुला रहे हैं श्रीमती अजित गुप्त को।

अजित जी को विषय प्रवर्तन के लिये बुलाया गया है। उन्होंने कहा कि वे ब्लॉगर हैं और त्वरित विचार ही ब्लॉगिग में पेश करती हैं। इसके बाद वे पढ़कर अपनी बात कह रही हैं और विषय परिवर्तन कर रही हैं। उनका कहना है कि अपने ऊपर हमको अपने आप संयम रखना चाहिये।

कामनवेल्थ खेलों के समय जिन लोगों ने भारत की अच्छी इमेज पेश की उनका जिक्र कर रही हैं श्रीमती अजित गुप्त जी। वे इशारे से कुलपति जी पर हुये हमले की बात भी कह रही हैं।

यदि मैं स्त्री संबंधी बात कहती हूं यह ध्यान रखना होगा कि पुरुष भी इसे सुन रहे हैं। कुछ लोग मर्यादा तोड़ते हैं तब ऐसे समय में एक आचार संहिता की आवश्यकता होती है। जैसे पंचायत होती थी पहले। लोग तय करते थे कि यह सही है यह अलग।

उन्होंने एक ब्लॉग पंचायत का सुझाव दिया। एक पंचायत होनी चाहिये जो इन सब मामलों पर समझदार भूमिका निभा सके। एग्रीगेटर से अनुरोध है कि वे अश्लील, खराब बेनामी और भद्दी भाषा में लिखने वालों को समझाइश दें और उनको अनुशाषित करें।

कविताजी आचार संहिता की आवश्यकता क्यों है पर बात कर रही हैं। शायद आने वाले समय में आचार संहिता की आवश्यकतायें बढ़ेंगी।

खराब से खराब व्यक्ति को अच्छी चीज का आधिपत्य दीजिये वह उसे खराब कर देगा। और अच्छे व्यक्ति को खराब से खराब चीज दे दीजिये वह उसे अच्छा कर देगा। आचारसंहिता को आरोपित नहीं किया जा सकता। हां आप यह कर सकते हैं कि अनाचार पर दण्ड का विधान किया जा सकता है।

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