ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात खामख्याली है








प्रख्यात कवि और संस्कृतिकर्मी आलोक धन्वा जी ने ब्लॉगिंग के संबंध में अपने विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने ब्लॉगिंग को विस्मय कारी विधा बताया। उन्होंने बताया कि वे कुछ दिनों से नियमित ब्लॉग देखते हैं। धन्वाजी ने बताया कि कबाड़खाना वाले अशोक पाण्डेय जी ने उनको ब्लॉगिंग के बारे में बताया। उनको प्रियंकर पालीवाल जी से भी इस बारे में जानकरी दी।

आलोक धन्वा जी ने ब्लॉगिंग की तुलना रेल के चलन से करते हुये बताया कि शुरुआत में जैसे रेल यात्रा करने से लोग डरते थे लेकिन आज यह हमारी आवश्यकता बन गयी है वैसे ही शायद अभी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में इसके प्रति हिचक है लेकिन आने वाले समय में यह जन समुदाय की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकती है।

आलोक धन्वाजी ने अपने वक्तव्य में कहा कि हम आजकल सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। इतना कठिन समय पहले कभी नहीं रहा- द्वितीय विश्व युद्ध और अन्य संकटों से भी अधिक कठिन समय के दौर से हम गुजर रहे हैं। लोकतंत्र के लिये बहुत कम बची है।

आचारसंहिता की बात करते हुये उन्होंने कहा कि समय और समाज की नैतिकता ही अभिव्यक्ति की नैतिकता हो सकती है। दुनिया कैसे बेहतर बने इस दिशा में प्रयास करने वाली आचार संहिता ही ब्लॉगिंग की आचार संहिता हो सकती है।

ब्लॉग जगत की अचार संहिता की जगह इंटरनेट की नैतिकता की चर्चा होनी चाहिये। जो अपने को अच्छा नहीं लगता उसे दूसरे से नहीं कहना चाहिये। आभासी दुनिया वास्तव में वास्तविक दुनिया का विस्तार है।

अनूप शुक्ल ने अपनी बात शुरु करने से पहले अपने ब्लॉगजगत से जुड़े तमाम दोस्तों को याद किया। रविरतलामी, आलोक कुमार, देबाशीष चक्रवर्ती, जीतेंन्द्र चौधरी और पंकज नरुला आदि। आचार संहिता के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा- मेरी समझ में ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात करना खामख्याली है। ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति
का माध्यम है। समय और समाज की जो आचार संहितायें जो होंगी वे ही ब्लॉगिंग पर भी लागू होंगी। इसके अलावा ब्लॉगिंग के लिये अलग से आचार संहिता बनाने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिये।

नैतिकता की बात पर अनूप शुक्ल ने कहा कि कोई भी आचार संहिता कम से कम ब्लॉगिंग पर लागू न हो सकेगी। नैतिकता लागू करने की बात कुछ ऐसी ही है:
तस्वीर पर जड़े हैं ब्रह्मचर्य के नियम
उसी तस्वीर के पीछे चिडिया बच्चा दे जाती है।

नैतिकता के बारे में रागदरबारी को उद्धरत करते हुये उन्होंने कहा:

“नैतिकता, समझ लो कि यही चौकी है। एक कोने में पड़ी है। सभा-सोसायटी के वक्त इस पर चादर बिछा दी जाती है। तब बड़ी बढ़िया दिखती है। इस पर चढ़कर लेक्चर फ़टकार दिया जाता है। यह उसी के लिए है।”

ब्लॉगिंग को अद्भुत विधा बताते हुये बताते हुये अनूप शुक्ल ने कहा कि लोग यहां की अच्छाई देखने के बजाय इसकी बुराइयों का रोना रोते हैं। यह अकेला ऐसा माध्यम है जिसमें त्वरित दुतरफ़ा संवाद संभव है। ब्लॉग एक तरह से रसोई गैस की तरह है जिस पर आप हर तरह का पकवान बना सकते हैं। साहित्य,लेखन, फोटो, वीडियो, आडियो हर तरह की विधा में इसमें अपने को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

मीडिया, साहित्य और पत्रकारिता की स्थापित लोग जो इसको दोयम दर्जे की विधा मानकर इसकी उपेक्षा करते हैं वे अपना ही नुकसान करते हैं। आम आदमी की अभिव्यक्ति का यह औजार अद्भुत है। इसकी आभासी बुराइयों का रोना रोने की बजाय हमें इसकी अच्छाईयों का उपयोग करना चाहिये।

बीच में दो मिनट का समय लेकर यशवंत सिंह ने अपनी बात कही और अनामी अनामी ब्लॉगरों के समर्थन में अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि हमको आज आचार संहिता बनाने वालों की आचार संहिता पर विचार करना चाहिये।

कार्यक्रम के अध्यक्ष ॠषभ देव ने अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुये सभी वक्ताओं के विचारों का संक्षिप्त अंश पेश करते हुये अपनी बात कही। उन्होंने नैतिकता, बेनामी ब्लॉगर और अन्य मसलों पर अपने विचार व्यक्त किये। बेनामी ब्लॉगरों के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा –

बेनामी बड़े-बड़े काम करते होंगे मैं उनका अभिनंदन करता हूं। लेकिन इसको नियम नहीं बनाया चाहिये। मेरे परिचय क्षेत्र में कई लोग हैं जिन्होंने अपने सूचनायें झूठी दी हैं। पाखंड हर जगह निंदनीय है। ब्लॉगिंग कोई खिलवाड़ नहीं है। यह नैतिक कर्म है(नित्य कर्म नहीं  ) बच्चों बताते हैं कि उनसे कोई पूछता नहीं है। वरिष्ठ और कनिष्ठ न भी माने तो अनुभवी और कम अनुभवी का अन्तर तो रहेगा ही। मेरी चिंता का कारण बच्चे हैं जो झूठी पहचान बनाकर गलत हरकतें कर रहे हैं।

जिस बात को सार्वजनिक रूप से नहीं कह सकते वह ब्लॉग पर भी कहने का हक हमें नहीं है। हममें यह हिम्मत होनी चाहिये कि जिसे हम सही समझते हैं वह कह सकें।

कमेंट माडरेशन यदि कमेंट व्यक्तिगत आक्षेप, अश्लीलता और अनैतिकता वाले हों तो उसे हटाने का अधिकार होना चाहिये। लेकिन आलोचना को सम्मान मिलना चाहिये। ब्लॉग को संवाद का माध्यम बनाया जाये अखाड़ा नहीं। पारस्परिक सम्मान जो हम अपने आम जीवन में करते हैं उसे ब्लॉग में भी देना चाहिये। ब्लॉग को समाज सुधार और नैतिकता के अतिरिक्त बोझ से लादना नहीं चाहिये।

संचार विभाग के श्री अनिल कुमार राय ने धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा -जहां आधुनिक संचार माध्यम समाप्त होते हैं वहां से इसकी शुरुआत होती है। यदि हम टिप्पणियों को माडरेशन करने लगे तो फ़िर यह तो एक संपादक की उपस्थिति ही हुई। उन्होंने इस सत्र के लिये धन्यवाद दिया इस वायदे के साथ कि अंतिम धन्यवाद कल दिया जायेगा।

दोपहर के खाने के बाद चार ग्रुप बना दिये हैं। ये चार ग्रुप ब्लॉगिंग पर चर्चा करके कल अपनी प्रस्तुति करेंगे। सभी ब्लॉगर चाय की चुस्कियों के बीच आपस में अपना परिचय देते हुये आगे की बात कर रहे हैं।

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