हाशिये की शताब्दी और कोहबर की शर्त

हिंदी साहित्य के चार महान कवियों , शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन ,के जन्म के सौ साल पूरे हुये। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा इन चार कवियों की जन्मशती मनाने के बहाने बीसवी सदी का सिंहावलोकन करने के उद्देश्य से साहित्यिक गोष्ठियों की एक शृंखला प्रारम्भ किया जा रहा है। ये कार्यक्रम देश के विभिन्न शहरों में आयोजित होंगे। समापन कार्यक्रम दिल्ली में होगा। इसी शृंखला का उद्घाटन कार्यक्रम गांधी-जयंती के अवसर पर वर्धा स्थित विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित हुआ।

इस मौके पर विषय प्रवर्तन करते हुये विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय ने कहा :

बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा।

इस कार्यक्रम के उद्धाटन भाषण में नामवर सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुये बीसवी सदी को सर्वाधिक क्रांतिकारी घटनाओं की शताब्दी बताया। ऐसी शताब्दी जिसमें दो-दो विश्वयुद्ध हुए, विश्व की शक्तियों के दो ध्रुव बने, फिर तीसरी दुनिया अस्तित्व में आयी। इस मौके पर जनकवि बाबा नागार्जुन को याद करते हुये उन्होंने कहा:

बाबा ने काव्य के भीतर बहुत से साहसिक विषयों का समावेश कर दिया जो इसके पहले कविता के संभ्रांत समाज में वर्जित सा था। दलितों, म्लेच्छों, वंचितों और शोषितों को उन्होंने अपनी कविता में पिरोकर प्रभु वर्ग के सामने खड़ा कर दिया। चमरौंधा जूता पहनाकर ए.सी. ड्राइंग रूम में घुसा दिया। ऐसे पात्र इससे पहले प्रेमचंद की कहानियों में ही पाये जाते थे। नागार्जुन के दोहे सुनाकर उन्होंने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।
नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक॥

इस मौके पर अन्य रिपोर्टें आप निम्न कड़ियों में देख सकते हैं:

  • अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर और फ़ैज़ की जन्मशताब्दी पर आयोजित कार्यक्रमों की शृंखला – २
  • “जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है”
  • इन्हीं कड़ियों में अन्य लाइव रिपोर्टिंग के किस्से भी हैं।

    वक्ताओं ने अपने प्रिय कवियों के बारे में बोलते हुये जो उसे आप कविता वाचक्नवी जी की रिपोर्ट में देख सकते हैं। उनके कुछ अंश देखिये:

    – नागार्जुन के काव्य में जेठ का ताप और पूर्णिमा का सौन्दर्य है.-प्रो.शम्भुनाथ

    – भारतीय जनता की सम्पूर्ण मुक्ति के कवि हैं नागार्जुन. उनका स्वप्न था कि एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की कोई सम्भावना नहीं.-प्रो.नीरज सिंह

    – शमशेर की कविताएँ अपनी समकालीनता का एक एल्बम हैं। हमारे पहले की तस्वीर हमारे आज से कई बार इतनी भिन्न होती है कि हम स्वयं नहीं पहचान पाते. कई बार समूचा भोलापन खो चुका होता है.-प्रो.रंजना अरगड़े

    – आज जिस प्रकार शमशेर वाले इस सत्र में सबसे कम वक्ता, सब से कम श्रोता हैं, यही शमशेर के साथ आजीवन होता रहा कि बहुत कम लोग उनके साथ रहे, चले.-अरुण कमल

    – जिन कवियों को आप प्यार करते हैं उनकी कोई शताब्दी नहीं होती.-अरुण कमल

    – फ़ैज़ को अपनी भाषा से बहुत प्रेम था. वे अपनी भाषा के लिए अत्यन्त चिन्तित होने के साथ साथ गर्वित भी थे.-डा.प्रीति सागर

    – फ़ैज़ का आशिकाना मिज़ाज़ हमें ही नहीं बुजुर्गों को भी प्रभावित करता है, उन्होंने कहा मेरी दो ही प्रेमिकाएँ हैं, एक है मेरी महबूबा और दूसरा है मेरा देश.-दिनेश कुशवाह

    – कवियों की तुलनात्मक चर्चा यहाँ यों हुई है जैसे आप उन्हें नम्बर दे रहे हों.-कवि आलोक धन्वा

    अभिषेक अपने काम के लिहाज से बहुत व्यस्त जैसी जिन्दगी जीते हैं फ़िर भी दोस्तों के उकसावे पर किताबें पढ़ने और फ़िर उसके बारे में बताने का समय निकाल लेते हैं। पिछले दिनों उन्होंने जो किताब पढ़ी उसके बारे में बताते हुये लिखते हैं:

    किताब पर अगर एक लाइन कहूँ तो… ‘किताब खोलने के बाद मैं अपनी जगह से तब उठा जब किताब का आखिरी पन्ना आ गया और आँखे तब-तब हटी जब-जब ये लगा कि पुस्तक पर बुँदे टपक जायेंगी.’

    यह एक लाइन वाली बात उन्होंने अपनी पोस्ट में दो लाइनों में कही। एक के साथ एक फ़्री का जमाना है हर जगह।🙂

    कोई किताब क्यों किसी को पसन्द आती है इस बारे में अपनी फ़िलासफ़ी बताते हुये अभिषेक लिखते हैं:

    मेरा अनुभव कहता है कि अगर कुछ भी पढते समय अगर उससे जुड़ाव हो जाए लगे कि कहीं ना कहीं हमने भी ऐसा महसूस किया है. कुछ पढते समय अगर पात्रों के साथ-साथ चलना हो पाता है वो बहुत अच्छा लगता है. कुछ पंक्तियाँ भले ही कितनी साधारण हो वो हमेशा के लिए याद रह जाती है क्योंकि उसमें अपनी या अपने आस-पास की बात दिखती है. ये कहानी वहाँ चलती हैं जहाँ मेरी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा गुजरा है. और वो हिस्सा जिसे बचपन कहते हैं. मैं घर जाने के लिए आज भी उसी स्टेशन पर उतरता हूँ जिसका वर्णन पहले पन्ने पर है. उसी गाँव में मैंने प्राथमिक शिक्षा पायी है जो पुस्तक में नायिका का गाँव है. पुस्तक पढते हुए मैं उसमें आये हर रास्ते पर चल पाया. एक-एक दृश्य देखा हुआ मिला. एक एक चरित्र में किसी की छवि दिखती गयी. खेती के तरीके अब भी लगभग वही हैं. उन खेतों में आज भी भदई बोना जुए का खेल ही है… नावों और बैलों को छोड़कर आज भी सबकुछ वैसा ही है. पुस्तक में आया बरगद का पेंड आज भी वैसे ही खड़ा है. आंचलिक शब्दों, दृश्यों और पात्रों से जुडने में जहाँ कोई समय नहीं लगा वहीँ उनको भुलाने में समय लग रहा है.

    किताब का नाम है कोहबर की शर्त! कोहबर के बारे में सवाल-जबाब हुये हैं पोस्ट में। उसका मतलब कुछ को पता है कुछ को नहीं। देखिये आप भी क्या होता है कोहबर और क्या है कोहबर की शर्त।

    कल भारत का खेलों में जलवा रहा। कामनवेल्थ खेलों में पदक मिले और क्रिकेट में आस्ट्रेलिया से जीत। एक अखबार में हेडिंग थी: पांच गोल्ड कंगारू बोल्ड। इस मौके पर विवेक सिंह ने अपनी कविता में भारत माता की खुशी जाहिर करते हुये लिखा:

    खाता खोला स्वर्ण का, सही निशाना मार
    बिन्द्रा-नारंग को कहें, बहुत बहुत आभार
    बहुत बहुत आभार बनाया कीर्तिमान है
    अर्जुन की इस मातृभूमि की बढ़ी शान है
    विवेक सिंह यों कहें खुश हुई भारत माता
    सही निशाना लगा स्वर्ण का खोला खाता

    और अंत में

    फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी। लेकिन जल्दी ही।

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    यह प्रविष्टि अनूप शुक्ल में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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