ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए

Best Among Equals दिव्या

दिव्या अजीत कुमार पहली महिला कैडेट बनीं जिनको सबसे बेहतर कैडेट के रूप में चुना गया। 21 वर्षीय दिव्या को ऑफीसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओटीए) की पासिंग आउट परेड में थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने सॉर्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया । गिरिजेश राव के अनुसार: मुझे उस दिन की प्रतीक्षा रहेगी जब दिव्या अजीत कुमार जनरल बनेंगी।
देखिये आगे क्या होता है फ़िलहाल हम एक बार फ़िर से दिव्या अजीत कुमार को बधाई दे सकते हैं।
साथ ही आशा भी कर सकते हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर और भी महिलायें इस सबसे कठिन मानी जानी वाले सेवा में आयेंगी और महिलाओं की बेहतरी के लिये हौसला बढ़ाने वाले उदाहरण पेश करेंगी।

भारत, जम्मू कश्मीर और सिर्फ़ कश्मीर

कश्मीर समस्या के बारे में हम बहुत दिन से सुनते आये हैं और अपने बयान भी जारी करते आये हैं लेकिन कश्मीर , जम्मू कश्मीर और भारत के बारे में साफ़-साफ़ नहीं जानते थे कि मामला क्या है! सिर्फ़ एक एहसास था कि कश्मीर एक समस्या है। रमन कौल ने अपने लेख Kashmir Is Too Small For Azadi में उन्होंने सिलसिलेवार कश्मीर के बारे में जानकारियां दीं जो कम से कम मुझे नहीं थीं। उन्होंने कई बातों के साथ बताया:
१.कश्मीर देश का सबसे उत्तरी इलाका नहीं है।
२.मीडिया और दुनिया के तमाम लोग कश्मीर को जम्मू-कश्मीर बताकर भ्रम फ़ैलाता है। जैसे कि ये:

Headline on CNN about Leh floods: Death toll from Kashmir flooding rises to 112
Correction: Leh is not in Kashmir. There was no flooding in Kashmir.

A Vaishno Devi Pilgrim: I just returned from Kashmir. Things are peaceful there.
Correction: Jammu is not in Kashmir. There is no jehad in Jammu.

A University of Texas Website Article: refers to the 1999 war in Kargil, Kashmir
Correction: Kargil is not in Kashmir. It is in Ladakh province.

३.कश्मीर का क्षेत्रफ़ल जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रफ़ल मात्र १५% है।
४.जम्मू कश्मीर में कश्मीर को छोड़कर बाकी हिस्सों की आबादी मुस्लिम बहुल नहीं है।
अपनी राय व्यक्त करते हुये रमन कौल लिखते हैं:

It is painful to see the violence, the killings, the inconveniences in Kashmir. But why are people getting killed? Is the presence of army in Kashmir the reason, or the consequence of the separatist movement? If the religion inspired protests end in Kashmir, would anyone be hurt? Kashmiri separatists know the answer to this. They know they can stop getting their children killed any day, but then, how will they get Sharia and Nizam-e-Mustafa?

पुनश्च:1. कश्मीर मसले पर कुश ने पिछले माह बेहतरीन चर्चा की थी- कश्मीर…! याद तो है ना? इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये अल्पना वर्मा ने लिखा था-कुश तुममें हिम्मत है, तुममें जज़्बा है.इसे बनाये रखना.
तुमने बहुत सलीके से व्यवस्थित ढंग से सभी पहलुओं को यहाँ रखा है.सच को बाहर लाना बड़ी हिम्मत का काम है क्योंकि आज कल सच भी डर कर छुपा रहता है.आशा है प्रस्तुत तथ्य कई लोगों की आंखों की पट्टी खोल सके.
इसे भी देखें।
2. इस लेख का हिन्दी अनुवाद देखें- कश्मीर बहुत छोटा है आज़ादी के लिए

आलोचक नामवर सिंह, मैनुपुलेटर नामवर सिंह

कल हमारे मास्टरजी का संदेशा आया मोबाइल पर । संदेश में अनुरोध कम आदेश ज्यादा था कि प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी जी पोस्ट खोया आलोचक मिला सैलीबरेटी नामवर सिंह की चर्चा करूं! मैंने सोचा क्या खास बात है इस पोस्ट में कि गुरुजी इसकी चर्चा का आदेश दे रहे हैं।

मैंने पोस्ट बांची तो देखा प्रो.साहब नामवरजी से रूठे हैं इस बात पर कि नामवरजी अब आलोचना नहीं करते। छोड़ दी है आलोचना अब उन्होंने। आलोचना की जगह नामवरजी आशीर्वाद देते हैं, विमोचन करते हैं! अपने लेख के अंत में उन्होंने इति सिद्धम करते हुये लिखा:

वे अब आलोचना नहीं करते मेनीपुलेशन करते हैं। पर्सुएट करते हैं, फुसलाते हैं। पटाते हैं। इसी चीज को कोई जब उनके साथ भक्त करे तो उसे अपना बना लेते हैं। उन्हें फुसलाना और पटाना पसंद है। साहित्य,विवेक और शिक्षा नहीं है। उनके सामयिक विमर्श का आधार है पर्सुएशन। यह विज्ञापन की कला है। आलोचना की नहीं।

नामवरजी के बारे में ऐसी बातें और भी लोग कहते रहे हैं। उनसे सहमत-असहमत लोग अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं। स्व.शैलेश मटियानी जी ने उन पर वर्तमान साहित्य में लेख लिखे थे जिनमें क्या लिखा था यह तो नहीं याद लेकिन उस लेखमाला का शीर्षक था- नयी हिन्दी कहानी का नेवला-नामवर सिंह। उसमें नामवरजी की जमकर ऐसी-तैसी की गयी थी। इसके बाद डा.रामविलास शर्माजी के निधन पर नामवरजी के लेख इतिहास की शव साधना जिसमें उन्होंने स्व.रामविलास शर्माजी की समझ की आलोचना की थी पर कई पत्रिकाओं (पत्रिका कल के लिये का नाम मुझे याद है) में उनके विरोध मे काफ़ी कुछ लिखा गया था।

लेख पढ़ने से पता चला कि जगदीश्वरजी नामवरजी से इस बात पर असहमत और खफ़ा हैं कि उन्होंने डा.पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर लिखी आलोचना पुस्तक को अपना आशीर्वाद दिया जिसकी तमाम बातों से डा.जगदीश्वर चतुर्वेदी असहमत हैं! उनको इस बात का एहसास है कि उनके तेवर नामवरजी ,जो कि उनके गुरु रहे हैं, के प्रति काफ़ी तीखे हैं:

अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना के सम-सामयिक वातावरण को नष्ट कर रहे हैं। ऐसा नहीं है मैं पहलीबार उनके बारे में लिख रहा हूँ। पहले भी लिखा है लेकिन अब यह बेवयुग के लेखन है। नए परिप्रेक्ष्य का लेखन है।

आगे उन्होंने यह भी लिखा

नामवर सिंह ने अब तक जो किया है उसका वस्तुगत आधार पर उनसे हिसाब लेने का वक्त आ गया है। इधर उन्होंने नए सिरे से कबीर के बहाने पुरूषोत्तम अग्रवाल की जिस तरह मार्केटिंग की है उसके विचारधारात्मक आयामों को समझने की जरूरत है।

इससे लगता है कि प्रो.जगदीश्वर जी नामवर की आलोचना की बैलेंस शीट सच्चे मन से आडिट कर रहे हैं! उनको डा.अग्रवाल की कबीर पर लिखी पुस्तक की कुछ स्थापनाओं से असहमति होगी। इसके बावजूद डा.नामवरजी ने उस किताब को अपना आशीर्वाद दे दिया। और साल भर में उसका दूसरा संस्करण भी आ गया। गड़बड़ी यह हुई कि नामवरजी ने प्रो.साहब की किताब का नोटिस नहीं लिया:

मैं बार-बार सोचता था कि एकबार आलोचक नामवर सिंह मेरी दस साल पहले आई स्त्रीवादी आलोचना की किताब ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ को जरूर पढ़ेंगे। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि आलोचक नामवर सिंह ने मेरी किताब नहीं देखी,यह बात दीगर है कि मेरी सारी किताबें अंतर्वस्तु के बल पर ,बिना किसी समीक्षक की सिफारिश या प्रशंसा के लगातार बिक रही हैं और मेरी अधिकांश किताबों की सरकारी खरीद भी नहीं हुई है।

अब बड़े लोगों की बड़ी बातें। क्या पता नामवरजी प्रो.साहब की किताब की चर्चा करते तो शायद उनकी शिकायत इत्ती तीखी न होती। प्रो.चतुर्वेदी के इस लेख पर एक पाठक ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये लिखा है:

आपकी हालत उस बच्चे जैसी है जो अपनी और ध्यान आकर्षित करने के लिए मचलता चीखता चिल्लाता है, अपने कपडे फाड़ता है, कभी कभी तो अपना सर फोड़ डालता है।

नामवर सिंह जी के विकट आलोचक तक उनकी प्रतिभा और अध्ययन का लोहा मानते हैं। वे अगर एक आलोचक से मैनुपुलेटर, पर्सुयेटर हुये तो उसके कारण क्या हैं। हिन्दी का यह विकट आलोचक अपनी प्रतिभा, मेधा और क्षमता के चरम उत्कर्ष के दिनों में सालों बिना नौकरी के रहा। लोगों ने अपनी-अपनी दुकानों के दरवाजे इनके बंद रखे कि कहीं ये आकर उसकी दुकान पर कब्जा न कर ले। तमाम मैनुपुलेशन हुये उनके खिलाफ़! ऐसी विभूति को जब मौका मिलेगा तो वह आलोचना करे न करे मैनुपुलेशन तो करेगा ही। नामवर जी का मानना शायद यह है कि हर हाल में शक्ति अपने हाथ में रहे। शक्ति, सत्ता बनी रहे तो बाकी काम तो होते रहते हैं।

इसीलिये नामवर जी का विभूति राय मसले पर कोई बयान नहीं आया। जब विनीत कुमार लिख रहे थे कि नामवर सिंह सेलिब्रिट्री नहीं रहे। उनकी राय की अब मीडिया को कोई आवश्यकता नहीं (विभूति-छिनाल प्रसंग में पिट गया नामवर का ब्रांड ) शायद उसी समय नामवर जी का नाम ज्ञानपीठ कमेटी के लिये तय हो रहा था, विभूति नारायण राय निकाले जा रहे थे।🙂

बुजुर्ग व्यथा कथा

पिछले दिनों बुजुर्गो की समस्याओं को लेकर कुछ बहुत अच्छे लेख लिखे गये। शिखा वार्ष्णेय ने अपने लेख कहां बुढ़ापा ज्यादा में बुज्रुर्गों के बारे में लिखते हुये अपने यहां के बुजुर्गों के हाल की तुलना लंदन के बुजुर्गों से की। वन्दना अवस्थी दुबे ने ऐसी मां की दास्तान बतायी जिसने अपने बेटों को पाल-पोस कर बड़ा किया और उन सबने बुढ़ापे में उनको भीख मांगकर गुजारा करने के लिये छोड़ दिया। रश्मि रविजा ने शिखा वार्ष्णेय की पोस्ट को आगे बढ़ाते हुये पोस्ट लिखी-कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ के… इसमें उन्होंने आज के हालात के बारे में अपनी राय बताई:

पहले संयुक्त परिवार की परम्परा थी. कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जो कि एक सामूहिक प्रयास है. घर के हर सदस्य को अपना योगदान देना पड़ता है.अक्सर जमीन घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के नाम ही होती थी. और वो निर्विवाद रूप से स्वतः ही घर के मुखिया होते थे.इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी. घरेलू कामों में उनकी पत्नी का वर्चस्व होता था.

पर घर से बाहर जाकर नौकरी करने के चलन के साथ ही संयुक्त परिवार टूटने लगे और रिश्तों में भी विघटन शुरू हो गया. गाँव में बड़े-बूढे अकेले पड़ते गए और बच्चे शहर में बसने लगे. अक्सर शहर में रहनेवाले माता-पिता के भी बच्चे नौकरी के लिए दूसरे शहर चले जाते हैं और जो लोग एक शहर में रहते भी हैं वे भी साथ नहीं रहते. अक्सर बेटे-बहू, माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं करते.या कई बार माता-पिता को ही अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगी में एक खलल सा लगता है.

ऊपर की तस्वीर वन्दनाजी की पोस्ट से। ये ही वे अम्मा जी हैं जिनको उनके बच्चों ने 85 साल की उमर में घर से बाहर भीख मांगने के लिये छोड़ दिया।

चलते-चलते एक पोस्ट ये देखी जाये –झंडूबाम, वेयो-हेयो, अनजाना..ऐ..ऐ..ऐ.., यानी जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिक़न तक ले चलो।

मेरी पसंद

बेग़रज़ बेलौस इक रिश्ता भी होना चाहिए
ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अच्छा भी होना चाहिए

बोलिए कुछ भी मगर आज़ादी-ए-गुफ़्तार में
लफ़्ज़ पर तहज़ीब का पहरा भी होना चाहिए

ये हक़ीक़त के गुलों पर ख्वाब की कुछ तितलियां
’ऐसा होना चाहिए. वैसा भी होना चाहिए’

हो तो जाती हैं ये आंखें नम किसी भी बात पर
हां मगर पलकों पे इक सपना भी होना चाहिए

दोस्ती के आईने में देख सब शाहिद मगर
मां के आंचल सा कोई पर्दा भी होना चाहिए

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

आज की तस्वीर

माँ को देख कर अदा जी अपने बचपन में पहुँच गईं….इस समय तीन पीढियां एक साथ रह रहीं हैं…:):)

About bhaikush

attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि Uncategorized में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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