अन्तर्मन् से अनेक मन तक

एक और शनिवार, एक और चर्चा, एक और चिट्ठाकार लेकिन सुस्ती थोड़ा ज्यादा है इसलिये सोचा इंडिया तक का सफर कौन करे यहीं किसी को पकड़ उसकी चर्चा कर देते हैं। आसपास नजर दौड़ायी तो वो अन्तर्मन् पर जाकर अटक गयी, आखिर सबसे पास वही तो था। अन्तर्मन् का मैं शाब्दिक अर्थ ढूँढ रहा था तो एक टिप्पणी या फीडबैक या फोरर्वड कुछ भी कह लीजिये, उस पर नजर गयी, जिसमें कुछ इस तरह से लिखा था –

हृदयेन सत्यम (यजुर्वेद १८-८५) परमात्मा ने ह्रदय से सत्य को जन्म दिया है. यह वही अंतर्मन और वही हृदय है जो सतहों को पलटता हुआ सत्य की तह तक ले जाता है.

अब इतनी तह पलटकर अंदर तक ले जाने की गारंटी तो हम नही देते लेकिन ४-५ मिनट तक पढ़ने लायक पोस्ट शायद दे ही दें। अब फिर आ गया प्रवासी कहना छोड़िये और इस दूसरे प्रवासी की सुनिये जो शीशे की छत के बारे में कुछ बात कर रहा है, एक्सक्यूज मी, कर रही है –

अमरीकी स्टोक कम्पनी सम्बंधित पत्रिका ‘वोल स्ट्रीट जर्नल ‘ में , सन 1986 के मार्च 24 तारीख के अंक में क़ेरोल हाय्मोवीट्ज़ [ Carol Himowitz ] और टीमोथी स्तेल्हार्द्ज़ [ Timothee Steilhardz ] ने सबसे पहली बार एक नया तथा पहले कभी जिसे प्रयोग ना किया गया हो ऐसा शब्द ’द ग्लास सीलिंग’ अपने आलेख में प्रस्तुत करते हुए स्त्रियों की प्रगति में अदृश्य व पारदर्शक व्यवधान होने की बात को उजागर करते हुए यह कोर्पोरेशन में होनेवाले वाकये को खुलकर समझाते हुए ये नया नाम दिया था जिसे मीडिया तथा जनता ने तुरंत अपना लिया और आम भाषा में ‘ ग्लास सीलिंग ‘मुहावरा या शब्द , स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दों के साथ सदा के लिए जुड़ गया ।

स्त्री सशक्तिकरण की जानकारी देता काफी अच्छा आलेख है और अगर आपने अभी तक नही पढ़ा तो एक बार जरूर पढ़िये। अमर युगल पात्र श्रृंखला की तहत वो बता रही है वशिष्ठ और अरूंधती के बारे में –

वसिष्‍ठ स्‍वायंभुव मन्‍वंतर में उत्‍पन्‍न हुए ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक हैं। कहते हैं कि वसिष्‍ठ का जन्‍म ब्रह्माजी के प्राणवायु (समान) से हुआ था। ‌वसिष्‍ठ ऋषि का ब्राह्मण वंश सदियों तक अयोध्‍या के सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहित पद सँभाले रहा। इनकी दो प‌‌त्नियाँ बताई गई हैं। एक तो दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘उर्जा’ और दूसरी ‘अरुंधती’। अरुंधती कर्दम प्रजापति की नौ कन्‍याओं में से आठवीं गिनी जाती हैं। दक्ष प्रजापति की कन्‍या ‘सती’ से शिव ब्‍याहे थे। इस नाते से वसिष्‍ठ शिव के साढ़ू हुए। दक्ष प्रजापति के यज्ञ के ध्‍वंस के समय शिव ने वसिष्‍ठ का वध किया था। अरुंधती के अलावा ‘शतरूपा’ भी वसिष्‍ठ की पत्‍नी मानी गई हैं। (वे अयोनिसंभवा थीं।)

हो सकता है आप में से कुछ लोग इस कथा से वाकिफ हों, कुछ नही, लेकिन इस आलेख में काफी जानकारी है इनमें से कुछ मुझे भी नही मालूम थी।

अमेरिका के न्यूजर्सी प्रान्त में छोटा भारत यानि एडिसन में बड़ती भारतीयों की संख्या को लेकर टाईम्स पर एक आलेख छपा था, इसी आलेख के संदर्भ में इन्होंने एक पोस्ट लिखी थी – मृण्मय तन, कंचन सा मन, जिसकी शुरूआत कुछ इस तरह थी –

इंसान अपनी जड़ों से जुडा रहता है । दरख्तों की तरह। कभी पुश्तैनी घरौंदे उजाड़ दिए जाते हैं तो कभी ज़िंदगी के कारवाँ में चलते हुए पुरानी बस्ती को छोड़ लोग नये ठिकाने तलाशते हुए, आगे बढ़ लेते हैं नतीज़न , कोई दूसरा ठिकाना आबाद होता है और नई माटी में फिर कोई अंकुर धरती की पनाह में पनपने लगता है ।

यह सृष्टि का क्रम है और ये अबाध गति से चलता आ रहा है। बंजारे आज भी इसी तरह जीते हैं पर सभ्य मनुष्य स्थायी होने की क़शमक़श में अपनी तमाम ज़िंदगी गुज़ार देते हैं । कुछ सफल होते हैं कुछ असफल !

हम अकसर देखते हैं कि इंसानी कौम का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने पुराने ठिकानों को छोड़ कर कहीं दूर बस गया है । शायद आपके पुरखे भी किसी दूर के प्रांत से चलकर कहीं और आबाद हुए होंगें और यह सिलसिला, पीढी दर पीढी कहानी में नये सोपान जोड़ता चला आ रहा है । चला जा रहा है । फिर, हम ये पूछें – अपने आप से कि हर मुल्क, हर कौम, या हर इंसान किस ज़मीन के टुकड़े को अपना कहे ? क्या जहाँ हमने जनम लिया वही हमारा घर, हमारा मुल्क, हमारा प्रांत या हमारा देश, सदा सदा के लिए हमारा स्थायी ठिकाना कहलायेगा ?

अमेरिका का इतिहास गवाह है कि यहाँ रह रहे सभी लोग प्रवासी है वो जो अपने को अमेरिकी समझते और कहते हैं और वो भी जो उसकी तैयारी में हैं। मूल निवासी जिन्हें रेड इंडियन कहा जाता था और है विलुप्त होने की कगार में हैं, ऐसे में किसी सदियों पहले आये एक प्रवासी का कुछ दशक पहले आये प्रवासियों के लिये कुछ कहना उसके भीतर पल रही असुरक्षा ही बयाँ करता है।

इससे पहले मैं आगे कुछ और चर्चा करूँ मैं आप को बता दूँ की आप हमारी आज की चिट्ठाकारा से पीढ़ी दर पीढ़ी दो चार हो सकते हैं और ऐसा लगता है यही शायद इनकी पहली हिंदी पोस्ट भी थी और इनके बारे में इनकी परम मित्र डाक्टर मृदुल कीर्ति जी का कुछ ये कहना है – लावण्य मयी शैली में विषय-वस्तु का दर्पण बन जाना और तथ्य को पाठक की हथेली पर देना, यह उनकी लेखन प्रवणता है. सामाजिक, भौगोलिक, सामयिक समस्याओं के प्रति संवेदन शीलता और समीकरण के प्रति सजग और चिंतित भी है. हर विषय पर गहरी पकड़ है. सचित्र तथ्यों को प्रमाणित करना उनकी शोध वृति का परिचायक है. यात्रा वृतांत तो ऐसे सजीव लिखे है कि हम वहीं की सैर करने लगते हैं.

आध्यात्मिक पक्ष, संवेदनात्मक पक्ष के सामायिक समीकरण के समय अंतर्मन से इनके वैचारिक परमाणु अपने पिता पंडित नरेन्द्र शर्मा से जा मिलते हैं, जो स्वयं काव्य जगत के हस्ताक्षर है. पत्थर के कोहिनूर ने केवल अहंता, द्वेष और विकार दिए हैं, लावण्या के अंतर्मन ने हमें सत्विचारों का नूर दिया है. अब हम इससे अच्छा आज की चिट्ठाकारा लावण्या शाह जी के लिये कुछ नही लिख सकते इसलिये इसे ही हमारा कहा समझ के संतोष कर लीजिये। अब चूँकि उपर दी गयी टिप्पणी आध्यात्मिकता की बातों की ओर ज्यादा झुकी है इसलिये थोड़ा ॐ नमो भगवते महादुर्गायेय नम: की बात भी कर लेते हैं –

सजा आरती सात सुहागिन ,
तेरे दर्शन को आतीं ,
माता , तेरी पूजा , अर्चना कर ,
भक्ति निर्मल पातीं !
दीपक , कुम कुम – अक्षत ले कर ,
तेरी महिमा गातीं ,
माँ दुर्गा तेरे दरसन कर के ,
वर , सुहाग का पातीं !

वैलेंटाईन डे पर लावण्याजी ने एक पोस्ट लिखी थी – आखिर ये मुहब्बत है क्या बला, इसमें १ नही २ नहि बल्कि १४ शेर भी दिये हैं, एक लाईन नमूने की –

“इश्क नाज़ुक है बेहद , अक्ल का बोझ , उठा नहीं सकता .”

और अब अंत में, लावण्या जी के पिताश्री पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की लिखी कुछ पक्तियाँ –

विस्तार है अपार.. प्रजा दोनो पार.. करे हाहाकार…
निशब्द सदा ,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ?

इतिहास की पुकार, करे हुंकार,
ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी,
गमग्रोग्रामी,बनाती नहीँ हो क्यूँ ?

विस्तार है अपार ..प्रजा दोनो पार..करे हाहाकार …
निशब्द सदा,ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई, मानवता भ्रष्ट हुई,
निर्ल्लज्ज भाव से, बहती हो क्यूँ ?

इस गीत को भूपेन्द्र हजारिका की आवाज में पूरा सुनने या देखने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये और मन्ना दा की आवाज में पंडित नरेन्द्र शर्मा जी का लिखा नाच रे मयूरा आप यहाँ सुन सकते हैं

बात कलेवर कीः लावण्या जी के ब्लोग में भी बेकार का तामझाम तो नही है लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें एक अच्छे टेंपलेट का उपयोग करना चाहिये और कभी कभी जो वो पोस्ट के लिये अलग अलग रंग लाल-नीले का प्रयोग करती हैं बजाये उसके अगर एक ही काले रंग का प्रयोग करें तो शायद पढ़ने के लिये ज्यादा आसान हो जायेगा। और ना जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वो सारी पोस्ट बोल्ड करके लिखती हैं और अगर ऐसा है तो उन्हें पोस्ट नार्मल फोंट में लिखकर जरूरी वाक्यों को ही बोल्ड करना चाहिये। ये मरे व्यक्तिगत विचार हैं और वो अपने ब्लोग को अपने ढंग से चलाने और लिखने के लिये उतनी स्वतंत्र हैं जितना कि मैं अपने ब्लोग के लिये।

अपनी बातः आज अपनी बात के लिये ज्यादा कुछ है नही लेकिन इतना जरूर पूछना चाहूँगा कि अगर आप को बात कलेवर की तहत चिट्ठाकारों के ब्लोग के लिये मेरे कमेंट पसंद नही तो जरूर बताईये जिससे मुझे इस पर बात करने और ना करने के लिये डिसाईड करने में मदद मिलेगी।

अगले शनिवार फिर मुलाकात होगी, एक नये चिट्ठाकार के साथ, एक नयी चर्चा के साथ, तब तक के लिये –

पूरी बोतल ना सही, एक जाम तो हो जाय
मिलना ना सही, दुआ सलाम तो हो जाय
जिनकी याद में हम बीमार बैठे हैं
उन्हें बुखार ना सही, जुकाम तो हो जाय

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attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि Tarun में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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