गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है

हमारे आज के चिट्ठाकार आफिस के लिये देरी होने पर अपनी बैटर हॉफ को शायद यही कहते होंगे, ‘गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है, तुम हो कि खाने में मेरी, देर करती ही जा रही है‘। ओके ओके, ये सब मेरा गड़ा हुआ है लेकिन आपने पहचान लिया ना आज किस की बात कर रहे हैं। इनके चिट्ठे मैं तब से पढ़ता आया हूँ जब से इनका स्टेशन पब्लिक के लिये ओपन हुआ था। मुझे याद है, इन्होंने आते ही शांति के आदी हो चुके हिंदी ब्लोग जगत में थोड़ी हलचल मचा दी थी।

उन्होंने तब लिखा था, शायद पहली पोस्ट थी

अवसाद से ग्रस्त होना, न पहले बडी बात थी, न अब है. हर आदमी कभी न कभी इस दुनिया के पचडे में फंस कर अपनी नींद और चैन खोता है. फिर अपने अखबार उसकी मदद को आते हैं. रोज छपने वाली – ‘गला रेत कर/स्ल्फास की मदद से/फांसी लगा कर मौतों की खबरें’ उसे प्रेरणा देती हैं. वह जीवन को खतम कर आवसाद से बचने का शॉर्ट कट बुनने लगता है.

आधे भरे गिलास को आधा खाली कहने वाले लोगों को गिलास को आधा भरा कहने के लिये मंत्र की शक्ति का ज्ञान दे रहे थे जिनके नाम में खुद <इतनी जल्दी बताना ठीक नही, अभी खुद अनुमान लगा लीजिये>।

लेकिन मैं बात कर रहा था शांत पड़े तालाब में पड़ने वाले पत्थर की जिसका नाम था ‘अहो रूपम – अहो ध्वनि’, चमगादड और हिन्दी के चिट्ठे, और उसकी पहली गुँज कुछ ऐसी थी –

सो हिन्दी के चिट्ठाकार चमगादडों की प्रजाति बागबाग हो कर फल फूल रही है. कल तक जो अखबार-पत्रिकाओं में छपास के लिये परेशान रहते थे, वे आज इंटरनेट पर फोकट में छप ले रहे हैं. अब छपास के स्थान पर रोग ‘पढ़ास’ का हो गया है. कितने लोग ब्लॉग पढ रहे हैं, यह नापने के लिये चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग पर काउंटर भी चिपका रखे हैं.

दूध में कितना ही ऊफान क्यों ना आ रहा हो, आँच कम करने में या बंद करने में वो शांत हो ही जाता है, चमगादड़ों की प्रजाति में उठा उफान भी शांत हो गया और ये भी उसी प्रजाति में शामिल हो गये और आज भी ये गेस्ट आर्टिस्ट की तरह यदा कदा चिपकाते रहते हैं अपना चिट्ठा। वो गीत सुना है ना आपने, हमीं से मोहब्बत, हमीं से लड़ाई, अरे मार डाला दुहाई दुहाई बस कुछ ऐसा ही हाल हिंदी ब्लोगजगत में मिलता था (अभी का पता नही) इसीलिये जब कुछ समय की तू-तू मैं-मैं के बाद इन्होंने राम राम की तो कई लोग पहुँच गये ये कहने – अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नही। हमारे इन द्ददा ने गीत को सुना, समझा और आज भी टिके हैं।

भारत में ना जाने कितने टल्लू भरे पड़े हुए हैं अब आप सोचेंगे ये टल्लू कौन? अरे वही जो पी पाकर इस हालत में भी नही रहते कि गा सकें – मैं टल्ली, मैं टल्ली। एक ऐसे ही टल्लू की कही ये बात पढ़कर मुझे एक पुराने विज्ञापन कि चंद लाईनें याद आ गयी, जो कुछ ऐसी थी – आप माँग कर खाते हैं (गुटका, तंबाकू), आप माँग कर पीते हैं (सिगरेट, दारू) तो माँग कर पढ़ क्यों नही सकते (किताब, शिक्षा)। और अब टल्लू की भी सुन लीजिये

भाइ, एठ्ठे रुपिया द। राजस्री खाई, बहुत टाइम भवा। एठ्ठे अऊर होइ त तोहरे बदे भी लियाई (भाई, एक रुपया देना। राजश्री (गुटखा की एक ब्राण्ड) खानी है, बहुत समय हुआ है खाये। एक रुपया और हो तो तुम्हारे लिये भी लाऊं!)।

अमीर आदमी इन सब का सेवन ऐश करने के लिये करता है और गरीब शायद बरबाद होने के लिये, सरल आदमी की सरल जिंदगी सरल शब्दों में बयाँ की हमारे इन बुजुर्ग ब्लोगर ने लेकिन क्या वाकई में वो इतनी सरल है जितनी दिखती है?

रामदेविया शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि इनकी फोटोग्राफी बहुत खराब है, हाथ कगंन को आरसी क्या, पढे लिखे को ___ __ –

अपनी पूअर फोटोग्राफी पर खीझ हुई। बोकरिया नन्दी के पैर पर पैर सटाये उनके माथे से टटका चढ़ाया बेलपत्र चबा रही थी। पर जब तक मैं कैमरा सेट करता वह उतरने की मुद्रा में आ चुकी थी!

उनकी रामदेविया शर्त की सुन राहुल सिंह को कहना पड़ा – आपने तो मेरी कोकाकोलीय श्रद्धा का ढक्‍कन ही खोल दिया.

रामदेविया शर्त और कोकाकोलिया श्रद्धा की कसम इस तरह के निठल्ले हम बिल्कुल नही हैं जैसा उन्होंने लिखा है –

पढ़ा कि कई उच्च मध्य वर्ग की महिलायें स्कूल में मास्टरानियों के पद पर हैं। पर स्कूल नहीं जातीं। अपना हस्ताक्षर कर तनख्वाह उठाती हैं। घर में अपने बच्चों को क्या जीवन मूल्य देती होंगी!?

दफ्तर के बाबू और रेलवे के इन्स्पेक्टर जिन्हें मैं जानता हूं; काम करना जानते ही नहीं। पर सरकारी अनुशासनात्मक कार्यवाई की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि वे बच निकलते हैं। पूरी पेंशन के साथ, बाइज्जत।

छोटे आदमी, छोटे संतोष, छोटे सुख। ये सुख स्थाई भाव के साथ मन में निवास क्यों नहीं करते जी! मन में कुछ है जो छोटाई को सम भाव से लेना नहीं चाहता। वह कुटिया में रहना चाहता है – पर एयरकण्डीशनर लगा कर!

छोटे आदमी, छोटे संतोष, छोटे सुख, छोटे से लेख में कितनी बड़ी बात कही है शायद इसी छोटे सुख की तलाश में जगह जगह आश्रम खुल गये हैं एयरकंडीशन लगा कर।

इनकी पोस्ट पढकर आपको एक बात तो माननी पड़ेगी कि कम शब्दों में ये बहुत कुछ कह जाते हैं, ऊपर दिये गये सैंपल (लिंक) इसके उदाहरण हैं। टिप्पणीरूपी प्रोटीन शुरूआती दिनों में इन्हें भी बहुत कम नसीब होता था और शायद ये इनके लेखन और धैर्य का फल है जो आजकल इसका प्रचुर मात्रा में सेवन कर रहे हैं।
आज का गीतः इनको फिल्में देखे जमाना हो गया है लेकिन भारतीय संगीत पसंद है बगैर शोर शराबे वाले, इसलिये आज विमलजी की ठुमरी की दुकान से इनके और आपके लिये पेश है – अतीत होते हमारे लोकगीत!, जाकर सुनिये और लोक गीतों का मजा लीजिये, सिर्फ तीसरा गीत (रोपनी) ही काम कर रहा है शायद।।

छोटू सपेरे की मोनी अगर देखी नही है तो देख आईये और बीन भी सुनकर आईये, इसका जिक्र इसलिये भी कर रहा हूँ कि ज्ञान दद्दा, (जी हाँ यही हैं हमारे आज के चिट्ठाकार यानि ज्ञानदत्त पांडे) अपने आसपास घट रही घटना और लोगों को बड़ी आत्मीयता ये अपनी ब्लोग में जगह देते हैं, फिर चाहे वो कोई पगली हो या छोटू सपेरा हो या उनका चपरासी या अवसाद में घिरने वाला उनका कोई परिचित और मुझे उनकी ये बात बहुत अच्छी लगती है। कितना दर्द है दुनियां में। भगवान नें हमें कितना आराम से रखा है, और फिर भी हम असंतुष्ट हैं। ये मेरी नही दद्दा की ही कही बात है जो पगली को देखकर उन्होंने लिखी थी।

हमने अभी थोड़ा पहले कहा था कि इनकी फोटोग्राफी में थोड़ा लोचा है लेकिन गंगा किनारे से रविवार को दी गयी इस रपट को देखकर हम अपनी कही बात वापस ले रहे हैं।

बात कलेवर कीः अब अंत में थोड़ा इनके चिट्ठे की रंगरोगन और साजसज्जा पर भी थोड़ा दो शब्द कह दिये जायें। अभी तक जिक्र में आये ब्लोगर की तरह इनका चिट्ठा भी व्यर्थ की ताम झाम को दूर से ही सलाम किये हुए है। पुराने प्रविष्ठियों को आसानी से पढ़ा जा सकता है। कुल मिलाकर साफ सुथरा और छोटी छोटी पोस्टों से सजा आकर्षक चिट्ठा है।

अपनी बातः पिछली चर्चा में काजल भाई का कहना था कि क्षमा करें उन्हें चर्चा समझ नही आयी। अब व्यवहारिक नजरिये से देखा जाय तो क्षमा माँगने का हक हमारा बनता है। लेकिन कोई बात नही, काजल भाई ये सब फ्रीकवेंसी का लफड़ा है, कई बार फ्रीकवेंसी में कुछ लोचा हो जाने से कई चीजें और बातें समझ नही आती। कई लोगों को मैट्रिक्स और हाल में ही रीलिज हुई इंसेप्सशन कतई समझ नही आयी। हमें खुद मैट्रिक्स २-३ बार देखनी पड़ी समझने के लिये। इसलिये ‘टैंशन लेने का नही, देने का‘, अब कोई बता सकता है ये किस फिल्म का डॉयलॉग है। और ‘समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है‘, इसमें कौन सा अलंकार?

याद है चर्चा के इस सीजन (पारी) में, हमने नये प्रयोग की बात की थी, अपनी पुरानी चर्चाओं पर नजर डाली तो पता चला कि इससे पहले भी हम मार्च- अप्रैल २००९ में ३ चिट्ठाकार को सलटा चुके हैं एक और अनेक के तहत और वो थे – हिमाँशु, कृषि वाले अशोक, और हमारे हम-क्षेत्र महेन; आज का मिलाकर सलट चुके चिट्ठाकारों की संख्या पहुँची ६। अब देखना ये है कि चर्चा की इस ईनिंग में कितनों का नंबर आता है क्योंकि हमारी चर्चा का आँकड़ा सटॉक मार्केट की तरह डांवाडोल किस्म का रहा है।

अनजाने ही पिछली से पिछली चर्चा में कुछ हो गया था जो हमें बहुत देर बाद समझा, लोगों के अलग अलग तरीके से समझाने के बाद। गल्तियाँ किसी से भी कभी भी हो सकती है इसलिये राई का पहाड़, तिल का ताड़ और ओस का समुद्र (ये हमारी दी गयी उपमा है) बनाने में कोई फायदा नही ये सिर्फ समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नही। डॉक्टर गल्ती से मरीज के पेट में कैंची जैसी चीज भूल जाते हैं ये तो महज एक क्लिक था। इसलिये बीति ताही बिसार दे, आगे की सुध लेईऐतिहासिक टिप्पणी के बाद रेगुलर टिप्पणी जिस तरह शुरू हुई है, आशा है उसी तरह ऐतिहासिक चर्चा के बाद रेगुलर चर्चा भी शुरू हो जायेगी। छः साल की ब्लोगिंग में एक बात जरूर समझ आ गयी है कि उम्र और परिपक्वत्ता का आपस में कोई संबन्ध नही इसलिये गलत थे वो जो कहते थे परिपक्वत्ता उम्र के साथ आती है। ये सब भारी भरकम बातें छोड़िये और हमारा लिखा ये ताजा ताजा शेर सुनिये –

दुश्मनी जब भी करें, जमकर करनी चाहिये
दोस्ती की गुंजाईश लेकिन, हरवक्त रहनी चाहिये

अब आप दाद दें ना दें, हम तो सुनाकर ये गये वो गये।

About bhaikush

attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि Tarun में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s