सोमवार (०६.०९.२०१०) की चर्चा

नमस्कार मित्रों!

हिन्दी का वार्षिक उत्सव आ रहा है। पूरे देश में १४ सितंबर को यह पर्व मनाया जाएगा, जिसे हिन्दी दिवस भी कहते हैं। वैसे तो एक फ़ैशन सा हो गया है कि हर दिवस पर हम कह देते हैं ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ। इस दिवस पर भी कह देंगे, ढेर सारे लोग, फिर सितंबर १४, हिन्दी दिवस की वर्षगांठ। फिर भाषण, फिर प्रतियोगिताएं, फिर कुछ लोगों के अख़बारो पत्रिकाओं में आलेख, कुछ वादे, कुछ घोषणाएं, कुछ नारे, हिन्दी का विकास हो रहा है, सरकारी काम काज में हिन्दी की प्रगति हुई है, हिन्दी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, या फिर हिन्दी की कब प्रगति होगी, कब तक यह फ़िर्फ़ १४ सितंबर के अनुष्ठानों तक सिमटी-सिकुड़ी रहेगी, आदि-आदि।

अधिकांश, हिन्दी के उत्थान में सहयोग दे ना दें, रोने का राग ज़रूर अलापेंगे। ऐसे महौल में कम-से-कम हम हिन्दी ब्लॉगर्स तो फ़ख़्र से कह सकते हैं कि हम हिन्दी में ब्लॉगिंग कर हिन्दी के उत्थान के प्रति सच्चे मयनों में समर्पित और संगठित हैं।

अखिलेश शुक्ल

“वर्तमान समय में हिंदी में जितना लेखन हो रहा है उतना आज से 20 वर्ष पूर्व नहीं था।” ये कहना है अखिलेश शुक्ल जी का। सृजन गाथा पर हिंदी लेखन में प्रतिबद्धताएँ आलेख द्वारा वे अपनी बात रखते हुए कहते हैं,

“आइए 14 सितम्बर हिंदी दिवस से पूर्व हम अपने पूर्वाग्रह त्यागकर यह संकल्प लें की उच्च गुणवत्तायुक्त लेखन करेंगे। जिससे हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ में वह सम्मान पा सके जिसकी वह हक़दार है। तभी हिंदी में सृजनात्मक लेखन सार्थक होगा व इसके साथ उचित न्याय हो सकेगा।”

ऐसे ही किसी संकल्प, स्वप्रेरणा और उत्साह से हम हिन्दी और देश का भला कर सकेंगे। केवल आलोचना कर देने से, कमियां गिना देने से,हम क्या हित करते हैं हिन्दी का,यह भी सोचने की बात है। ऐसे में मुझे गाना “इतनी शक्ति हमें देना दाता” की ये पंक्त्यां बरबस स्मारण हो आती हैं,

हम न सोचें मिला क्या है हमको,

हम ते सोचें किया क्या है अर्पण”

रविवार को सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णण का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया गया। ज़ाहिर है कि इस दिन को समर्पित कई पोस्ट भी आए ब्लॉग जगत में। जिन तक मैं जा पाया, उन्हें यहां देने की कोशिश करूंगा इस समर्पण के साथ कि इनमें से भी कई इस बात को बोलने से नहीं भूले होंगे कि आज के शिक्षक वो शिक्षक नहीं रह गए, या फिर आज के छात्र वो छात्र नहीं रह गए। हम गुरु के क़र्ज़ को कभी नहीं उतार सकते। अगर की बोर्ड पर हमारी उंगलियां चल रही हैं, अगर हम उनसे कुछ सार्थक लिख रहें हैं, तो निश्चय ही किसी ना किसी गुरु का आशीर्वाद रहा है हम पर!

१.गुरु बिनु ज्ञान कहाँ जग माही…. ravindra.prabhat@gmail.com (रवीन्द्र प्रभात) Sun Sep 05 07:59:00 IST 2010 (परिकल्पना)

२.शिक्षा का स्तर ———कल और आज ? rosered8flower@gmail.com (वन्दना) Sun Sep 05 10:32:00 IST 2010 (ज़िन्दगी…एक

३. शिक्षक दिवस ….कुछ दिल से … mukhiya.jee@gmail.com (रंजन) Sun Sep 05 00:54:00 IST 2010 (दालान)

४. ब्लॉगजगत के सभी गुरुजनों को सादर नमन ….शुभकामनाएं…….. noreply@blogger.com (Archana) Sun Sep 05

५.HAPPY TEACHER’S DAY. rdkamboj@gmail.com (सहज साहित्य) Sun Sep 05 16:01:00 IST 2010 (सहज साहित्य)

६. मैं मास्‍टर नहीं हूं

७. “शिक्षकों का सम्मान-एक रपट” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) शब्दों का दंगल पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

८. गुरू दिवस शुरुआत हिंदी लेखन से पर अंकुर द्विवेदी

९. बारह लाख शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है देश भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र

१०. अपनी प्यारी टीचर के लिए – मौलश्री पर Aparna Manoj Bhatnagar

११. शिक्षक दिवस पर ई-मेलीय गुरु मन्त्र Alag sa पर Gagan Sharma, Kuchh Alag sa

१२. गुरु-शिष्य की बदलती परम्परा (शिक्षक दिवस पर विशेष) उत्सव के रंग by Akanksha~आकांक्षा

१३. पाँच सितम्बर-शिक्षक का अभिनन्दन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”) from उच्चारण by डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

१४. “शिक्षक-दिवस” – शिक्षक का सम्मान या अपमान? सम्वेदना के स्वर पर

१५. मैंने भी मनाया शिक्षक-दिवस पाखी की दुनिया पर Akshita (Pakhi)

१६ अर्चना जी के स्वर में शिक्षक दिवस पर गीत और पवन चन्दन जी के साथ मेरी जुगलबंदी——>>>दीपक मशाल

मसि-कागद पर  दीपक ‘मशाल’

१७. नमन् भाषा,शिक्षा और रोज़गार पर शिक्षामित्र

इन सबके बीच  तनहा फ़लक पर त्रिपुरारि कुमार शर्मा दिखा रहे हैं आधा बिस्कुट! इस बिस्कुट का स्वाद पारिवारिक रिश्तों की चाशनी से सना है।

हथेलियों पर चीटियाँ रस चाट रही है
कलाई पर अब भी मेरे राखी है
निकल गया दांत में फसा मांस का टुकडा
वक्त के मुँह में  बिस्कुट नहीं है
‘आधा बिस्कुट’ है मेरे हाथ में अब भी
यही ‘आधा बिस्कुट’ मेरा जीवन है।

यह कविता तरल संवेदनाओं से रची गई है। जो दिल से पढ़ने की अपेक्षा रखती है।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने पर चला बिहारी ब्लॉगर बनने (सलिल जी) एक बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता पेश करते हैं विवेक शर्मा, भिखारी और भिखारी का ताजमहल!!

मेरा फोटोभिखारी का ताजमहल

पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू!

बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था

सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी

उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून.

कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था

कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी.

आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल

दौलत-ए-दो-जहाँ से बढके पोटली है मेरी

संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है

सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.

पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

आपकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखते हैं। इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है। इस कविता की कोई बात अंदर ऐसी चुभ गई है कि उसकी टीस अभी तक महसूस कर रहा हूं।

My Open Space पर Rachana जी प्रस्तुत कर रहीं हैं रंग बिरंगी चूडिया! 

My Photoदुल्हन बन
तुम संग चली
बाबुल की हवा
पिया के अंगना बही
खन-खन चूडिया
फिर बजने लगी!
जब पिया भये परदेस
और आवे ना कोई सन्देश
चूडिया की गूँज
लावे है नयनो में बूँद!
रंग बिरंगी चूडिया
मिटाए दिलो की है दूरियाँ!

यह कविता तरल संवेदनाओं के कारण आत्‍मीय लगती है!

My Photoजाने क्या मैंने कही पर नरहरि पटेल बता रहे हैं ध्यान से सुनना भी एक साधना है। सच हम या तो सुनते ही नहीं, या सुनाना ही नहीं चाहते, या अग्र सुनें तो ध्यान से तो बिल्कुल ही नहीं। कहते हैं दरअसल, जब ध्यान से सुना शब्द अर्थ लेता है तभी वह सार्थक होता है। शब्द पक्का बनकर हरकत में आता है और मन के आदेश में आकर तन की इन्द्रियों से क्रिया करवाता है। जब तक कानों में पड़ा शब्द मन स्वीकार नहीं करता, तन हरकत नहीं करता। अनसुना करने की लगातार क्रिया मनन शक्ति को बोथरा कर देती है।

सच तो यह है कि श्रद्धा से सुना शब्द ही धारण होता है। अच्छी बात सुनने के लिए कान सदा खुले रखो। “सुनो सब की, पर करो मन की’ इस कहावत का अर्थ कभी नकारात्मक मत लो। सही सुना हुआ शब्द मन को भायेगा ही। जिस बात में सबका भला हो उसकी कभी अनसुनी मत करो। जिस बात से सबका कल्याण हो, ज़रूर सुनो।

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यह प्रविष्टि मनोज कुमार में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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