ये शम्मह का सीना रखते हैं, रहते हैं मगर परवानों में

मेरा मानना है नये नये प्रयोग करते रहने चाहिये इससे जिज्ञासा और कुछ नया पाने की उम्मीद बंधी रहती है और कहने वाले कह गये हैं, उम्मीद में दुनिया कायम है या यूँ कह लीजिये उम्मीद में भारत टिका है और अनुराग के शब्द उधार लेकर कहूँ तो उम्मीद के सहारे ही पैसे वाले भारतीय एसी में मस्त तान के बिना चिंता के सो जाते हैं।

आज जिस प्रयोग की बात कर रहा हूँ उसके तहत चिट्ठा चर्चा करने की सोच रहा हूँ, अब आप कहेंगे ये तो सभी करते हैं और रोज करते हैं लेकिन मैं “चिट्ठा चर्चा” की बात कर रहा ,हूँ यू नो, चिट्ठा चिट्ठा ना कि चिट्ठे चिट्ठे। सीधे सरल शब्दों में अब से शनिवार के दिन सिर्फ और सिर्फ किसी एक चिट्ठे या चिट्ठेकार की चर्चा की जायेगी। जाहिर हैं चर्चा अब हम करेंगे तो चिट्ठे का चुनाव भी हम करेंगे और उसे अपने नजरिये से ही बाँचेंगे। समझ लीजिये जब तक आप का नंबर नही आता आप कतार में हैं। इसी क्रम में आज का चिट्ठा या चिट्ठेकार हैं, खैर जाने दीजिये आप पढ़कर खुद समझ जाईये।

इन जनाब की टिप्पणियों का अंदाज सबसे जुदा है, इसलिये शुरूआत इनके द्वारा (चि.च. में) की गयी टिप्पणियों के नमूनों से ही करते हैं –

१. आज की चर्चा को पूरे तौर पर पढ़ते समय यदि पूर्वाग्रह की जगह पर आग्रह पढ़ा जाये, तो तस्वीर और भी साफ़ होती है॥ पूर्वाग्रह से एक हठवादी कठोरता का भान होता है । चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो, स्त्रीलिंग को हम परँपरागत वर्ज़नाओं से अलग नहीं कर पाये हैं । उसने अपनी ऊर्ज़ा और मेघा से एक ऊँचा मुकाम भले हासिल कर लिया हो, पर वह अपने पर सदियों से थोपी हुई अस्पृश्यता से आज़ाद नहीं कर पायी है।

२. ” झिलमिली भाषा का वाग्जाल ” फैला कर पाठकों को आकर्षित करने में बतौर लेखिका वह सफल रही हैं, किन्तु विमर्शात्मक लेखन के स्तर पर उनके इस एकतरफ़ा नज़रिये को सिरे से ख़ारिज़ किये जाने की तमाम गुँज़ाइशें हैं।

३. तू स्पैम ठहराये या माडरेट करे / हम तो हैं तेरे दीवानों में / हम शम्मह का सीना रखते हैं / रहते हैं मगर परवानों में

आप नोट करेंगे कि टिप्पणियों की गंभीरता भी चर्चा की गंभीरता के हिसाब से कम ज्यादा होती रहती है। हमारे व्यक्तिगत चिट्ठे में ये शख्स कभी सँपेरा शेखीबाज के नाम से टिपियाता है तो कभी कम-पिटऊ-कर के नाम से लेकिन टिप्पणी का मजमून छद्म नाम की पोल खोल कर रख देता है।

अपने पिछले आलेख “झूठ पकड़ने वाला रोबट” में हिंदी ब्लोगिंग के एक सच को दारू से नहला धुला कर पेश करने की कोशिश कुछ इस तरह से करते हैं –

सच है यारों, ब्लॉगिंग में शायद दँगाईयों की ही ज़्यादा सुनी जाती है । हम भी अभी दँगा करने का मूड बनाय के आय थे, पर इन सूनी गलियों में दँगा करने का भी भला कोई मज़ा है ? फिर यह भी सुना है कि, दँगा करने वास्ते माइकल को दारू पीना पड़ता है..

और झूठ बोलने वाले रोबोट की टेस्टिंग के लिये क्या कमाल की कोड़ी ढूँढ कर लाते हैं – तुम्हारा नेता लोग इतने वैराइटी का झूठ उगलता है कि अपने नेता पर टेस्ट करोगे तो जो मशीन बनेगा, वह परफ़ेक्ट होगा, और नेता के साथ साथ इसमें पुलिस को भी नही बख्शते – इँडियन पुलिस वर्ज़न है सो तुमको मार खाने से हमहूँ नहीं रोक पायेंगे

हम बहुविकल्प सवाल अभी तक सिर्फ परीक्षा में ही सुनते आये थे या किसी पोल में लेकिन इन जनाब ने बगैर शिर्षक की पोस्ट लिख पढ़ने वालों के सामने विकल्प छोड़ दिये, चुन लो जो भी पसंद आये। अपनी इस बिना सिर वाली पोस्ट में इनकी मेनका की भी एंट्री कुछ इस तरह से होती है – अच्छा सुनों, जब 140 आतँकी देश में घुस आये हैं.. तो ब्लॉगिंग में भी 20-30 घुसे होंगे?

आज जब देश और पड़ोस दोनों ही हाय इतना पानी कितना पानी कहते हुए इसकी मार से तड़प रहें हैं, ये अपने एक दूसरे चिट्ठे में आँखों में भरे पानी का कौतुक का हवाला कुछ यूँ देते हैं –

हम्मैं क्या, ऊपर वाले ( दिल्ली वालों ) की दया से आज पूरा देश घायल पड़ा कराह रहा है! एक दिन के लिये इस रोती आत्मा को स्वतँत्रता दिवस का बिस्कुट थमा कर कब तक फुसलाओगे?

इसी पोस्ट से –

किस्स-ए-अज़मते माज़ी को ना मुहमिल समझो,
क़ौमें जाग उठती हैं अकसर इन्हीं अफ़सानों से।

किस्स-ए-अज़मते — महानता की कहानियाँ, माज़ी — अतीत! मुहमिल — व्यर्थ का !

इन जनाब को फिल्म का भी थोड़ा बहुत शौक मालूम होता है तभी तो बात करते हैं उसकी जो ताउम्र अज़ीब आदमी ही रहे, अरे वही आदमी जो बिछड़े सभी बारी बारी कहते हुए खुद भी बिछड़ गया। वो याद कर रहे हैं उनके पसंदीदा गुरूदत्त की, गुरूदत्त को पसंद करने के लिये उनके दौर का होना बहुत जरूरी है। लेकिन याद करते और कुछ लिखने का सोचते सोचते उन्हें याद आता है कि उनके पास इतना वक्त ही नही –

ज़ल्दबाज़ी में गुरुदत्त पर कुछ लिखना सँभव ही नहीं, नृत्य-निर्देशक से कहानीकार, डायरेक्टर, निर्माता अभिनेता तक का उनका सफ़र बहुत सारी पेंचीदगियों से भरा पड़ा है । किसी फ़िल्म को देख कर यदि मैं पहली बार और आख़िरी बार रोया हूँ तो मुझे याद है वह थी काग़ज़ के फूल.. मन को समझाने को यह ख़्याल अच्छा है कि, ” पगले, वह तो तुम इसलिये रो पड़े थे कि हॉस्टल से कोई भी तुम्हारे साथ यह फ़िल्म देखने को तैयार भी न हुआ था।

और फिर ये कह के सच में ज़माने के हिसाब से गुरुदत्त दुनिया के लिये अज़ीब आदमी ही रहे!, एक पुरानी पोस्ट की रीठेल कर आफिस को सटक लिये गोया डाक्टर का नुस्खा हो सप्ताह में एक पोस्ट ब्लोग की हलक में डालते रहना वरना ब्लोग का ब्लडप्रेशर बढ़ सकता है

अगर आप इनकी लिखी पोस्ट और टिप्पणी पढ़ेंगे तो पायेंगे कि इनके लिखने का एक अलग ही अंदाज है और हो सकता है पहली नजर में यानि कि पहले पहल आप सोचें ये बुढ़बक क्या लिखे जा रहा है, पल में तोला पल में गोला टाईप, कोई कोई पोस्ट पढ़ते पढ़ते हो सकता है आपको ये भी आभास हो कि आप इंडियन क्रिकेट टीम की पारी देख आज का गीतः दादा समेत आप सब की नजर है आज ये गीत – एक चमेली के मंडवे तले, मयकदे से जरा दूर उस मोड़ पर। चमेली की खुशबू आप तक शायद पहुँच ही जायेगी।
रहे हैं जो कई बार शुरू में लुढ़कते फुढ़कते रहने के बावजूद मैच जीत जाती है तो कभी कभी अच्छी खासी स्ट्रोंग खेलते खेलते अंत में लुढ़क जाती है। लेकिन एक बार आदत लग जाये तो हो सकता है कुछ यूँ कहें, छूटती नही काफिर, मुँह से लगी हुई

बात कलेवर की: अब अंत में एक बार इनके ब्लोग की सुंदरता की बात भी हो जाय, ब्लोग को आकर्षक बनाने में इन्होंने कोई कसर नही छोड़ी और ये अपनी कोशिश में कामयाब भी रहे हैं। ब्लोग में फालतू का मैकअप नही जिनसे रोम छिद्र बंद होने की संभावना के तहत मुहांसे बने रहने का खतरा रहे यानि कि फालतू का तामझाम नही। ब्लोग में अलग अलग कैटगरी और सेक्शन कायदे से तो लगे ही हैं, चित्रों का भी तरीके से उपयोग किया गया है।

तो ये थी आज की चर्चा क्या आप इस शख्श को पहचान पाये, अगर नही तो बताना ही पढ़ेगा ये हैं इसी हिंदी ब्लोग जगत के दूसरे निठल्ले, डा अमर कुमार। आप क्या सोचने लगे, ये दूसरे हैं तो पहला कौन है? अब वो हम अपने मुँह से क्या कहें आप खुद ही समझ लीजिये। अगली बार फिर किसी और के साथ मुक्कालात करवायेंगे तब तक आप अपनी टिप्पणियों का थोबड़ा थोड़ा दुरस्त करके रखिये वरना कहीं ऐसा ना हो जब आपकी खुबसूरती का जिक्र हो तो टिप्पणियों के जूड़े में सिर्फ सार्थकता के फूल गूँथे नजर आये।😀😉

नोटः आपको हिंट देते चलें कि ब्लोगरस का शिकार चिट्टा चर्चा या हमारे व्यक्तिगत चिट्ठों में छोड़े कदमों के निशान का पीछा करते हुए किया जायेगा। अपने जंगल में भुखमरी की नौबत आने पर ही दूसरे जंगलों की ओर रूख किया जायेगा।

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