"हम सब अपने पूर्वाग्रहों का एक्सटेंशन है"

कभी कभी मन में ये सवाल    उठता था  के   उर्दू में तमाम बंदिशों  ओर  सो काल्ड संकीर्णता के बावजूद इतना खुलापन क्यों है …..क्यों हिंदी में कोई इस्मत चुगताई पैदा नहीं होती …क्यों हिंदी   ब्लॉग में भी महिलाये लिखते वक़्त अपने आप को “एडिटकर लेती है …..तो क्या भाषा में भी एक हिंसा होती है . जो कभी कभी किसी  विचारात्मक  विकास को रोक देती है …. कंट्रोवर्सी ओर इमेज का .भय उनकी लेखन प्रक्रिया में जानबूझकर   कुछ तटस्थता की ढिलाईया लाता है … …..सच की  आकृतियो  में अपना पुरुष दृष्टिकोण रोपते कुछ बुद्धिजीवियों से अनामिका  जी   अपने लेख “पूरा स्त्री शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है   अपना विरोध जाहिर करती है ……”बौद्धिक छल” के इस खेल के विरोध में उनकी प्रेसेंस  भ्रमित करने वाले कई संदर्भो की पड़ताल अपने तरीके से करती है …

कौन माई का लाल कहता है कि स्त्री आत्मकथाकारों के यहां दैहिक दोहन का चित्रण पोर्नोग्राफिक है? घाव दिखाना क्या देह दिखाना है? पूरा स्त्री-शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है। स्त्रियां घर की देहरी लांघती हैं तो एक गुरु, एक मित्र की तलाश में, पर गुरु मित्र आदि के खोल में उन्हें मिलते हैं भेड़िये। और उसके बाद प्रचलित कहावत में रोमको रूमबना दें तो कहानी यह बनती नजर आती है कि ऑल रोड्स लीड टु अ रूम।

 …आगे वे कहती है

चतुर बहेलिया वाग्जाल फैलाता है और चूंकि भाषा एक झिलमिली भी है, एक तरह का ट्वालाइट जोनभी, कुछ हादसे घट भी जाते हैं! अपने ही भीतर से संज्ञान जगा या किसी और ने सावधान किया तब तो पांव पीछे खींच लिये जाते हैंवरना धीरे-धीरे देह के प्रति एक विरक्ति-सी हो जाती है और उसकी हर तरह की दुर्गति-मार-पीट से लेकर यौन दोहन तक इस तरह देखती है लड़की जैसे छिपकली अपनी कटी हुई पूंछ! देह जब मन से कट जाए भाषा में दावानल जगता है और जिसे लिखना आता है, वह दावानल की ही स्याही बनाकर धरती सब कागद करूंकी मन:स्थिति में पहुंच जाता है। यह एक थेरेपी भी है और आगे इस क्षेत्र में असावधान कदमों से आने वाली बहनों या मानस-पुत्रियों को दी गयी सावधानी भी, संस्मरण मीरा की इन पंक्तियों का उत्तर-आधुनिक पक्ष : जो मैं ऐसा जानती, प्रीत किये दुख होय / नगर ढिंढोरा पीटती, प्रीत न करियो कोय।

.लेकिन जिस सत्य से हम परिचित है ….उसे सिर्फ वे याद दिलाती है 

इस तरह से देखा जाए तो हर स्त्री-आत्मकथा आगे आनेवालियों की खातिर एक उदास चेतावनी है। इसमें मीरा का मीठा विरह नहीं बोलता, एक हृदयदग्ध जुगुप्सा बोलती है पर बोलती है वही बात। आदर्शवाद स्त्रियों को घुट्टी में पिलाया जाता है। पहले स्त्रियां तन-मन से सेवा करती थीं और सिर्फ अपने घर के लोगों की, आदर्शवाद के तहत सेवा अब भी करती हैं सिर्फ तन-मन से नहीं, तन-मन-धन से करती हैं और सिर्फ घर की नहीं, ससुराल-मायका, पड़ोस, कार्यक्षेत्र, परिजन-पुरजन सबकी। दुर्गा के दस हाथों का बिंब आगे बढ़ाएं तो दस दिशाओं में फैले दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र नहीं, दस तरह के काम रहते हैं।

इस बहस के कई मतान्तर हो सकते है कई सन्दर्भ ….हम सबके भीतर एक जिद होती है ….अपने साथ हुए असहमतो से असहमत होने की जिद  ….
क़्त के किसी  एक हिस्से की व्याख्या सब अपनी समझ ओर बूझ से करते है …..यूँ भी असहमतिया कभी कभी किसी विकास प्रक्रिया का एक हिस्सा होती है ….कुछ असहमतिया हद दर्जे की ईमानदार भी होती है …उन्हें आप यूँ ही निर्वासित नहीं कर सकते ..

लम्बी विमर्शो बहसों के दौर में प्रियंकर जी अपने अपने लेख “साहित्य का  पर्यावरण यानि भाषा छुट्टी पर इस द्रश्य को  यूँ ..देखते  है

दार्शनिक विट्गेंस्टाइन कहते हैं, “दार्शनिक समस्याएं तब खड़ी होती हैं जब भाषा छुट्टी पर चली जाती है.यानी भाषा के बेढंगेपन का विचार के बेढंगेपन से गहरा संबंध है. कवि लीलाधर जगूड़ी भी अपनी एक कविता में यही पूछते दिखते हैं कि पहले भाषा बिगड़ती है या विचार’ . एक काल्पनिक प्रश्न के उत्तर में कन्फ़्यूसियस अपनी प्राथमिकता बताते हुए कहते हैं यदि भाषा सही नहीं होगी तो जो कहा गया है उसका अभिप्राय भी वही नहीं होगा; यदि जो कहा गया है उसका अभिप्राय वह नहीं है,तो जो किया जाना है,अनकिया रह जाता है; यदि यह अनकिया रह जाएगा तो नैतिकता और कला में बिगाड़ आएगा ; यदि न्याय पथभ्रष्ट होगा तो लोग असहाय और किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े दिखाई देंगे. अतः जो कहा गया है उसमें कोई स्वेच्छाचारिता नहीं होनी चाहिए. यह सबसे महत्वपूर्ण बात है.

अंत में प्रियंकर जी बात से जैसे हिंदी का एक  आम पाठक अपनी सहमति  दर्ज करता है

किसी को हटाने-बिठाने और उखाड़ने-स्थापित करने के व्यवसाय/व्यसन में पूर्णकालिक तौर पर संलग्न महाजन भले ही इस तथ्य से मुंह फेर लें पर सच तो यह है कि आम हिंदीभाषी को इन दुरभिसंधियों से कोई लेना देना नहीं है. हिंदी समाज में साक्षरता और शिक्षा के स्तर तथा साहित्य के प्रति सामान्य उदासीनता को देखते हुए कुल मिला कर यह छायायुद्ध अब एक ऐसे घृणित प्रकरण में तब्दील हो गया है जो भारतेन्दु के सपने और हिंदी जाति के एक नव-स्थापित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को उसके शैशव काल में ही नष्ट कर देने की स्थिति निर्मित करने का दोषी है. श्लेष का प्रभावी प्रयोग करते हुए भारतेन्दु ने हिंदी जाति के दो फल फूटऔर बैरगिनाए थे. नियति का व्यंग्य यह है कि उनका सुंदर सपना भी इन्हीं आत्मघाती फलों की भेंट चढने जा रहा है.
सदाचार को तो हम पहले ही मार चुके हैं, यह भाषा-साहित्य से सामान्य शिष्टाचार की विदाई का बुरा वक्त है .

किसी रचनाकार की केन्द्रीय चिंता कई है ….साहित्य  में संघर्ष  से इतर कुछ कवी चेतना के कई स्तरों को छू कर लौट आते है …ऐसे ही एक कवि नरेश सक्सेना जी एक कविता “समुद्र  पर हो रही बारिश  ‘ के माध्यम से   सुशीला पूरी जी परिचय कराती है 



कैसे पुकारे
मीठे पानी मे रहने वाली मछलियों को
प्यासों को क्या मुँह दिखाये
कहाँ जाकर डूब मरे
खुद अपने आप पर बरस रहा है समुद्र
समुद्र पर हो रही है बारिश

नमक किसे नही चाहिए
लेकिन सबकी जरूरत का नमक वह
अकेला ही क्यों ढोये

कभी कभी हम किसी रचना प्रक्रिया से गुजरते वक़्त  जब   आक्रोशित होते है तो शायद अपना बेहतर देते है …..यूँ भी कुछ कविताएं कभी कभी खुद का प्रतिनिधित्व करती है.दर्पण ऐसे ही किसी बगावती तेवर लिए समय से रूबरू होते है

कविता,
मुहावरों में ऊँटों के मार दिए जाने का कारण जानने की ‘उत्कंठा’ है.
कविता जीरा है…
..जब वो भूख से मरते हैं.
अन्यथा,
पहाड़.

पहाड़…
…चूँकि खोदे जा चुके हैं,
…गिराए जा चुके हैं, ऊँटों के ऊपर.
इसलिए दिख जाती है,
पर समझी नहीं जा सकती.
‘कविता लुप्त हुई लिपि का जीवाश्म है.’

 

 
पूरी कविता “कविता उम्मीद से है ! पर चटका लगा कर पढ़ी जा सकती है

उसका क्षेपक 

उसे यूँ समराइज़   करता है
कविता ज़ेहन में अचानक रिंग टोन सी नहीं बज सकती,क्यूंकि उसका अस्तित्व ‘शब्द’ है.
वो ज़ेहन में पड़ी रहती है अब बस….अनरीड मेसेज की तरह कभी डिलीट कर दिए जाने के लिए.
अलबत्ता मुझे ये तमाम कविताओ पर फिर बैठता मालूम पड़ता  है 
मसलन मुकेश कुमार  की ये कविता ….सड़क

              काले कोलतार व रोड़े पत्थर के मिश्रण से बनी सड़क
पता नहीं कहाँ से आयी
और कहाँ तक गयी
जगती आँखों से दिखे सपने की तरह
इसका भी ताना – बाना
ओर – छोर का कुछ पता नहीं
कभी सुखद और हसीन सपने की तरह
मिलती है ऐसी सड़क
जिससे पूरी यात्रा
चंद लम्हों में जाती है कट!
वहीँ! कुछ दु: स्वप्न की तरह
दिख जाती है सड़कें
उबड़-खाबड़! दुश्वारियां विकट!!
पता नहीं कब लगी आँख
और फिर गिर पड़े धराम!
या फिर इन्ही सड़कों पर
हो जाता है काम – तमाम!!


.

१५ अगस्त बीते शायद एक हफ्ता हुआ है….देशभक्ति  वापस दराजो में बंद हो चुकी है …अगली .२६ जनवरी तक ….कश्मीर में सिखों ने  एक बूढ़े नेता के यहाँ फ़रियाद रखी हुई  है के उन्हें अपने देश में रहने दिया जाए ….पाकिस्तान ने  अंतत भारत की आर्थिक  सहायता जो करोडो डालर में है स्वीकार कर  ली है .. किसी महिला मैगज़ीन ने एकता कपूर को महिलाओ के लिए काम करने के लिए पुरुस्कृत किया है … उड़ीसा के किसान .यू. पी   के किसान  भूमि अधिग्रहण मसले पर सडको पर उतर आये है.. ..पूरी दुनिया के शायद  सबसे बड़े लोकतंत्र के नुमाइंदो ने अपनी तनख्वाहे तय कर  ‘असल लोकतंत्र ” की परिभाषा पे मुहर लगा दी है …  ….पीपली लाइव के  यथार्थ   पर रीझे….. हम तमाम बौद्धिक जमावड़ो में  अपनी हिस्से की  साझेधारी  रख अपने कर्तव्य का स्लाट पूरा कर….”दुनिया फिर भली होगी” लिखकर . ए सी में सो जाते है …




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