स्वतंत्रता की नई चादर फिर से बुननी होगी…

ऐसा नहीं लगता कि स्वतंत्रता की ये चादर नए सिरे से बुननी चाहिए? हममें से अधिकांश को ऐसा लगता होगा. पेश है स्वतंत्रता दिवस पर आम भारतीय की पीड़ा व्यक्त करती कुछ ऐसी ही ब्लॉग पोस्टें:

सन ४७ से

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धुनी कपास की बनी

पोनी को चरखे पर कात

बनाई थी खादी की

एक सफेद चादर

कुछ चूहे मिलकर

कुतरते रहे रात दिन

उसे सन ४७ से

और आज

छोटी छोटी कतरनों का ढेर

लगने लगा है जैसे

कच्ची कपास

उसे धुनना होगा

एक नई चादर

फिर से बुनना होगा.

स्वतंत्रता दिवस पे एक सादा सा सवाल और वही पुराना सन्देश

सादा सा सवाल है, ऊँगली ही उठाते रहेंगे तो,
अपने गिरेबान में कब झाकेंगे?
गलती तो कोई भी निकाल लेता है,
उपाए सोचेंगे तभी तो आगे बढेंगे…

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भूख भरी स्वतंत्रता दिवस

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भगवान् तू ने ये बेरेहेम भूख क्यों दी?
सुखा पेट सूखी रोटी के लिए ज़िन्दगी कितना मजबूर कर रहा है,
और रूखी साँसों से सूखा गला बूँद पानी केलिए तरस रहा है ,
पर आज आज़ादी के आस और आरजूओं को सीच कर भारत माँ को
विनती का हार पहना रहे है !
स्वतंत्रता तो बस नाम का है पर जहा भी देखूं देश भर में बेबसी के दायरे है…
कही कोई बच्छा खेलते हुए आके खाली थाली में भरे पानी पर ,
छत के छेद से गिरे चाँद का प्रतिबिम्भ को निवाला समझ कर मुट्टी भरने का प्रयास करता है
पर चाँद को पानी में बिखरता देख तड़पता रह जाता है ..! और माँ अपने दिल को पत्थर बनाके ,
बच्चे की तसल्ली केलिए पत्थर को उबालती है और सीजने की इंतज़ार में उसे भूखा सुलाती है….

१५ अगस्त के संदर्भ में – वन्दे मातरम और स्वतंत्रता दिवस के सही मायने क्या हम नई पीढ़ी तक पहुँचा पा रहे हैं ? [On the occasion of 15th August….]

क्या उम्मीद रखें हम अपनी नई पौध से, किस देशभक्ति की उम्मीद रखें हम इस नई पीढ़ी से, जबकि आज के स्वतंत्रता के मायने नई पीढ़ी के लिये इंडिपेन्डेन्स डे की ५० % से ७०‍ % तक की सेल होती है। सारे अखबारों में पन्ने इंडिपेन्डेन्स डे सेल से अटे पड़े हैं, परंतु कहीं भी यह नहीं मिलेगा कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कैसे ये स्वतंत्रता पाई और कैसे वे लोग ये स्वतंत्र आकाश में रह पा रहे हैं।

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देश के ठेकेदारों से आज़ादी कब

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आज हम आज़ादी की ६४वी वर्षगाँठ मना रहे है और देश के हर सदस्य देशभक्ति के गीत गुनगुना रहा है !लेकिन आज गुनगुनाने के बाद हम फिर कब देश को याद करेंगे और कब देश के बारे में सोचेंगे कुछ पता नही …शायद २६ जनवरी को !हम आजाद है लेकिन हम अपनी आज़ादी को नहीं ले पा रहे है ..पहले हम गोरो के गुलाम थे लेकिन आज आजाद होने के बाद भी हम अपने ही देश में गुलाम है !गुलाम बनने में पहले भी कुछ न कुछ हमारी गलती थी और आज भी !पहले गोरे हमे आपस में लड़वाते थे लेकिन आज उनकी कमी को देश के ही कुछ ठेकेदार पूरा कर देते है ! सच बात तो यही है की आज़ादी है लेकिन वो नहीं जो हमे मिली थी ..आज जब हम अपनी शिकायत करने किसी सरकारी विभाग में जाते है तो हम सब को अपनी आज़ादी का अच्छे से पता चल जाता है !हमारी अपनी मेहनत की कमाई को पानी के लिए एक हिस्सा कही और भी देना होता है जिसे देकर हर व्यक्ति को अपनी आज़ादी की परिभाषा बहुत अच्छे से समझ आ जाएगी !देश में इतने तरह के भ्रष्टाचार है के आम आदमी की सोच से भी परे है ! गोरो के बाद अब हमे अपने ही देश के लोगो से आज़ादी छीनने की जरुरत है ..

—.

63 साल की आज़ादी और 36 का आंकड़ा

मनुष्य मात्र के लिए किसी भी स्वतंत्र देश में आजादी का अर्थ और व्यावहारिक अभिप्राय बहुआयामी होता है। किसी विदेशी शासन का जुआ उतार फेंकने भर से देश के नागरिकों को आजादी नहीं मिलती, बल्कि आजादी का मतलब है स्वदेशी शासन में प्रत्येक नागरिक को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध हों, लिंग, धर्म, जाति, संप्रदाय और नस्ल आदि में से किसी भी आधार पर भेदभाव न तो समाज में हो और ना ही शासन या व्यवस्था के स्तर पर। देश में उपलब्ध प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों का सामुदायिक हित में प्रयोग किया जाए और प्रत्येक नागरिक को बिना भेदभाव के इन संसाधनों के समुचित प्रयोग का अधिकार हो। अगर भारत की आजादी के विगत 63 सालों का विश्‍लेषण करें तो पता चलेगा कि हम भारतीय आज भी बहुत से मामलों में एक स्वाधीन लोकतांत्रिक देश के सच में स्वाधीन नागरिक नहीं हैं। हमारी आजादी आज भी अधूरी है, क्योंकि हमारे यहां जाति, धर्म और लिंग के अलावा प्रांत और अंचल जैसे कई आधारों पर आज भी जबर्दस्त भेदभाव है, जिसके शोले कश्‍मीर से कन्याकुमारी और मुंबई से सुदूर उत्तर-पूर्व तक सुलगते देखे जा सकते हैं। …….

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आजादी के साठ वर्षो के बाद भी आमजन मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं …

“….कालोनी की सडकों पर बजबजाती गन्दगी . सडकों पर गन्दगी होने के कारण लोग सड़क पर ईट रखकर चलने को मजबूर हैं .

जिन करीबी रिश्तेदार का निधन हो गया था वे करीब दस दिनों पहले पूर्ण स्वस्थ थे . करीब पांच दिनों पहले मेरे साथ एक अन्य मरीज को देखने जबलपुर हॉस्पिटल गए थे . उनकी असामयिक मृत्यु का समाचार सुनकर एक क्षणों के लिए मै अवाक रह गया . जानकारी प्राप्त करने पर पता चला की परसों रात अचानक उन्हें पीलियाँ हो गया था और कुछ ही घंटों के पश्चात उनका देहावसान हो गया . कालोनी की नरक जैसी स्थिति को देखकर मैंने वहां के निवासियों से वहां के बारे में चर्चा की तो लोगो ने बताया की उनके क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की भरी कमी है . क्षेत्र में कभी साफ सफाई नहीं होती है . पेयजल की सुविधा उपलब्ध नहीं है . सडकों में दूषित पानी भरा होने के कारण नलों से पीने का गन्दा पानी आता हैं . क्षेत्र में भीषण गन्दगी के कारण कीड़े मकौडों की बसाहट बढ़ गई है . क्षेत्र के जनप्रतिनिधि कभी इस क्षेत्र में झांकने तक नहीं आते है और जनता द्वारा की गई शिकायत की ओर वे कभी ध्यान नहीं देते हैं . कालोनी के निवासियों की परेशानियों को देख सुनकर मेरी ऑंखें डबडबा गई .

जरा सोचिये जिन क्रातिकरियों ने अपने लहुसे इस धरतीको सीचा हैं,क्या हम उनके लहुके एक कतरेका हक अदा कर पाए हैं । 62 साल पहले अंग्रेज इस धरतीपर राज करते थे और आज कुछ राजनेता । क्या आपको लगता हैं दोनों में कोई अंतर हैं ?

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स्वतंत्रता के मायने…

भारतीय स्वतंत्रता दिवस की धूम हैं, पर स्वतंत्रता के क्या मायने हैं, शायद हम आज तक सीख नहीं पाये हैं और न ही सीखने की कोशिश की। हमारी केन्द्र और राज्य की सरकार का भी ध्यान इस ओर नहीं गया। जो काम अंग्रेज अपनी शासन के दौरान नहीं कर सकें, आजादी के बाद उन अंग्रेजों के सपनों को हमने अपने हाथों से पूरा करने का, ऐसा लगता हैं कि हमने मन बना लिया हैं। हमें आज की परिस्थितियों को देख लगता हैं कि गर अंग्रेज नहीं होते, तो हम शायद सभ्य भी नहीं बन पाते, क्योंकि आज भारतीयों में होड़ लगी हैं कि कौन सर्वाधिक भोगवादी प्रवृत्तियों को अपनाने में सबसे आगे हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय हमारे नेता व जनता दोनों इस बातों को लेकर सजग थे कि वे किसी भी हालात में विदेशी वस्तुओं को स्वीकार नहीं करेंगे, पर आज क्या हैं, खुद सरकार ही भारत को विदेशी वस्तुओं का बाजार बना दी हैं और जनता इसमें डूबकी लगाते जा रही हैं, आज हमारा पड़ोसी चीन, पूरे भारत में अपनी वस्तुओं को ठेल रखा हैं, इन घटिया चीनी वस्तुओं को भारतीय खरीद कर स्वयं को धन्य धन्य कर रहे हैं, और भारतीय लघु उद्योग दम तोड़ता चला जा रहा हैं। शायद आज की पीढ़ी को पता नहीं या बताने की कोशिश नहीं की गयी कि आखिर पूर्व में अंग्रेजों ने भारत को अपना उपनिवेश क्यों बनाया।….

क्या है आजादी का मतलब ??

आज स्वतंत्रता दिवस है. पर क्या वाकई हम इसका अर्थ समझते हैं या यह छलावा मात्र है. सवाल दृष्टिकोण का है. इसे समझने के लिए एक वाकये को उद्धृत करना चाहूँगीं-

देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद में कुम्भ मेले में घूम रहे थे। उनके चारों तरफ लोग जय-जयकारे लगाते चल रहे थे। गाँधी जी के राजनैतिक उत्तराधिकारी एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के मुखिया को देखने हेतु भीड़ उमड़ पड़ी थी। अचानक एक बूढ़ी औरत भीड़ को तेजी से चीरती हुयी नेहरू के समक्ष आ खड़ी हुयी-’’नेहरू! तू कहता है देश आजाद हो गया है, क्योंकि तू बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिले में चलने लगा है। पर मैं कैसे मानूं कि देश आजाद हो गया है? मेरा बेटा अंग्रेजों के समय में भी बेरोजगार था और आज भी है, फिर आजादी का फायदा क्या? मैं कैसे मानूं कि आजादी के बाद हमारा शासन स्थापित हो गया हैं।‘‘

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स्वतंत्रता दिवस

 

आज सारा देश
स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनायेगा
थोड़ी देर के लिए महगाई,
भ्रष्टाचार से ध्यान हटाएगा
आप भी आमंत्रित हैं,
…यदि आप वाकई स्वतंत्र है
वर्ना तो ये जश्न
सर से गठरी उतार,
छाये में बैठ
बीड़ी सुलगा लेने से अधिक
और कुछ नहीं.
फिर वही धूप, फिर वही बोझा
और मंजिल की तलाश..

आज़ादी

एक बड़ा नेता, बड़ी बड़ी मूँछ वाला नेता, ऊँची नाक वाला नेता १५ अगस्त का तिरंगा झंडा लहराने के लिए परेड करने वाले जवानों से सलूट लेने के लिए जा रहा था, एक मंहगी कार में !

उसकी कार के आगे एक बूढ़ा असमर्थ लाचार भूखा आदमी आ खड़ा हुआ, दो रोटी के लिए पैसे माँगने लगा, "बाबू जी दो दिन से भूखा हूँ, दो रोटियों का जुगाड़ कर दीजिए"

नेता आग बाबूला हो गये, सुरक्षा गार्ड को बुलाकर कहने लगे,"इसे भगाओ" !

उसी समय सामने चार जवान लड़के नारे लगाते हुए सामने आ गए, "नेता की हाय हाय, देश भूखमरी, मंहगाई से गुजर रहा है और, ये जनता के पैसो पर ऐस कर रहे हैं, क्या इसी को आज़ादी कहते हैं ?"

नेता ने सुरक्षा गार्ड को बुलाया और कहा, "इन्हें पटाओ" !

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इसलिए, क्यों न –

अब लालकि़लेबाज़ी बंद कर ही दो.

15 अगस्त को लाल क़िले से प्रधान मंत्री के भाषण के समय जो लोग वहां होते हैं वे हैं:- सरकार के लोग और सरकारी कर्मचारी, विदेशी राजनयिक व स्कूलों के बच्चे. इनमें से कोई भी अपनी मर्ज़ी से खुशी-खुशी सुबह साढ़े 6 बजे लाल क़िले नहीं पहुंचा होता.
अब आज, जब आम आदमी किसी प्रधानमंत्री का भाषण सुनने अपने आप जाता ही नहीं तो क्यों ये जंबूरी चालू रखी जा रही है. सबसे बड़ी बात, इससे वोट भी नहीं मिलते.
आख़िर कौन कहेगा कि राजा नंगा है.

—-

(इस तेवर के और भी तमाम पोस्टें होंगी. आपकी निगाहों से गुजरे हों तो आग्रह है कि यहाँ हम सभी से साझा कीजिए. )

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यह प्रविष्टि रविरतलामी में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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