सोमवार (०९.०८.२०१०) की चर्चा।

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर सोमवार की चर्चा के साथ हाज़िर हूं। सबसे पहले तो इस ब्लॉग के नियंत्रक को बहुत बधाई इस खूबसूरत टेम्पलेट के लिए।

My Photoएक आलेख पढ रहा था। शीर्षक है धन का सदुपयोग ..   संवेदना संसार पर रंजना जी का अलेख। शीर्षक सो तो लगा कि हमें धन का कैसे सदुपयोग किया जाना चहिए उसपर जानकारी मिलेगी, पर बात कुछ आगे और कुछ और थी। बात यहां से शुरु करती हैं

“पूर्णतः अनभिज्ञ हूँ कि एक इंसास रायफल का क्रय या विक्रय (चोर बाजार में) मूल्य क्या होता है, परन्तु इतना मैं जानती हूँ कि यदि एक इंसास रायफल बेचकर साढ़े तीन लाख रुपये मिले और उस पैसे से यदि एक आटा चक्की लगवाई जाय, एक स्कूटी, एक टी वी तथा कुछ अन्य घरेलू उपकरण खरीदने के उपरान्त भी इसमें से एक लाख रुपये बचाकर भविष्य कोष में संरक्षित रख लिया जाय, तो इससे अच्छा निवेश, इससे अच्छी दूरंदेसी तथा इससे अच्छा धन का सदुपयोग और कुछ नहीं हो सकता..”

इंसास हम बनाते हैं तो मूल्य तो हमें पता है। अनूप जी तो उसी कारखाने में हैं। खैर, बात यह नहीं है, बल्कि

“सबसे महवपूर्ण बात यह कि धन चाहे ईमानदारी से कमाया हुआ हो या चोरी चकारी घूसखोरी, बेईमानी से ,अर्जित धन को ऐश मौज ,हँड़िया – दारू में व्यर्थ न गंवाते हुए व्यक्ति भविष्य संवारने में लगाये .”

किन्तु इसके बाद की कहानी कई अर्थों में भिन्न हैं। आलेख में एक प्रकार की सहजता है। लोक-राग की सी सहजता और यह सहजता रंजना जी के परिपक्व लेखन शैली की मिसाल है। एक निबंधात्मक आलेख में एकरसता होती है परंतु रंजना जी की लेखनी में वह बेलौस, बेखौफ सी सहजता है जो कहीं-कहीं गुस्सैल दिखाई देती है तो कहीं कहीं वह प्रखर व्यंग्यात्मकता से लैस है। इस रचना में एक कुशल किस्सागो की तरह वे ‘ब्यौरों’ का ऐसा मोड़ दे देती हैं कि पलभर के अंदर पाठक एक स्थिति से दूसरी स्थिति में छलांग लगा लेता है। एक बानगी देखिए

“कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दस बीस दर्जन पुलिस कर्मी एक साथ मर जाएँ तो भी सरकार कहती है कि ,इन्हें तो रखा ही गया है भिड़ने मरने के लिए..लेकिन एक नक्सली मारा जाये तो पांच पांच राज्यों की सांस एक साथ इनके एक आवाज पर बंद हो जाती है।”

व्यंग्य सटीक है और अपने उद्देश्य में सफल है। रंजना जी के शब्द सोचने को बाध्य करते हैं कि ….नक्सलवाद की समस्या से वास्तव में छुटकारा पाना है तो हमें पुलिस कर्मियों की समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा जिसके कारण वे कर्तव्य पथ से विचलित होते हैं।

My Photoघर से बाहर रहने वालों से, मेस में खाना खाने वालों से पूछिए वो क्या-क्या मिस करते हैं। और अगर उसका कवि-हृदय हो तो कविता तो फूट पड़ती ही है। माँ के हाथों बने खाने का स्वाद । बता रहें हैं शरद कोकास पर शरद कोकास जी। कहते हैं

“मुझे अपने हॉस्टल के दिनों में लिखी कवितायें याद आ गईं…और पढ़ाई के दिनों की वह सारी मस्ती और परेशानियाँ भी। उन दिनों न मोबाइल हुआ करता था कि जब चाहे तब फ़ुनिया सकें, न पापा इतना पैसा भेजते थे कि जब चाहे जैसा चाहें खर्च करें फिर भी मज़ा तो आता ही था लेकिन कभी कभी बहुत होमसिक फील होता था और मेस का खाना खाते हुए तो बरबस घर के खाने की याद आ जाती थी …|”

कुछ ऐसे ही क्षणों में उपजी थी यह कविता…….

मेस

पकी पकाई रोटी के लिये भी

इंतज़ार करना

दुखदाई होता है

मेस में

मेज़ तबला बन जाती है

थाली डफली

गिलास ढोलक

खाने की प्रतीक्षा में

एकल गान नहीं

कोरस होता है

पूरा होता है

पेट भरने का दस्तूर

कमरे में लौटते हुए

जुबान पर आता है

माँ के हाथों बने

खाने का स्वाद । 

कविता की भाषा सीधे-सीधे जीवन से उठाए गए शब्दों से बुने हैं। विषय कहने में वे अनूठे हैं। उनके इस पोस्ट में चार कविताएं हैं। अपनी इन कविताओं के लिए वो किसी भारी-भरकम कथ्य को नहीं उठाते हैं, फिर भी उनकी काव्यलोक की यात्रा करते हुए हम कुछ ऐसा पाते हैं कि लगता है कि वे कुछ ऐसा अवश्य कह गए हैं, जिसे नया न कहते हुए भी हल्का नहीं कहा जा सकता।

 

आगे की चर्चा आज शॉर्टकट में …

चर्चा के लिए उपर्युक्त दो पोस्ट ही तैयार कर पाया था कि एक भूले-बिसरे टाइप के मित्र का पदार्पण हुआ और उनसे जो लंबी खींचतान हुई कि समय का ध्यान ही न रहा। सो आज की आगे चर्चा शॉर्टकट में ही।

१. वो जो दौड़ते से रस्ते हैं, ठहर जायेंगे… :: काव्य मंजूषा पर ‘अदा’ :: फिर हम न जाने किधर जाएंगे!

२. उँगली छुड़ा लें :: जीवन यात्रा , एक दृष्टिकोण पर शारदा अरोरा :: बचा अब बड़ा हो गया है, कब तक टामे रहेगा?

३. आज का ख्याल –3 :: ज्ञान दर्पण पर usha rathore :: बारिश खूभ हो रही है, राशन की लाइन लंबी है।

४. दोहा सलिला: संजीव ‘सलिल’ :: शब्दकार पर आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ :: कौन कहानीकार है?, किसके हैं संवाद?  बोल रहे सब यंत्रवत, कौन सुने  फरियाद??

५. बोलो तुम क्या कर सकते हो… :: बिगुल पर राजकुमार सोनी :: एक बार फिर मैं निरूतर हो गया हूं!

६. ये लूट का महोत्सव है :: बना रहे बनारस पर शैलेन्द्र नेगी :: संसद में बैठे ये गरीबनवाज क्या सोच रहे हैं।

७. छंद-प्रकरण – अनुष्टुप-प्रविष्टि : मा निषाद ……..  :: हिन्दी पर अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी :: शुभ निमित्त के लिए – सब शिरोधार्य है !..

८. पलाश और करेली…  …..:: मेरी कलम से….. पर Avinash Chandra :: तुम पलाश के अमर पुष्प हो, मैं कडवी सी बेल करेली.

९. कालियाजी के पास गिरवी नहीं रखी है कलम :: गाहे-बगाहे पर विनीत कुमार :: मैंने तय कर लिया कि मुझे इस बहस से अपने को अलग कर लेना है।

१०. समानता के नाम पर ??????  :: दखलंदाज़ी पर  Manish Tiwari :: वह भी तब जब हम  कुछ ही दिनों में अपना स्वतंत्रता – दिवस  मानाने जा रहे हैं !!!!!!!

११. ज़रूरतमंद को देने के लिये द्स रूपये नही और…… !  :: अमीर धरती गरीब लोग अप्र  Anil Pusadkar :: एक बहुत छोटी सी पोस्ट जिसमे बहुत बड़ा सवाल।

१२. “हमको आपने भारत पे नाज़ है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)  :: उच्चारण पर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक :: धर्मनिरपेक्ष राज-काज है। जनता का जनता पे राज है।

१३. पतों के बीच लापता होते हुये  :: कवितायन पर मुकेश कुमार तिवारी :: आदमी गुम हुये होते हैं खुद की तलाश में!

१४. कड़वा और कठोर किंतु अच्छा निर्णय है नकल पर नकेल !  :: Tisari-Ankh पर Dr. Mohanlal Gupta :: इस निर्णय से प्रतिभाशाली छात्रों का भी एक वर्ष खराब हो गया है!

१५. 13 अगस्‍त की शाम सूर्यास्‍त के बाद पश्चिमी क्षितिज पर देखें .. शुक्र चंद्र युति का अद्भुत नजारा :: गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर संगीता पुरी :: इस खास योग का प्रभाव किन जातकों पर कितना पडेगा?

१६. “मैं “का कोई अस्तित्व नहीं  :: एक प्रयास पर वन्दना :: तब तक ……जब तक अस्तित्व बोध  नहीं  होता  !

१७. मेरी ‘जानेमन’!  :: मौत भी शायराना चाहता हूँ! पर Ram Krishna Gautam :: तू दुखी न हो, मैं तेरे पास आ रहा हूँ!

१८. मैंने सीखा है !!  :: गीत…….मेरी अनुभूतियाँ पर संगीता स्वरुप ( गीत ) :: पीड़ा को दास बनाना, उस पर अधिकार जमाना , पलकों पर बाँध बनाना, और खेतों पर मेंड़  बनाना !!

१९. अध्ययन का बदलता स्वरुप  :: शुरुआत हिंदी लेखन से पर अंकुर द्विवेदी :: धोती-कुर्ता पहनकर स्वच्छ हवा में वृक्ष के नीचे धरती में बैठकर अध्ययन?

२०. मैं फिर से विवाह करना चाहता हूँ….महानता पाने की ओर अग्रसर होना चाहता हूँ…..देश और दुनिया को बदल देना चाहता हूँ…..सतीश पंचम :: सफ़ेद घर पर सतीश पंचम :: किचन में श्रीमती जी मसाला ही नहीं कूटती हैं ……,

२१. विवादित साक्षात्कार की हलचल :: लिखो यहां वहां पर विजय गौड़ :: हलचल का प्रभाव इतना गहरा था कि खराब मौसम के बावजूद रचनागोष्ठी बेहद हंगामेदार रही।

२२. हरेक इंसान के अंदर होता है एक चैंपियन ……..अजय कुमार झा :: कुछ भी…कभी भी.. पर अजय कुमार झा :: पहले भी कई बार कह चुके हैं स्कूली दिनों में!!

२३. दर्द बन जाता है प्रेरणा :: सरोकार पर arun c roy :: इस दर्द से झीनी झीनी रौशनी आती है आशा की!!

२४. दुधारू की दुल्लती :: छपाक पर छपास ळ्ळ सहनी पड़ती है।

२५. बिखरे सितारे: सितम यह भी था.. :: BIKHARE SITARE पर  kshama :: जो पूरे एक साल से चल रहा था…अब आगे..

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यह प्रविष्टि मनोज कुमार में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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