तेरे पास ये जो ज़मीर है यही तेरी दौलते ख़ास है- इस्मत जैदी

इस्मत जैदी’शेफ़ा’ ने अपने परिचय में लिखा है-

तेरे पास ये जो ज़मीर है यही तेरी दौलते ख़ास है
तू बचा के रखना इसे ’शेफ़ा’ यही ज़िंदगी का दवाम है

दवाम का मतलब मुझे ठीक-ठीक नहीं मालूम लेकिन इससे इस शेर को समझने में कोई दिक्कत नहीं होती। फ़िलहाल पणजी गोवा में रहने वाली इस्मत कम लिखती हैं, महीने में एकाध गजल लेकिन जब लिखती हैं तब उसकी कोई न कोई लाइन चुराने के लिये गौतम राजरिशी हाजिर हो जाते हैं। अब जैसे इस गजल को ही देखिये गौतम लिखते हैं:

“हमारे हौसलों का रेग ए सहरा पर असर देखो
अगर ठोकर लगा दें हम, तो चश्मे फूट जाते हैं”

इस शेर पे क्या कहूँ…एक कसक सी उठी मन में कि ये शेर मेरा क्यों नहीं है। इन तंग काफ़ियों पे एक बेहतरीन ग़ज़ल, मैम…ये शेर लिये जा रहा हूँ। आने वाले दिनों में कुछ हिचकियां आये तो समझ लीजियेगा कि आपका शेर सुना रहा हूँ अपने यर-दोस्तों को आपका नाम लेकर।

अब गौतम को यह शेर पसंद आने का कारण शायद यह हो कि वे आजकल हौसले से लबालब हैं और जहां-तहां ठोकर मारने के मूड में हों। लेकिन इसको पढ़ते हुये मुझे राहत इन्दौरी के ये शेर याद आये:

वो खरीदना चाहता था कांसा(भिक्षापात्र) मेरा,
मैं उसके ताज की कीमत लगाके लौट आया।
सुना है सोना निकल रहा है वहां
मैं जिस जगह पर ठोकर मारकर लौट आया।

इस गजल के सभी शेर एक से एक हैं। शुरुआत बच्चों के हाल से है:

न डालो बोझ ज़हनों पर कि बचपन टूट जाते हैं
सिरे नाज़ुक हैं बंधन के जो अक्सर छूट जाते हैं

घर परिवार टूटने की बात को इतना सलीके से कहना, कमाल है:

नहीं दीवार तुम कोई उठाना अपने आंगन में
कि संग ओ ख़िश्त रह जाते हैं ,अपने छूट जाते हैं

और यह शेर तो समझाइस के लिये हमेशा इस्तेमाल किया जा सकता है !अद्भुत!!:

न रख रिश्तों की बुनियादों में कोई झूट का पत्थर
लहर जब तेज़ आती है ,घरौंदे टूट जाते हैं

वैसे जब इसका मतलब पढ़ रहा हूं तो लग रहा है कि दूसरी लाइन कुछ और भी हो सकती है( क्या हो सकती है मैं नहीं जानता)। घरौंदे में झूठ का पत्थर! तेज लहर में घरौंदे टूटेंगे तो क्या उसमें झूठ का पत्थर ही होगा।
इस गजल का सबसे प्यारा शेर मुझे सबसे आखिरी वाला लगा:

’शेफ़ा’ आंखें हैं मेरी नम, ये लम्हा बार है मुझ पर
बहुत तकलीफ़ होती है जो मसकन छूट जाते हैं

मुझे मसकन का मतलब पता नहीं था। इस्मत यह बहुत अच्छा करती हैं कि जिन शब्दों को कठिन समझती हैं उनके मतलब नीचे दे देती हैं। मसकन माने होता है -घर। घर छूटने की तकलीफ़ प्रवासी शायद शिद्दत से महसूस कर सकते हैं इसीलिये समीरलाल’कनाडा वाले’ ने इस शेर को दोहराते हुये लिखा:बहुत शानदार..वाह!
इसके पहले की गजल की शुरुआत ही इस्मत ने शानदार की:

बीती बातें फिर दोहराने बैठ गए
क्यों ख़ुद को ही ज़ख़्म लगाने बैठ गए

इस गजल का यह शेर लोगों ने बहुत पसंद किया:

अभी अभी तो लब पे तबस्सुम बिखरा था
अभी अभी फिर अश्क बहाने बैठ गए?

इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते नीरज गोस्वामी ने लिखा:

मतले से मकते तक के इस हसीन सफ़र में एक से बढ़ कर एक खूबसूरत शेरों के मंज़र देखने को मिले…ये कमाल सिर्फ आपकी कलम ही कर सकती है…इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए दिल से दाद कबूल करें…

इसी पर सर्वत एम की प्रतिक्रिया है:

किसी गुमनाम शायर के मिसरे हैं— “तुम जिस चिंगारी को छू लो उड़े और जुगनू बन जाए”, गजब की गजल पेश की. हालात, नफसियात, जज़्बात की जो अक्कासी आपने अशआर की शक्ल में पेश की है, दूसरों के लिए एक मुश्किल मरहला है. मैं हैरत और सकते का शिकार हूँ. समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या कहूं. फिलहाल, इस कामयाब गजल के लिए मुबारकबाद.

यह नज्म उनके प्रोफ़ाइल का विस्तार लगती है:

मेरे मालिक ख़यालों को मेरे
पाकीज़गी दे दे ,
मेरे जज़्बों को शिद्दत दे ,
मेरी फ़िकरों को वुस’अत दे,
मेरे एह्सास उस के हों ,
मेरे जज़बात उस के हों ,
जियूं मैं जिस की ख़ातिर ,
बस वफ़ाएं भी उसी की हों,

इस पर नीरज गोस्वामी की प्रतिक्रिया है:

अता कर ऐसी दौलत
जिस के ज़रिये, मैं
तेरे बंदों के काम आऊं
मुझे ज़रिया बना कर
उन के अरमानों को पूरा कर

इस्मत जी आपकी इन पंक्तियों में ज़ाहिर आपकी सोच को पढ़ कर मेरा सर आपकी शान में झुक गया है…सुभान अल्लाह…बेहतरीन नज़्म कही है आपने…आपको तहे दिल से दाद देता हूँ…

एक और गजल में इस्मत लिखती हैं:

जब तुम ही नहीं हो तो ज़माने से मुझे क्या
ठहरे हुए जज़्बात में जां है भी नहीं भी

इसी गजल पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये सर्वत एम ने लिखा:

इतनी शानदार गजल कहने के बाद भी यह इन्किसारी, पता नहीं आपको पसंद आए, अरे जिसे पसंद न आए वो आँखें रखते हुए भी….!!!
इतनी मुश्किल बहर और इतनी टिपिकल रदीफ़, मुझे तो पढ़ते हुए ही पसीने छूट गए, गर्मी की वजह से नहीं, बहर और रदीफ़ की हौलनाकी की वजह से. लेकिन निभाया खूब से खूब तर आपने.
मैं किन्हीं दो एक अशआर की बात क्या करूं, कोई भी शेर ऐसा नहीं, जिसे कमजोर कहा जाए.
यह मैं कह रहा हूँ…क्योंकि मैं झूट नहीं बोलता!!!
बहुत दिनों बाद आ सका हूँ, माज़रत की गुंजाइश है ना!

अब बहर, रदीफ़ का तो मुझे अंदाजा नहीं लेकिन गजल बहुत अच्छी लगी।
अब यह गजल देखिये और उस पर नीरज गोस्वामी जी की दो माह बाद की गयी टिप्पणी:

क़त्ल ओ ग़ारत ,ख़ौफ़ ओ दहशत के लिए
भूक ताक़त की ही ज़िम्मेदार है

हंस के मेरे सारे ग़म वो ले गई
ये तो बस इक मां का ही किरदार है

इस्मत जी आपके अशआर बड़ी उलझन में डाल देते हैं क्यूँ की उनकी तारीफ़ के लिए माकूल लफ्ज़ ही नहीं मिलते…ऐसे सूरते हाल में सिर्फ “लाजवाब” लफ्ज़ से ही काम चलाना पड़ रहा है, जो मुकम्मल नहीं है…आपके लिए दिल में जो इज्ज़त है उसे बयां करने को भी लफ्ज़ नहीं हैं मेरे पास…लिखती रहिये…

बहुत सारी गजलें हैं इस्मत की! कुछ अच्छी हैं कुछ बहुत अच्छी हैं। जब उन्होंने ब्लॉग पर लिखना शुरू किया था तब से मैं उनका प्रशंसक हूं। लेकिन ऐसा प्रशंसक कि उनकी तमाम रचनायें पढ़ीं नहीं सोचा कि आराम से पढ़ी जायेंगी। आज जब पढीं तो थोड़ा अफ़सोस हुआ कि इतनी अच्छी रचनायें अभी तक पढ़ीं नहीं थीं लेकिन साथ ही खुशी भी हुई कि इसी बहाने इंतजार नहीं करना पड़ना और एक के बाद एक तमाम रचनायें पढ़ने को मिल गयीं।

इस्मत की गजलें थोक के भाव लिखी जाने वाली मैगी गजलों से अलग ऐसी गजलें लगती हैं जिनके शेर याद करके दोहराने का मन करता है।

आप भी देखिये आपको भी पसंद आयेंगी इस्मत की रचनायें।

मेरी पसंद

चला भी जाऊं तो तुम इंतेज़ार मत करना
और अपनी आंख कभी अश्कबार मत करना

उलझ न जाए कहीं दोस्त आज़माइश में
कि ख़्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना

मैं जानता हूं कि तख़रीब है तेरी आदत
हरे हैं खेत इन्हें रेगज़ार मत करना

मेरी हलाल की रोज़ी सुकूं का बाइस है
इनायतों से मुझे ज़ेर बार मत करना

जो वालेदैन ने अब तक तुम्हें सिखाया है
अमल करो, न करो, शर्मसार मत करना

सड़क भी देंगे वो पानी भी और उजाला भी
सुनहरे वादे हैं बस,ऐतबार मत करना

मुझे तो मेरे बुज़ुर्गों ने ये सिखाया है
उदू की फ़ौज पे भी छुप के वार मत करना

तुम्हारे काम ’शेफ़ा’ गर किसी को राहत दें
बजाना शुक्र ए ख़ुदा इफ़्तेख़ार मत करना

तख़रीब= बर्बाद करना ; रेग ज़ार =रेगिस्तान ; बाइस =कारण ; ज़ेर बार =एहसान से दबा हुआ इफ़्तेख़ार =घमंड

इस्मत जैदी

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यह प्रविष्टि अनूप शुक्ल में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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