बेकार के विवादों की निन्दा करना भी उन्हें बढ़ावा देना है

विनीत कुमार ने कल बज पर लिखा:

चार लड़कियां एक साथ। किसी के हाथ में मदर डेरी दूध की थैली,किसी के हाथ में लीची,एक के हाथ में कोक और एक के हाथ में सब्जी की पॉलीथीन। सब मैगजीन की दूकान पर खड़ी होकर पढ़ रही थी- कैंपस- प्रेम,पॉलिटिक्स और पढ़ाई। मैं खड़ा देख मुस्करा रहा था कि उसके पलटने से नजरें टकरा गयी। वो मैगजीन में छपे लेखक की तस्वीर से मिलान करने की कोशिश में थी कि मैं आगे बढ़ गया। ले लेख कादंबिनी के जून अंक में है।

इस बज से क्या पता चलता है! यही न कि बजकार का रवैया असहयोगात्मक है। जब कोई फ़ोटो मिला रहा है तो आप आगे बढ़ लिये। आप जब अकेले आगे बढ़ेंगे तो कोई प्रगति क्यों कर होगी।

ये वही विनीत कुमार हैं जिन्होंने चार दिन पहले लिखा- अब ब्लॉगिंग करना पहाड़ लगता है.. । इस पहाड़ को पार करने के बाद एक लेख लिख मारा और अगले का शीर्षक जीमेल के स्टेटस में झिलमिला रहा है-श्री श्री रविशंकर पर हमला किसी संत पर हमला नहीं है

बात विश्वविद्यालय के लोगों की हो रही है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के किस्से भी सुन लिये जायें योगेश गुलाटी की पोस्ट के माध्यम से। इसमें बताया गया है कि कैसे उनके एक देहाती मित्र ने 96% अंक पाने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के छुआ-छुऔव्वल और लेटेस्ट फ़ैशन ट्रेंड वाले माहौल को देखकर वहां दाखिला लेने से इंकार कर दिया। इस पोस्ट पर इसके बाद नीरज रोहिल्ला और योगेश गुलाटी में मजेदार टिप्पणीचार हुआ जिसमें बकौल नीरज , योगेश गुलाटी की दूसरी टिप्पणी गुस्से में है। आप ये सब मसला उधर ही देखिये न!

अब जब बात चली गुस्से की तो ये देखिये कि मीनाक्षीजी क्या कहती हैं! वे लिखती हैं- गुस्सा बुद्धि का आइडेन्टिटी कार्ड है । मीनाक्षीजी की इस पोस्ट पर कई साथियों ने अपने गुस्सैल होने की बात कही है।

कुछ साल पहले ब्रेन ड्रेन का मतलब यह समझा जाता था कि कोई प्रतिभा उचक कर विदेश निकल ली। इससे यह भी आभास होता था कि जो भी ड्रेन हो रहा है वह ब्रेन ही है। इससे कभी-कभी असमंजस की स्थिति पैदा होती होगी। इस समस्या का हल निकालते हुये सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने। उन्होंने अपने देश में ही एक सेवा से दूसरी सेवा में जाने की प्रक्रिया को ब्रेन ड्रेन बताकर इस बात की कड़ी आलोचना की और इस तरह के निर्णय को घटिया बताया। सिद्धार्थ की तकलीफ़ आप उन्हीं के शब्दों में देखिये:

साल दर साल हम देखते आये हैं कि आई.आई.टी. जैसे उत्कृष्ट संस्थानों से निकलकर देश की बेहतरीन प्रतिभाएं अपने कैरियर को दूसरी दिशा में मोड़ देती हैं। जिन उद्देश्यों से ये प्रतिष्ठित संस्थान स्थापित किए गये थे उन उद्देश्यों में पलीता लगाकर देश के ये श्रेष्ठ मस्तिष्क `नौकरशाह’ या `मैनेजर’ बनने चल पड़ते हैं। यह एक नये प्रकार का प्रतिभा पलायन (brain drain) नहीं तो और क्या है?

उनका गुस्सा आई.ए.एस. के टॉपर डा.फ़ैजल शाह पर उतरा:

इस साल जो सज्जन आई.ए.एस. के टॉपर हैं उन्हें डॉक्टर बनाने के लिए सरकार ने कुछ लाख रुपये जरूर खर्च किए होंगे। लेकिन अब वे रोग ठीक करने का ज्ञान भूल जाएंगे और मसूरी जाकर ‘राज करने’ का काम सीखेंगे। क्या ऐसा नहीं लगता कि चिकित्सा क्षेत्र ने अपने बीच से एक बेहतरीन प्रतिभा को खो दिया?

अब आप इस पर विचार कीजिये कि प्रतिभा के साथ कैसा सलूक किया जाये। वैसे तीन दिन पहले जब यही सवाल डा.फ़ैजल से रवीश कुमार ने किया था एक साक्षात्कार में तो उन्होंने यह बताया कि हर व्यक्ति अपने लिये बेहतर विकल्प चुनता है। अभी मैं समझता हूं कि मैं आई.ए.एस. में रहकर बेहतर कर सकता हूं कल हो सकता है मेरी सोच बदले और मैं कुछ और करना चाहूं।

ये पीडी भी अजीब हैं। एक गंजेड़ी की सूक्तियां सुनाने के बाद सालों पहले उड़ गये तोते के किस्से सुनाने लगे:

खैर उसे जाना था सो वह चला गया.. अब भी कभी रात सपने में देखता हूँ कि मेरा तोता भूखा है और मैं उसे खाना देना भूल गया हूँ.. सुबह तक वह सपना भी भूल जाता हूँ अक्सर.. मअगर जेहन में कहीं ना कहीं वह याद बची हुई है जिस कारण उसे सपने में देखता हूँ.. हाँ, मगर यह भी प्रण कर चुका हूँ की कभी किसी पंछी को कैद में नहीं रखूँगा..

पीडी की इस पोस्ट पर अपनी बात कहते हुये डा.अरविन्द मिश्र लिखते हैं:

उसे तोतापारी आम कभी खिलाया था क्या -वो परभ्रित(अहसान फरामोश) पक्षी उड़ गया तो जाने दीजिये …दूसरा पालिए ..
नीड़ का निर्माण फिर फिर …यहाँ जीवित मृत मनुष्यों को लोग भूल जाते/गए हैं और आप तोते को और आराधना कली की याद में अधमरी हो रही हैं –
किसी तरह सामान्य भी हो रही होगीं तो आपकी यह पोस्ट फिर रुलाने के लिए पर्याप्त है -यह देहाती औरतों का गुण कहाँ से सीखा पी डी साब ?🙂

पीडी ने अभी तक उनके सवाल का जबाब नहीं किया है। इसके पहले वे एक और सवाल अपनी पोस्ट पर उछाल चुके हैं-क्या हिन्दी ब्लागिंग के ये अशुभ लक्षण हैं ? अब सब सवाल-जबाब आप उधर ही देखिये।

काजल कुमार आजकल इधर-उधर बहुत घूमते हैं। देखिये अबकी बार वे संयुक्त अरब अमीरात टहल आये और उसकी रपट भी पेश कर दी। इस रपट का यह अंश देखिये:

यहां भी, भारत की ही तरह, कभी-कभी बिजली की भयंकर कमी रहती है. 27 मई, 2010 को Gulf News के पेज 2 पर छपी शरजाह की यह रिपोर्ट देखिये. यह बात अलग है कि दुबई में एक लीटर पेट्रोल 90 फिल्स (1 दिरहम से भी कम) में मिलता है पर एक लीटर वाली पानी की बोतल दो दिरहम की आती है. यहां मीठे पानी का स्रोत केवल समुद्री पानी को desalinate करना है पर पानी की कमी नहीं मिलती.

सयुंक्त अरब अमीरात जाने के बावजूद काजल कुमार वहां अल्पना वर्मा जी से बिना मिले चले आये। इस शिकायत की सफ़ाई देते हुये उन्होंने क्या कहा यह आप उधर ही देखिये। फ़ोटो भी हैं भाई। क्यूट काजल कुमार का भी है।

जब घुमक्कड़ी की बात चली तो देखिये वन्दनाजी भी गोवा घूम कर आयीं और उसके किस्से सुनाये। जब उन्होंने स्वर्ग से सुन्दर गोवा के किस्से लिखे तो मैंने सोचा कि भैये ये स्वर्ग कैसे देखा इन्होंने और कब देखा। उसके किस्से किधर हैं। बहरहाल जब सस्ते में निपटाने की कोशिश की उन्होंने तब लोगों जो कहा उसका जिक्र करते हुये उन्होंने आगे लिखा-

गोवा की अधूरी पोस्ट पर इतनी झिड़कियां (स्नेहसिक्त) मिलीं, कि तुरन्त आगे का वृतांत लिखने बैठ गई.
तो शुरु करूं?🙂

और बिना किसी की हां सुने वे आगे शुरू हो गयीं और लिखा-परीकथा सा सुन्दर, गंगाजल सा निर्मल…. गोवा लिखना भूल गयीं वे। आप जोड़ लीजिये। इसके आगे के किस्से सुनने के लिये आप देखिये-जहां शराब है, नशा नहीं… इसके बाद की पोस्टें भी हैं। वन्दनाजी की सफ़र से लौटकर लिखने की गति देखकर लगता है कि जिसको लिखने के मसाले की कमी लगे उसको कैमरा लेकर यायावरी पर निकल लेना चाहिये।

सतीश पंचम ने अपने ब्लॉग के दो साल पूरे किये। इसके बाद एक ठो कोलाज बना डाला। उनका शुरुआती कान्फ़ीडेन्स तो जरा निहार लीजिये:

कभी मुझे अपने लेखन पर इतना कॉन्फिडेंस था कि जब पोस्ट लिखने के कुछ देर बाद तक यदि कोई टिप्पणी नहीं आती थी…….. तब एक टेस्ट कमेंट लिख चेक करता था कि कहीं टिप्पणी आदि के बारे में कोई तकनीकी रूकावट तो नहीं है🙂

यही गजब का कान्फ़ीडेन्स है जिसके चलते उनको लगता है कि उनकी कोलाजी पोस्ट शायद सबकी समझ में न आये इसईलिये उन्होनें अपने कोलाज का हिन्दी अनुवादभी जारी किया।

शिखा वार्ष्णेयजी ने भी अपने ब्लॉग के दो साल पूरे किये! दूसरी वर्षगांठ पर उन्होंने लड्डू भी बांटे। इस मौके पर उन्होंने अपने सभी पाठकों को आभार दिया। पाठकों की प्रतिक्रियायें भी रोचक हैं। उनको एक बार फ़िर से बधाई। इसके बाद वाली पोस्ट में उन्होंने लिखा:

अब तो नया लिव इन का फैशन है
हर रिश्ते पर स्वार्थ की पैकिंग
हर रिश्ते पर एक्सचेंज ऑफर है
सेटिसफाइड नहीं तो डस्टबिन है
पर प्यार की कस्टमर सर्विस डिम है
सुना है आजकल एक स्कीम नई है
दहेज़ के साथ एक दुल्हन फ्री है

समीरलाल अपने नये दर्द का बयान कर रहे हैं:

पिछले बरस इसी सीजन में महबूबा थी एसीडीटी और अब की बार है यह कमर दर्द. उसी महबूबा की याद के समान कमर दर्द किसी को दिखता भी नहीं. चोट लगी हो, प्लास्टर बँधा हो, आँख सूज आई हो तो लोगों को दिखता है, साहनुभूति मिलती है. मगर कमर दर्द, पत्नी सोचे कि काम न करना पड़े इसलिए डले हैं और ऑफिस वाले सोंचे कि ऑफिस न आना पड़े, इसलिए डले हैं, और मित्र तो खैर आलसी मान कर ही चलते हैं.

कुश भी अब भूले-बिसरे गीत हो लिये हैं। बहुत दिन बाद एक ठो पोस्ट लगाये उसका शीर्षक क्या दिया देखिये- स्पिट…फार्ट… एंड स्टार्ट ब्लोगिंग । हमको तो कुछ शीर्षक का मतलब बुझाया नहीं लेकिन बकिया लोगों की टिप्पणियों से पता चला कि उनकी पोस्ट जिसमें केवल एक ठो फोटो है के बहुत सारे मतलब हैं। हमें सबसे आश्चर्य इस बात का है कि यह सब बातें शिवकुमार मिश्र कैसे समझ गये। क्या सिर्फ़ इस लिये कि उनको राष्ट्रीय ब्लॉगर दल बनाना है।

इस बीच और भी बहुत हो गया। सुना है कि नीशू जी हैं कोई उन्होंने ब्लॉगिंग में हड़कम्प मचा रखा है, कोई पलक जी हैं उन्होंने कविताओं का ऐसा भंडार खोला है कि पूछिये मत उधर महाशक्ति जी हैं वे एक बार फ़िर से हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा पर चिन्तित हो गये हैं।

इस सबको देखकर ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग का भविष्य उज्ज्वल है। यह सब हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये शुभ संकेत हैं।

चलते-चलते उन्मुक्तजी की बात पर ध्यान दिलाया जाना जरूरी समझ गया सो बांचिये उन्मुक्तजी को एक बार फ़िर से:

विवाद हर जगह है। लेकिन हिन्दी चिट्ठों की मुश्किल यह है कि कुछ लोग फज़ूल के विवाद (अनावश्यक बहस, व्यक्तिगत आक्षेप, हिन्दू मुस्लिम सौहार्द्य, हिंदी ब्लॉगिंग को किसी मठ का रूप देकर इसे नियम कानून में बांटना, महिला पुरुष विवाद) उठाते हैं। उनसे कहीं अधिक चिट्ठाकार, उन बेकार के विवादों की निन्दा करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा कर वे अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन इससे, इसका उलटा होता है।

बेकार के विवाद के बारे में लिखा जाय, या उसकी तरफदारी की जाय, या उनकी निन्द की जाय – इन सब से उसे बढ़ावा मिलता है। अधिकतर बेकार के विवाद मुझे उसकी निन्दा करने वाले लेखों से पता चलते हैं।

मेरे विचार से, बेकार के विवादों की निन्दा करना भी उन्हें बढ़ावा देना है। हमें इससे बचना चाहिये।

यह भी सच है कि यहां
“कई बार लोग यहां अच्छी विषय वस्तु के उपलब्ध नहीं होने पर शिकायतें भी करते हैं।”
यह भी मुझे कुछ अजीब सा लगता है। इन सब को चाहिये यह लिखना या विवादों की निन्दा करना छोड़, जिस विषय पर माहिर हों उस पर लिखना शुरू करें। कुछ तो अच्छा उपलब्ध होगा।

उन्मुक्तजीकी बात को मानते हुये हम किसी बेकार के विवाद की निन्दा का काम स्थगित करते हुये यह पोस्ट प्रकाशित करते हैं।

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यह प्रविष्टि अनूप शुक्ल में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

बेकार के विवादों की निन्दा करना भी उन्हें बढ़ावा देना है को 3 उत्तर

  1. आभा कहते हैं:

    ब़ढ़िया चर्चा……

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