विज्ञान चर्चा – डार्विन की आत्मकथा

नमस्कार, चिठ्ठा चर्चा में आपका स्वागत है. पिछली बार डार्विन पर की गई चर्चा में विस्तार से कई पहलुओं पर चर्चा नही हो पाई थी. इसलिए आज भी चर्चा का विषय मैंने इसे ही चुन लिया.
हम सब जानते हैं विकासवाद के सिद्धांत के प्रतिपादन के एवज में डार्विन को धर्म के ठेकेदारों(चर्च ऑफ़ इंग्लैंड)की कटु आलोचना का सामना करना पड़ा था, बाद में चर्च ऑफ इंगलैंड ने डार्विन के साथ किये गये अन्याय पर माफी मांग ली.

नया सर्वहारा पुनर्जागरण नया सर्वहारा प्रबोधन नामक नेट पत्रिका ने डार्विन के जन्म की द्विशती के उपलक्ष्य में एक आलेखनुमा रिपोर्ट प्रकाशित की है, समय के आभाव के कारन मैं उसपर टिप्पणी कर पाने में असक्षम हूँ.

साहित्य शिल्पी
इन दिनों डार्विन की आत्मकथा का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा है.



चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 1
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 2
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 3
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 4
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 5
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 6
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 7
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 8
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 9
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 10
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 11
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा भाग – 12


यह तो हुआ लिंकों का प्रस्तुतीकरण इस विषय पर “चर्चा” तब ही हो पाएगी जब आप टिप्पणियों में अपना मत जाहिर करेंगे. अब इजाजत दीजिये. चर्चा विषयपरक होने के कारन मैं अन्य चिठ्ठों को स्थान नही दे रही जिनमे किसी अन्य मुद्दों पर लिखा जा रहा है. उनकी चर्चा अगले माह की अंतिम शनिवार को. आपका दिन सार्थक हो.

||चिठ्ठा चर्चा मंच और मेरी ओर से आप सब को होली की हार्दिक शुभकामनाएं||

– लवली

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यह प्रविष्टि डार्विन का विकासवाद, लवली कुमारी, विज्ञान चर्चा में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

13 Responses to विज्ञान चर्चा – डार्विन की आत्मकथा

  1. डॉ. मनोज मिश्र कहते हैं:

    अच्छी चर्चा,होली पर आपको भी बहुत शुभकामनायें.

  2. शरद कोकास कहते हैं:

    इस चर्चा के बहाने चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा के लिंक सभी एक जगह मिल गये । अब इसे पहली फुर्सत में पढ़ लिया जाये । इस लिंक के लिये बहुत बहुत धन्यवाद ।

  3. Arvind Mishra कहते हैं:

    चिट्ठाचर्चा के पाठकों के लिए डार्विन पर इतनी विषद सामग्री के लिए आभारआपको और चिट्ठाचर्चा परिवार ,पाठकों को भी होली की रंगारंग शुभकामनाएं

  4. अभिषेक ओझा कहते हैं:

    डार्विन की आत्मकथा के लिंक के लिए धन्यावाद. बुकमार्क कर रहा हूँ. अभी तो नहीं… फुर्सत में पढता हूँ.

  5. सागर नाहर कहते हैं:

    एक ही विषय पर इतने सारे लिंक्स.. फुर्सत में देखना होगा।आज तो मुख्य समाचार की तरह मुख्य लिंक से ही काम चलाना पड़ रहा है। संभव है व्यस्तता की वजह से! उम्मीद है अगली चर्चा में विस्तृत चर्चा पढ़ने को मिलेगी।होली की हार्दिक शुभकामनाएं, रंगों का यह पर्व आपके पूरे परिवार के लिए मंगलमय हो।

  6. सतीश सक्सेना कहते हैं:

    बढ़िया जानकारी दी आपने !! आपकी चर्चा है यहाँ ..http://nukkadh.blogspot.com/2010/02/blog-post_2119.htmlहोली और मिलाद उन नबी की शुभकामनायें !

  7. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    व्हाट ऍन आइडिया लवली जी,मुरीद हुआ आपकी तीक्ष्ण बुद्धिमता का,काम के लिंक दिये, यानि मोटा सा होमवर्कहम्मैं समझाया, आप लोग चुप्पै बईठ के पढ़ो,हम आते हैंऔर..खुद बिना किसी एहसान खिसक लीं,पकवान बनाने होंगे ?हम प्रस्तुत कड़ियों की आपकी समीक्षा चटनी से ही सँतुष्ट हो लेते ।ब्यूटीफुल आइडिया लवली जी..कौन कहता है कि,दिमागदार लोग ब्लॉगिंग नहीं करते ?

  8. लवली कुमारी कहते हैं:

    @अमर जी क्या पकड़ा है सर जी ————–हमें धर – पकड कर चर्चा में दिया बिठाय टिप्पणी देने की बारी में कोरी वाह – वाह टिपियाय नही चाहिए ऐसी टिप्पणियाँ जो पढ़ कर कोफ़्त हो जाए"चर्चा" शब्द सार्थक हो तब कोई बात बन पाएइसलिए कहा – आप सब पढ़िए हम थोड़ी देर में आएसोंचा कम से कम ऐसे तो बात बन जाएपकवान के बहाने की खिंचाई पर विषयवस्तु पर कहाँ टिपियाए?"व्हाट एन आइडिया सर जी" – ऐसे हम भी कहने का मौका पाए ..——————-होली मुबारक .. 🙂

  9. अर्कजेश कहते हैं:

    क्‍या विज्ञान चर्चा टिप्‍पणी सापेक्ष है ?

  10. लवली कुमारी कहते हैं:

    @अर्कजेश यह चर्चा विषयपरक थी. मुझे जो समीक्षा अथवा समालोचना करनी थी. वह मैं इस बार समयाभाव के कारन नही कर पाई. रही बात चर्चा के टिप्पणी सापेक्ष होने की तो ऐसी कोई बात नही है ..पर मेरा प्रयास होता है की पाठकों को विषयवस्तु पर चर्चा के लिए प्रेरित कर पाऊं.मेरी टिप्पणी को उसी परिप्रेक्ष्य में लिया जाए.

  11. दीपक 'मशाल' कहते हैं:

    इस बार रंग लगाना तो.. ऐसा रंग लगाना.. के ताउम्र ना छूटे.. ना हिन्दू पहिचाना जाये ना मुसलमाँ.. ऐसा रंग लगाना..लहू का रंग तो अन्दर ही रह जाता है.. जब तक पहचाना जाये सड़कों पे बह जाता है..कोई बाहर का पक्का रंग लगाना..के बस इंसां पहचाना जाये.. ना हिन्दू पहचाना जाये..ना मुसलमाँ पहचाना जाये.. बस इंसां पहचाना जाये..इस बार.. ऐसा रंग लगाना…(और आज पहली बार ब्लॉग पर बुला रहा हूँ.. शायद आपकी भी टांग खींची हो मैंने होली में..)होली की उतनी शुभ कामनाएं जितनी मैंने और आपने मिलके भी ना बांटी हों…

  12. ravikumarswarnkar कहते हैं:

    डार्विन की आत्मकथा जानकारी में ही नहीं थी…धन्यवाद…इन लिंकों के लिए…

  13. PD कहते हैं:

    मैंने ये सभी पोस्ट पहले पढ़ी थी और अपने मित्रों को भी पढ़ाने के लिये फिर से ढ़ूंढ़ रहा था जो आज मिला.. बढ़िया लगा.. 🙂

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