जिन्हें नींद नहीं आती वे अपराधी होते हैं….


ज्योति बसु

दो दिन पहले पश्चिम बंगाल के सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु जी का 96 वर्ष की अवस्था में देहावसान हो गया। इस मौके पर अनेक साथियों ने उनको याद करते पोस्टें लिखीं और उनको अपनी तरह से श्रद्धांजलि दी। लाखों समर्थकों के ज्योति बाबू… और लाखों विरोधियों के भी ज्योति बाबू को याद करते हुये विनय मिश्र ने लिखा-

बंगाल में दादा व दीदी के संबोधन के बीच वे बाबू थे। ज्योति बाबू…। पांच दशक से जानने वाले प्रणब मुखर्जी उन्हें ज्योति बाबू कहते हैं। और प्रणब दा की उंगली पकड़ कर राजनीति में आने वाली ममता बनर्जी भी। विलायत में पढ़ाई करने वाले एक धनी-मानी परिवार के बेटे ज्योति बसु बंगाल की राजनीतिक धारा के अलग ध्रुव रहे। कोई और नेता बाबू नहीं कहा गया।

ज्योति बाबू अपनी पार्टी की नीति के चलते प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये। वो जो प्रधानमंत्री न बन सका, चला गया में उनको याद करते हुये रवीश कुमार लिखते हैं:

वो प्रधानमंत्री होते तो क्या होता और न बनने से क्या हुआ,इस सवाल का कोई ठोस जवाब मिलना मुश्किल है। जहां से ज्योति बसु ने अपनी पीठ मोड़ कर इतिहास बना दिया, वहीं से हिन्दुस्तान का इतिहास दूसरी दिशा में मुड़ गया। कंप्यूटर क्लर्कों का देश बन गया। देश के डीलर उद्योगपतियों का राज( ये पंक्ति सुशांत झा के लेख से प्रेरित है),जो सिर्फ बड़े डीलर बन कर शाइनिंग इंडिया में कामयाबी के प्रतीक बन गए। भारत के उद्योगपतियों ने मौलिक संस्थान कम बनाएं बल्कि लाइसेंस हटवा कर मल्टी नेशनल कंपनियों की डीलरशिप ले ली। इस उदारीकरण का नतीजा यह है कि देश में आज चालीस करोड़ लोग गरीब हैं। बाकी गरीब ही हैं।

रवीश कुमार की इस पोस्ट पर टिपियाते हुये अभिषेक अन्नपूर्ण पाण्डेय ने लिखा:

सर आप का आज करीब 12 बजे से एंकररिंग देखी …
बेहतरीन एंकररिंग करते हैं आप .. बहुत अच्छा लगा. आप को सुन कर लगता है की बस ग्लामेर ही नहीं और भी बहुत कुछ है इलेक्ट्रिक मीडिया में….

आज ज्योति बाबू का अंतिम संस्कार किया गया। ज्योति बाबू ने अपना शरीर मेडिकल शिक्षा के लिये दान दे दिया था। उनके इस शरीरदान से अविभूत होने की हद तक प्रभावित घुघूती बासूतीजी का मानना है कि ज्योति बसु जी द्वारा अपने देहदान की खबर का प्रमुखता से प्रचार करके लोगों में अपने शरीर के अंग दान देने की भावना का प्रसार किया जा सकता था उन्होंने लिखा:

ऐसा अवसर बार बार नहीं आता। ज्योति बसु करोड़ों लोगों के नायक थे। उनका एक छोटा सा प्रतिशत भी यदि उनके प्रति अपनी श्रद्धा दर्शाते हुए शरीर दान जितना बड़ा नहीं तो नेत्रदान व अंगदान का ही प्रण ले लेता तो भारत में नेत्रहीनों को नेत्र मिल जाते, रोगियों को गुर्दे खरीदने जैसा अमानविक काम न करना पड़ता न ही अपने परिवार के किसी सदस्य का गुर्दा शल्य चिकित्सा द्वारा निकालकर लेना पड़ता। मुझे दुख है कि हम और हमारा मीडिया एक बार फिर ऐसे अवसर का उपयोग जन चेतना फैलाने के लिए करने से चूक गया।

मैं किसी अन्य नीति में ज्योति बसु से सहमत थी या नहीं किन्तु उनके इस निर्णय ने मेरे मन में उनका आदर बहुत बढ़ा दिया है। ज्योति बसु आपको मेरा लाल सलाम तो नहीं किन्तु प्रकृति के हर उस रंग का, जो जीवन का पर्याय है, बहुरंगी सलाम!

ज्योति बाबू जी से संबंधित कुछ अन्य पोस्टों के लिंक यहां दिये जा रहे हैं और कुछ आगे भी जोड़े जायेंगे।


आशाराम बापू

आशाराम बापू के नाम से जाने जाने वाले सुबहिया उपदेशक ने जनता द्वारा चुने हुये मेयर , जो कि संयोग से किन्नर हैं, खिल्ली उड़ाई और भद्दे इशारे किये। विनीत कुमार ने घटना का लब्बो-लुआब बताते हुये लिखा:

कहानी हाल भी उज्जैन में दिए गए उस प्रवचन को लेकर है जिसमें भौंडापन का एक नमूना शामिल है। स्टार न्यूज की सनसनी टीम ने इसे आसाराम बापू की नौटंकी नाम दिया है। उज्जैन में आसाराम को सुनने हजारों की भीड़ जमा होती है। एक संत कहलाए जाने के नाते भक्ति,आध्यात्म और मानवीय गुणों पर प्रवचन देने के नाम पर आसाराम ने राजनीति गलियारों की गतिविधियों पर अनर्गल बोलने लग गए। इसी बीच उन्होंने सागर,मध्यप्रदेश की चुनी गयी मेयर का जमकर मजाक उड़ाया। पहले तो उसने किन्नरों जैसी हाय-हाय का स्टेज पर ही नकल करना शुरु किया। बाद में कमला ने जो बातें कहकर सागर के लोगों से वोट देने की अपील की थी उसकी नकल उतारने में जुट गए।

जो हरकत आशारामजी ने की उसकी किसी संत से आशा नहीं की जाती। आशाराम की इस हरकत पर मेयर कमला ने इस पर जो प्रतिक्रिया की उससे लगा कि वे आशाराम से कहीं अधिक समझदार और संयमित तथा जिम्मेदार हैं। मेयर कमला ने प्रतिक्रिया में क्या कहा देखिये:

इस पूरे मामले की जानकारी जब कमला को होती है तो इसके जबाब में जिस तरह से पेश आती है,उस पर आसाराम को शर्म आनी चाहिए। दुनिया की निगाह में संत संयमी और बहुत ही उंचे ख्यालात के होते हैं जबकि किन्नरों के बारे में जिस तरह की कथाएं गढ़ी गयी हैं,उनके बारे में जिस तरह से बताया जाता रहा है वो ये कि इनमें लाज-शर्म नाम की कोई चीज नहीं होती। इसे पूरी तरह ध्वस्त करते हुए कमला ने बहुत ही शांत अंदाज में कहा है कि ऐसा करके आसाराम बापू ने मेरा मजाक नहीं उड़ाया है बल्कि गीता(श्रीमद्भागवत गीता) को झूठा करार दिया है। आसाराम को हमें मजाक से नहीं बल्कि सेवाभाव से देखना चाहिए। एक कहावत है न- लंबा तिलक मीठी जुबानी, दगाबाज की यही निशानी।

प्रशान्त उर्फ़ पीडी दिन पर दिन अपने लेखन में शानदार और जानदार से होते जा रहे हैं। सहज लेखन से प्रभावित कर देने वाली पोस्ट में प्रशान्त लिखते हैं:


प्रशान्त

सोचने की बिमारी बहुत पुरानी है.. किसी से कुछ कह दिया, तो उसके बारे में सोचता हूं.. किसी ने कुछ कह दिया, तो खूब सोचता हूं.. किसी ने कुछ नहीं कहा, तब भी सोचता हूं.. रिश्तों की बात आती है, चाहे वह खून का रिश्ता हो या फिर दोस्ती का, तब सोच-सोच कर पगला ही जाता हूं.. पुराने दिनों को भी खूब याद करता हूं.. अच्छे पल भी याद आते हैं, बुरे पल भी.. मगर कमबख्त याद बेहिसाब आते हैं.. वो शहर भी याद आता है.. वह लड़की भी याद आती है.. उसके घर को जाने वाली गली याद आती है!

इस पोस्ट की सबसे टची लाईन को उद्धरित करते हुये विनीत कुमार लिखते हैं:

अब नौस्टैल्जिक होना बेवकूफी कहलाती है.. और जरूरत से अधिक ईमानदार होना दूसरे के मन में शक पैदा करता है.. किसी का जरूरत से अधिक ख्याल कर जाता हूं तो अगले ही पल यह डर बैठ जाता है कि इससे कहीं वह इरीटेट तो नहीं हो गया होगा/होगी? ..पोस्ट की सबसे टची लाइन। मुझ पर इसका असर रहेगा लेकिन मेरी मां अगर पोस्ट को पढ़ेगी तो यही कहेगी- येही सब अलाय-बलाय कोढ़ा-कपार सोचो। इ नहीं घर-दुआर से दूर हैं तब मन-मारकर काम पर ध्यान दें।.

इस पोस्ट में नींद न आने के बारे में एक डायलाग है–“जिन्हें नींद नहीं आती वह अपराधी होते हैं..”

समीरलाल से ललितेश शर्मा ने एक खास मुलाकात की। एक सवाल के जबाब में समीरलाल देश से दूर रहने पर खलने की बात का जिक्र आने कहते हैं:


समीरलाल

खलता नहीं, बहुत ज्यादा खलता है. दिन तो व्यस्तता में गुजर जाता है लेकिन मुझे आज इतने सालों बाद भी कोई ऐसी रात याद नहीं जब मैं सपने में भारत में न रहा हूँ. कहते है अवचेतन मन सपने में रुप लेता है. शायद मन से मैं भारत के बाहर कभी आया ही नहींयहाँ सुख सुविधायें हैं, परिवार है. सब कुछ है बस, वो भारत नहीं है.

अभिषेक ओझा कानपुर/लखनऊ क्या घूमे सोचने-साचने की बीमारी टाइप पाल लिये। क्या ऊंचे स्वीकार हैं देखिये:


अभिषेक ओझा

मुझे ये स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मैं धीरे-धीरे उस वर्ग का हो गया हूँ जिसे देश की राजनीति में कोई रुचि नहीं… पर जब खुद के साथ ऐसा हो रहा हो या फिर जब बिहार से परिवर्तन की बात सुनने को मिले… तो दिमाग में कुछ नयी अवधारणाएँ बनती है, कुछ पूरानी अवधारणाएँ टूटती भी हैं ! सुना उस दिन रैली में बसो में भरकर एक दिन के खाने पर हजारों लोग आए थे. शायद ये सुनने कि ‘सर्वजन’ के लिए बहुत काम हो रहा है (होगा/होता रहेगा). पर ये ‘सर्वजन’ है कौन? शायद उन्हें मिल जाय !

दो दिन पहले हम कोलकता में अपने मित्रों से मिले। उसके कुछ किस्से लिखते मनोज कुमार ने लिखे हैं।

आप गद्य लिखते हैं न! देखिये कुमार अम्बुज के ब्लाग पर गद्य के कुछ नमूने शायद आपको अच्छे लगें :

1 ईश्‍वर रेडियम, ईथर अथवा कोई वैज्ञानिक योग है। ईश्‍वर एक रासायनिक प्रतिक्रिया है।

2 आप यह बता सकते हैं कि आपने क्‍या स्‍वप्‍न देखा और तोते ने क्‍या कहा क्‍योंकि पक्षी एक अयोग्‍य गवाह है।

3 उनके चेहरे पत्‍थरों पर नमक से बने चेहरों के समान थे।

4 न्‍यूयॉर्क किसी के भी लिए इतने प्रलोभन पैदा कर देता है कि कोई भी अपव्‍ययी हो जाता है।

5 मैं कपड़ों में आश्‍चर्यजनक सौदेबाजी और सुई-धागे से किया गया चमत्‍कार देखता आया हूं।

अब देखिये जी.के अवधियाजी कहते हैं तो सही ही होगा पोस्ट बनता है रचनाओं से और रचनाएँ बनती हैं शब्दों से

न्य़ूटनजी के नाम का उपयोग करते हुये खुशदीप ने छिछोरेपन का नियम बनाया था तब जब वे कोई नियम न मानते हों शायद:


खुशदीप

हर छिछोरा तब तक छिछोरापन करता रहता है…जब तक कि सुंदर बाला की तरफ़ से 9.8 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नुकीली हील वाला सैंडल उसकी तरफ नहीं आता…ये फोर्स (बल) बेइज्ज़ती
कहलाता है…और ये बल शर्मिंदगी के समानुपाती (डायरेक्टली प्रपोशनल) होता है…अगर छिछोरापन फिर भी कायम (कॉन्स्टेंट) रहता है तो बेइज्ज़ती की ये प्रक्रिया अनंत ( इंफिंटी) को प्राप्त होते हुए अजर-अमर हो जाती है..

शास्त्रीजी का ब्लागिंग का साल पूरा हुआ। उनको बहुत बहुत बधाई। आप भी दीजिये न बधाई।

लाख चाह कर भी मैं बात नही कर पा रहा हूं ब्लाग परिवार के सदस्यों से! यह कहना है अनिल पुसदकर का जिनके केवल एक बार चाहने पर ही हमने उनसे बात करके अपने अलावा एक और नम्बर भेजा।


रश्मि रवीजा

बहरहाल आप रश्मि रवीजा के लघु उपन्यास की पांचवी किस्त तो पढ़ना ही चाहेंगे न! देखिये एक झलक इस किस्त की:

अजीब त्रासदी है, भारतीय बाला होना भी । कितनी बड़ी विडम्बना है… उसकी जिंदगी के अहम् फैसले लिए जा रहे हैं और वह दर्शक बनी मूक देखती रहे पर आज के दर्शक तो रिएक्ट करते हैं, रिमार्क कसते हैं या कुर्सी छोड़ ही चले जाते हैं। पर यहाँ तो…

हरिशर्माजी रश्मि रवीजा के इस उपन्यास पर अपनी राय व्यक्त करते हुये लिखते हैं:

आपके इस लघु उपन्यास से एक बात तो जेहन मे साफ़ हो गई है कि अगर कोई लडकी प्रकट मे बेरूखी दिखा रही हो तो ये नही समझना चाहिये कि वो वास्तब मे आपको पसन्द नही करती है और नेह की बारिश से अन्गारो की गरमी भी निकल जाती है.

हरि शर्मा की इस बात पर वन्दना अवस्थी का मजाक देखने का मन करे तो भैया उधर ही देखिये।

एक औरत अपने मन के भाव बखूबी उड़ेल दे, जैसा फील किया वैसे ही को शब्द दे ले, ये उसका हुनर है….! एक पुरुष भी जब बिलकुल ऐसा ही कर ले तो वो भी एक अद्भुत गुण है….!!!

लेकिन जब एक पुरुष किसी औरत का मन उतार कर शब्दों में रख दे तो…???

ओफ्फ्फ्फोऽऽऽऽ बस बार बार पढ़ रही हूँ और हर बार की तरह मौन के खाली घर में मौन हूँ….!!!!!!

यह प्रतिक्रिया है कंचन की और पोस्ट है कविता ओम आर्य की-सिरहाने में से आधा चाहिये

एक लाईना


    इरफ़ान का कार्टून
  1. “बूढ़ा हो रहा बचपन है?” :साल भर की ब्लागिंग में ही ये हाल शास्त्रीजी?
  2. लाख चाह कर भी मैं बात नही कर पा रहा हूं ब्लाग परिवार के सदस्यों से! : जाड़े के मारे हलकान हूं गला बैठ क्या लेट गया है।
  3. तुझे जलेबियाँ खानी है?: चलो बताओ, ब्लाग पर आकर टिपियाओ
  4. बड़बोलेपन की बजाय खेल पर ध्यान दें क्रिकेटर : बड़बोलेपन की जिम्मेदारी कप्तान साहब निभायेंगे
  5. खुद को कभी कम्युनिस्ट नहीं कहूँगा:क्योंकि मैं कम्युनिस्टों को प्यार करता हूं
  6. छिछोरेपन का ‘न्यूटन’ लॉ…खुशदीप: से बेहतर और कौन बता सकता है उदाहरण सहित
  7. ख्यालातों के अजीब से कतरन :जोड़-जाड़कर कोलाज बनाया है यादों का
  8. भांति भांति के गणेश : निहारियेगा!
  9. जीत लिया युद्ध! : कम्बल,रजाई, स्वेटर, कोट के सहारे
  10. सिरहाने में से आधा चाहिये : इत्ते से ही काम चला लेंगे।

  11. फिल्मों में दारोगा का प्रमोशन हो गया है।
    : छठे पे कमीशन के हिसाब से पैसा भी मिलेगा तो मौज करेगा।

मेरी पसंद


पीसिंह

राज रिश्तों का अब खोला जाये |
दोस्त को दोस्त ही बोला जाये ||

जिंदगी तुझ को जीने के लिए |
टूटी उम्मीदों को टटोला जाए ||

कौन अपना है कौन बेगाना |
वक्त के तराजू पे तोला जाए ||

दिलों की दूरियां मिटाने के लिए |
सच तो सच झूठ भी बोला जाए ||

नजाकत हुश्न की भी समझलो |
फिर किसी का दिल टटोला जाए ||

पीसिंह
फ़िलहाल इत्ता ही। मौज मजे में रहिये।

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About bhaikush

attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि अनूप शुक्ल में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

25 Responses to जिन्हें नींद नहीं आती वे अपराधी होते हैं….

  1. खुशदीप सहगल कहते हैं:

    महागुरुदेव, इस अनूप चर्चा में शास्त्रीय गायन जैसा आनंद है…जय हिंद…

  2. खुशदीप सहगल कहते हैं:

    अनूप जी,ज्योति बसु जी के लिए गवर्नर की जगह मुख्यमंत्री कर लीजिए…जय हिंद…

  3. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    शुक्रिया भाई खुशदीप!

  4. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    बड़े दिनों बाद दिखे हैं देव….बेहतरीन चर्चा और खूब मेहनत वाली चर्चा है।

  5. Mired Mirage कहते हैं:

    बहुत अच्छी चर्चा रही। ओह, आपराधिक प्रवृत्ति की चुगली समय कर रहा है।घुघूती बासूती

  6. अभिषेक ओझा कहते हैं:

    चिटठा चर्चा की पोस्ट मेरे फीड में क्यों नहीं दिखती? ये तो पीडी ने शेयर कर दी तो दिख गयी. पीडी से कहना पड़ेगा रोज शेयर कर दिया करें 🙂

  7. मनोज कुमार कहते हैं:

    बहुत अच्छी चर्चा रही। वसंत पंचमी की शुभकामनाएं।

  8. नींद न आना अपराध हैतो हम भी अपराधी हैं

  9. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    बेहतरीन चर्चा ! आपकी ही खालिस चर्चा का फ्लेवर है इसमें । आभार ।

  10. शरद कोकास कहते हैं:

    अच्छी चर्चा है भाई । कॉमरेड बसु को श्रद्धांजलि

  11. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    अति सुन्दर अनूप जी ! विस्तृत चर्चा !!

  12. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    आसाराम बापू भी बाबाओ की उस जमात का प्रतिनिधित्व करते है….जिसके लिए धरम एक मुनाफे का धंधा है…..अभिषेक ….पी डी .की पोस्ट पढ़कर मजा आया …दोनों युवा वर्ग के दो चेहरों को दिखाते है …खुशदीप .की पोस्ट भी दिलचस्प थी….इत्तिफाक से उस दीवार को हमने करीब से देखा है उसी जगह से पढ़े जो है….

  13. शानदार चर्चा. रश्मि जी के उपन्यास में पांचवी किस्त के बाद भी रोचकता और ताज़गी बनी हुई है.काबिले तारीफ़ मेरी पसंद-राज रिश्तों का अब खोला जाये |दोस्त को दोस्त ही बोला जाये ||बहुत सुन्दर.

  14. shikha varshney कहते हैं:

    Nispaksh ,behtareen charcha…no Doubt about it.

  15. rashmi ravija कहते हैं:

    अच्छी चर्चा है…आभार

  16. ओम जी ने अपने ब्लॉग पर कहा कि कंचन जी के विषय में तो अनूप जी कह ही चुके हैं…हम घबरा गये कि अनूप जी ने हड़काऊ लक्ष्मीबाई जैसा कुछ फिर लिखा क्या ? ढूँढ़ते ढूँढ़ते यहाँ आये तो पता चला कि नही हमने जो कहा वही लोगो को पढ़ने को कहा गया है.. धन्यवाद इस कंसेशन के लिये 🙂

  17. रंजना कहते हैं:

    nice(is shabd ne mujhe bada prabhavit kiya hai…soch rahi hun iska upyog karne lagun…)NICE CHARCHA…

  18. विनीत कुमार कहते हैं:

    अच्छी और मेहनत से की गयी चर्चा। शुक्रिया।.

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