बौद्धिक ऐयाशी के बाय प्रोडक्ट्स ?ओर फ्लेश्बेक से दो पन्ने

मै बचपन से ही फाइटर रहा हूँ ..ओर मुश्किल समय में मुस्कराना मैंने नेहरु से सीखा है ….बकोल राठोर

ये दोनों इसी व्यवस्था के वे ट्रांसपेरेंट चेहरे है जहाँ दूसरी ओर जीने के बड़े हिस्से पर ताकतवर लोगो के कब्जे की समाज की अप्रत्यक्ष स्वीक्रति की मोहर दिखाई देती है .ये आपने तय करना है के आप गुटनिरपेक्ष स्टेंड का बोर्ड कब तलक हाथ में थामे रहेगे ?

(इरोम शर्मीला अस्पताल के बिस्तर पर)

पोलिश जैसी स्याह किस्मत !
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उसने बहुत जुगत लगाकर फीतों को किसी तरह एक दूसरे में फँसा दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेरा पाँच साल का बेटा करता है. वक़्त ने उसे जूते चमकाना सिखा दिया है मगर उसे जूते के फीते बाँधना सिखाने वाले पता नहीं कहाँ हैं.
शायद उसे ‘उँगलियों का हुनर’ सिखाने वाला कोई उस्ताद नहीं मिला वरना वह जूते घिसने के जगह उसी स्टेशन पर जेब तराश रहा होता, वह स्कूल नहीं जाता यानी किसी नेक एनजीओ के दायरे से भी बाहर है.
जब मैं अपने बेटे को जूते को फीते बाँधना सिखाऊँगा तो उस लड़के का मटमैला चेहरा आँखों के सामने आएगा.

दो कप मीठी चाय, दो कप काली चाय, कमरे कि चार दिवारी, दोनों के बीच से गुजरती अनछुई मासूम हवा.. आँखों में जाल बुनता विश्वास … तीन घंटे जैसे तीन पल …दोनों सिर्फ एक शाम की तन्हाई बांटना चाहते थे किन्तु दो चेहरों ने बिना किसी मुखोटे के ..जिंदगी का हर वो पन्ना बाँट लिया जिससे वो स्वम भी अनिभज्ञ थे… वो हेरान थे उनके पास इतना जमा था एक दुसरे से बांटने को …जो वह आजतक किसी और से नहीं बाँट पाए . ..जीवन में पड़ी सिलवटों को, हिस्से में आई ठोकरों को, ना मिले मुट्ठी भर आसमान को, जीवन के इंद्र धनुष रंगों को, जिंदगी के कोनो में छुपी ख़ुशी को, दिन के उजाले में देखे सपनों को, विकल्पों के अभाव को, मजबूरियों को, उपलब्धियों को, टिक टिक पर बसी चुनोतियों को,नसिकता पर जम आई धूल को, रोज मुंडेर पर आकर बैठने वाली लालसाओं को, बेबाक कल्पनाओं को, रिश्तों से मिले अपनेपन और उपहास को, जाने -अनजाने में हुए गुनाहों को …बिना किसी लागलपेट के एक दुसरे से बाँट सके … दोनों एक दुसरे को वहां छु सके ..जहाँ अभी तक किसी ने नहीं छुआ था … आत्मा की खामोशी को छुआ और उसे भीतर सहेजा बिना किसी आपेक्षा और उम्मीद के… उस कमरे की हवा पंखुड़ी जैसी हलकी और खुशबूदार थी …मन और आत्मा को एक दुसरे के सामने निर्वस्त्र कर स्त्री -पुरुष के आकर्षण की विवशता की जगह दोनों के बीच इंसानियत का आहान था ..

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जिस रिश्ते को तुमने उस रात…….

Dont leave anything except your foot print ………
पार्क के अंतिम छोर पर अनगिन घुमावों दर्श्यों उबड़-खाबड़, समतल रास्तों के बाद मिलता है– ‘सफेद सिरस का पेड़’ — अपनी कोमल काया के साथ, जिसके नीचे ओस भीगी,बिछी, काली बजरी पर पड़ी छोटी नुकीली हरी पीली पत्तियां नक्काशी की तरह जड़ी दिखाई देती हैं. ‘सफेद सिरस’ के चारों ओर गोलाकार राह से प्रदक्षिणा के साथ आगे बढ़ते ही सूरज की कच्ची हंसी सर पर आ बिखरती है… तभी ‘सफेद सिरस’ खिलखिला उठता है, उलीचता है सुख… कई-कई रिश्तें, घटनाओं का साथ छोड़कर स्मृति में बदलते हैं और समृतियों के संविधान में कोई रद्दो-बदल नहीं होता, एक गाढ़ी आद्रता भयंकर सर्दी में अन्दर तक जम कर रह जाती है, खरोचों तब भी नहीं पिघलती… दिल धडकता है… ज़ोरों से, और लम्बी साँस के साथ फिर सामान्य स्थिति में आ जाता है. मन मुख्य द्वार के भीतरी प्रवेश के साथ ही बूढ़े कचनार के सीने पर टंगी तख्ती पर लिखा टटोलता है, “डोंट लीव एनिथिंग्स एक्सेप्ट युवर फूट प्रिंट्स”– यही सच है अपने ही वाक्य का रिक्त स्थान मन ही मन भरने की भरसक कोशिश करते हुए लौटना… “कल फिर मिलेंगे”… उनकी खुशआमदी की दुआ करते…


तुम्हारा आंचल कन्धों से खिसकता है, फासले तय होता है… महज शब्द से शब्द तक, होटों पर उभरता है चुम्बन…
नदी ठिठकती है, पेंड़ो से गिरती पत्ती दम लेती है… जुबान में बदलता शब्द, खो जाता है प्राश्चित में…
(- कवि सुदीप बनर्जी, “आइने दर आइने” संग्रह से…)

मेरी आत्मा एक अजाना आर्केस्ट्रा है . मै नहीं जानता कौन से वाध्य यंत्र कौन सी सारंगी ओर वीणा के तार ,नगाड़े ओर ढपलिया मै अपने भीतर बजाता हूँ ओर उनको झंकृत करता हूँ कुल मिलकर जो मै सुनता हूँ वह एक सिम्फनी है …..

कुमार अम्बुज ……..अपनी प्रिय किताब “बुक ऑफ़ डिसकवाईट “को याद करते हुए

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आईने में रोज़ रोज़ जो दिखता है तुमको तुम्‍हारा, बहुत मुश्किल है लेकिन, उससे बचा कर, अपने उस ध्‍वस्‍त व्‍यक्‍त से छुपा कर, देखना अगर कभी हाथ आती है, किस ज़बान और किन बोलों में क्‍या तार और कौन बारह शब्‍द फुसफुसाती है, आंख में थोड़ा खून लिये पूछना कविता क्‍या बताती है, सचमुच किसी काम आती है?
घिसे रंगों की, लदर-फदर के बोझ, बेमतलब प्रसंगों की, यही होगी दुनिया, कांपती उंगलियां और ‘घन्‍न-घन्‍न’ डोलता पंखा, फटे पन्‍नों की फड़फड़ाती बातें होंगी और सियाह सिर गिराये आहभरी रातें, मालूम है मुश्किल है लेकिन अंधेरे में टटोलकर टोहना, पूछना मोहब्‍बत से, क्‍या कविता, क्‍या है, बोलोगी, बताओगी तुम्‍हारी सौगातें..
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ब्लोगिंग का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन नहीं

कुल मिलाकर ब्लॉगिंग सिलेब्रेटी और उस टाइप के लोगों के लिए अपने फैन,ताक लगाकर बैठी मीडिया और न्यूज डेस्क पर बाट जोह रहे चैनलकर्मियों के लिए कुछ टुकड़े और मसाले फेंक देने की जगह है। एक ऐसी जगह जहां से देश का बड़ा से बड़ा अखबार उन टुकड़ों को उठाकर पूरे आधे पन्ने की खबर छाप सके,न्यूज चैनल आधे घंटे की स्पेशल स्टोरी बना सके। उस पर दुनियाभर के एक्सपर्ट के फोनो और चैट लिए जा सकें। यानी बिना हर्रे और फिटकरी लगाए सिलेब्रेटी चोखे तरीके से खबरों में टांग फैला दे।

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समाज,राजनीति,स्त्री-विमर्श,मीडिया विश्लेषण और हाशिए पर के समाज को लेकर जो कुछ लिखा जा रहा है उस पर बात की जाए। अब अभिव्यक्ति,अस्मिता,दबाव और संस्थानों के भीतर की घपलेबाजी को लेकर जो चीजें इसके जरिए सामने आ रही है उस पर बात होनी चाहिए। हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए ये वो समय है जब इससे जुड़ी खबर को सिलेब्रेटी से जोड़कर और उन्हीं तक सीमित करके दिखाया जाता है तो इससे उसका नुकसान छोड़ फायदा नहीं।

ब हर कवि का बेटा अमिताभ बच्चन तो नहीं हो सकता?

पिछले बीसेक सालों से ( लगभग वही समय काल जिसमें मेरा/मेरी पीढ़ी का लेखकीय/पाठकीय विकास हुआ है) हम लगातार जन्म शताब्दियां मना रहे हैं। प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, सज़्ज़ाद ज़हीर, सुभद्रा कुमारी चौहान और ऐसे ही तमाम आदमक़द साहित्यकारों की, जिन्होंने आधुनिक हिन्दी-उर्दू साहित्य के लिये बुनियादें भी चुनीं और कंगूरे भी बनाये। बड़े ज़ोर-शोर से कार्यक्रम हुए, पत्रिकाओं के विशेषांक निकले, चर्चा-परिचर्चा, थोड़ी कीच धुलेंड़ी भी और ऐसा लगा कि अब तक जो उनको बिसराये रखा गया, अब सारी कसर पूरी कर ली जायेगी। पर हुआ क्या? जैसी ख़ामोशी उन ख़ास वर्षों के पहले थी…उनके बाद भी कमोबेश बनी ही रही।
रामकुमार वर्मा, दिनकर, रांगेय राघव, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल जैसे तमाम दूसरे साहित्यकारों की जन्मशतियां या तो ऐसे ही बीत गयीं या बीत जाने की उम्मीद है।
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जन्मशती वाले साल तमाम चीज़ें मूर्खों की तरह पलक झपकाते हुए पढ़ी और लगा — …अगले ज़माने में कोई मीर भी था। उस दौरान मंचों से की गयीं दहाड़ें याद हैं और उसके बाद की बेशर्म चुप के हम गवाह हैं।
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स‌िर्फ पोछा मारने स‌े ही नहीं कार चलाने स‌े भी नॉर्मल डिलिवरी के आसार बढ़ते हैं डायलॉग तो परफेक्ट था। हालांकि मैं इसका उदाहरण पेश नहीं कर पायी।
साइकिल,स्कूटर,मोटरसाइकिल के बाद अपनी कार की कहानी भी तो बतानी है।
मई-जून की चिलचिलाती धूप में दो पहिया वाहन पर आंख-नाक-कान तक को कपड़े स‌े लपेट कर पारे का ताप कम करने की जद्दोजहद चलती, रेडलाइट पर बगल में कोई कार में बैठा दिखता तो लगता उसे स्वर्ग सा परमानंद मिल रहा है। तमन्ना मुंह फैला लेती, काश मैं भी अपनी खुद की कार खरीद पाती। हें-हें…।
जाड़े में लुढ़कते पारे के स‌ाथ, स‌र्द हवा से जंग भी कुछ ऎसी ही हसरत जगाती। हम भी अपने चार पहिया वाहन का स‌ुख उठा पाते।
सिर्फ यही नहीं, दो पहिया वाहनों के स‌ाथ स‌‌ड़क पर घिसटने के अनुभव भी प्राप्त हैं, कुछ भयानक दुर्घटनाएं भी देखी हैं। ऎसे में चार पहिया वाहन ज्यादा स‌ुरक्षा का एहसास कराते। हालांकि एक्सीडेंट तो चार पहिये में भी कम नहीं होते।

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हरित पल्लवों की उम्मीदें
मौसम की गुलाम नहीं होती
जैसे बरगद उगता,
पुराने किले की सबसे उंची
दीवार पर, मेहराब को तोड़ने.
कभी छूट जाया करते हैं
कदमों के निशां
पहाड़ों की सख्त चट्टानों पर,
अरावली और विंध्य वाले
अभी तक करते हैं दावा कि
पांडवों के पदचिह्न बने हुए हैं.
पहाड़ी की उपत्यका में
शांत सजीव खड़े मठ से
आशीर्वाद अब भी बोलते हैं
जबकि
बाबा चंचलनाथ
समाधी लेने के बाद भी
हरिद्वार में दिखे थे
क़स्बे के जोशी परिवार को.
मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ
इन अद्भुत अचरजों के बारे में
कि पैर भले पांडवों के ना हो
कि बाबा से मिलने का धोखा हुआ हो…
मगर उम्मीदें अक्सर
पहाड़ का सीना चीर कर
उगती है नन्हे फूल की तरह.

शार्दुला नोगजा

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एक सपना टूटता है
आज चुप्पी मूढ़ता है
एक सपना टूटता है
एक हरियाली मेरे जंगल से नोटों तक चली
सालों से बोरी में लिपटी शायरी अब पक चली
फल पका अब फूटता है
एक सपना टूटता है
भाग पातीं अब न गलियाँ, ट्रेफिकों ने पाँव छीने
एक ही मंज़र दिखातीं थक गयीं ये ट्रेड मशीनें* (*Treadmills)
कुछ न पीछे छूटता है
एक सपना टूटता है
क्रेन, पोतों, टेंकरों के बीच सूरज क्या करेगा
अब कहाँ पानी में जा कर आस्मां डुबकी भरेगा
क्षितिज पल-पल रूठता है
एक सपना टूटता है
अमन के हैं मायने क्या वो बताएँगे हमें अब
छत ज़मीनें जा लगीं और रास्ते छलनी हुए जब
शहर छाती कूटता है
एक सपना टूटता है

प्रवासी नोट्स


दूर बहुत दूर तक धरती के कौने कौने पसरी है अजनबीयत कभी न छटने वाली धुन्ध के मानिंद. बौराया मन धुंधलके में ढूंढता है परिचित पहचाना कोई चेहरा, कोई आवाज़, कोई हंसी, किन्ही आँखों में अचानक से उतर आयी चमक, कोई भूला इशारा। मन के किसी कौने में बैठे नाक नक्श के अपनापे में कोई चुन लेता है डाक्टर, किसी आवाज के अंदेशे में चौंकती है नींद बार बार, कोई नींद में रहता है सालों साल सुकून से बरसों पीछे छूटे शहर में, और आँख खुलने पर कुछ देर को बैठता है दिल। रोजमर्रा की भागदौड़ में बीतता है दिन.
कई लोग बहुत सालों से हैं एक मुसाफिर की चैतन्य मुद्रा में, अटा-सटा है सामान जैसे कल ही कंही फिर से निकलना हो, नहीं मिली मोहलत एक-डेढ़ दशक में इत्मीनान से पसर जाने की, घर में घर की निश्चिंतता से होने की ,स्थगित है जीवन और अपार बहता समंदर है आदमी, औरतों और बच्चों का पृथ्वी के एक छोर से दुसरे तक रेंगता

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यह बहुत बरस पहले की बात है
कि हम साथ में हरे सपने देखते थे
और ख़ुश रहते थे।
वे और दिन थे माँ सुनो,
उन दिनों खील खाकर ख़ुश रहा जा सकता था,
देखे जा सकते थे गुब्बारे और पतंग शाम भर,
तुम मेरा माथा भी फोड़ सकती थी
और फिर छिपा सकती थी मुझे कहीं अन्दर गहरे सुरक्षित।
ये कुएँ में कूद जाने या कविता पढ़ने के दिन नहीं हैं माँ,
बाहर निकलकर देखो काला होता आसमान,
यहाँ जो इस शहर और इससे अगले शहर में जो आग लगी है
और माँ,
पानी प्यार की तरह ख़त्म होता जा रहा है,
अभी बोने हैं उसके बीज।
हम जहाँ जन्म लेते हैं,
अक्सर करते हैं उस ज़गह से नफ़रत।
हमारी प्यारी ख़ूबसूरत चाँद सी माँएं
धीरे धीरे खलनायिकाएँ होती जाती हैं
हमारी धुएँ से भरी लड़ाइयों में।

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जहां गली के मुहाने पर मिलता है
सेर भर अश्लील साहित्य
जहां की आबादी
घरों से इस तरह निकलती है जैसे
चीटियों के सुरंग में किसी ने पानी झोंका हो
जहां,
उस बस्ती के बाशिंदे सर्कस में नौसिखिए सा
दो बांसों के बीच खीचीं गई रस्सियों पर
हवा में हाथ लहराए
बैलेंस बनाते हुए चलने की कोशिश कर रहा है।
अक्सर,
जिंदगी को हमने वहीं देखा है सांस लेते हुए
भारी सांसों को हंस कर कोयला ढ़ोते हुए
उम्र के इस मोड़ पर अनायास
वे सारे घोषित गुनाह मुझे प्रिय लगने लगे हैं
कवि कह गया है
किंतु,
तुम तो जानते हो न कवि;
कि कविताएं दूब जैसी होती है.
..कि कविताएं कहीं भी उग आती हैं

तुम्हारा ये शहर क्यों इतना चहक रहा है….कैसे इतना गुल्ज़ार आसमां यूं बरस रहा है…..क्यों इस कुहासे में मेरी याद के रंग और रौशन लग रहे हैं….क्या तुम्हें मालूम…..कि तुम्हारी हर याद के रंग में तुम नज़र आते हो…..ये कभी कभी होने वाली बारिश अब इतनी फुहारें भर रही है कि कभी कभी तो मुझे मेरे दामन का छोर छोटा मालूम पड़ता है…..किसने कहा…कि यादें तस्वीरों में कैद…मासूम लगती हैं….मेरा दिल…काश कोई देख पाता…पता नहीं कितने हज़ार रंग हैं तुम्हारे वहां छिपे….और कितनी मुस्कुराहटें…..ना मालूम कब से दबी ढकी मेरे अंदर….तुम्हारी उसी एक हंसी की मुंतज़िर….वो सुनहरा चमकीला हाईलाईटर मिल जाए….. मैं उन सारी मुस्कुराहटों को दिखाऊं और शायद…ये आसमां भी तुम्हारी उन मुस्कुराहटों के रंग से शर्मा जाए और यूंही बस ढक जाए….जैसे मैं……कोई मौसम तय नहीं….कोई दिन तय नहीं….कोई लम्हा तय नहीं….जिसे मैं कहूं कि तुम्हारा मौसम नहीं….कोई नहीं जानता ….वो हर मौसम सर्द एहसास की तरह जिसमे तुम नहीं….इसलिए ना सर्दी ना गर्मी कोई सितम नहीं नुमायां कर पाया इस ज़हन पर….क्योंकि वहां तो तुम…तुम्हारा मौसम….तुम्हारा एहसास….पता नहीं कौन कमबख्त कहता है….कि यह बारिश का मौसम शायद यादो से घिरने का ही मौसम होता है….
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नाच के दौरान उसमें जो स्थिर था वो उसकी आँखें थीं। अपना ही नाच खुद देख रही हो जैसे, अलग हटकर।देखते देह को उसके पागलपन से निकलते हुए। दीर्घा में औरों के साथ इस नाच को वो भी उतने ही अविश्वसनीय भाव से देखतीं। हर बार। कब ये नाच उसके पेशे से अलग होकर विशुद्ध अतीन्द्रीय हो जाता था इसे कोई नहीं चिन्हित कर पाया। और यूँ ये एक ऐंद्रिकता का भंवर ही था। देह का ही गान। उसी का उत्सव।
पता नहीं ये जगह कौनसी थी। हाँ ये पता था कि ये जगह कौनसी नहीं थी। ये घर,बाज़ार, टाउन हाल, होटल,समारोह-स्थल,मंदिर या ऐसा कुछ नहीं था। ये किसी फिल्म का सेट भी नहीं था। देखने वालों को इससे मतलब नहीं था कि ये कहाँ हो रहा था। वो अपना भूगोल खुद बनाती थी। और यूँ ये कहीं भी हो सकता था।

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आरोप है कि स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति जैसी धारणाओं की देशी जड़ें नहीं हैं और इसका यहाँ के अतीत, सभ्यता और संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों का भी इस ‘मुक्ति’ से
कोई सरोकार नहीं है। इसे मान भी लें तो क्या अगर कोई विचारधारा अपने मुल्क में नहीं जन्मी तो उसे नहीं अपनाना चाहिए? लोकतंत्र सरीखी धरणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन धरणाओं को त्याग देना चाहिए? ये और ऐसे कई सवाल उठा रहा है राजीव के लेख का तीसरा और आखिरी हिस्सा।
जब भी स्त्री-मुक्ति की चर्चा होती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के
अलमबरदार इसे खतरे के तौर पर प्रचारित करते हैं। ऐसे लोग यह फैलाते हैं
कि मुक्ति की आवाज उठाने वाली ये औरतें पुरुषों से नफरत करने वाली,
परिवार तोड़ने वाली, ब्रा जलाने वाली, परकटी समुदाय की हैं। इनकी कोई देशी
जमीन नहीं है। अव्वल तो यह है कि स्त्री-मुक्ति का सपना देखने वाली या इस
दिशा में चिंतन-मन्थन करने वाली औरतों की कोई एक धारा नहीं है न ही
स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी कोई एक अवधारणा। हर बड़े मकसद की तरह इसमें भी
तरह-तरह की वैचारिक सरणियों में यकीन रखने वाले लोग सक्रिय हैं। किसी भी
अस्मितावादी, मुक्तिकामी समूह का अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के
प्रति नफरत पैदा कर अपनी अस्मिता की तरफ ध्यान खींचने और इस ‘अन्य’ के
बरअक्स ‘अपने’ लोगों को एकजुट करना आसान होता है।

चाँद की परते
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चाँद की परतें उकेलता रहा
और उसकी सारी गिरहें खोलकर…
पानी में बहता था,
तो उससे पूंछा भी
ये कैसे चलता है आसमां की सड़कों पर
कभी आधा कभी पूरा
तो कभी गुल हो जाता है
बूंदों के आईने बनाए
और उन एक-एक में चाँद बैठाकर
बहा दी सारी पानी में
अब दस-दस चाँद हैं मेरे पास
अदल-बदल के रोज
अब सारों को चखा करता हूं!!!
हमारी व्यवस्था जिन्हें इडियट्स कहती है

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समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते हैं किसी का अर्थविस्तार तो किसी का अर्थसंकोच। आज कोई जब बुद्धिजीवी बोलता है तो एक ऐसी छवि बनती है जिसमें पर्याप्त जटिलता, कुटिलता तथा बने बनाए रास्तों पर चलने वाले मुसाफिर जैसे गुण हों। वहीं इडियट का अर्थविस्तार हो गया है। दरअसल यह अर्थविस्तार आश्चर्यचकित नहीं करता है क्योंकि हमारी व्यवस्था कुछ निर्धारित मानदंडो के आधार पर ही लोंगो को इडियट घोषित करती है। लेकिन ये मानदंड कितने विवेकशील हैं महत्वपूर्ण बात यह है।
जिसे हम इडियट कहते हैं उसमें एक किस्म का पागलपन होता है, चीजों को खारिज करने का माद्दा होता है। जिसे हम पागलपन कह रहे हैं वही व्यक्ति को रचनात्मक बनाता है और खारिज करने का माद्दा, मौलिक । यह रचनात्मकता और मौलिकता स्थापित मानदंडो को चुनौती देती है जिसे लोग डाइजेस्ट करने में असहज महसूस करते हैं। लोगों को लगता है कि यह बहक गया है और तमाम तरह की चाबुकें लगायी जाने लगती हैं। उत्तर आधुनिक विचारधारा इसी चाबुक को खारिज करती है और पागलपन को पर्याप्त स्पेस देती है, पनपने के लिए।

ए जिंदगी गले लगा ले

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सौरभ द्विवेदी

कुछ जिंदगी के लिए ही है। ऑफिस का कॉम्पिटिशन, सुबह की जॉगिंग, थिएटर में पॉपकॉर्न टटोलती उंगलियां या फिर सोने के पहले सोचने जैसा कुछ, यही सब मिलकर बनाता है जिंदगी को। हमें इस जिंदगी से तमाम शिकायतें हैं, मगर उन शिकायतों की पूंछ में लिपटी आती हैं तमाम उम्मीदें और उन्हें पूरा करने के लिए जोश।
हमारे मकसद में एक तपिश है, जो मुश्किलों के पहाड़ को धीरे-धीरे ही सही, पिघलाने का माद्दा रखती है, बशर्ते हम ठंडे न पड़ जाएं। इसलिए जिस कोने में कभी आपकी सेहत, तो कभी आपकी जेब को बचाए रखने और बेहतर करने के नुस्खे सुझाए जाते हैं, उस पर हमने इस बार जिंदगी की हरारत से जुडे़ कुछ ख्यालों को जगह दी है। वजह सिर्फ इतनी कि जिंदगी को बांहों में भींचने के लिए हमें भी तो कुछ करना होगा। तो नए साल से पहले जिंदगी को नई नजर से निहारने की कोशिश

इससे तो बेहतर है
अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी
किताबों में घुसा लिया जाए सिर
एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं
पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये
टके में जो साथ हो ले
ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें
गुलमोहर के ठूँठ के नीचे
या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर
तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है
और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।

बैले दे जूं” देखकर पियर के लिखी गयी महेन की कविता

अतीत के दो पन्ने ……
आप ब्लोगों में कुछ तलाशते है या महज़ इसे खुद के उलीचने का माध्यम मात्र मानते है …तो क्या है ब्लॉग ?बौद्धिक ऐयाशी का एक बाय प्रोडक्ट्स ..याभारी भाषा में कहे तो वैचारिक प्रवाह का एक ठिया ……यक्ष प्रश्न है…सच कहूँ ब्लोगिंग गर खुद को उलीचना कहते है …तो कुछ समय बाद हम खुद को उलीचना भूल …..पढने वाले क्या सोचेगे सोचकर लिखते है …पर कौन कितना ओर कैसे उलीचे …कंप्यूटर का जमाना आने वाली नस्लों को इतना कुछ मेटीरियल दे देगा के निजता ओर उसके अधिकार पर लम्बी बहसे होगी …ओर करेक्टर सरटीविकेट पर फेस बुक देख कर मोहर लगेगी….. पर ..क्या है असल ब्लोगिंग ?हरेक के पास जुदा उत्तर है

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आज जिन दो पन्नो को उठाया है .दोनों का मिजाज़ अलग है ….शायद हर लिखने वाले का एक जायका होता है ….जोशिम की भाषा चौंध भरी नहीं है जिसे अद्दितीय कह कर उससे एक सम्मानित दूरी बन ली जाए …उसमे एक अजीब सा मिश्रण है ..तात्कालिक भावुकता भी है ओर मूड को पकडती कलम भी….एक बानगी देखिये

पिछली कलम की सियाही बहुत धुंधली है और इस कीबोर्ड की चमक तेज है। फिर भी मैं अपने भरम का मालिक, समझता हूँ, कि कभी कभी जो नहीं है उसकी सोच का लुत्फ़ है तो सही। माने रोज़ के बही – खाते से तंग दिमाग को कहीं सैर पर ले जा कर बहलाना फुसलाना वगैरह वहैरह। बशर्ते नए – पुराने की बहस अपने आप से चालू न की जाये। दिमाग का बायाँ हिस्सा पुराने की वकालत करे और दायां हिस्सा नए की और आपका मुँह बगैर बोले होंठ हिलाये और बीवी परेशान हो जाये कि पतिदेव का स्वलाप किसी अंदरूनी नए ज़माने की दीमागी बीमारी का इशारा तो नहीं ।
हज़ार बार कोशिश करे कि ऐसा न हो फिर भी होता है – मानो न मानो अपने आपसे वाद विवाद का गुल्ली डंडा अकेले बैठके खेलने का खेल तो है वैसे ही जैसे अपने भरम की गरमी को समेटे जिलाये रखना । और फ़िर पूछना अपने आपसे सवाल – एक नहीं अनेक – और शुरू करना सम वेदना से विषम वेदना के बीच अंगुली से बटन दबाना –

कह दे माँ क्या देखूं ?
केंचुल उतरने का समय है क्या ?
एक सांस के पीछे की सांस में कितना स्टेमिना बचा है ?
दुनिया गोल ही है न ?
क्या वहां भी बुलडोज़र चलने शुरू हो गए होंगे ?
कौन कहता है कि यहाँ सड़कें तेज भागती हैं ( उम्र भी ?)
सच्ची कि पुराने शहर के इतिहास का एक छोर पुनः प्रगति को समर्पित होने के लिए आतुर है ?
क्या किसी और के पास भी उन यादों का पलस्तर रुका है ?
भ्रम मेरी कमजोरी है या आदत ?
डर मेरी मज़बूरी है या नशा ?
खाकी, नीला , हरा या नारंगी ?
ताक़त, शोहरत या सुकून ? (सच में क्या ? )
खिचडी में रंग कौनसा ?
भूख की कितनी उमर?
किसका कितना मोतियाबिंद ? और… और … और .. ??

पहला पहले भ्रम के नाम, दूसरा डर के लिए, तीसरा अगले सोच की आनेवाली आज़ादी को और चौथा उन सभी को जो मेरी संवेदनाओं से थोडे़से जुड़ते हैं – स्वागत

वैचारिक यात्रा के कई पड़ाव भी…..जो असमय समय रुक कर सांस लेते है ओर जैसे ठिठका देते है मन को…..अटपटे कपाट एक ऐसी ही रचना है .ज्सिके कई आयाम है कई छोर है … कही से भीतर जा सकते है ……

न दिनों….
उम्मीद की परिधियों पर चहचहे ,
कागजों के गुड़मुड़ाऐ गोले, सबूत थे गवाह रहे,
उथली ही सही, किसी को, कहीं से, कुछ तो, परवाह कहे,
रेल की पटरियों सा, साथ साथ चलने से,
क्या बेहतर है उन का, एक साथ मिलने से?
मैं क्यों नहीं समझ पाता तुम्हें पूरा? यह समझ पाने की अधूरी कला,
मैं निमित्त था या था देश, काल, प्रबल के प्रवाह में छिना छला?
इन सारे सवालों के महकमे, इफ़रात के दिन रात उकसाएंगे,
धुएँ दुमछ्ल्लों में उछलेंगे, और प्रदूषण में खो जायेंगे,
अगली आबादी में कवायद लगाएंगे, आरामकुर्सी पर थके पैर,
फूटेंगे प्रारम्भ भी संयम की परिणिति में बन कच्चे आम और मीठे बेर,
कहीं न कहीं नए बाँकुरे फिर ज़रूर फूल जाएंगे।
तब भी सीटियाँ गुहार मारेंगी इस मंच को, जब पटकथा में बहुरूपिये सूत्रधार ही रह जाएँगे
….. इन दिनों …..
सच और अपच के दरमियाने में
आलस, आस्था, अचरज और आक्रोश के चूमने चबाने में
नए सुख/नए ग़म और पुराने आनंद के युगल गीत गाने में
समय समाप्त है इस समय, इस कविता को पढने पढ़ाने का,
शायद नहीं, नहीं शायद, इस कविता के उखड़ने उखड़ जाने का ?
….. उन दिनों….. ?
….. इन दिनों …..?

दूसरा पन्ना
हिंदी ब्लोगिंग में गर किस्सागोई की कोई खान है तो वे है लपू झुन्ना पर उनको समेटने के लिए पूरे एक चिट्ठाचर्चा की जरुरत होगी ……आज किन्हीओर सज्जन का जिक्र है…..मुझे नहीं मालूम इ स्वामी कौन है …उनका असल नाम क्या है ….उलीचना कैसे कैसे गर शीर्षक हो तो …. कई लोग ऐसे उलीचते है के उनकी किस्सागोई दूर देश में कंप्यूटर खंगालते किसी भी शख्स के चेहरे पर मुस्कान ले आती है …..बरस भर पहले यही विचार आया था के किसी पोस्ट की उम्र २४ घंटे ही क्यों रहती है .अग्रीगेटर के ओक्सीज़न डिलीवरी पाइप सहारे टिकी हुई … इ स्वामी कुछ ऐसा ही लिखते है ..के उनकी हिम्मत पर दाद देने को जी आता है ……दिलचस्प बात ये है के उनके एक कोलेज रीयूनियन के बोल्ड लेख को ढूंढते हुए मैंने सर्च मारी तो ..वो तो नहीं मिला पर बाकी बहुत कुछ मिला मसलन……बानगी देखिये.
एक देसी.एक बियर.एक किस्सा में देखिये
मैं बैठा कुछ देर तक प्रथम श्रेणी सीट की आरामदायक चौडाई महसूस करता रहा. “मैं इस आराम से अनुकूलित हो सकता हूं!” मैंनें सोचा.
मेरी मां ने एकबार पूछा था – “तू शराब पीता है?” ”धरती पर आम तौर पे छूता नहीं और आसमान में आम तौर पे छोडता नहीं” ..ये जवाव सुन कर मां मुस्कुराईं तो नहीं, पर वो निश्चिंत हो गईं थीं!

जब २२ घंटे की उडान के बाद मुझसे मिलने पहली बार भारत से यहां आईं तो बोलीं ‘इतनी लंबी और पकाऊ फ़्लाईट में तो कोई भी पीने लगे.. सारे पीने वाले जल्दी ही खर्राटे लेने लगे थे!’
हजारों मील हवाई धक्के खा चुकने के बाद, एयरलाईन्स वालों नें आज वफ़ादारी का सिला दिया, कोच श्रेणी में यात्रा करने वाले को मुफ़्त का प्रथम श्रेणी उच्चत्व प्राप्त हुआ था.. आम तौर पर सूफ़ी में रहने वाले नाचीज़ का फ़ील गुड एक ग्लास बीयर पी लेने के बाद और भी सेट होने लगा .. ये चिट्ठा लिखने के लिये आदर्श समय था.

वो बोली इट्स ओके ………में वे
मनोहर श्याम जोशी तर्ज पर कुछ कह देते है …..
मसलन ….

”मुझे तुम पुरुषों पर कई बार तरस आता है.. आम तौर पर तो हमारा मुस्कुराना भर काफ़ी है, अगर हम किसी पुरुष को कोई निवेदन करते हुए जरा आत्मियता से कंधे पर थपथपा दें; ना भी चाह रहे हों, तब भी वो हमारा काम कर देते हैं. पर तुम लोग स्त्रीयों को अक्सर ऐसा वाला व्यक्तिगत स्पर्श नहीं दे सकते!”
“अरे यहां तो मुस्कुराने पर भी खलनायक हो चुकने का आभास दिया जाता है!”
वो हंसने लगी – “यस वी हैव द पावर..लेकिन पता है एक बार मैं एक ऐसे ग्रुप में फ़ंस गई थी जहां पर मैं अकेली महिला थी और समूह के पुरुष मुझे अपनी गैंग में स्वीकारने को तैयार ही नहीं थे, ये कंधा थपथपाने वाली आत्मीय स्पर्श भी तब काम नहीं किया! ”
“फ़िर क्या किया तुमनें?”
“मैनें अपने ब्वायफ़्रैंड से बात की और उसने एक लाजवाब ट्रिक बताई!”
“क्या?”
“जब मैं अपने समूह के मर्दों के साथ एक बडी टेबल पर बैठी काम कर रही थी और मुझे हवा सरकानी थी, मैंने बडे आत्मविश्वास से एक ओर झुक कर पूरे जोरदार ध्वन्यात्मक तरीके से काम सरेआम संपन्न किया.. सारे मर्द पहले तो चौंके और फ़िर क्या हंसे!.. गैंग ने तुरंत काम खत्म होने के बाद मुझे अपने साथ खाने पर आने की दावत दे दी!.. तुम पुरुष लोग कितने जंगली और ज़ाहिल होते हो – तुम्हारा बाण्डिंग का तरीका है ये?!”
“ये है खूबसूरत होने का फ़ायदा..अरे ये सोचो की हम कितने फ़रागदिल होते हैं!.. यही काम कोई पुरुष किसी महिलाओं के समूह में कर दे तो बेचारे का क्या हाल हो!”
“देखो डबल स्टैंडर्डज़ तो दोनो तरफ़ हैं!”

रंग डालूं एक लेंड्स स्केप -कलेजे में धुआँ-धुआँ सर्दियों का अलाव
पलकों में चौथ का चाँद हो
जी में हो कोहरे से नहायी काची- काची धूप
हवा में, उड़ती-बिखरती मार्च की मदमाती महीन गंध ..
गले में हों सोहनी के उनींदे सुर
तबीयत ज़रा-ज़रा गिलहरी सी
मन में जलते-बुझते मोरपंख रहें
होंठों पर व्याकुल हो मौन
और
कानों में पहरों बाद एक अदद तुम्हारी-हम्म
इतना…बस इतना..
जो सिमट आए किसी रोज़ मेरे अंतस
तो रंग डालूँ एक लैंडस्केप
खाली कैनवास पर
मै भी ……

चलते चलते बकलमखुद से चंद्रभूषण जी का ब्यान

imageशुरू में दो-तीन महीने शहर की एक गरीब बस्ती राजापुर में आधार बढ़ाने के इरादे से संगठन द्वारा शुरू किए गए एक स्कूल में पढ़ाया लेकिन जनवरी 1985 में हिंदू हॉस्टल के सामने एक चक्काजाम के दौरान हुई गिरफ्तारी ने यह सिलसिला तोड़ दिया। बमुश्किल हफ्ता भर जेल में रहना हुआ, लेकिन इतने ही समय में नजरिया बहुत बदल गया। क्रांति अब अपने लिए कोई अकादमिक कसरत नहीं रही। बाहर निकल कर लोगों के बीच काम करना जरूरी लगने लगा। इस दौरान संगठन की एक साथी से इनफेचुएशन जैसा भी कुछ हुआ लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि गाड़ी गलत पटरी पर जा रही है। आघात बहुत गहरा था। तीन दिन तेज बुखार में डूबा रहा। फिर मन पर कुछ गहरी खरोचें और हमेशा खोजते रहने के लिए एक अनजाना रहस्यलोक छोड़ कर वह समय कहीं और चला गया। उसका एक ठोस हासिल अलबत्ता रह गया कि छह-सात महीने पहले लोहियाहेड में किसी बौद्धिक कसरत की तरह दिमाग में फूटा कविता का अंखुआ मन के भीतर अपने लिए उपजाऊ जमीन पा गया। लगा कि हर बात बाहर बताने के लिए नहीं होती। कुछ को हमेशा के लिए सहेज कर रखना भी जरूरी होता है। कविता के मायने मेरे लिए आज भी यही हैं।

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attractive,having a good smile
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बौद्धिक ऐयाशी के बाय प्रोडक्ट्स ?ओर फ्लेश्बेक से दो पन्ने को 20 उत्तर

  1. सागर कहते हैं:

    इस्स्स्स… ! शायद सबसे पहले कमेन्ट कर रहा हूँ इसलिए नहीं की लिंक मेरा भी है… इसलिए की पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग्गिंग से दूर हूँ… और मन में यह चलता रहता था की पता नहीं पढने में क्या चूक हो गयी होगी इन दिनों… किन्तु अब शांति है और फक्र है डॉ. अनुराग पर… इनकी चर्चा लम्बी जरूर होती है लेकिन सरे छांटे हुए लिंक यह ले आये हैं… आज बहुत दिनों बाद अनामदास का ब्लॉग भी अपडेट देख रहा हूँ… अब विनती सिर्फ इतनी है की दूसरी चिठ्ठाचर्चा जल्दी न की जाये… अभी यही काफी है… शुक्रिया डॉ. अनुराग…

  2. सागर कहते हैं:

    महेन जी की कविता की पंग्तियाँ लगभग याद रह जाने वाली होती हैं… और चबा कर कही गयी बात होती है… उनके शब्द भी बड़े कंजूसी से कविता में आते हैं… बैले दे जू का जिक्र दूसरी बार किया गया है यह बेव्लोग पर भी पढ़ी… औ लगभग याद है… गौरव की एक कविता "तुम्हारी वो सहेली कहती है" याद आई… इससे बाद की उनकी दुस्ती कविता "दूसरा प्यार" भी उतना ही प्रासंगिक है… अब अबकी "शराबी की सूक्तियों " पर आधारित लेटेस्ट कविता….. हैरानी यह है की यह तना लोकप्रिय क्यों नहीं है…

  3. Mired Mirage कहते हैं:

    बहुत चुनचुनकर चिट्ठे लाए हैं। कुछ नहीं पढ़े थे सो अब पढ़े।घुघूती बासूती

  4. अनिल कान्त : कहते हैं:

    डॉक्टर साहब अच्छे अच्छे लिंक देने की भरपूर कोशिश करते हैं

  5. sidheshwer कहते हैं:

    बहुत बढ़िया और उम्दा चर्चा

  6. शनादार चर्चा, जानदार लिंक्स.

  7. Vidhu कहते हैं:

    जी शुक्रिया ,तहे दिल से …कुमार अम्बुज जी को पढना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता रहा है ….दूसरी कई नई लिंक देकर आपने उपकार ही किया है …अमिताभ का मतलब …लेख सटीक है लेखक से में सहमत भी हूँ और साधुवाद देती हूँ ..नीरा जी को और अन्य को पढ़ना अभी शेष है ..

  8. शरद कोकास कहते हैं:

    यह यात्रा बढिया रही । बधाई

  9. शीर्षक देख कर ही लगा ये डॉ० अनुराग की चर्चा होगी और आई तो वही था….!!मंथन का सार्थक माखन मिल गया इस बार भी… सब कुछ पठनीय और अवश्य पठनीय….!!!

  10. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    इतने सारे धांसू लिंक जुगाड़ के धर दिये चिट्ठाचर्चा में। जय हो। सुन्दर।

  11. वाह गजब…!छोटी चर्चाओं की कमी आज पूरी हो गई!बढ़िया चर्चा!

  12. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    अच्छा लगा,लपूझन्ना और ई-स्वामी को यहाँ देख कर खुशी हुई,न जाने चर्चाकार इनसे परहेज करने की कोशिश क्यों करते रहे हैं ?आजकल ब्लॉगिंग से दूर हूँ, पिछले दो दिनों की चर्चा छूट रही थी ।आज अभी जल्दबाजी में पढ़ा, जबकि क्लिनिक की देर हो रही है.. .. कुछ दूसरे चर्चाकारों की तरह ठेलने के बाद क्या एक फोन भी नहीं मार सकते थे ? शाम को दुबारा बाँचना पड़ेगा ! यह भी अच्छा लगा ।

  13. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    यहाँ भी एप्रूवल का लटका देख कर लग रहा है, इस मँच के दरवाज़े भी मेरे लिये बन्द हो रहे हैं, इति !

  14. बहुत से लिंक इस में पढ़े थे पर फिर भी कुछ छुट गए थे इस बेहतरीन बौद्धिक चर्चा का शुक्रिया

  15. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    हम तो "उस जानिब" से कुछ और की अपेक्षा में थे…लेकिन एक शानदार संकलन बना है।ई छोटा बक्सा-बक्सा सब कैसे बना लेते हैं एके पोस्ट में?

  16. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    @मेजर …विंडो लाइव राइटर से लिखी है …उस जानिब की तरह की एक सोच तो है…बस फुरसत की दरकार है पर जोशिम को पढ़कर लगा इसे बांटना चाहिए …यूँ भी हिंदी ब्लॉग में कोई भी पोस्ट चौबीस घंटे ही सांस लेती है …….ऊपर इरोम शर्मीला की तस्वीर तहलका मैगजीन से बिना शुक्रिया कहे ली है……

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