तुलसी और दुर्वासा इतने भौंडे तो नहीं थे

ब्लॉग पर कविता लिखना कितना आसान है उसका एक उदाहरण देखिये. स्वनामधन्य महाकवि श्री अलबेला खत्री ने एक कविता लिखी है. कविता का शीर्षक है; “लोग माथा पीट रहे हैं और तुम लिंग पकड़ कर बैठी हो.

शीर्षक पढ़ लिया? अब कविता का कंटेंट पढ़िए;

कहीं स्वाइन फ्लू जैसा रोग है
कहीं आँगन में पसरा सोग है

कहीं ठण्ड के मारे हड्डियाँ चटक रही हैं
कहीं भूखी बुढ़िया भिक्षा को भटक रही है

लेकिन तुम्हें दिखाई नहीं देता
रुदन किसी का सुनाई नहीं देता

इसीलिए
शायद इसीलिए इतना ऐंठी हो
लोग माथा पीट रहे हैं
और तुम लिंग पकड़ कर बैठी हो

तुम्हारे दिल में ज़रा भी दर्द नहीं है
लगता है
तुम्हारी ज़िंदगी में कोई मर्द नहीं है

वरना ऐसे फालतू काम नहीं करती
भले लोगों को बदनाम नहीं करती

क्योंकि देह जिसकी असंतुष्ट होती है
सारी दुनियाँ उसके लिए दुष्ट होती है

न तो कोई ढंग का काम कर पाती है
न वह आराम से आराम कर पाती है

देखो ज़रा….
जग हर्ष मन रहा है
नव वर्ष मना रहा है
और तुम?
हाँ हाँ तुम!
अपने आपको
भाषा की जंजीरों में जकड कर बैठी हो
दुनियाँ चाँद पर पहुँच गयी
और तुम यहाँ लिंग पकड़ कर बैठी हो

लिंग ही पकड़ना था तो
किसी ज्योतिर्लिंग को पकड़ती
काशी में शिवलिंग को पकड़ती
मेवाड़ में एकलिंग को पकड़ती
तुम भी तर जाती
तुम्हारा कुनबा भी तर जाता
जहर जीतता भरा है
तुम्हारे भीतर’ वह मर जाता

लेकिन तुम्हारे ऐसे सौभाग्य कहाँ?
सूर्पनखा के भाग्य में वैराग्य कहाँ?
उसे तो नाक कटनी है
और लुटिया डुबानी है
हे आधुनिक सूर्पनखा!
पुल्लिंग और स्त्रीलिंग में क्या सार है?
मेरी आँख से देख इसके अलावा भी संसार है
मगर तुम जिद्दी प्राणी हो’ सच पहचानोगी नहीं
अपने घमंड के आगे किसी को मानोगी नहीं

इसलिए
ऐंठी रहो!
ऐंठी रहो
ऐंठी रहो
हम तो अपने काम में लग रहे हैं
तुम लिंग पकड़कर
बैठी रहो!
बैठी रहो!
बैठी रहो!

महाकवि की इस कालजयी कविता पर रामचरित मानस तथा भगवद गीता के जानकार और देवभाषा के पक्षधर श्री अरविन्द मिश्र की टिप्पणी पढ़िए;

जबर्दस्त- कवि अपने पर उतरता है तो दुर्वासा भी बनता है और तुलसी भी.
नववर्ष की मंगल शुभकामनाएं

आदरणीय राज भाटिया जी की टिप्पणी पढ़कर लगा जैसे वे भी ऐसा कुछ कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए. पता नहीं क्या मजबूरी थी? उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;

अलबेला भाई जीयो खूब जीयो, बहुत सुन्दर और सटीक कविता कही, जो बात हम सब नहीं कह पाए वो आपने कह दी, हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा……

इस कालजयी कविता का सन्दर्भ अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट है. जहाँ आयी टिप्पणियां भी महाकवि अलबेला खत्री जी की कविता से जरा भी कमतर नहीं हैं.

आप में से कुछ कह सकते हैं कि केवल एक पोस्ट को इतना महत्व देने की क्या ज़रुरत है? या फिर यह कि मुझे चिट्ठाचर्चा जैसे मंच इस्तेमाल कर किसी के खिलाफ लिखना शोभा नहीं देता.

मेरा कहना है;

ब्लॉग जगत को ख़राब किया जा रहा है.
ब्लॉग जगत में गुटबाजी हो रही है.
ब्लॉग जगत से गंध आ रही है.
कुछ लोगों ने ब्लॉग जगत को बर्बाद करने का बीड़ा उठा लिया है.

या इसी तरह की और बातें कहने वाले लोग खुद क्या कर रहे हैं? ब्लॉगर का स्त्रीलिंग क्या होना चाहिए? क्या महिला ब्लॉगर को ब्लागरा कहा जा सकता है? ऐसी बातों को आधार बनाकर दस लाइन की पोस्ट लिखकर तथाकथित बहस चलाकर ब्लॉग जगत का क्या भला किया जा रहा है? कितना भला किया जा रहा है? कहने की ज़रुरत नहीं कि रचना जी की टिप्पणियों और उनकी पोस्ट को आधार बनाकर कुछ लिखना और उसपर तथाकथित बहस करवाना किस तरह की ब्लागिंग है?

मैं और मेरे जैसे तमाम लोग यह मानते हैं कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का माध्यम है. जो चाहे लिख सकते हैं. लेकिन क्या ऐसा कुछ लिखा जाना चाहिए जैसा परम आदरणीय अलबेला खत्री जी ने लिखा है? भौंडेपन की कोई लिमिट है कि नहीं? पाकिस्तानी हास्यास्पद रस के कलाकारों के साथ टेलीविजन पर तथाकथित लाफ्टर के फटके मारते-मारते इतना गिर जायेंगे कि ब्लॉग पर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करेंगे? और टिप्पणी करने वाले बुद्धिजीवी उन्हें तुलसी और दुर्वासा बता रहे हैं.

कौन सी बहस महत्वपूर्ण है? यह कि “महिला ब्लॉगर को ब्लागरा कहा जाय?” या फिर यह कि “किसी के खिलाफ इस तरह की कविता लिखी जा सकती या नहीं?”

एक बार सोचियेगा.

मैं आदरणीय अरविन्द जी से और परम आदरणीय अलबेला खत्री जी से कहना चाहता हूँ कि उनके खिलाफ लिखने का या उन्हें केंद्र में रखकर चर्चा करने का मेरा कोई ध्येय नहीं है. बात केवल इसलिए उठाई गई है ताकि चिट्ठाकार यह तय कर सकें कि तथाकथित बहस के लिए कौन सा मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है?

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यह प्रविष्टि शिवकुमार मिश्र में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

45 Responses to तुलसी और दुर्वासा इतने भौंडे तो नहीं थे

  1. महफूज़ अली कहते हैं:

    इस चर्चा से सौ प्रतिशत सहमत…..

  2. Suresh Chiplunkar कहते हैं:

    अलबेला खत्री जी, जब-तब भाषा की मर्यादा तोड़ते नज़र आते हैं… निश्चित रूप से उन पर टीवी का दबाव-प्रभाव है या फ़िर TRP का…। ब्लॉग लिखना एक बात है और इस तरह की भाषा में किसी महिला ब्लॉगर के खिलाफ़ गुटबन्दी करना बेहद अशोभनीय है…। कम से कम मैं तो इस प्रकार की तथाकथित "कविता" का विरोध करता हूं…

  3. अजय कुमार कहते हैं:

    किसी के प्रति विरोध दर्ज करने के लिये अश्लील भाषा का इस्तेमाल कैसी बुद्धिमत्ता है , मेरे समझ से परे है । अलबेला जी का ब्लाग क्या उनके परिजन आदि नही पढ़ते ?औरों की नही तो कम से कम उनका ध्यान रख लेते ।

  4. AlbelaKhatri.com कहते हैं:

    shrimaanji !meri kavita ko kendra bana kar charcha karne ke liye dhnyavad !rahi baat is kavita ki toh i9s kavita me na toh kisi ka naam liya gaya hai aur na hi bhaashaa ki maryaada todi gayi hai na hi arvindji se iska koi sarokaar hai ye ek kavita hai aur kavita kavi ki niji sampatti hai aap aur jahan maine prakaashit kiya hai voh mera apna blog hai, aapko padhna ho padho, nahion padhna ho na padho, aapatti ho toh mere blog par tippani karo, main uska swaagat karunga lekin dobaara ye kahne se pahle das baar sochna ki laughter ke phatke me maine kya kiya hai , vahan bhi aapko mere kam me agar gandgi nazar aati hai toh main aap par sirf daya kar ke moun rah sakta hoon……..zara ab tak ke mere tamaam episod dekhiye aur fir vichaar kijiye ki main kaisa kaam karta hoon….vaise maine kavitaayen aur bhi likhin hain kul 10 blog likh raha hoon ab tak 1500 ke as pas post ho chuki hain apne kitni padhi, ye toh aapki mere baare me jaankaari bata rahi hai raha sawaal trp ka to mere lekhanh ka to prayojan hi yahi hai ki trp badhe, kya burai hai ismen ?mast raho maze karo aaj raat dekhna 10 baje star one par laughter ke phatke me meri aur abhijeet sawant ki jugalbandi…. bahut mazaa aayega navvarsh ki shubhkaamnaaon sahit,albela khatri

  5. स्वप्नदर्शी कहते हैं:

    बेहद अशोभनीय है, अश्लील भाषा का इस्तेमाल.

  6. cmpershad कहते हैं:

    "बात केवल इसलिए उठाई गई है ताकि चिट्ठाकार यह तय कर सकें कि तथाकथित बहस के लिए कौन सा मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है"बहस हो सकती है… पर शालीनता की दरकार है॥ नववर्ष की शुभकामनाएं॥

  7. Amit कहते हैं:

    शिवप्रसद मिश्र के लियेकर फुलेल को आचमन, मीठौ कहत सराहरे गंधी मति अंधि तू, इतर दिखावत काह

  8. बवाल कहते हैं:

    आपने बहुत हद तक वाजिब कहा पंडितजी पर यह क्या ? बाक़ी चिट्ठों की चर्चा ही नहीं की। क्या बाक़ी कोई और ब्लॉग चर्चा के क़ाबिल नहीं ? क्या सब बुरी बुरी बातें ही चलती रहीं, कहीं कोई अच्छी बात नहीं हुई ? सच कहते हैं आप। हम सब मिलकर सन २००९ में अत्यंत क्रोधी ब्लॉगर्स बन गए हैं किसी को कुछ भी कहते रहते हैं और किसी का कुछ बरदाश्त भी नहीं। काश यह सब कुछ सन २०१० में बदल जाए।सब अच्छा हो जाए, सब सुन्दर हो जाए।जय हिंद।

  9. AlbelaKhatri.com कहते हैं:

    aapne sirf apni post ko pathak dilaane ke liye meri poori ki poori kavita uthaakar laga di hai . ho sakta hai isse aapko pathak to bahut mil jaayenge kyonki kavita hai hi aisee..lekin kya aapne meri anumati lee hai kavita ka prayog karne ki ?aapko kya adhikaar hai mmeri kavita ko jyon ka tyon bina izazat ke udaane ki…..ye ek tarah ki chori hai aur chori ke maal se apni dukaan chalaana yadi aapko sahi lagta hai toh ye aapke liye antim avsar hai …bhavishya me ye zaleel harkat mat karna kyonki kavita likhne me kitna zor aur zehan lagta hai iska aapko andaaza nahin hai osho ne bhi kaha hai sabse badi chori hoti hai shrey ki..mehanat kare murga aur andaa khaaye mulla !meri kavita log mere blog par hi padhen toh behtar hai..shaayad kisi ne aapko bataaya nahin ki kavita kavi ki niji sampatti hoti hai chori ka maal bech kar agar saahookaar banna itnaa aasaan hota , toh aapke pahle aur bhi kai ban gaye hote..MERI AAPATTI DARJ KI JAAYE AUR IS KAVITA KO TURANT YAHAN SE DELETE KIYA JAAYE

  10. फिल्मजगत की तरह ब्लॉगजगत में भी दादा कोंडके के लिये स्थान है और गौरवपूर्ण स्थान है। यह अलग बात है कि दादा कोंडके को मैने कभी देखा पढ़ा नहीं, पर उनकी फिल्मों के पोस्टर देख कर पता चल ही गया उनके बारे में। और मेरे विचार से शुचिता की बात इस युग में करना कोई खास मायने नहीं रखता। Nice.

  11. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    परम आदरणीय अलबेला जी, आपकी कविता मैंने आपके नाम से छापी है. कहीं पर यह नहीं लिखा गया है कि कविता मैंने लिखी है या किसी और ने लिखी है. कृपा करके इसे अपनी कविता की चोरी न कहें. यह चोरी तो नहीं है. रही बात उसे चिट्ठाचर्चा से हटाने की तो अब इसपर क्या कहूँ सिवाय इसके कि इसे हटाने के लिए धमकी देना आपकी जिद है. मुझे कानून की जानकारी नहीं है. आजकल जिस तरह से मुक़दमे ठोक देने की धमकी का फैशन हो गया है, शायद हो सकता है यहाँ भी कोई मामला बनता हो. लेकिन आपसे यही कहूँगा कि आपकी यह कविता जिस सन्दर्भ में यहाँ दी गई है, उसे स्वीकार करने की कोशिश कीजिये. ब्लॉग एक सार्वजनिक मंच है. हमें कम से कम इस्तेमाल किये जाने वाले शब्दों और उससे बनने वाले वाक्यों का ध्यान तो रखना पड़ेगा.एक बार फिर से समझिये. उसके बाद भी अगर आप कहेंगे तो शायद मुझे आपकी कविता इस मंच से हटानी ही पड़ेगी.निस्संदेह कविता आपकी है और इस बारे में शायद आपका फैसला ही अंतिम होगा.

  12. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    समीक्षा के लिए कविता यहाँ रख देना कोई गैर कानूनी है. जिसे कार्यवाही करनी हो करे. कविता (????) निहायत भौंडापन लिये है. अश्लील है. निंदा करता हूँ. किसी के विचारों से हम सहमत – असहमत हो सकते है, मगर बात कहने की एक मर्यादा होती है. महिला से बात करते समय तो खास ध्यान रखा जाता है. शैल चतुर्वैदी जैसों को हास्य कवि कह सकते है, बाकि तो सब ….

  13. टिप्पणी अगर असभ्य भाषा में हो तो हटा ली जायेगी लेकिन अगर कृति ही असभ्य भाषा में में हो तो हम वाह वाह ही करेंगे न. कवी सम्माननीय होता है लेकिन हर एक की एक मर्यादा होती है. साहित्य की, व्यक्तित्व की और लेखन की. सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल की जा सकती है लेकिन इसको रचनाधर्मिता से हीन और फूहड़ ही कहा जाएगा. अगर सवाल इस बात का है की फिर पढ़ा ही क्यों? इससे पहले ये भी पूछा जा सकता है की लिखा पढने के लिए जाता है , पर ऐसा लेखन की जिसको पढ़कर वितृष्णा हो कुछ ही लोगों की ही पसंद हो सकती है. ऐसे लेखन की मैं निंदा करती हूँ.

  14. उम्दा सोच कहते हैं:

    अलबेला जी के लेख की भाषा पर आपत्ति दर्ज करता हूँ , उनका ये अशोभनीय लेख पढ़ कर शर्म आती है ! अलबेला जी और आप दोनों से निवेदन है इसे तत्काल कूड़ेदान में डाल दे! लेख मर्दाना न होकर नपुंसकता का द्योतक है !

  15. chilkaur कहते हैं:

    दो टके का यह लफंगा मंचीय तुक्कड़ (कृपया इस तुक्कड़ को कवि न कहें) बेहद घिनौनी चीजें ब्लाग जगत में ला रहा है. ऐसे तुक्कड़ों को वही हाथ में दीजिए जो वह दूसरे के हाथों में देख रहा है.

  16. pratibha कहते हैं:

    @ अलबेलाजी निजी का मतलब होता है किसी बात को स्वयं तक सीमित रखना… जब आप कथ्य को लोगों के साथ शेयर करने की अभिलाषा रखते हैं, तो भाषा भी मर्यादित रखिए। इस तरह की बेहूदी कविता लिखकर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं??? संजयजी की इस बात से मैं सहमत हूं कि किसी के विचारों से हम सहमत – असहमत हो सकते है, मगर बात कहने की एक मर्यादा होती है। महिला से बात करते समय तो खास ध्यान रखा जाता है। इस कविता को कूड़ेदान में ही जाना चाहिए…।

  17. Mithilesh dubey कहते हैं:

    अलबेला जी ने कुछ भी गलत नहीं कहा है , आप फालतु और बेमतलब का बवाल करवा रहे है । ऐसा कोई व्यक्ति तभी लिख सकता है या कह सकता है जब वह उब जाता है , और यहाँ अलबेला जी नें यही किया । अलबेला जी से पूर्णतया सहमत हूँ ।

  18. अवधिया चाचा कहते हैं:

    हमने कल इस कविता का आनन्‍द लिया था, आज फिर आपके सौजन्‍य से हम फिर से आनन्दित हुए, पिछली बार ऐसे ही ब्‍लागरस ने आपत्तियां दरज की थीं तो श्री अलबेला जी ने 'बहन चो' नामक कविता लिखी थी, इस लिए अबकी बार में इस कविता की तारीफ करता हूं, अलबेला जी ध्‍यान दें सभी के स्‍वागत में कोई कविता दे रहे हों तो अवधिया के सम्‍मान का खयाल रखें, चलते चलतेःआज हमें अर्थात अवधिया जी को 'धान के देश में' पर साईस ब्‍लागरस की तरफ से सम्‍मान मिला है, हमें मुबारकबाद से नवाजेंनोटः 'धान के देश मी' को सम्‍मान नहीं मिला, आप भ्रमित न हों

  19. Mithilesh dubey कहते हैं:

    अलबेला जी ने कुछ भी गलत नहीं कहा है , आप फालतु और बेमतलब का बवाल करवा रहे है । ऐसा कोई व्यक्ति तभी लिख सकता है या कह सकता है जब वह उब जाता है , और यहाँ अलबेला जी नें यही किया । अलबेला जी से पूर्णतया सहमत हूँ ।

  20. blogvakil कहते हैं:

    रचना का कोई ऐसा कमेन्ट दिखाया जाए जहा उसने किसी के वस्त्रो , किसी के काम करने के तरीके , किसी के विवाहित अविवाहित होने पर कोई टिप्पणी कि हो । उसका मुद्दा अपना हैं और उसके कमेन्ट भी उन्ही ब्लॉग पर होते हैं जहां उसके मुद्दे पर बात होती हैं । डॉ अरविन्द के ब्लॉग पर जो कमेन्ट आये हैं उन मे रचना के व्यक्तिगत जीवन के ऊपर लिखा गया हैं और वो सब "सेक्सुअल हरासमेंट " मे ही आता हैं ।ब्लॉग मे क्या लिखना हैं और क्यूँ लिखना हैं और उस पर क्या आपति दर्ज होनी हैं तो समझ आता हैं पर व्यक्तिगत जीवन शैली को लांछित कर के क्या साबित किया जा रहा हैंऔर फिर रचना अगर अपने ब्लॉग को बाई लिंगुअल करती हैं तो इस पर परम आदरनिये डॉ अरविन्द को क्या अपती हैं , कोई इंग्लिश मे लिखे या हिंदी मे क्या फरक पड़ता हैं , उसका ब्लॉग वो जाने आप मत पढोशिव मिश्र जी इस कविता को यहाँ से हटा ही दो लिंक दो ऐसा वाहियात लेखन उसी ब्लॉग पर रहने दो ।

  21. यह तो घटिया सोच की पराकाष्ठा है। अलबेला जी की म्लेच्छ कविता और टिप्पणी में उनका मूर्खतापूर्ण कॉपीराइट का दावा दोनो जुगुप्सा पैदा करते है। अरविन्द जी की पोस्ट से इसका कोई सम्बन्ध न होना बता कर वे क्या साबित करना चाहते हैं। यह कि सभी ब्लॉग पढ़ने और लिखने वाले मूर्ख हैं? यदि उनकी कविता रचना सिंह को संबोधित नहीं है तो वे क्यों नहीं बताते कि ऐसे पवित्र शब्द उन्होंने किसको समर्पित किए हैं। अपने किसी परिवारी जन को या किसी खास दोस्त को या यूँ ही किसी आम महिला को। ऐसी स्थिति में भी उनका अश्लील गायन पवित्र भजन की श्रेणी में नहीं आ जाएगा।ऐसी बकवास और भद्दी रचना करने वाले भी टीआरपी का जुगाड़ कर लेते हैं यही संचार माध्यमों की विकट विडम्बना है। थू…।रचना जी की किसी टिप्पणी से अरविन्द जी आहत हुए। इसका उन्होंने अपने तरीके से प्रतिकार किया। उनका पक्ष मजबूत था इसलिए लोगों ने उसका समर्थन भी किया। लेकिन जिस भाषा और शैली के लिए रचना जी की कथित आलोचना हो रही थी उससे भी खराब और गलीज भाषा का प्रयोग करके इन टिप्पणीकारों ने स्वयंको नीचे गिरा लिया। अरविन्द जी ने यह सब शुरू तो करा दिया लेकिन बोतल से बाहर आने पर यह विषधर जिन्न अनियन्त्रित और आत्मघाती हो चला है। अनेक लोगों ने एक मरे हुए विषय को बार-बार जिन्दा करना शुरू किया। मुर्दे को बार-बार पीटने का यह क्रम अब इस चरण तक आ पहुँचा है कि ऐसे कुकवि भी अपनी रोटी सेंक रहे हैं। अरविन्द जी को इस घटिया श्रृंखला का सूत्रधार होने पर अब ग्लानि होनी चाहिए। रचना सिंह का मौन साध लेना तो समझ में आता है। यहाँ के पुरुष समाज ने जो बेतुकी टिप्पणियाँ की हैं वह पूरी नारी जाति को अपमानित करती हैं। यह कविता तो पाप की श्रेणी में रखने योग्य है।

  22. राज भाटिय़ा कहते हैं:

    नुझे तो यह कविता एक हास्या ओर हलका फ़ुलका मजाक ही लगी, वेसे भी मुझे कविता समझ नही आती, अगर मेरी टिपण्णी से आप सब को ठेस लगी तो मै माफ़ी चाहूंगा, लेकिन अब वो टिपण्णी तो मेरी नही रही, उस पर अलबेला जी का आधिकार है, वो रखे या उसे हटायेधन्यवादआप को ओर आप के परिवार को नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!

  23. Mithilesh dubey कहते हैं:

    प्रवीण जी नमस्कारआप भी जरा लहजे में रहकर बात करते तो कितना अच्छा लगता , आप के मुँह से ऐसी अशोभनीय बात जरा भी अच्छी नही लग रही है । आप ये कैसे कह सकते हैं कि सभी नर किन्नर हो गयें हैं , क्या आपने कुछ ऐसा अनुभव किया है ?? आप अपनी इस बात के लिए क्षमा माँगिये और इस टिप्पणी को तुरन्त हटा लिजिये , क्योंकि आप जैसे ब्लोगर को ये शोभा नहीं देता ।

  24. सुलभ सतरंगी कहते हैं:

    मैं पहले भी कह चुका हूँ…मैं उन साइट्स और ब्लॉग को पढने और उनपर टिप्पणी करने से बचुंगाजहाँ सस्ती लोकप्रियता के लिए धर्म-जाति संगत/ धर्म-जाति विरोधी,निरर्थक बहस,व्यक्तिगत आक्षेप, अभद्र अश्लील रोषपूर्ण भाषायुक्त विचारया वक्तव्य प्रस्तुत किये जाते हैं.नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित- सुलभ जायसवाल सतरंगी

  25. प्रवीण शाह कहते हैं:

    …@ मिथिलेश दुबे जी,आपकी आपत्ति का सम्मान करते हुए मैं अपनी टिप्पणी हटा रहा हूँ,संशोधित टिप्पणी यह रही… …आदरणीय शिव कुमार मिश्र जी,आपकी इस पहल का मैं सम्मान और समर्थन करता हूँ, मैं तो हतप्रभ था कि क्या ब्लॉगजगत के सम्माननीय पुरुष ब्लॉगरों का विवेक-हरण हो गया है, उनका न्यायबोध कहाँ है?… जो उनके गले के नीचे यह जहर भी उतर रहा है।सुबह जो टिप्पणी इस पोस्ट पर की थी वह यह थी:-आदरणीय अलबेला जी,सबसे पहले तो आपके और आपके परिवार को नव वर्ष की शुभकामनायें।आपकी आज की यह पोस्ट बहुत ही BAD TASTE में है करबद्ध अनुरोध है कि महिलाओं के सम्मान कीहमारी परंपरा को देखते हुऐ आप इस पोस्ट को हटा लें यदि आप इस अनुरोध से इतर निर्णय करते हैं तो अत्यंत आदर के साथ आपकी इस दुर्भावनापूर्ण और नारी विशेष को अपमानित करने वाली पोस्ट पर मेरा विरोध दर्ज किया जाये!आभार!हमारे एक भाई यहाँ कह रहे हैं:-इस चर्चा से सौ प्रतिशत सहमत…..और विवादित पोस्ट पर इनकी टिप्पणी थी:-और तुम लिंग पकड़ के बैठी हो?आपने यह नहीं बताया कि लिंग स्त्री का है या पुरुष का जो पकड़ के बैठा गया है……?यह दोगलापन क्यों ?अभी ३.०० बजे तक एक भी महिला ब्लॉगर ने उस पोस्ट पर जाकर विरोध नहीं जताया है ध्यान रहे गलत बात होने पर मौन रहना या तटस्थ रहना भी आपको अपराध का भागीदार बनाता है। December 31,2009 3:04 PMयह तो हुई मेरी बात अब जरा यहाँ पर की गई अपनी टिप्पणी भी देख लीजिये:-आगरा में एक मेरे दोस्त है पागलो के , सोच रहा रचना जी का वहाँ ईलाज हो सकता है , सस्ते में, मेरा परिचय जो है । सच बातऊं इनके पास कुछ भी अब रह नहीं गया है लिखने को , तो अब पुरुष और नारी के बिच भेद को खत्म करने बैठ गयीं हैं । यहाँ बोलने सबको आता है और अनाब सनाब लिखने भी , परन्तु इन्होने तो हर सिमा लांघ दी है। हर रोज साला जब भी ब्लोगवाणी खोलता हूँ तो देखता इनका बकवास और फालतु के लेख चलते रहते हैं । समझ नहीं आता कि ये क्या सिद्ध करना चाहती हैं , । अरविन्द जी मैं तो चाहूगा की आप तैयार रहिए इनके केस का सामना करने के लिए , देखते है हम भी क्या ऊखाड़ लेती हैं ।प्रिय मित्र,गाय व नारी को वैदिक काल का उसका स्थान आज के कलियुग में दिलाने के महान कार्य में लगे सनातन धर्म के ध्वज-वाहक और सामाजिक मूल्यों के क्षरण के प्रति चिंतित आप जैसे महान विचारक को भी ऐसे विचार व भाषा कतई शोभा नहीं देती। आभार!

  26. Mithilesh dubey कहते हैं:

    @प्रवीण जी बहुत अच्छा लगा एक बार फीर से आपको देखकर । मैं आपकी बातो से बिल्कुल सहमत हूँ कि मैंने जो कुछ भी लिखा है टिप्पणी स्वरुप वह किसी भी विधा से सही नही हैं , ,लेकिन हर एक चिज की अपनी एक हद सिमा होती है , और जब वह अपनी हद सिमा लाघंती है तो उसके लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही कि जानी चाहिए , जिसका मैंने समर्थन किया है । और मुझे जरा भी अफसोस नहीं है कि मैंने इस प्रकार की टिप़्पणी की है आवेश स्वरुप , और न ही मैं इसे हटाना चाहूंगा ।

  27. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    लिखने वालो की उम्र देखता हूं फिर सोचता हूं क्या कहूं ?इस साल के जाने में जब छह घंटे के करीब है …हम कहां खड़े है ?जितनी उबाऊ ओर अनर्थक बहस वो थी .उतनी ही भोंडी ओर घटिया ये कविता है ….की -बोर्ड पर गर लोग इतने हिंसक है तो ?……..

  28. कुश कहते हैं:

    हम अगर कुछ कहेंगे तो ब्लोगिंग के भामाशाह बुरा मान जायेंगे.. वो उन सबको आउट करा चुके है जिन्होंने उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलायी.. विवेक सिंह भी इसी राजनीति का शिकार हुए.. अब हमारी बारी है.. जानते है फिर भी गलत को गलत कहने की आदत के चलते अपनी असहमति दर्ज करा रहे है.. कविता (?) कवि के नाम के साथ 'क्रिएटिव कोमन लाइसेंस' के अंतर्गत ली गयी है.. जिसके अनुसार रचियता का नाम देकर उपयोग किया जा सकता है.. हाँ ये उनसे ज्यादा ईमानदार काम है जिसमे लोग लाफ्टर शो में वो चुटकुले सुनाते है जो हम तीसरी क्लास में सुनाया करते थे..खैर मुद्दा ये नहीं है.. मुद्दा ये है कि किसी महिला का तर्कों द्वारा विरोध नहीं कर सकने की स्थिति में नकली प्रोफाईल बनाकर उनकी व्यक्तिगत जानकारी देना या फिर उनकी निजी जिंदगी के बारे में घटिया मजाक करना क्या मर्दानगी है ?लोगो द्वारा ऐसा किया जाने पर बाकियों की चुप्पी कौनसी बहादुरी है?नकली नामो से चर्चा पर टिपियाने वाले मर्द (?) इतने भी काबिल नहीं कि अपने नाम से मन की भड़ास ही सही लिखे तो सही.. मुझे लगता भी नहीं की उनमे इतनी हिम्मत होगी..ये जानते हुए भी कि अब मुझपर पर्सनल अटैक किया जाएगा.. मैं ये टिपण्णी लिख रहा हूँ.. अंत में..अपूर्व की कविता से कुछ अंश दे रहा हूँ..क्षमा कर देना हमकोओ समय !हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लियेहमारे अपराध के लियेकि बस जी लेना चाहते थे हमकि हमने मुक्ति की कामना नही कीबचना चाहा हमेशान्याय, नीति, धर्म की परिभाषाओं सेभागना चाहा नग्न सत्य से.कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे करसुला दिया था हमनेहमारे आत्माभिमान ने खुदअपना गला घोंट कर आत्महत्या कर ली थी

  29. मनोज कुमार कहते हैं:

    आपको और सबको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

  30. मेरी आपत्ति कि आप सब लोग अलबेला जी की रचना को कविता कह रहे हैं, चाहे म्लेच्छ कविता ही सही। मुझे तो यह कविता का अपमान लगता है। पर कविता बेचारी मुकदमा तो नहीं ठोंक सकती ना, न ही उस की धमकी दे सकती है। चर्चाकार और और दीगर ब्लागीर बंधु हर तुकबंदी को कविता कहलाना चाहते हों तो कहलाएँ, पर यह कविता तो क्या उस का पासंग भी नहीं है। चर्चाकार संभवतः स्वयं इस रचना से इतना प्रसन्न थे कि आलोचना के बहाने ही सही उसे पूरा का पूरा यहाँ रख दिया। आलोचना और चर्चा के लिए रचना के अंशों का उपयोग किया जा सकता है, पूरी रचना का उपयोग निश्चित रूप से कॉपीराइट का उल्लंघन है। सभी लेखकों-प्रकाशकों को इस व्यवहार को जान लेना चाहिए और सावधान भी रहना चाहिए।अरविंद जी को जो यौनउत्पीड़न के नाम से मुकदमा चलाने की जो धमकी दी गई थी वह विधिज्ञान की अल्पज्ञता थी। उस से उन्हें जो अपमान सहना पड़ा उस के लिए वे कानून के समक्ष जा सकते थे। लेकिन टिप्पणियों से जो बवाल फैला है उस से केवल एक महिला ब्लागर ही नहीं संपूर्ण मनुष्यता और संस्कृति को ठेस पहुँची है जिस की क्षतिपूर्ति संभव नहीं। अलबेला जी की इस रचना ने तो सारी हदें तोड़ दीं। अलबेला जी को अवश्य ही इस पर खेद प्रकट करना चाहिए। स

  31. blogvakil कहते हैं:

    दिनेश जी वकील हैं वो बताये कि अल्प ज्ञान से क्या तात्पर्य हैं ??क्या किसी को भी निरंतर किसी महिला ब्लॉगर को नीचा दिखाना उसका अपमान करना नहीं होता ? तो क्यूँ वो महिला ब्लॉगर अपने प्रति इसको यौन शोषण नहीं मान सकती ?? आज कुछ समय पहले भी डॉ अरविन्द रचना कि एक पोस्त्पर उनको "दुबला " कह कर हाथ धो चुके थे क्या रचना नए तब आपति दर्ज नहीं की थी ?अगर कि थी तो तब क्या वो इसको यौन उत्पीडन मे नहीं डाल सकती थी ?मान हानी का दावा तो उन पर भी किया जा सकता हैं जो रचना के विरुद्ध निरंतर " श्री मति " रचना लिख रहे हैं " और PIL नाम कि भी कोई चीज़ होती हैंऔर रचना नए एक बार फिर सिद्ध कर ही दिया कि हिंदी ब्लॉग जगत के पुरुष जब मुल्लाम्मा उत्तर देते हैं तो कैसे लगते हैं । यही रहा होगा उसका मकसद शायदहां कविता नियाहत बकवास हैं और यहाँ नहीं होनी चाहिये पर फिर बाकी लोग साक्ष्य मांगेगे , शायद इस लिये ही यहाँ हैंमेरा प्रोफाइल बंद हैं क्यूँ मै ठहरा डरपोक , बीवी बच्चे वाला कब कौन मुकदमा कर दे क्या पता

  32. अलबेला तो बहाना है, दरअसल आपको कुछ और बताना है।हम भी इसका बुरा नही मानेंगे, क्योंकि आपका ये अंदाज पुराना है।नव वर्ष की अशेष कामनाएँ।——–2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकनसाइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के पुरस्कार घोषित।

  33. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    यूँ तो एल-बे, ला जी, मोफ़त के जुगाड़ और मोफ़त के मौके कभी नहीं चूकते, इसलिये मैं उनका आदर करता हूँ ( कोई और चारा भी नहीं ), चर्चामँच पर आप इसमें और इज़ाफ़ा कर रहे हो ! दुनिया चाँद पर गयी, और आप उनकी कविता पकड़ कर बैठे हो, उल्टे उनकी इस अद्वितीय रचना के कॉपीराइट उल्लँघन का आरोप भी झेल रहे हो ! वह मानसिक रूप से, शायद अपनी ही मानसिकता में सही भी हैं ( अभिजीत सामँत तक उनकी इस प्रतिभा को पहचानते हुये देखे गये हैं ) ! चर्चाकार जी, आख़िर आप क्या चीज़ हो,क्या गलत है इसमें..आप उनकी बेचैनी के आलम को समझने का प्रयास करिये.. वह स्वाइन फ़्लू, भूखी बुढ़िया ( यह बुढ़िया हमेशा भूखी ही क्यों पायी जाती है ? ) और दर्द इत्यादि इत्यादि देख देख विकल हो रहे हैं, और ’वह’ लिंग पकड़ कर बैठी हैं ! हो सकता है वह स्वयँ ही भूखे हों और बेचारी बुढ़िया के भूखे होने का हवाला देकर, ख़ुद अपना लाभ निकालना चाहते हों, और ’वह’ लिंग पकड़ कर बैठी हैं ! हद है.. आपका नाम नहीं दिख रहा है, सो हद है.. चर्चाकार बँधु, आप इस अलबेली कविता को जीने का प्रयास करके देखो, बहुत मज़ा आयेगा.. और इस कविता को भी चर्चामँच पर जीवित रहने दो, ताकि सनद रहे !भविष्य में यदि ’ खत्री स्कूल ऑफ़ ब्लॉग रिसर्च ’ के शोधार्थी लाभ उठाना चाहें, तो निराश न हों । मैं भी निराश नहीं हुआ, जैसा सोच कर आया था उससे कुछ ज़्यादा ही पाया !

  34. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    एक जरूरी पोस्ट।ब्लागिंग का हिसाब-किताब कुछ ऐसा होता है कि टिप्पणियां में जितना कहा जाता है उससे कहीं अधिक अनकहा रह जाता है।अलबेला खत्री इस तरह की तुकबंदियां पहले भी करते रहे हैं। अपनी इस तुकबंदी में तो उनको जमीन तैयार मिली उस पर उन्होंने अपनी फ़सल काट ली। इस बारे में ज्यादा कुछ लिखना अब उचित नहीं होगा।ब्लागवकील के नाम से कभी ताऊजी ने टिप्पणियां की थीं। क्या अभी भी वे वकील के ही नाम से टिपियाना पसंद करते हैं।नया साल सबको मुबारक।

  35. Arvind Mishra कहते हैं:

    वैसे मैंने एक वाक्य में कहीं अपनी बात कह दी थी की हम दूसरों के कृत्य पर जजमेंटल न बना करें ,भाषा की तीन शक्तिओं -अभिधा .लक्षणा और व्यंजना ,मतलब शब्द के सीधे अर्थ और व्यंजित अर्थ में कवि अक्सर व्यंजित अर्थबोध को चुनता है -मैंने उसी अर्थ से कविता पढी थी और अकस्मात मुंह से निकल पड़ा था जबरदस्तवह किसी एक व्यक्ति विशेष को लेकर लक्षित नहीं थी ….अलबेला जी की अन्य कृतियाँ ज्यादा भौंडी औरविकृतियाँ ले लेती हैं और उन पर मेरी भी सहमति नहीं रहती मगर मैं चुप लगा लेता हूँ क्योंकि वे एक उदित कवि हैं .लिंग का मतलब अनिवार्यतः पुरुष अंग नहीं होता …उस कविता का श्लेष ज्यादा ग्राह्य था …मैंने अब तक यही सीख रहा हूँ – यद्सारभूतम तदोपासनीयम !और मिश्र जी .अब इतनी भी खुन्नस क्या है मुझसे ?

  36. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    @ अनूप जीअपने हिन्दी ज्ञान को थोड़ा सुधारिए. एकवचन और बहुवचन में फर्क होता है. मेरे नाम के साथ उल्लेखित टिप्पणियां को टिप्पणी लिखिए और यह भी समझ लीजिए कि आप जिस टिप्पणी का उल्लेख कर रहे हैं वह ताऊ रामपुरिया के लॉग-इन से की गई है और उसमे मौज लेने वालों की मौज लेने के के लिये ब्लाग वकील को संदर्भित किया गया है.ताऊ को किसी छदम नाम की आवश्यकता नही है, लठ्ठ और भैंस दोनो अपने पास हैं. वैसे ब्लाग वकील कौन है? यह आपसे अच्छी तरह कौन जानता होगा? उम्मीद करता हूं कि आपको स्पष्टीकरण मिल गया होगा.रामराम.

  37. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    अलबेला खत्री जी की टिप्पणी सम्मानित ब्लोगर बन्धुगण सर्वश्री ज्ञानदत्त पाण्डेय… सम्मानित ब्लोगर बन्धुगणसर्वश्री ज्ञानदत्त पाण्डेय, संजै बेंगानी, उम्दा सोच, छिल्कौर, सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी, कुश, दिनेश राय द्विवेदी, डॉ अमर कुमार, अनूप शुक्ल आदि आदि इत्यादिमुझे खेद है, गहरा खेद है कि मेरी कविता से आपको और अन्य कई भले लोगों को दुःख पहुंचा । मेरा अभिप्राय किसी को दुःख पहुंचाना नहीं है । अरे भाई मेरी तो रोज़ी-रोटी ही लोगों को हँसा कर चलती है तो मैं किसी को तकलीफ पहुंचाऊं , ये कैसे हो सकता है ?लेकिन………….लेकिन…….यहाँ आपको ये भी ध्यान रखना होगा कि सभी दवाएं मीठी नहीं होतीं, कुछ कड़वी भी होती हैं और कड़वी दवा बनाने वाली कम्पनी पर क्रोध करने के बजाय उसकी मज़बूरी भी समझनी ज़रूरी है जैसा रोग हो, उसका इलाज वैसा ही किया जाता है ,विद्वजनों ! तुम अपने ही घर में देखना कई तरह के झाडू और ब्रश मिलेंगे….रसोईघर की झाड़ू अलग होती है, आँगन की अलग होती है और सड़क की अलग होती है। जहाँ कोमल चाहिए वहां कोमल प्रयोग होती है, जहाँ कठोर चाहिए, वहां कठोर प्रयोग होती है ……….दान्त का ब्रश अलग होता है, कपड़े का अलग होता है, जूते का अलग होता है और कमोड का अलग होता है…टॉयलेट साफ़ करने वाले ब्रश से आप अपने दांत साफ़ करेंगे तो आपको अच्छा नहीं लगेगा और दांत वाले ब्रश से टॉयलेट घिसेंगे तो टॉयलेट को अच्छा नहीं लगेगा । इसीलिए आप से पहले पैदा हुए विद्वानों ने कहा है "जैसे को तैसा"मैं कोई सफाई नहीं दे रहा और कोई ज़रूरत भी नहीं है बिना रोकड़ा लिए मैं किसी को गन्दी गाली नहीं देता, तो सफाई ?…..तौबा! तौबा !मैं तो सिर्फ़ ये देखने और देख कर गौरवान्वित होने आया हूँ कि कवि की कविता में कितनी ताकत होती है …ना चाहते हुए भी आप उसे बार बार पढ़ रहे हैं , पढवा रहे हैं और उस पर गहन चिन्तन कर रहे हैं हालांकि वैसी कविता लिख कर उत्तर देना किसी के बस में नहीं है, लेकिन अपनी इस नाकाबिलियत की कुंठा वह कविता के बजाय कवि पर निकाल रहे हैंज्ञानजी दादा कोंडके को देखे नहीं, पढ़े भी नहीं……बस पोस्टर देख कर ही नैनसुख पा लेते हैं । अब ये ज्ञानजी हैं जिन्हें ये भी ज्ञान नहीं की दादा कोंडके पढने की चीज़ नहीं थे वे अब तक के सबसे सफल फ़िल्म मेकर थे जिन्होंने एक के बाद एक लगातार 9 जुबली हिट फ़िल्में दी थीं और केवल अपने बल बूते पर दी थीं । मुझे गर्व है की मैंने उनके साथ काम किया है और उनकी आखरी फ़िल्म "येऊ का घरात?" के गाने मैंने ही लिखे थे। दादा में और मेरे में केवल एक ही समानता है कि उनकी फिल्मों के कंटेंट चोरी करके लोग अपनी फ़िल्में हिट कर रहे हैं और मेरी कवितायें सुना सुना कर कई कवि अपनी दाल रोटी चला रहे हैं । ज्ञान जी ! कभी मौका मिले तो दादा कि पुरानी फ़िल्में देखना ……ये लफ्फाजी करना भूल जाओगे ।संजै बेंगानी शैल चतुर्वेदी के अलावा किसी को हास्य कवि ही नहीं मानते ..यानी हुल्लड़ मुरादाबादी, ओम प्रकाश आदित्य, पं विमलेश इत्यादि सभी …..हा हा हा हा हा हो हो हो हो होछिल्कौर अनजाने में ही मेरी गणना तुक्कड़ो में कर रहे है , अब उन्हें क्या मालूम तुक्कड़ो विदर्भ में कितने बड़े सन्त हुए हैं ? कहाँ सन्त तुक्कड़ो, कहाँ मैं ? लेकिन कुए के मेंढकों को क्या मालूम कि दुनिया कितनी बड़ी है ।त्रिपाठीजी ऐसा गोलमोल लिख दिए हैं कि समझ ही नहीं आ रहा वे मेरी तारीफ कर रहे हैं या बुराई ! होना भी ऐसा ही चाहिए..लेकिन एक बात समझ नहीं आई यहाँ हम कवि लोग रात दिन ये प्रयास करते हैं कि जात-पात ना हो जबकि वे तो कविता को भी मलेछ जाति का बता रहे हैं ..उनकी बसती में रहते होंगे शायद ..इसलिए ये शब्द जुबां पर चढ़ गया होगा ।कुश की योग्यता कमाल की है उसने मेरे वो जोक सुन लिए जो मैंने कभी सुनाये ही नहीं …हा हा हा हा । वाह रे कुंठित कानपुरी ! कहाँ सुन लिए भाई ? ज़रा सच सच बताओ….दिनेश जी बिलकुल सही कहते हैं कि कविता का अपमान हुआ है । मैं भी यही कहता हूँ कि इस घटिया और दो कौड़ी के चर्चा मंच पर आने से मेरी कविता का अपमान तो हुआ ही है ।अमर कुमार सिर्फ़ दया के पात्र हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं …और अनूप शुक्ल को मैं डैड देना चाहूंगा जिन्होंने मेरी क्षमता का लोहा माना..और पतली गली से खिसकना ही बेहतर समझा…..कुल मिला कर इस बकवास का सार ये है कि आप सब खुश रहें …….नव वर्ष आपके लिए मंगलकारी हो !जय हिन्द !

  38. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    ताऊ की टिप्पणी के बाद अपनी टिप्पणी में संसोधन:ब्लागवकील ने कभी ताऊ की प्रोफ़ाइल का इस्तेमाल करते हुये टिप्पणी की थी। अब पता नहीं कि यह टिप्पणी व्लागवकील की है या ताऊ जी की?

  39. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    मसल है.. बगल खुजावै गाल बजावैअउर छिनरो का सोहर गावै ?सच कहा मित्र एल-बे ला जी ( सँबोधन का यह अँदाज़ किसी टी.वी. एँकर का है ),तो एल-बे ला जी, मैं सचमुच दया का पात्र हूँ कि मैं इतनी भी समझ नहीं रखता कि कवि या कथाकार की मँशा में निहित ईमानदारी को पहचान पाऊँ ।यदि यही होता पिछले 40 वर्ष मैं केवल गद्य लिखने में स्वाहा क्यों कर देता ? मैंने चकाचक बनारसी की चौंचक सँगत की है.. अफ़सोस कि वह मुझे तैयार न कर सके, वरना मैं IPTA से जुड़ा होने के बावज़ूद भी स्टेज़ के सहारे अपना पेट पालने की पर्याप्त व्यवस्था बना ही लेता ! आज तो मुझे भी अपने पर दया आ रही है कि, टी.बी.-कैंसर के रोगियों और आप जैसे मूर्धन्य सद्साहित्यकार के बीच में टँगा मैं ब्लॉगर पर क्या कर रहा हूँ ? सचमुच मैं दया का पात्र हूँ, मित्र खत्री जी !

  40. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    @ अलबैला, जैसा रोग हो, उसका इलाज वैसा ही किया जाता है. यानी आपने एक महिला का इलाज अभद्र भाषा से किया है. जो आपकी नजर में सही है! कमाल है!किसी एक कवि का उदाहरण देने का मतलब यह नहीं था जो आप यहाँ लगा रहे है. और जिन लोगो के नाम आपने दिये है क्या वे आपने लिखा वैसा लिख सकते थे?

  41. रचना कहते हैं:

    उनके लिये असहनीय होती है एक ऐसी स्त्री जो किसी पुरुष के आधीन न हो, जो आत्मनिर्भर होकर पुरुषों कि दुनिया में अस्तित्व बनाये रखे और उस पर हद यह कि उसके पास 'opinion' हो. Opinionated women उन्हें एक ऐसी बीमारी कि तरह लगती हैं जिसे कैसे भी करके दबाना, हराना है क्योंकि वो उन्हें अपने पुंसत्व पर एक सवालिया निशान कि तरह दिखती हैं.I dont think there could be a better reply then this which i hv copied from the post http://wohchupnahi.blogspot.com/2010/01/blog-post.html

  42. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    @ अनूप जी शुक्लअपनी टिप्पणी मे संशोधन करने का धन्यवाद. आपको एक संशोधन और करना पडेगा.आप बात को घुमा फ़िरा कर लिखने की जगह सीधे सीधे यह क्यों नही लिखते कि ताऊ ने ताऊ के लाग-इन से टिप्पणी की थी जिसमे संदर्भ ब्लाग वकील का था. रामराम

  43. अभिषेक ओझा कहते हैं:

    हे प्रभु ! सदबुद्धि दो !

  44. Sonal Rastogi कहते हैं:

    अलबेला जी,मैंने छोटे परदे पर आप को कई बार देखा और सराहा, पर आप की ये कविता ने कहीं न कहीं मन को ठेस पहुंचाई है, आप की कविता से अगर नारी अपमान करती पंक्ति हटा दी जाए तो कविता ठीक ही है,यदि कोई कवी कुछ लिखता है तो उसमे भावना,कल्पना,हिंसा शोक नवरस हो सकते है पर यह पंक्ति स्पष्ट रूप से सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए लिखी गई है……आप के इस निम्न स्तर के लेखन के प्रतिउत्तर में बहुत कुछ लिखा जा सकता है. पर हम अपनी लेखनी को भाषा की मर्यादा नहीं खोने देना चाहते, तो गांधीगिरी की तर्ज़ पर "गेट वेल सून "

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