पुरुष, मेरा मन करता है कि तुम्हारा एक झाड़ू बनाऊँ और उससे अपने कमरे को बुहारूं…

बचपन

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सामने जो एक नाला है ना, गिर नहीं जाना उसमें, ठीक?

गिरने से क्या होगा?

अरे! गिरने से क्या होगा? एक हज़ार नौ सो छिपकलियाँ एक के बाद एक नाले के कीचड़ से निकलेंगी, फिर पानी में तैरकर तुम्हारे ऊपर चढ़कर आस्ते आस्ते तुम्हारे मुंह तक पहुंचकर अपने तेज़ नुकीले दाँतों से … चीखो मत!

मुझे घर जाना है।

क्या? क्यूँ?

मुझे घर जाना है!

पर घर तो नाले के उस पार है।

पुरुष

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पुरुष मेरा मन करता है

तुम्हारा एक ब्रश बनाऊं

उससे अपने कमरे को बुहारूं,

अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,

दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,

बालों पर ब्रश करूं

और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं……..

—.

(यदि आपको लगता है कि चर्चा में कमी-बेसी रही – बिना किसी भूमिका के रही, छोटी रही, अच्छी रही या न रही इत्यादि इत्यादि, तो स्पष्टीकरण प्राप्त करने हेतु यहाँ  जाएं 🙂 )

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attractive,having a good smile
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32 Responses to पुरुष, मेरा मन करता है कि तुम्हारा एक झाड़ू बनाऊँ और उससे अपने कमरे को बुहारूं…

  1. पुरुष होने के नाते तो चर्चा बड़ी डरावनी निकली !! अब कैसे कहें हैप्पी ब्लॉग्गिंग??

  2. Dr. Mahesh Sinha कहते हैं:

    ब्रश के भी भाग्य खुल गए 🙂

  3. ललित शर्मा कहते हैं:

    चलो अच्छा है ब्रश के काम तो आये,घर के नसीब जागे-आभार

  4. रचना कहते हैं:

    उफ़ !!! इतने सारे उपयोग वर्णित हैं फिर भी अलमारी मे रखना चाहती हैं । बेकार का उपक्रम हैं किसी को आले या अलमारी मे रखना जब वस्तु इतनी उपयोगी हो । ख़ैर जिनकी वस्तु हैं वो जाने रखे या लोन पर दे दे !!!!!

  5. Ashok Pandey कहते हैं:

    पुरुष मेरा मन करता हैतुम्हारा एक ब्रश बनाऊंउससे अपने कमरे को बुहारूं,अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,बालों पर ब्रश करूंऔर फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं……..गनीमत है..आलमारी में ही रखा है, फेंका नहीं 🙂 इस सुंदर कविता को पढ़वाने के लिए आभार।

  6. अरे ठीक है न रचना जी, रखने दीजिये अलमारी में…इन पुरुषों ने तो बहुत दिनों तक ताले में रखा है महिलाओं को…बन्द किये जाने का अर्थ इन्हें भी तो समझ में आये…

  7. cmpershad कहते हैं:

    `यहां’ देखने पर गूगल ऊऊऊप्स्स्स्स कहता है तो देखना छोड दिया। अब पुरुष की कामना तो होगी कि ब्रश से अच्छा है साबुन बन जाना…. बाकिया तो आप जाने:)

  8. बी एस पाबला कहते हैं:

    यह तो वैसा ही है जैसे पुरूष की कामना रहती है पायल, झुमका, लिपिस्टिक, लॉकेट बनने की!हाँ, उपमायों का प्रयोग नज़रिया ज़रूर बताता है।वैसे पुरूषों का उपयोग ऐसी ही वर्णित अल्पकालीन कार्यों के अलावा और क्या है! बी एस पाबला

  9. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    लेकिन मेरा मोहतरमा से एक सपाट प्रश्न है,मैडम यू मे बी इन्डियन जी, आपके प्रोफ़ाइल में लिट्टी-चोखा प्रभावित तो करता है,यदि प्राउड टू बी बिहारी तो प्राउड टू बी अ मराठी माणूष ने क्या अपराध किया है ?यू ऑर प्राउड फ़ॉर बीइँग इन्डियन ऑनली क्यों नहीं, बिहारी ही क्यों ?हमारे सर्वोच्च गर्व का विषय भारतीय होना है, बाई द वे आई एम प्राउड टू बी उफ़रौलियन ?अब कोई अँदाज़ा है किसी को मेरे देश का ?यदि नहीं, तो मैं बता दूँ कि यह सीतामढ़ी से सटा हुआ मेरा गाँव है ।सीतामढ़ी.. वह भी इलाहाबाद यू.पी. वाला नहीं, ठेठ उत्तर बिहार वाला !आपकी कविता पाठकों से एक स्पष्ट प्रश्न कर रही है, वह यह किकौन कहता है कि, पुरुष उपभोग्य नहीं हैं ?यदि यह प्रेम का आवेग है, तो अपने प्रेम प्रतीक से ’ गंदे कपड़ो ’ को नहीं रगड़ा जाता ।चर्चाकार भाई जी इतने वरिष्ठ और आदरणीय हैं, कि यह भी नहीं पूछते बन पा रहा है कि,यह गाड़ी रतलाम जँक्शन पर ही क्यों अटक कर रह गयी ?

  10. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    रचनाजी, शुक्रिया। गलती ठीक कर ली गयी।

  11. शरद कोकास कहते हैं:

    एक पुरुष से ..मतलब एक ब्रश से इतने काम सम्भव नही है इसके लिये अलग अलग साइज़ के ब्रश चाहिये .. तथ्यात्मक गलती – आलोचक ।

  12. प्रस्तुति का अंदाज दुरुस्त लगा ……….ब्रश – धर्मी प्रस्तुति ………….पाठक – पुरुष क्या करें …………

  13. एक ब्रश बनाया,उससे अपने कमरे को बुहारा,अपने गंदे कपड़ों को साफ़ किया,दांत ब्रश किये, कोट साफ किया,बालों पर ब्रश किया,और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दिया…….ये कहिये कि गनीमत रही किटॉयलेट साफ़ करूँ, जूते पोलिश करूँ,अलमारी में नहीं डस्टबिन के बगल में टिका दूं.यही तो बच रहा है.

  14. Ancore कहते हैं:

    महिला………..मेरा मन करता हैतुम्हारा एक ब्रश बनाऊंउससे अपने कमरे को बुहारूं,अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,बालों पर ब्रश करूंऔर फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं……..सामने जो एक नाला है ना, गिर नहीं जाना उसमें, ठीक?:-)

  15. यह कविता शिल्प के स्तर पर अलग है। वस्तुतः स्त्री को एक वस्तु समझने के विरुद्ध फंतासी प्रतिक्रिया है। मोहतरमा ने अपने दांत में फंसा एक तिनका निकाल कर फैंका है।

  16. Udan Tashtari कहते हैं:

    आपने अपने मन की कह ली. बहुत बढ़िया किया. ऑउटलेट तो चाहिये ही.अब जरा हास्य के तौर पर इसे भी देख लें मगर मात्र हास्य के तौर पर-उसके आगे-नो विवाद. विवाद का दिल करे, तो अलमारी में ताला भी जड़ देना.पुरुष मेरा मन करता है(हे नारी, तेरे मन पर तो हम कभी खरे उतरे ही नहीं..तेरा मन तो करता है कि हम चाँद तारे तोड़ लाये, वो भला कैसे संभव करें)तुम्हारा एक ब्रश बनाऊं(जरा ध्यान से, कहीं हमारी दाढ़ी के कड़े बालों से अपनी उँगली न आहत कर लेना. फिर खाना कौन बनायेगा, बह्ह्ह्हू??)उससे अपने कमरे को बुहारूं,(गंदगी पर दर गंदगी-भला इतने छोटे बालों के ब्रश से भी कोई कमरा बुहारता है, इतनी झुकोगी तो कमर लचक जायेगी, उसका तो कुछ ख्याल करो)अपने गंदे कपड़ों को साफ़ करूं,(फिर गंदगी पर दर गंदगी-हमारे बालों से..उफ्फ!!! कैसे पहनोगी फिर वो ही कपड़े?)दांत ब्रश करूं, कोटे साफ करूं,(मसूड़े छील जायेंगे और कुछ ही दिन में दाँत नजर नहीं आयेंगे फिर ब्रश अलमारी में धरा का धरा रह जायेगा जैसे कि हमारा अस्तित्व तुम्हारे लिए) (कोट में क्या लगा लाई, ड्राई क्लीन कराओ-कितनी बार भला ब्रश से काम चलेगा)बालों पर ब्रश करूं(बालों का बालों से घर्षण, जान न ले ले ये आकर्षण)और फिर उसे उठा कर अलमारी में रख दूं……..(अलमारी खुली रखना और टीवी ऑन-वहीं से देख लेंगे-सोफे पर पड़े थे कभी, अब अलमारी में पड़े हैं):)-जहाँ एक ओर माधवी जी की रचना का शिल्प बेहतरीन है और निश्चित ही एक आक्रोश के निस्तार का सहित्यिक मार्ग……. वहीं चिट्ठाचर्चा बढ़िया रही.पुनः मात्र हास्य का उद्देश्य है…कोई विवाद नहीं…उसका जबाब देने में असमर्थ ही रहूँगा.

  17. अजय कुमार झा कहते हैं:

    हम सोचिए रहे थे ….चर्चा पर परिचर्चा का एंगलवा ..खाली सीरियस ही काहे है ….मुदा एलियन जी आपने इसका ….एलियोनेटिक व्याख्या करके…संदर्भ को …सार्थक कर दिया है …। हां एक गो बात नहीं समझ पाए..ई लाईनवा सब के बीच में घुसे कईसे जी …साईज फ़्लेक्चुअल है आपका ..इलास्टीसिटि …टाईप ….

  18. Arvind Mishra कहते हैं:

    @समीर भाई…… तो हर विषय में हास्य खोज लेते हैं…इसमें कोई क्या बुरा मानेगा..कवियत्री भी बिना मुस्कराये न रह पायेंगी और अनूप जी तो खैर!!!..बाग़ बाग होगे ही .टी आर पी बढ़ती जा रही है आलतू फालतू बात पर !

  19. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    वाकई, I like it, खुंदक निकालो तो पूरी तरह 🙂

  20. Anil Pusadkar कहते हैं:

    गनिमत है कमरे से सीधे अल्मारी मे,वर्ना टायलेट……………………………।

  21. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    हे राम! घोर और नितांत कलयु………..:)रामराम.

  22. अल्पना वर्मा कहते हैं:

    दोनो कविताओं में रोष है.दूसरी कविता में कुंठाग्रस्त मन का आक्रोश है जो उनकी अपनी व्यक्तिगत सोच है.

  23. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    स्त्री को एक वस्तु समझने के विरुद्ध फंतासी प्रतिक्रिया है। हाँ यह ठीक है.. पुरुष की उपस्थिति को अपरिहार्य मानते हुये जुगुप्सित फ़ँतासी है यह !उसे आत्मसात करने की कशिश इतनी कि कल्पना हर अच्छे-बुरे उपयोग पर ठहर कर रह गयी है ।सवाल वही.. कौन कहता है कि, पुरुष उपभोग्य नहीं हैं ?ख़ैर जिनकी वस्तु हैं वो जाने रखे या लोन पर दे दे !!!!!पर.. लोन पर लेना क्या चाहती हैं, यह तो स्पष्ट करें, रचना में बहुत सारे विकल्प हैं पुरुष, उसके बालों का ब्रश, गँदे कपड़े, कोट, आलमारी या कवियित्री अरे ठीक है न रचना जी, रखने दीजिये अलमारी में…क्योंकि चार चैम्बर वाली यह आलमारी मॉयोकॉर्डियल टिश्यू से ख़ास तौर पर विधाता ने गढ़ी है, जिसे बेख़्याल शायर लोग दिल के नाम से पुकार डालते हैं ! इसमें भला कौन नहीं बन्द होना चाहेगा ?बन्द किये जाने का अर्थ इन्हें भी तो समझ में आये…ताकि पुनः कोई एक और महाकाव्य रच जाये और एम.ए. हिन्दी के छात्रों को झेलाये ।एक गो बात नहीं समझ पाए..ई लाईनवा सब के बीच में घुसे कईसे जीयह तो आसानी से एच.टी.एम.एल. टैग लगा कर किया जा सकता हैबेशी जानकारी हेत ’ खण्डेलवालम शरणम गच्छामि ’गनिमत है कमरे से सीधे अल्मारी मेगनीमत तो हईये हैं, क्योंकि यूज़ एन्ड थ्रो की सोच नहीं आयी !अल्पना वर्मा on November 30, 2009 11:10 AM ने कहा… यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई हैगूगुल बाबा बाँगाली कि, कौनो लिंग भेद नहीं ?रचनाजी, शुक्रिया। गलती ठीक कर ली गयी।सरे चर्चा-बाज़ार, ई का खुसुर पुसुर होय रहा है भाई ?हालाँकि लाख टके का यह डिस्क्लेमर यहाँ भी लागू हैमात्र हास्य का उद्देश्य है…कोई विवाद नहीं…उसका जबाब देने में असमर्थ ही रहूँगारचनाकर्मी की पहचान को लेकर मेरा सवाल कायम है,यू ऑर प्राउड फ़ॉर बीइँग इन्डियन ऑनली क्यों नहीं, बिहारी ही क्यों ?.

  24. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    कवि यहां तसलीमा नसरीन से प्रेरित है ……उनकी एक कविता भी कुछ इस तरह की है .. ….कभी कभी मन करता हैतुम्हारी पीठ झुकायुंओर उस पर धौल जमा कर जोर से कहूं "साले"नेट पर पूरी सर्च कर रहा था .मिली नहीं शायद कथादेश या हंस के किसी पुराने अंक में मिले ….या इतना हल्ला मचा देख हैरानी हुई…वो तुलसी दास भी तो कह गए थे कई साल पहले …..ढोल पशु शुद्र नारी .ये सब ताडन के अधिकारी सा कुछ…….खैर वैसे मै तसलीमा का कोई फेन नहीं हूं….पर उनकी लिखी कुछ कविताएं ….कविता की परिभाषा में शायद फिट न बैठती हो …पर हां एक औरत की सोच तो दिखाती ही है ..You Go Girl !They said—take it easy…Said—calm down…Said—stop talkin'…Said—shut up….They said—sit down….Said—bow your head…Said—keep on cryin', let the tears roll…What should you do in response?You should stand up nowShould stand right upHold your back straightHold your head high…You should speakSpeak your mindSpeak it loudlyScream!You should scream so loud that they must run for cover.They will say—'You are shameless!'When you hear that, just laugh…They will say— 'You have a loose character!'When you hear that, just laugh louder…They will say—'You are rotten!'So just laugh, laugh even louder…Hearing you laugh, they will shout,'You are a whore!'When they say that,just put your hands on your hips,stand firm and say,"Yes, yes, I am a whore!"They will be shocked.They will stare in disbelief.They will wait for you to say more, much more…The men amongst them will turn red and sweat.The women amongst them will dream to be a whore like you. वैसे यहां उनकी ओर कविताएं पढ़ी जा सकती है …..

  25. cmpershad कहते हैं:

    कल्पना कीजीए की अगर यही काम कोई युवक किसी अभिनेत्री को उसी स्टेज पर कर देता तो उस का क्या हाल होता! wah to seedha jail mein hota..अल्पनाजी, शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गैरे का केस भूल गईं क्या? जेल-वेल तो नहीं अच्छी खासी पब्लिसिटी तो मिल ही गई:)

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