और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन

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कल १४ नवम्बर था-  “बाल दिवस” या कहें कि जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिवस ;  जिनके विषय में बाबा नागार्जुन ने लिखा था –

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

देश ने और देशवासियों ने सरकारी / असर कारी / अ – सरकारी  और अन् + असरकारी अलग अलग विधि विधान से इसे   मनाया और अपने अपने ढंग से जवाहर लाल और बालकों के प्रति उनके प्रेम को याद किया| ब्लॉग जगत में बाल दिवस के अवसर पर बच्चों पर केन्द्रित कई  प्रकार की विचारात्मक, सूचनात्मक , संवेदनात्मक, …….. आदि आदि सामग्री यथासम्भव उपलब्ध कराई गयी| वह सारी आप ब्लॉगवाणी तथा चिट्ठाजगत संकलकों पर जा कर गत ३२ घंटे की प्रविष्टियों को खंगालते हुए स्वरुचि के अनुसार ( या अपनी- अपनी  टिप्पणियों के आदान-प्रदान की सीमारेखा और तय नीति अनुसार ) देखभाल / पढ़ सकते हैं | वैसे रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी ने इसका एक  लघु संस्करण भी तैयार किया है – 

कई प्रविष्टियाँ यद्यपि इसमें छूट गयी हैं किन्तु उनके लिए शास्त्री जी ने सौजन्यता व विनम्रता पूर्वक इसे मानवीय चूक के रूप में लेने का आग्रह किया है | अत: किसी को उनसे किसी प्रकार की शिकायत मन में नहीं लानी चाहिए क्योंकि चर्चा करने वाली की भी अपनी सीमाएँ होती हैं |

हाँ तो, हम बात कर रहे थे बाल दिवस के साथ नाभिनाल सम्बद्ध जवाहर लाल नेहरू की|  पता नहीं क्यों जवाहरलाल नेहरु चाचा के साथ मैं सदा चीन का दागदार (चिन्हित) चेहरा चीन्हने में जुट जाती हूँ ? (ये अलंकार नहीं है भाई!, चक्कर है च का !!) | इसी सहसंबंध के कारण ही हो सकता है कि मुझे  भारत के पड़ोसी चीन के संबंधों पर लिखा एक लेख भी नेहरू जी के जन्मदिवस के अवसर पर, एकदम सही समय पर आया लगा| लेख विश्लेषणात्मक और सुचिन्तित है, जिसे लिखा है हमारे वरिष्ठ मित्र व `स्वतंत्र वार्ता’ (दैनिक हिन्दी पत्र) के सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ला जी ने – 

अमेरिका, चीन और भारत के संबंधों का एक विश्लेषण

अमेरिका और चीन आज दुनिया के दो सर्वाधिक श्क्तिशाली देश हैं। इन दोनों के अंतर्संबंध इतने जटिल हैं कि उनकी सरलता से व्याख्या नहीं की जा सकती। उनके बीच न कोई सांस्कृतिक संबंध है, न सैद्धांतिक, बस शुद्ध स्वार्थ का संबंध है। इसलिए न वे परस्पर शत्रु हैं, न मित्र। इनमें से एक भारत का पड़ोसी है, दूसरा एक नया-नया बना मित्र। पड़ोसी घोर विस्तारवादी व महत्वाकांक्षी है। ऐसे में भारत के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह अमेरिका के साथ अपना गठबंधन मजबूत करे। यह गठबंधन चीन के खिलाफ नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका भी न तो चीन से लड़ सकता है और लडऩा चाहता है। लेकिन चीन की बढ़ती शक्ति से आतंकित वह भी है और भारत भी। इसलिए ये दोनों मिलकर अपने हितों की रक्षा अवश्य कर सकते हैं, क्योंकि चीन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह अमेरिका और भारत की संयुक्त शक्ति के पार कभी नहीं जा सकता।

१३ नवम्बर को प्रख्यात हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिवस भी था| ठीक विधानसभा की जूतमपैजार के कुछ  दिन बाद | मुक्तिबोध मूलतः मराठीभाषी थे, उनके भाई मराठी के जाने माने  कवियों में गिने जाते हैं | है न कमाल, एक भाई मराठी का  कवि दूसरा हिन्दी का|

सीखिए- सीखिए कुछ तो! वर्चस्व के लडैतो !!

नेट पर इन दिनों देशकाल ने इस अवसर पर मुक्तिबोध सप्ताह की आयोजना की हुई है|  इसके अर्न्तगत मुक्तिबोध पर केन्द्रित कई वैचारिक आलेख आप वहाँ समयानुसार पढ़ सकते हैं| स्मरणपूर्वक इस अवसर पर चर्चा के इस मंच पर उनकी एक बहुप्रसिद्ध लम्बी कविता `अँधेरे में’ का एक बहुत छोटा-सा अंश आपको यहाँ पढ़वाने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा –

https://i1.wp.com/cmsdata.webdunia.com/hi/contmgmt/photogalleryimg/Photo/1187B_Gajajnan-Madhav-Muktibodh.jpg

ज़िन्दगी के…
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार….बार-बार,
वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,
किन्तु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है–वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह–
ख़ुद-ब-ख़ुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !!
कौन मनु ?

हिन्दी के नाम पर हुई अ – वैधानिक ( ?)  जूताजोरी के बाद हिन्दी की उपयोगिता को लेकर अंग्रेजी वालों के मध्य एक परिचर्चा कराने का विचार अपने एन डी टीवी वालों को वालों समय की माँग जैसा लगा (सही पहचाना,  यह वही अर्थशास्त्रीय / बाजार की माँग और आपूर्ति वाली माँग है बंधु !)| तो उन्होंने बिना देर लगाए इस अनुष्ठान को करने करवाने के लिए अलग अलग दिशाओं से पुरोहितों को  ( न-न, वक्ताओं को) आमंत्रण भेजे|  अब इस अनुष्ठान का विधिविधान देखने से आप चूक गए हों तो उसकी बानगी देख सकते हैं –

एन डी टी वी (अंग्रेजी )चैनल में हिन्दी की उपयोगिता पर निरर्थक बहस

आज शाम आठ बजे, टी वी चैनल – एन डी टी वी -(अंग्रेजी) में परिचर्चा का एक कार्यक्रम आयोजित था । विषय था –
हिन्दी का मुद्दा।

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सभी लोगों ने अंत में एकमत से अंग्रेजी को ही भारत की संपर्क भाषा घोषित किया और कहा की अंग्रेजी से ही भारत का उत्थान होगा और अंग्रेजी ही देश की एकता को सुरक्षित रख सकती है. खुले आम हिन्दी और भारतीय भाषाओं की धज्जिया उडाई गयी । भारतीयता का न ही कोई बोध था, किसी में और न ही हिन्दी के प्रयोग के बारे में कोई जानकारी ही थी उन लोगो के पास. सभी लोगों ने हिन्दी को ही देश की समस्याओ का मूल कारण बताया और इससे जल्द से जल्द निजात पाने का फरमान घोषित कर दिया । वाह रे वाह भारत के बुद्धिजीवी और वाह रे वाह एन डी टी वी चैनल। धन्य हो बरखादत्त .


देश -दुनिया और समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर निरंतर लोग सद्प्रयासों में लगे हैं क्योंकि स्त्री को उसका समुचित मान-सम्मान दिए बिना कोई भी वर्ग,जाति, देश, समाज कभी अपनी ह्रासमान स्थितियों से उबर ही नहीं सकता| हमारे देश में एक दबंग, सच्ची और ईमानदार महिला पुलिस अधिकारी हुआ करती थीं| `थीं’ इसलिए, क्योंकि तेजस्वी महिलाओं की स्वायता को नष्ट कर के अंगूठालगाऊ महिलाओं को आगे करने वाली सिंहासनारूढ़ सत्ता ने उन्हें दरकिनार कर दिया और …| खैर, वे आज भी सक्रिय हैं और बड़े बड़े काम कर रही हैं| एक समाचार उनके विषय में –



किरण बेदी को देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की मुहिम

निष्पक्ष और निडर पुलिस अधिकारी के तौर पर ख्यात रहीं किरण बेदी को देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की मुहिम को और बल मिल गया है। बेदी ने अब खुद सामने आ कर कहा है कि उन्हें यह पद मंजूर करने से कोई एतराज नहीं।……………………..
किरण बेदी से अच्छी सख्सियत नही हो सकती भारत में इस पद को सम्हालने के लिए ।
अगर सरकार को अपनी पुराणी गलतियाँ सुधारनी है तथा सच की थोडी सी भी शर्म है तो तुंरत किरण बेदी को इस पद पर नियुक्त कर दे।
पर इस की उम्मीद कम ही दिखायी पड़ती है , क्योंकि सच की तो कोई कदर ही नहीं है सरकार के घर ।
जो कांग्रेस बेशर्मी से कौडा जैसे नेता को समर्थन देती रही वो सच और ईमान दारी तो चाहती ही नही

महिलाओं की ऐसी-तैसी और इज्जत-उतार-अभियान देश, बस्ती, गली, कूचे, घर-बाहर, बाज़ार, संस्था, देश, परदेस,  लिखने, पढने, जीने मरने जैसे हर नुक्कड़ और हर शिखर पर हर कहीं चल रहा है, चलता आ रहा है, बस उजागर होने की कसर बची रहती है सदा-सर्वदा| उजागर  हों भी क्यों ? अंततः वे निरंकुशों की लिप्सा शांत करने का सामान-भर ही तो हैं !! कोई देख कर, कोई बोल कर, कोई लिख कर, कोई नोच कर, कोई मार कर, कोई भोग कर सभी तो लगे हैं अपनी लिप्सापूर्ति में ( स्त्री की देह को माध्यम बना कर )| यहाँ भी वे भोगे जाने के लिए शापित हैं –

रेड कॉरिडोर में कराहता सेकेंड सेक्स

माओवादी संगठनों ने सामाजिक राजनीतिक बदलाव की मुहिम छोड़ कर महिलाओं का बर्बर उत्पीड़न शुरू कर दिया है उत्तर प्रदेश,बिहार झारखण्ड और छतीसगढ़ के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में जहाँ इंसान का वास्ता या तो भूख से पड़ता है या फिर बन्दूक से ,माओवादियों ने यौन उत्पीडन की सारी हदें पार कर दी हैं |माओवादी , भोली भाली आदिवासी लड़कियों को बरगलाकर पहले उनका यौन उत्पीडन कर रहे हैं फिर उन्हें जबरन हथियार उठाने को मजबूर किया जा रहा है वहीँ संगठन में शामिल युवतियों का ,पुरुष नक्सलियों द्वारा किये जा रहे अनवरत मानसिक और दैहिक शोषण बेहद खौफनाक परिस्थितियां पैदा कर रहा है वो चाहकर भी न तो इसके खिलाफ आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं |इस पूरे मामले का सर्वाधिक शर्मनाक पहलु ये है कि जो भी महिला कैडर इस उत्पीडन से आजिज आकर जैसे तैसे संगठन छोड़कर मुख्यधारा में वापस लौटने की कोशिश करती हैं ,उनके लिए पुलिस बेइन्तहा मुश्किलें पैदा कर दे रही है ।शांति, बबिता, आरती, चंपा, संगीता…ये वो नाम हैं जिनसे चार -चार राज्यों की पुलिस भी घबराती थी। लेकिन आज पीडब्ल्यूजी एवं एमसीसी की ये सदस्याएं, पुरूष नक्सलियों के दिल दहलाने वाले उत्पीड़न का शिकार हैं।  





आप ने अभिनेता ओमपुरी के जीवन प्रसंगों पर केन्द्रित उनकी पत्नी नंदिता की पुस्तक “अनलाइकली हीरो: ओम पुरी” को लेकर हो रही चर्चाओं के विषय में सुना पढ़ा होगा ही| मेरी चिंता इस सब के बीच पति पत्नी संबंधों के विघटन को लेकर थी| इस लेख से अधिक विस्तार व तथ्यपूर्वक घटनाक्रम की जानकारी मुझे श्री आलोक तोमर जी द्वारा उनके मध्य समझौता कराने की पहल से जुड़े घटनाक्रम द्वारा निरंतर मिल रही थी| कल दोपहर तोमर जी ने जैसे ही मुझे सूचना दी कि ओमपुरी और नंदिता दोनों अभी यहीं बैठे हैं और स्थिति यह है कि दोनों के मध्य सब ठीक हो गया है व अभी अभी पति पत्नी ने सहज भाव से परस्पर एक दुसरे को चूमा भी है| पारिवारिक विघटन की छाया एक दम्पती के परिवार से टल जाने के हर्षातिरेक से भर मैंने बात करनी चाही तो उधर से सीधे नंदिता से ही चैट हो गयी और यह भी पता चला कि विमोचन के समय अब ओमपुरी ही नंदिता की पुस्तक के अंशों का पाठ भी करेंगे| यह घटना भले ही किसी के एकदम वैयक्तिक जीवन से संबंद्ध हो, किन्तु यह तो प्रमाणित करती ही है कि पति पत्नी संबंधों के बीच ज़रा-सा बित्ते-भर अवकाश दीखते ही नज़ारा करने वालों और उसे खाइयों का रूप देने में बाहर से कोई कसर नहीं छोड़ता| कोई विरला ही अपना होता है, जो इन का लाभ उठाए बिना उन्हें वापिस साथ जोड़ मिला सकता है| ओमपुरी जी, नंदिताजी और तोमर जी को बधाई देनेका अवसर है यह|

ऐसे प्रसंगों के लेखन और बाज़ार वाले समीकरण पर केन्द्रित एक आलेख कबाड़खाना पर आया है, उसे आप अवश्य बाँचें –

 

अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार

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आत्मकथा के आयाम में बहुत चितेरे होते हैं, जो पाठकों को आकर्षित करते हैं, किंतु उससे कहीं अधिक आकर्षित करते हैं समाज और निजी जिंदगी के प्रवाह में डूबते-उतराते रिश्ते। संबंधों की अंतरंगता हर किसी के जीवन के खास पहलू होते हैं। उन संबंधों की याद में लोग भावुक होते हैं, जिंदगी से तृष्णा व वितृष्णा होती है और फिर किसी हवा के झोंके के साथ उससे गाहे-बगाहे सामना भी करना पड़ता है।
पाश्चात्य संस्कृति में पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद या हकीकत जो भी हो लेकिन भारतीय परिवेश में इसके मायने अहम हैं। साहित्य, फिल्म के अलावा राजनीति की चमचमाती जिंदगी में संबंधों की अपनी अहमियत है और अंतरंग प्रसंगों को चटखारे लेने की परंपरा भी नई नहीं है। यही कारण है कि पत्रकार नंदिता पुरी द्वारा लिखी गई किताब ‘अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ ओमपुरी’ लोकार्पण होने के पहले ही सुर्खियां बटोर रही है और ओमपुरी के बयान के कारण विवादों की चपेट में है। किसी की जिंदगी के महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सों को सस्ते और चटखारे वाली गॉसिप में बदलना किसी विश्वासघात से कम नहीं है।


 


अब पुनः आते हैं अपने ब्लॉगजगत के  घटनाक्रम में | मुझे गत दिनों रह रह कर एक कथा बहुत याद आती रही, जब  दो शिष्यों ने गुरु की सेवा को आधा आधा बाँटने  के चक्कर में गुरु को ही आधा आधा बाँट लिया था और सोते गुरु को मक्खी से बचाने की चेष्टा में गुरु जी का देह-भंग कर डाला था| ऐसे ही प्रसंगों के लिए नीतिकार कह गए हैं कि मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अधिक अच्छा होता है| दलों में बँटे शिष्यों की चाँव-चाँव सुन कर यह कथा बार बार स्मरण हो आती रही|  बुरा भी लगता रहा | मैं अथवा मेरे जैसे कई लोग जिस पहल को नहीं कर सके उस पहल का दायित्व लिया खुशदीप ने  ब्लॉगिंग की ‘काला पत्थर’लिख कर –



मेरी उस फेहरिस्त में अनूप शुक्ल जी भी हैं और गुरुदेव समीर लाल जी समीर भी…ये मेरी अपनी पसंद है…ये मेरे अपने आइकन है….मैंने एक प्रण लिया…जिस तरह का स्तरीय और लोकाचारी लेखन मेरे आइकन करते हैं…उसी रास्ते पर खुद को चलाने की कोशिश करूंगा…अगर एक फीसदी भी पकड़ पाया तो अपने को धन्य समझूंगा…धीरे-धीरे ब्लॉगिंग करते-करते मुझे तीन महीने हो गए…इस दौरान दूसरी पोस्ट और टिप्पणियों को भी मुझे पढ़ने का काफी मौका मिला…जितना पढ़ा अनूप शुक्ल जी और गुरुदेव समीर के लिए मन में सम्मान और बढ़ता गया…लेकिन एक बात खटकती रही कि दोनों में आपस में तनाव क्यों झलकता है…या वो सिर्फ मौज के लिए इसे झलकते दिखाना चाहते हैं….क्या ये तनाव ठीक वैसा ही है जैसा कि चुंबक के दो सजातीय ध्रुवों के पास आने पर होता है…जितना इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की, मेरे लिए उतनी ही ये रूबिक के पज्जल की तरह विकट होती गई…जैसा पता चलता है कि समीर जी भी शुरुआत में चिट्ठा चर्चा मंडल के साथ जुड़े रहे….किसी वक्त इतनी नजदीकी फिर दूरी में क्यो बदलती गई…
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चिट्ठा चर्चाओं के ज़रिए उछाड़-पछाड़ के खेल से हिंदी ब्लॉगिंग में राजनीति के बीजों को पनपने ही क्यों दिया जाए…राजनीति किस तरह बर्बाद करती है ये तो हम पिछले 62 साल से देश के नेताओं को करते देखते ही आ रहे हैं..

इस प्रकरण का सबसे अच्छा पक्ष समीरलाल जी का बड़प्पन है | वह इसलिए क्योंकि स्थापित हो जाने, या स्वयं गुरु बन जाने, या किसी स्वार्थ के बिना किसी को सार्वजनिक रूप से अपने से अधिक महत्व देना व अपने `तत्सम्बन्धी’ निर्माण में किसी के योगदान को रेखांकित करना वास्तव में प्रशंसनीय है|  अधिकाँश लोग ऐसी विनम्रता केवल स्थापित होने से पूर्व किसी न किसी स्वार्थ वश ही दिखाते हैं|  परन्तु समीर जी और अनूप जी के मध्य ऐसा कोई कारण नहीं है क्योंकि समीर जी स्थापित और लोकप्रिय हो चुके हैं| ऐसे में उनकी ये स्वीकारोक्तियाँ उनका बड़प्पन ही दिखाती हैं| अतः  इस का स्वागत किया जाना चाहिए तथा यह आशा भी कि भविष्य में लोग अपने व्यक्तिगत मन मुटाव को सार्वजनिक मंचों पर अथवा अपने से इतर लोगों के बीच हँसी या विवाद का रूप नहीं लेने देंगे|



चर्चा बहुत लम्बी व समय बहुत अधिक हो गया है | इन गंभीर बातों के साथ आपको छोड़ जाने का जी नहीं होता| सो पहले आप श्रीश जी की एक कविता का रसास्वादन करें –


Shreesh Pathak

‘ सोचता हूँ; कितना कठिन समय है, अभाव, परिस्थिति, लक्ष्य…
‘हुंह; सोचने भी नहीं देते, सब मुझसे ही टकराते हैं और घूरते भी मुझे ही हैं..’
समय कम है और समय की मांग ज्यादा,
जल्दी करना होगा..!
‘ओफ्फो..! सबको जल्दी है..कहाँ धकेल दिया..समय होता तो बोलता भी मुझे ही…’

इतने संघर्षों में मेहनत के बाद भी..
आशा तो है पर..डर लगता है…
जाने क्या होगा..?

कविता को   यहाँ   पूरा पढें |

अनंतिम 

और सप्ताह में टाईमपास करने की समस्या का निदान काजल कुमार जी के इस कार्टून को देख कर स्वतः ढूँढ लें  क्योंकि हमें चर्चा करते हुए पूरे ७ घंटे हो गए हैं | अगले सप्ताह सामना होने तक आपके लिए सर्वमंगल की कामनाओं के साथ विदा लेती हूँ

Kajal Kumar

आओ टाइम पास का नया तरीक़ा दिखाऊं.

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पुनश्च : चर्चा के प्रारंभ में “कल १४ नवम्बर था”  क्योंकि 
(१)  –   मैं आप से ५.३० घंटे पीछे हूँ 
और 
(२) – चर्चा भी १५ की सायं लिखी गयी है |

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attractive,having a good smile
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और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है– वह कौन को 15 उत्तर

  1. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    बहुत सुन्दर विविधता लिए हुए !छुट्टी की वजह से समयाभाव के कारण श्रीश जी की कविता मिस कर गया था आपके चिटठा चर्चा के माध्यम से पढ़ ली !

  2. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    चर्चा सदैव सारगर्भित होती है । चर्चा के बहाने एक तटस्थ समीक्षा हो जाती है तत्कालीन प्रविष्टियों की । आभार ।

  3. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    आपकी चर्चा हमेशा नये रंग लेकर आती है कविता जी…बेहतरीन हमेशा की तरह!

  4. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    समयानुकूल एवँ सारगर्भित चर्चा, आज की चर्चाकार धीर गँभीर विषयों को बड़ी सहजता से व्यक्त करने के श्रेय की हकदार हैं ।खुशदीप नॉनसीरियसली तौर पर सीरियस दृष्टि के आलेख देने में सदैव सक्षम रहे हैं..ब्लॉगजगत के इन मोतियों को बिखरते हुये देखना अपने आप में ब्लॉगिंग विरक्तता की स्थिति दो चार होने जैसा है । मन तो मेरा भी उद्वेलित है.. बस लिख न पाया । खुशदीप ने पहल की है, उनकी अपने ऑइकन के प्रति जो भी परिभाषा हो, हमारे बिखरे मोतियों को ब्लॉगजगत के कल्याण के लिये मुलायम पड़ना चाहिये । इस पोस्ट को इस मँच पर लाकर, चर्चाकार ने सकारात्मक रुख का परिचय दिया है ।विरक्तता और शोक की स्थिति में भी, अचपन जी को पचपन की दृष्टि से बच्चों को बधाई देना अनिवार्य लगा । सो, बालदिवस पर एक चलताऊ पोस्ट हाज़िर-ए-नज़र किया था । किंवा सँज्ञान में आने से वँचित रह गया ।

  5. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    समयानुकूल एवँ सारगर्भित चर्चा, आज की चर्चाकार धीर गँभीर विषयों को बड़ी सहजता से व्यक्त करने के श्रेय की हकदार हैं ।खुशदीप नॉनसीरियसली तौर पर सीरियस दृष्टि के आलेख देने में सदैव सक्षम रहे हैं..ब्लॉगजगत के इन मोतियों को बिखरते हुये देखना अपने आप में ब्लॉगिंग विरक्तता की स्थिति दो चार होने जैसा है । मन तो मेरा भी उद्वेलित है.. बस लिख न पाया । खुशदीप ने पहल की है, उनकी अपने ऑइकन के प्रति जो भी परिभाषा हो, हमारे बिखरे मोतियों को ब्लॉगजगत के कल्याण के लिये मुलायम पड़ना चाहिये । इस पोस्ट को इस मँच पर लाकर, चर्चाकार ने सकारात्मक रुख का परिचय दिया है ।विरक्तता और शोक की स्थिति में भी, अचपन जी को पचपन की दृष्टि से बच्चों को बधाई देना अनिवार्य लगा । सो, बालदिवस पर एक चलताऊ पोस्ट हाज़िर-ए-नज़र किया था । किंवा सँज्ञान में आने से वँचित रह गया ।

  6. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    श्रीश की कविता बेहद शानदार है …अभिव्यक्ति को एक अमूर्त रूप देती है ….. एन डी टीवी पर हुई बहस पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती ..वहां केवल कुछ लोगो का जमावडा था ओर ये उनके निजी विचार …..यधिपी इस कार्यकर्म के कुछ भागो का मै प्रशंसक हूँ पर हमेशा हर बात से सहमत नहीं ….मुक्तिबोध इस पन्ने पर …फिर एक बार ये पन्ना गरिमामय हुआ …..चूँकि आपने आत्मकथा की चर्चा की है .इसलिए कहता हूं के रचनाकार पन्नो पे कुछ ओर दिखाई देता है ओर असल जीवन में कुछ ओर ….हम सब क्यों किसी व्यक्ति विशेष को मानवीय गुण दोष से ऊपर घोषित कर देते है ….ओम पूरी पर बेवजह बवाला मचा रहे है ….. एक साहब हमेशा खुन्नस खाए रहते थे ….कभी हंसते नहीं थे …..सड़क पे चलते तो गाड़ी वालो को गरियाते …स्कूटर पे चलते तो पैदल वालो को……..खुन्नस की इत्ती बुरी आदत थी के रिश्तेदारों के ब्याह पे . फोटोग्राफरों से विशेष आग्रह होता के भाई जब खीचो तो उन्हें फ्रेम से बाहर रखना …. क्रिकेट मैच होता तो क्रिकेट को गरियाते कहते साला क्रिकेट देश को पीछे ले जा रहा है….अंग्रेजी फिल्मो को गाली देते ..अंग्रेजी फिल्मे गंदी ओर अश्लील होती है ,अख़बार में एक दिन गांधी की आलोचना आ गयी तो अख़बार फेंक दिया के गांधी को गाली देना आजकल फैशन है …..(ये बात ओर है के उन्होंने आज तक अपने जीवन में स्कूल की किताबो से इतर कभी कोई किताब गांधी के बारे में खरीद कर नहीं पढ़ी .)… .सारा दिन टी .वी के आगे बैठे रहते के टी वी सीरियल कूड़ा है .उनका दामाद आजकल क्रिकेट के बल्लो का व्योपारी है , उनका छोटा लड़का प्लानेट एम् की दुकान खोलकर बैठा है ओर आजकल उनकी छोटी लड़की टी वी सीरियल के प्रोडक्शन हाउस में जॉब कर रही है हाय जीवन कितना विरोधाभास से भरा है ना ?खैर छोडिये…..एक अच्छी चर्चा के लिए बधाई

  7. बहुत अच्छी और सारगर्भित चर्चा। हर बार की तरह समय और श्रम का प्रचुर निवेश किया गया है। प्रतिभा का तो कहना ही क्या। बधाई स्वीकारें। ब्लॉग के माध्यम ने हमारी उत्सवधर्मिता को और मुखर कर दिया है। यह बालदिवस पर आयी पोस्टों ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया। मैं भी इसके मोहपाश से बच न सका था।🙂

  8. cmpershad कहते हैं:

    क्या जी कविताजी! आप इतने गम्भीर मुद्दे एकदम एक ही चर्चा में उछाल देती हैं कि मुझ जैसे नासमझ टिप्पणीकार को कठिनाई होती है कि किस मुद्दे को चुने और किसे छोडें…खैर"पर इस की उम्मीद कम ही दिखायी पड़ती है , क्योंकि सच की तो कोई कदर ही नहीं है सरकार के घर ।जो कांग्रेस बेशर्मी से कौडा जैसे नेता को समर्थन देती रही वो सच और ईमान दारी तो चाहती ही नही"किरण बेदी जी जैसे ईमानदार व्यक्ति को कौन नेता सराहेगा? आज सुबह ही मधुश्री काबरा जी , सम्पादक ‘समाज प्रवाह’ से बात हो रही थी जिसके दौरान उन्होंने कहा कि ‘ईमानदारी’ शब्द को शब्दकोश से निकाल देना चाहिए। मैं ने कहा कि ‘समाज प्रवाह’ के अगले अंक में इसपर संपादकीय का इंतेज़ार रहेगा:)बहुत अच्छी चर्चा के लिए बधाई। समीरजी [काला पत्थर:)] और अनूपजी [गोरा पहाड:)] दोनों को प्रणाम ब्लागजगत को एक और किचकिच से बचाने के लिए॥ उद्दण्ड्ता के लिए क्षमा मांगते हुए। आखिर कभी कभी बडों से मौज लेने का हक हम को भी है ना🙂

  9. ललित शर्मा कहते हैं:

    कविता जी-सारगर्भित चर्चा रही-आभार

  10. अजित वडनेरकर कहते हैं:

    बेहतरीन चर्चा। मज़ा आया।

  11. बहन कविता वाचक्नवी जी!सन्तुलित और सार्थक चर्चा के लिए बधाई!

  12. ओह उम्दा और बेहतरीन चर्चा…एक साथ कई सरोकार इस चर्चा में..लग रहा था कि आदरणीया कविता जी स्वयं सम्मुख वार्ता कर रही हों…इस विशेष शैली और 'सर्वाधिक' को समेटने की कला को प्रणाम…

  13. ऋषभ कहते हैं:

    नेहरु और मनु के समीकरण में एक विचित्र सा विरोधाभास चमत्कारी है. मुक्तिबोध के बोध की गहराई रोमांचित कराती है कि उन्होंने इमरजेंसी की नंगों की बरात एक दशक से अधिक अवधिपूर्व ही देखली/ दिखादी थी.महाराष्ट्र विधानसभा के चपत-समारोह को भावुकता के बजाय इस तरह भी देखने की ज़रुरत है कि इस बहाने एक उद्दंड नेता ने हिन्दी को जानबूझकर अपमानित कराया है….. उकसावा भी आपराधिक कृत्य है. आत्मकथा और जीवनियाँ तरह तरह के कारणों से लिखी/लिखाई जाती हैं. भारतीय समाज यह जानता है कि दाम्पत्येतर कामसंबंध सदा रहते हैं/ रहे हैं.उन्हें वह इतना अस्वाभाविक नहीं मानता कि व्यक्ति के अन्य चारित्रिक गुणों को भूल जाए. इतने पर भी उसे इन संबंधों का महिमामंडन स्वीकार नहीं है क्योंकि ऐसा करने से इस समाज का नींवाधार -परिवार – खतरे में पड़ता दीखने लगता है. इसलिए इन नातों को सब जानते बूझते यही चाहते हैं कि कुछ तो पर्देदारी बनी रहे. आखिर को आदमी सोशल जानवर है जी!एक हिसाब से ओमपुरी जी बड़े मासूम हैं क्योंकि उनके ऐसे नातों की चर्चा से समाज पर कोई गहरा असर होने की संभावना नहीं है. कुछ दिन चर्चे होंगे…. इतने में किताब के कुछ संस्करण बिक जाएँगे. भला किसी के पक्षकार बन कर बुद्धिव्यवसायी लोग 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' क्यों हुए जा रहे हैं! माओवादी संगठन पूरी तरह भटक चुके हैं…….और किसी भी संवेदनशील रचनाकार के लिए उनकी पक्षधरता इतिहास की वस्तु हो चुकी है. अत्यंत सधी हुई और सटीक चर्चा के लिए अभिनन्दन!!

  14. शरद कोकास कहते हैं:

    बाबा नागार्जुन और मुक्तिबोध को इस तरह याद करना अच्छा लगा

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