टिप्पणियों के रूप में कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले हैं आज


गत सप्ताह की हमारी चर्चा को आप सभी स्नेही मित्रों का जो दुलार मिला, उसके लिए कृतज्ञ हूँ |
डा० अमर कुमार  जी ने कहा –

आपको पुनः अपने मध्य देखना ही सुखद है,बतायेंगी नहीं, इस बीच क्या क्या पढ़ड्डाला ?स्वस्थ, निष्पक्ष और सुरूचिपूर्ण चर्चा के लिए आभार

जय हिंद…
  
उनके लिए हमारा निवेदन है कि  बंधु! पढ़ डाला का हिसाब तो हमें स्वयं नहीं पता; क्योंकि रस परिपाक ही वास्तविक कसौटी है इसकी तो, और उसका पता तो समय ही बताएगा | क्योंकि  ` खाए कितना /क्या ‘ का असली हिसाब  तो `पचाए कितना /क्या‘  ही से लगाना चाहिए | सो, पचाए को चीन्हने में स्वयं हमीं लगे हैं अभी तो, क्या बताएँ ?….
अनूप शुक्ल   जी ने हमारी इक पुरानी कविता अंकित कर हमें विभोर कर दिया | धन्यवाद | यह देखिए उनकी वह टिप्पणी – 

अभी अभी सुबह सुबह आपके द्वारा की चर्चा देखी और संयोग कि कल ही पढ़ी आपकी ही कविता सामने रखी है: 
एक मछली सुनहरी

ताल के तल पर ठहरी
ताकती रही रात भर

दूर चमकते तारे को।

ब्राह्ममुहूर्त में
गिरी एक ओस बूँद
गिरा तारे का आँसू
मछली के मुँह में
पुखराज बन गया।

सप्ताह की शुरुआत आपकी सुरुचि पूर्ण चर्चा से हो यह अपने आप में खुशनुमा एहसास है। जय हो!


इनके अतिरिक्त अरविंद जी, लक्ष्मी एन .गुप्ता जी, वाणी गीत, सतीश सक्सेना जी, ताऊ रामपुरिया जी, खुशदीप सहगल जी, महेंद्र मिश्र जी, शारदा अरोड़ा जी, संगीता पुरी जी, चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी, हिमांशु जी, मीनू खरे जी, उड़न तश्तरी जी, लवली कुमारी जी, ऋषभदेव शर्मा जी  व कनिष्क कश्यप जी  प्रभृति सहृदयों ने अपना समय देकर प्रोत्साहन दिया | सबके प्रति आभारी हूँ|





आज की चर्चा के लिए दिन में कई बार संकलक खोले, तलाशे| हर बार कुछ नए लिंक सुपाठ्य लगते किन्तु अपनी सीमाओं की परिधि में जिन्हें आज की चर्चा के लिए अलग किया, वे मेरे तईं कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं| इन कारकों का उल्लेख किए या न किए इन्हें आप से बाँट रही हूँ, जो निस्संदेह आप को भी महत्त्व के लगेंगे|
 इधर विवादों का मौसम गहराया हुआ है – ऐसा ब्लॉग जगत् के निर्णायक प्रवक्ता लोग कहते हैं/ लिखते हैं| वस्तुत: हमारे यहाँ इधर तर्क को विवाद कहने का प्रचलन होता चला गया है, जबकि तर्क भारतीय संस्कृति का प्राण है| तर्क को प्रमाण का आधार भी माना गया है| भारतीय दर्शन ईश्वर तक पर भी तर्क करता है, और प्रत्येक निर्णय पर पहुँचने के लिए तर्क को प्रमाण माना गया| तर्क का अर्थ ही है विवेक और बुद्धि से औचित्य की प्रामाणिकता|  सत्य की पक्षधरता का आग्रह|  न कि आपत्ति अथवा विरोध| पुनरपि तर्क से निरस्त हो जाने वाली अधिकाँश विचारधाराओं के लिए अतार्किक होना ही सर्वाधिक सबल आधार होते चले जाने के क्रम में अंधाधुध वृद्धि के चलते  तर्क को वाद और उस से भी बढ़ कर विवाद की संज्ञा दे दी गयी| अन्यथा खरे को कसौटी से भला क्या डर?

तर्क के विषय में लंबा तर्क हो गया| अस्तु ! चिट्ठा-लोक में मत -भेदों के बीच इधर महत्वपूर्ण शोध परक और  विचारणीय सामग्री जो आ रही है उस का लाभ पठन-लोभी अवश्य उठाएँ | इस क्रम में मैं  भाषा के नाम पर विवाद और कु -तर्क करने वालों की आँखें खोलने वाले  एक आलेख का उल्लेख सर्वप्रथम करना चाहूँगी| लेख का शीर्षक  है  – 


तूँ कहाँ का है, इस जागाँ तूँ क्यों आया? इस शहर को बाट तूँ क्यों पाया? तुझे कौन दिखलाया?’’ xxx ‘‘सो उस दिलरुबा नार कूँ, दीदियाँ के सिंघार कूँ, चतुर चैसार कूँ, एक सहेली थी,भौत छबीली थी, रात रंगीली थी। नाँव उसका ज़ुल्फ़ था, लट साँवली निपट, रंग कूँ काली, घूँगर वाली।’’
दक्खिनी हिंदी के लेखक वजही (1609) द्वारा रचित गद्य के ये अंश यह सोचने पर विवश करते हैं कि यदि दक्खिनी में 17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में गद्य का यह रूप था तो उस समय के उत्तर के हिंदी रचनाकार ऐसा गद्य क्यों नहीं लिख पाए! स्मरणीय है कि यह समय महाकवि तुलसीदास का समय है। इस प्रश्न से टकराए बिना यदि हम हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के गद्य का उदय 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मानते हैं, तो बड़ी ऐतिहासिक भूल करते हैं। कोई कड़ी है जो बीच से निकल गई है या जानबूझ कर निकाल दी गई है! इस निकली हुई कड़ी का नाम है दक्खिनी’|
खड़ी बोली के साहित्य को भारतेंदु काल से आरंभ मानते हुए प्रायः यह याद कर लिया जाता है कि कभी अमीर खुसरो ने भी इस भाषा में काव्य रचना की थी परंतु उसकी कोई परंपरा न मिलने के कारण उन्हें किसी प्रवर्तन का श्रेय नहीं दिया जाता। गद्य में तो और भी खस्ता हालत है। ब्रज और राजस्थानी के गद्य की चर्चा तो मिलती है लेकिन खड़ी बोली के गद्य की कहीं गंध तक इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है।






 

भाषा की इसी यात्रा को निरंतर अपना  लक्ष्य बना कर शब्दों का सफ़र गतिमान है| इस बार एक और रोचक  यात्रा है शब्द की – 


कीर और रेखा का अर्थ एक ही है। इन दोनों का मूल भी एक है। लिख् और रिष् धातुओं से इनका विकास हुआ है। इनसे बने लेख, लेखनी, लेखक, लीक, लेखक, लेखनी जैसे शब्द तो हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। मगर एक खास बात है रेखा की गणित और हिसाब-किताब में मौजूदगी। स्पष्ट है कि लेखा, लेखा परीक्षक, लेखाकार, लेखापाल और लेखा जोखा जैसे शब्दों का प्रयोग करते वक्त यह अहसास नहीं रहता कि इनका रिश्ता भी लिख-रिष्-राईट की परम्परा से ही जुड़ता है। 





विचार- प्रधान चिट्ठों की शृंखला में इधर एक और चिट्ठा देखने में आया है सत्यार्थ प्रकाश | महर्षि दयानंद सरस्वती के क्रांतिकारी अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के नाम साम्य के कारण भी मुझे  अनायास भला लगना ही था|  सांख्य- दर्शन पर केन्द्रित एक लंबा आलेख आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रातीक्षा कर रहा है| अभी मुझे वहाँ केवल दिनेश राय द्विवेदी जी  की एक टिप्पणी ही दिखाई दे रही है| क्या इसे यही माना जाए कि गंभीर लेखों को पाठक नहीं मिलते ?

लेख का अंश देखें –
बहुत लोग साँख्ययोग को एक साथ जोड़ कर देखते हैं और उसको एक ही पुस्तक या दर्शन समझते हैं। साँख्य के साथ योग का नाम इसलिए लिया जाता है जैसे हम भौतिक-रसायन, जीव-वनस्पति विज्ञानं आदि विषयों को जोड़ी में रखते हैं अन्यथा साँख्य दर्शन एवं योग दर्शन दोनों अलग पुस्तकें हैं और एक दुसरे की पूरक हैं। इसी प्रकार हम न्याय-वैशेषिक (न्याय दर्शन , वैशेषिक दर्शन ) और वेदांत-मीमांसा (वेदांत दर्शन अथवा ब्रह्मसूत्र , मीमांसा दर्शन ) का नाम लेते हैं पर वो सभी हैं अलग -अलग पुस्तकें। साँख्य योग में जगत के उन मूल तत्वों की संख्यात्मक विवेचना की है जो नेत्रों से दिखाई नहीं देते किन्तु जगत के मूल कारण में वो ही तत्व मुख्य होते हैं। और मोक्ष क्या है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है इन सब बातो का भी उसमें उत्तर है । साँख्य को पढने मात्र से ही यह तत्व भेद्ज्ञान नहीं होता जब तक योग दर्शन के अनुरूप सबीज और निर्बीज समाधि तक नहीं पंहुचा जाये। इन तत्वों, आत्मा और इश्वर का साक्षात्कार केवल पढने मात्र या साधारण ज्ञान प्राप्त करने से नहीं होता है इसके लिए उच्च कोटि का पुरषार्थ चाहिए।

इससे स्पष्ट है की वास्तविक सांख्य सिद्दांत अकाल में ही किस प्रकार भ्रान्ति-घटाओं में आच्छादित होते रहे हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री के भाष्य में उनको विच्छिन्न कर वास्तविकताओं को स्पष्ट किया गया है। विवेकशील पाठक मनन करने पर स्वयं अनुभव कर सत्य का निर्धारण कर सकते हैं ।

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रश्मि रविजा   मन का पाखी  पर अपने लेख में खिन्न हो कर लिखती हैं – 
  मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है,शारीरिक विकलांगता 
 

आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था.नृत्य गुरु ‘शाईमक डावर’ भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहें थे.पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज ‘अरशद वारसी’ ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं.उनका कहना था ”अगर भगवान कहीं मिले तो मैं उस से पूछूँगा,उसने आपको ऐसा क्यूँ बनाया (अगर कहीं हमें भगवान मिले तो हम पूछना चाहेंगे ,उसने ‘अरशद वारसी’ को इतना कमअक्ल क्यूँ बनाया.??)तुम हमलोगों से अलग हो और यह हकीकत है,इसलिए तुम्हे दूसरे राउंड के लिए सेलेक्ट नहीं कर सकते.” बाकी दोनों जजों की भी यही राय थी.शाईमक ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकामयाब रहें.

गत दिनों रसायन के लिए संयुक्त रूप से दिए गए नोबल सम्मान में सम्मिलित भारतवंशी के नाम से भारतीय गद गद है|  किन्त्तु  इसका एक दूसरा पक्ष प्रस्तुत  कर रहे हैं अरविंद मिश्रा  –
 
 
आइये आज रसायन के नोबल २००९ की बात करते हैं   
 
उनके प्रश्न का उत्तर तलाशने का यत्न किया जाना चाहिए –

इस नोबेल पुरस्कार से भारत में जन्मे वेंकटरमण रामकृष्णन की बड़ी भूमिका है -मगर इसका श्रेय भारत को मिलने का कोई औचित्य नहीं है -बल्कि इन अवसरों पर भारतीय नियोजकों और नौकरशाही को आत्मचिंतन करना चाहिए कि ऐसे क्या कारण हैं कि जो भारतीय प्रतिभाएं यहाँ उपेक्षा का शिकार होती  हैं वही  अमेरिका में जाकर वैश्विक सम्मान का हकदार  बन जाती हैं ! क्या भारतीय परिवेश प्रतिभाओं के अनुकूल नहीं रह गया है ?

आज  एक प्रकरण पर मन जैसे अटक गया, कई सारे लिंक इधर से उधर क्लिकाते हुए खोजा तो पूरा प्रकरण समझ  में आया |  कुछ माह के मेरे अंतराल की अवधि में घटी घटनाएँ समझ में आईं| मुझे अनुमान है कि इस विषय पर अगला एक भी शब्द लिखते हुए मैं अपने लिए चिट्ठा लोक में कई शत्रु बना लूँगी, शत्रु न सही तो निंदक अथवा कन्नी काटने वाले ही सही , तैयार  हो जाएँगे; किन्तु अचाहे भी लिखने से स्वयं को रोक नहीं सकी| मन काफी खिन्न हुआ| रचना और पाबला जी के बीच ( और इस बहाने  रचना और ब्लॉग जगत् के कई  उसके विरोधियों के बीच एक द्वंद्व युद्ध- सा चल रहा प्रतीत हुआ| कुछ  घटनाएँ इतनी बड़ी नहीं होतीं,  जितना उन्हें रूप दे दिया जाता है| रचना के जन्मादिन पर पाबला जी ने बधाई दी, औरों ने भी बधाई दीं| रचना ने स्वीकार कीं| पश्चात रचना ने अपनी प्रोफाईल नेट से हटाने के क्रम में पाबला जी से उसके जन्मदिन वाली पोस्ट हटाने को कह दिया ताकि कोई व्यक्तिगत जानकारी नेट पर न रहे| पाबला जी ने वहाँ बधाई देने वालों के भी सम्मान का प्रश्न उठाते हुए उनसे राय देने को कहा कि पोस्ट हटाएँ या नहीं| राय न आनी थी न आई| इस  बीच रचना और पाबला जी के  बीच वितर्क  पूर्ण टिप्पणियों का इतिहास मिलता है| अब इस खींचतान ने इतना विकृत रूप ले लिया है कि बात सीधे सीधे एक दूसरे की अनुदारता के उदाहरण व अपने व्यवहार के पक्ष में खोद खोद तर्क देने के क्रम पर बढ़ निकली है या कह लें कि अपनी अपनी सफाई के चक्कर में लगभग एक दूसरे पर लांछन से लगाए जा रहे हैं. (क्षमा कीजिएगा किसी को मेरे शब्द बुरे लगें तो, मैं वास्तव में इस  प्रकरण से अत्यंत खिन्न हूँ और किसी का पक्ष नहीं लेना चाहती, इसलिए अपनी व्यथा इन आधे अधूरे शब्दों में व्यक्त कर रही हूँ)|

वस्तुतः यदि किसी कारण से , वे कारण स्त्री की सुरक्षा से भी जुड़े हो सकते हैं ( जिनका कारण  रचना के नारी को पढने वाले अनुमानित कर सकते हैं / या न भी कोई सुरक्षा कारण हो ) कोई व्यक्ति/ विशेषतः स्त्री, यदि अपने जीवन से सम्बंधित किसी पोस्ट को हटाने की बात कहे तो ( यदि वह पोस्ट किसी सार्वजनिक हित के प्रश्न से न जुडी हो ) तो उसे हटाने में कोई बड़ी आपत्ति किसी को भी नहीं होनी चाहिए| रही उस पर टिप्पणी कर्ताओं के सम्मान की बात , तो बधाई देने वाली टिप्पणियाँ इतना बड़ा प्रश्न नहीं हैं कि उनका निरस्त हो जाना किसी को भी खलता| ऐसी ऐसी घटनाएँ जीवन में होती  हैं कि आप किसी को बधाई देने गए और विवाह आदि मंगल कार्य के बीच में वहाँ आकस्मिक दुर्घटना हो जाती है, लोग भी समझदार होते हैं, ऐसे में भी समझदारी  दिखाते हैं,  न कि  अड़ते हैं कि हम तो बधाई देने और पार्टी खाने आए थे, अब बधाई तो देंगे ही देंगे| हमारी बधाई पलट नहीं सकती|  बड़प्पन इसी में था कि इस प्रकरण को एक इश्यु नहीं बनाया जाता| पर दोनों ओर से कोताही हुई, इसमें अपने अपने कारणों से लोग अपने मनोनुकूल टिप्पणियाँ करते रहे| आग में घी पड़ता रहा| बात बिगड़ती रही| रचना ने प्रथम अप्रैल पर केन्द्रित चर्चा का हवाला देते हुए पाबला जी पर आरोप/ ताना  लगाया और पाबला जी ने अपने पक्ष में तर्क लिखे|

पाबला जी का उद्देश्य मूलतः रचना को मान देना व खुशी देना ही था  और रचना ने भी सहर्ष उसे स्वीकारा  ही, किन्तु लम्बे अन्तराल के पश्चात यदि कोई घटना दोनों में से किसी भी  पक्ष के लिए उस रूप में सुखदाई न रह कर कष्ट दायक बन ने लगे तो मूल उद्देश्य और उसका औचित्य ही समाप्त हो गया | कोई एक तो बड़प्पन दिखाता !!   किसी को तो विचार करना चाहिए कि परस्पर व्यवहार में मृदुलता बनी रहे या मृदुलता नहीं तो कम से कम शत्रुता तो न हो| परन्तु खेद  कि ऐसा नहीं हुआ| पोस्ट को हटाना कोई बड़ा और सार्वजनिक मुद्दा था ही नहीं| बहुत व्यापक सरोकार वाली पोस्ट होती तो उस पर सार्वजनिक राय माँगने की बात उठती| परन्तु यह ऐसा मामला नहीं था| एक पक्ष यदि चूक कर भी रहा है तो दूसरे को अपना बड़प्पन व औदार्य दिखाते हुए बात को सम्हाल लेना चाहिए था| इन अर्थों में मैं पाबला जी से करबद्ध प्रार्थना करती हूँ कि वे इसे यहीं विराम दे कर बात को शांत करें ,  प्रकरण का पटाक्षेप करें और कुछ उदारता बरतें| दोनों को अपने अपने सन्दर्भ में समझना चाहिए कि सभी के अपने अपने कारण होते हैं अपनी अपनी `टची’   होने की अलग सीमा होती है, जैसे आप दोनों की अपने अपने किसी समय रही| दूसरों की भी वैसी ही कोई सीमा हो सकती है, उसे अनदेखा न करें plzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz | लड़ने और विवाद करने के लिए जीवन में बहुत से विचारणीय प्रश्न है, व्यक्तिगत जीवन को इस विवाद का आधार न बनाइये कृपया|

मुझे टिप्पणियों के रूप में कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले हैं आज, किन्तु हमारी पीडा का अनुमान कर इसे आप दोनों अन्यथा नहीं लेंगे व न ही पक्ष विपक्ष में बँटे हुए अन्य ब्लॉगर बंधु |

अब और क्या लिखूँ? कुछ और ब्लॉग आप से बाँटना चाहती थी किन्तु अब मानसिकता उसकी अनुमति नहीं दे रही, इसलिए इतना ही कि –


वरना वो दिन दूर नही कि किसी नियमन आयोग का चौकीदार हमारे सर पर बैठा दिया जाएगा। तब सिवाए पछताने के कुछ हासिल नही होगा । उस से पहले ही हम चिट्ठाजगत के कचरे को साफ़ कर एक बेहतर माहौल बनाएं।शायद ये हम सभी के हित में है।

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टिप्पणियों के रूप में कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले हैं आज को 44 उत्तर

  1. खुशदीप सहगल कहते हैं:

    कविता जी,ऐसे ही चिट्ठा चर्चा को कविता का रूप देती रहें…दिल से बात रखने के लिए साधुवाद…जय हिंद…

  2. Arvind Mishra कहते हैं:

    कविता जी ,आपने निछल मन से चर्चा की -अच्छा लगा ! मगर रचना जी के मामले में मेरे भी कुछ अपने रिजर्वएशंस हैं -इन स्थतियों की काफी हद तक जिम्मेवार वे खुद हैं ! उन्होंने शुरू से ही दरोगाई दिखाई -सहिष्णुता से कोसो दूर ,सदाशयता का लेशमात्र नहीं -उन्होंने मुझे या कितने ही दूसरेब्लागरों को भी हड़काया -वे आज अपनी ही लगाई गयी विष बेलिका विष फल चख रही हैं ! पर सच कहूं यह सारा वितंडा किसी भीसंवेदनशील को दुखी करता है ! मुझे भी उनकी ही बोली भाषा में जवाब देने का जब तब अप्रतिरोध्नीय आवेग हुआ है मगर बाद में पछताया भी हूँ ! आप का निर्देश सर माथे ! अब तक जो हुआ सो हुआ ! आगे आपके इस तेजोपमय आह्वान से सब कुछ शांत होगा और रचना जी का हम पूरे सम्मान से पुनरावर्तन चाहेगें ! और मित्रो से भी यही अपील करें ! यथार्थ तो हैं की मैं निजी तौर पर उनकी प्रतिभा का कायल हूँ बस वे हड़काना और दरोगाई छोड़ दें ! ऐसा वे करती ही क्यों हैं ??

  3. रचना पूरे आवेग के साथ विवाद में प्रवेश करती हैं या खुद ही विवाद की प्रस्थान बिन्दु बनती हैं। फिर जब भी कुछ लोग उन्हें कुछ कहते हैं तो वे पीछे हटती है, तब वे बहुत कुछ समेटती हैं। यह समेटना ठीक नहीं। जब हम किसी विवाद में प्रवेश करें या उस का प्रस्थान बिन्दु बनें तो फिर ऐसा क्या कि उस से पीछे हट जाएँ। जो भी पैदा हो उस का मुकाबला करें। इस तरह बार बार पीछे हटना ही हो तो फिर न विवाद में पड़ें न प्रस्थान बिंदु बनें। जो कीचड़ उछालेगा, कीचड़ उसी पर गिरेगा। पर पहलवान मैदान में तो डटे। किसी को पलायन ही करना है तो पीछे की फिक्र क्यों? लगता है पलायन भी मिथ्या है। वापस लौटने की मंशा के साथ।चर्चा अच्छी है। आशा है करती रहेंगी।

  4. संगीता पुरी कहते हैं:

    शीर्षक देखकर आयी यहां .. कडी भर्त्‍सना की जानेवाली कोई बात मिलेगी यहां .. पर ऐसा तो कुछ आपने लिखा ही नहीं .. पूरे पोस्‍ट में मधुरता ही मधुरता बिखरी मिली !!

  5. Nirmla Kapila कहते हैं:

    चर्चा बहुत अच्छी लगी धन्यवाद्

  6. रचना कहते हैं:

    kavita issi charcha kae manch par kehaa gayaa ki mail dae diya karae so mail hi hi dee thee jab mail par kaaryvaahi naa karkae usko post baan diyaa jaaye to kyaa kiya jaayephir english kae kaemnt kop delete kar diya jaaye ab agar inglish sae itna naarzagi haen to paashchaty sbhyataa ko kyn maantey haen is tippani ko laekar phir post baanyee gayee us par maene koi kament nahin kiya to " paalaayan " kehaa jataa haen aap vidushi , hindi ki gyataa haen jo baat dinesh ji likh rahey usko padh kar to yahii lagtaa hen ki mujhe mr pabla ki dusri post par bhi jwaab dae hi daen thaa par daekhiyae kyaa jwaab haen vish bel ki baat kyun ho rahee haen dr arvind kae kament mae kyaa mujeh uska jwaab dena haen haen yaa nahin kament karo to vish beal haen naa karo to paalayan haen blogger naari ko prajati kehtae haen tab sab taali bajaatey haen mae nahin bajaatee kyuki bheed kaa hissaa nahin hun ki har galat cheez par chup rahunlekin haa blog jagat par agar rule ho to sabkae liyae ek sae hi ho

  7. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    आपकी चर्चा की कुछ लय दिखी आज । आभार ।रचना जी और पाबला जी के तर्क-वितर्कों पर सम्यक दृष्टि डाली है आपने । अजीब तो लग ही रहा है इस बात का इतना बढ़ जाना ।

  8. रचना कहते हैं:

    I was on this forum once told that we should send mail first which i did . Then i was told on the mail that the issue has been put on blog . so i requested the mail to be made public . Now if a blogger wants to bring the issue in public its ok with me . I merely replied to all querries on that post . Now when my commnets in english were deleted on pretextof hindi promotion i merely gave a link to show 2 aspects of the same coin . And lo and behold anothor post comes up , no comments from me , and the comments there say i have "run away" . so mr dinesh says it here also . for me commenting there was not required i did not but was the second post needed ?? and i really have a question for all those who say dont post comments in english , why do they have their profiles on social net working sites like facebook , orkut etc. Are they not followers of western culture . I merely spesk english they follow western culture .

  9. क्रिएटिव मंच कहते हैं:

    शीर्षक पढ़कर इधर आना हुआ ! लेकिन आपकी पोस्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई इसकी भर्त्‍सना करेगा ! यहाँ तो पूर्ण स्नेह भाव ही दिखता है ! यहाँ ब्लॉग जगत में इधर काफी कुछ गलत हो रहा है लेकिन अफसोस इस बात का है कि आपके जैसे चिटठा चर्चा करने वाले स्तम्भ उनको निरंतर हवा दे रहे हैं ! एक बार हम ऐसे लोगों को नजरअंदाज करके देखें ! किसी चिट्ठे की सफलता आप लोग 'कमेंट्स' से आंकते हैं, यह बहुत ही गलत पैमाना है ! कोई नंगई करेगा …नौटंकी करेगा…टुच्चई करेगा तो लोग वहां मजमा लगायेंगे ही ! ज्यादा कुछ न कहके सन्क्षेप में बस इतना ही कि कृपया द्रष्टिकोण में परिवर्तन लायें और गलत तत्वों का विरोध उसे नजर अंदाज करके करें ! अरविन्द जी की प्रतिक्रिया पढ़ी ! मुझे नहीं पता कि रचना जी कौन हैं ! अगर हम ब्लॉग जगत को एक परिवार सरीखा मानते हैं तो परिवार में क्या हर सदस्य का अपना अंदाज … अपनी अलग सोच नहीं होती ? अगर आप इस तरह किसी को जबरिया डांट डपटकर व्यवहार में बदलाव लाने को कह रहे हैं तो क्या यह दरोगाई नहीं है ? जरूरत आज इस बात की ही है कि ऐसे लोगों को उनके हाल पे अकेले छोड़ दिया जाए ! क्योंकि जैसे ही आप अपनी प्रतिक्रिया देते हैं उनका मंतव्य पूरा हो जाता है ! एक बार पुनः आप सबसे अपील है कि कोई भी जो आपस में कटुता ..वैमनस्य..अलगाव…समाज/देश विरोधी बातें करे उससे उलझिए नहीं बस किनारा कर लीजिये !

  10. Meenu Khare कहते हैं:

    "हम लोग स्वनियंत्रण कर बेहतर उदाहरण पेश करें। वरना वो दिन दूर नही कि किसी नियमन आयोग का चौकीदार हमारे सर पर बैठा दिया जाएगा। तब सिवाए पछताने के कुछ हासिल नही होगा । उस से पहले ही हम चिट्ठाजगत के कचरे को साफ़ कर एक बेहतर माहौल बनाएं।शायद ये हम सभी के हित में है। "ज़ैगम मुर्तज़ा की बात से पूरी तरह सहमत. ब्लॉग जगत की इस विषाक्त बेला में इससे ज़्यादा कुछ कहने को दिल गवारा नही कर रहा.

  11. Meenu Khare कहते हैं:

    मन इतना खिन्न था कि यह कहना ही भूल गई कि कविता जी आपकी चर्चा बहुत बहुत अच्छी लगी. शुभकामनाएँ.

  12. बी एस पाबला कहते हैं:

    करबद्ध प्रार्थना वाली बात कह आप मुझे शर्मिंदा कर रही हैं कविता जी। दूसरी पोस्ट का कारण भी मैंने बता दिया था कि वह मूलत: एक टिप्पणी थी जो लम्बी हो रही थी सो पोस्ट में बदल दिया उसे।मुझे नहीं लगता कि आपने यहाँ ऐसा कुछ लिखा है जिसके कारण आपको …कड़ी भर्त्सना और आरोप झेलने को मिलने वाले …एक संयत, सारगर्भित कथन है आपका, मेरी पिछली दो पोस्टों के संदर्भ में।इस मंच का उपयोग करते हुए कहना चाहता हूँ कि उन पोस्टों से शुभेच्छु ब्लॉगर साथियों को जो असहजता हुई है, उसके लिए मुझे खेद है।वैसे, मुस्कुराते हुए एक बात पूछना चाहूँगा कि आपने मुझ अकेले से ही उदार और शांत होने को क्यों कहा? :-)स्नेह बनाए रखिएगा। बी एस पाबला

  13. अल्पना वर्मा कहते हैं:

    कविता जी ,आप की आज की यह चर्चा is samay बहुत ज़रूरी थी.आशा है ,हिंदी चिट्ठाजगत को बचाने के लिए आप का यह प्रयास अवश्य सफल होगा.

  14. विवेक सिंह कहते हैं:

    यह तो वही बात हो गयी कि किसी को इमोशनल करना हो तो उससे कहा जाय, " चल भई इमोशनल हो जा !"

  15. कुश कहते हैं:

    सबसे पहले तो कविता जी को बहुत बधाई इस शानदार चर्चा के लिए.. ऐसी चर्चा करने के लिए साहस की आवश्यकता होती है..आगे, यदि हिंदी ब्लॉगजगत में सिर्फ हिंदी ही लिखी जानी चाहिए तो उन ब्लोग्स को तुंरत डिलीट किया जाते जिन पर भोजपुरी, हरयाणवी या और किसी क्षेत्रीय भाषा में कुछ लिखा जाता हो क्योंकि हमें बढा तो हिंदी को देना है.. वैसे व्यक्तिगत रूप से मैं ये मानताहूँ कि किसी भी ब्लॉग पर कैसी भी टिपण्णी रखना उस ब्लॉग स्वामी के अधिकार में आता है.. इस पर किसी प्रकार की बहस नहीं की जा सकतीबाकीबहस, विवाद, आपत्तिया गलत नहीं है पर सिर्फ तब तक जब तक की वे निजी नहीं हो जाये..

  16. चिट्ठाचर्चा सदैव की भाँति बढ़िया रही।

  17. Suresh Chiplunkar कहते हैं:

    मेरे व्यक्तिगत विचार में, कोई भी व्यक्तिगत ई-मेल चर्चा किसी चिठ्ठे पर नहीं डालना चाहिये… वरना आगे से कोई आपस में दोस्ती का भी ई-मेल नहीं करने वाला…

  18. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    कविता जी, बहुत ही बढ़िया चर्चा के लिए धन्यवाद.मेरे विचार से नियम, कानून, दृष्टिकोण,…वगैरह-वगैरह से ज्यादा महत्वपूर्ण है व्यवहारिकता. एक पोस्ट हटाने की बात को जिस तरह से देखा जाना चाहिए था, मुझे लगता है वैसा हुआ नहीं. टिप्पणीकारों की भावना का आदर वगैरह ऐसी बातें हैं जिनका व्यवहारिकता से ताल-मेल नहीं बैठता.कोई ब्लॉगर या पाठक अगर किसी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए टिप्पणी करता है तो निश्चित तौर पर उस व्यक्ति के लिए टिप्पणीकार के मन में आदर होगा. ऐसे में अगर वह व्यक्ति खुद उस पोस्ट को हटाने के लिए अनुरोध करता है तो इसमें बुराई क्या है? टिप्पणीकारों के मन में अगर सचमुच उस व्यक्ति के प्रति आदर है तो फिर निश्चित तौर पर वे उसकी भावना का भी सम्मान करेंगे. अगर ऐसा नहीं है तो फिर उन टिप्पणियों का ज्यादा कुछ महत्व नहीं है. फिर जन्मदिन की बधाई वाली टिप्पणियां एक औपचारिकता भर हैं. वाह! वाह! टाइप.और किसी भी कमेन्ट को इसलिए डिलीट कर देना कि वह हिंदी की बजाय अंग्रेजी में लिखा गया है, कहाँ तक जायज ठहराया जाएगा, यह किसी बहस का मुद्दा मुझे तो नहीं लगता. हाँ, आजकल के फैशन में तमाम मुद्दे ऐसे छाए हैं जो बहस के लायक नहीं है लेकिन उनपर जी तोड़ बहस की जा रही है. हिंदी का विकास अंग्रेजी को गाली देकर कैसे किया जा रहा है वह दिखाई दे रहा है. आगे भी देता रहेगा.

  19. rashmi ravija कहते हैं:

    बहुत अच्छी चर्चा रही….कई चिट्ठों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली मेरा आलेख शामिल करने के लिए शुक्रिया….अभी एक मास भी नहीं हुआ है मुझे अपना ब्लॉग शुरू किये …पर ब्लॉग जगत के सभी साथियों का बहुत बहुत शुक्रिया उनके स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए…आपकी प्रतिक्रियाएँ मुझे अच्छे लेखन के लिए और भी प्रेरित करेंगी..

  20. रंजना कहते हैं:

    " रस परिपाक ही वास्तविक कसौटी है इसकी तो, और उसका पता तो समय ही बताएगा | क्योंकि ` खाए कितना /क्या ' का असली हिसाब तो `पचाए कितना /क्या' ही से लगाना चाहिए | सो, पचाए को चीन्हने में स्वयं हमीं लगे हैं अभी तो………."कविता दी, आपकी इस उक्ति ने तो तो बस आपका कायल ही बना दिया….कितना सही कहा है आपने….वाह !!! आपकी यह आशंका कि इस चर्चा से आपके अनेकों शत्रु बन जायेंगे या आपकी भर्त्सना करेंगे नितांत ही निराधार है…..मैं तो आपकी भाषा शालीनता और बात को इतने अप्रतिम ढंग से रखने की कला के सम्मुख नतमस्तक हो गयी हूँ….अब अधिक क्या कहूँ, बस पाठकों से यही निवेदन करुँगी कि आपकी विनयशीलता से शिक्षा ग्रहण करें और अपने व्यवहार को उग्र नहीं संयत रखना सीखें..इधर जो चिट्ठाजगत की स्थिति है,मुझे लगता है लिखने वालों से अलग वह जो विसुद्ध पाठक वर्ग है,वह यदि इस धर्म भाषा विचार आदि आदि पर जूतमपैजार वाली स्थिति को देखेगा तो उसे क्या लगेगा……यही है हिन्दी और हिंदी चिठ्ठा का स्तर….ऐसे ही तो आज नेट का उपयोग करने वालों असंख्य लोगों के भीड़ में गिने चुने ही हिन्दी से पठन पाठन और लेखन से जुड़े हैं और अब इस तरह यहाँ का यह हाल रहेगा तो क्या होगा…आज तो जैसे इसे हर तरह से तुच्छ साबित करने का ही अभियान चल रहा है…….कितनी दुर्भाग्यपूर्ण है यह स्थिति …….. क्या कहा जाय….भाइयो,बंधू बांध्वियों ……. सबसे करबद्ध प्रार्थना है,कृपा कर अपने लेखन के माध्यम से हिन्दी के समृद्धि में योगदान दें न कि इसके अधोगति का कारण बनें….आपकी चर्चा में भले ही बहुत से चिठ्ठे समाहित न हो पाए,परन्तु मुख्य समस्या को रेखांकित कर आपने बड़ा ही कल्याणकारी कार्य किया है….आपका यह सवाल किन्ही एक या दो चिथ्तों के लिए नहीं है बल्कि जो लोग भी इस तरह की प्रवृति रखते हैं ,उन सबपर लागू होता है और यह सबको सावधान करता है…

  21. Ratan Singh Shekhawat कहते हैं:

    कविता जी बहुत बढ़िया चर्चा के लिए शुभकामनाएँ !

  22. 'अदा' कहते हैं:

    आपने बहुत ही संयत और मर्यादित तरीके अपनी बात कही है…..और मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रभावित हुई हूँ….धन्यवाद…

  23. rishabhuvach कहते हैं:

    नहीं, मुझे तो कोई पत्थर बरसने/बरसाने वाली बात इस प्रविष्टि में नज़र नहीं आई. ब्लॉग-माध्यम की गरिमा के प्रति आपकी चिंता सहज है, उस पर कोई भी आपत्ति कैसे हो सकती है!तर्क को विवाद से अलगाने की बात में दम है.साथ ही एक और चीज़ की आजकल कमी होती जारी है ,जिसका नाम है…सहिष्णुता.

  24. अनिल कान्त : कहते हैं:

    आपकी चर्चा बहुत बहुत पसंद आई मुझे

  25. शिवम् मिश्रा कहते हैं:

    चर्चा पसंद आई!बाकी सब ज्ञानी है!

  26. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    डा. कविता, अपने विशद प्रवाह से इस चर्चा ने यह तो सिद्ध कर दिया है कि यह आपके ही कीबोर्ड से निकली है । इसकी गुणवत्ता कई बिन्दुओं पर ज़ाहिर भी होती है, पर क्षणे तुष्टा, क्षणे रुष्टा किसिम के वैचारिक स्तर पर इसे विवाद चर्चा के रूप में ढलते हुये देखना मुझे असहज कर रहा है । अप्रत्याशित आवेश की सोच को वैचारिक ज़ामा पहनाने में आपके सहयोग या सहमति को देख आश्चर्य होता है । हम तय करें कि हमारी ज़रूरत क्या है, चिट्ठों की चर्चा, सामयिकी चर्चा, चिट्ठासँसार के उपलब्धियों की चर्चा या विवादों की चर्चा ?मुँह का ज़ायज़ा कड़वा हुआ, और मैंने दर्ज़ कर दिया । सामाजिक समारोहों और बहस – विचार विनिमय के मँच के ज़ेन्डर कॉम्फर्ट प्रिविलेज़ एक समान नहीं होते होंगे न, कविता जी ?

  27. Apoorv कहते हैं:

    बहुत विचारोत्तेजक रही आपकी चर्चा और कुछ जरूरी सवाल भी उठाती हुई..जिनके जवाब ढूँढे जाने चाहिये

  28. Anil Pusadkar कहते हैं:

    बहुत बढिया चर्चा।

  29. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    कल मैंने चर्चा पढ़ी थी। बहुत अच्छा लगा इसे बांचकर। आपकी ही एक कविता फ़िर याद आयी:मन अदहन सा खौलेजब्तब आंच हटाओवरनाढक्कन फ़ूटेंगे।आपने आंच हटाने की कोशिश की। उसके लिये बधाई। चर्चा के लिये आपकी मेहनत वाकई काबिले तारीफ़ है। सुन्दर, शानदार, धीर-गंभीर।रचनाजी जन्मदिन वाली पोस्ट हटाने से संबंधित बातें इस बात का बेहतरीन उदाहरण हैं कि किसी गैरमामूली सी लगती बात पर कितना शानदार विवाद खड़ा कर सकते हैं हम लोग।इसी बहाने कई लोगों ने रचनाजी के बारे में अपनी राय जाहिर करके उनसे अपना हिसाब बराबर कर लिया। मेरी अपनी समझ में रचनाजी का अनुरोध अटपटा और दूसरों की नजर में शायद गैरजरूरी होते हुये भी ऐसा नहीं था कि उसके लिये पंचायत बैठानी पड़े।रचनाजी की अपने जन्मदिन से संबंधित पोस्ट हटवाने के लिये इतना मेहनत करना उसके बाद भी नतीजा ठनठनगोपाल निकलना कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे दफ़्तर में एक कोई आम सर्टिफ़िकेट निकलवाने के लिये आम जनता दर-दर की ठोकरें खाये और उसे जबाब मिले कि भैया आपके मामले में मजबूर हैं। कोरमैं पूरा नहीं हुआ मीटिंग के लिये।रचना जी की रोमन में की हुई टिप्पणियां हटाना एक बचकाना कदम है और ब्लाग लेखक की असहिष्णुता को दर्शाता है। उस ब्लाग पर अंग्रेजी में विज्ञापन हैं, एक टिप्पणी रोमन में भी है। रचनाजी की टिप्पणी रोमन वाली हटा दी गयी साथ में और भी। यह ब्लाग लेखक की मंशा बताता है। यह दुखद स्थिति है।संयोग से वहां पाबलाजी बारे में एक अप्रैल की पोस्ट का जिक्र किया गया है। पाबलाजी के एतराज को देखते ही मैंने देर रात को कुश को फ़ोन किया और उनको बताकर उनका फ़ोटो हटा दिया। हमारे पास भी बहाने हो सकते थे कि अब तो लोग हंस चुके हैं उनकी हंसी वापस कैसे करें? पाबलाजी ने एतराज तो किया है लेकिन मना नहीं किया है काहे को हटायें? बाद में लोगों ने इस बात पर सवाल भी उठाये कि भाई कुश की पोस्ट पर मैंने बदलाव कैसे किया। लेकिन मुझे अच्छा ही लगा कि बाद में भी कि किसी के दुखी होने की कीमत पर हम क्यों किसी को हंसायें।रचनाजी का स्वभाव कैसा है, उनका लेखन कैसा है, वे कैसे मुद्दे रखती हैं, वे क्या करती हैं ,क्या नहीं करती हैं यह सब कहने का यहां मौका नहीं है। उनसे मेरी तमाम असहमतियां हैं, तमाम मतभेद हैं लेकिन मेरी निगाह में वे हिंदी ब्लाग जगत की एक जरूरी उपस्थिति हैं। उनके इस गुण की मैं मन से तारीफ़ करता हूं कि वे जैसा उचित समझती हैं (चाहे वह दूसरों की नजर में अटपटा या बेतुका और फ़ालतू की बात हो) वह पूरी ताकत से करती हैं। पूरे मन से और पूरी ईमानदारी के साथ। वे इस मामले में यह नहीं गिनतीं कि कितने लोग उनके साथ हैं और कितने विरोध में। पाबलाजी हटायें या न हटायें मेरा स्पष्ट मत है कि रचनाजी की मांग ऐसी कोई चांद-सितारे वाली मांग नहीं थी कि जिसके लिये इत्ता बबाल किया जाये। रचनाजी की रोमन में की हुई टिप्पणी हटाना भी गैरजरूरी और असहिष्णु कदम मानता हूं। भले ही आपकी मंशा हो या न हो लेकिन यह असहमति का जानबूझकर किया गया असम्मान लगता है।यहां इस मंच पर इस बात को उठाने के लिये डा.अमर कुमार का एतराज है। लेकिन मालिक जो ब्लाग जगत में हो रहा है उसकी चर्चा करने में एतराज काहे? आपको जो बात क्षणिक लगती है वह शायद दूसरे को उद्धेलित करत हो ई काहे को भूलते हैं आप जी। ई कहते हुये हम यह भी दोहरा दें कि आपकी असहमतियां हमारे लिये दिशा निर्देश का काम करती हैं अक्सर। कम से कम सोचने का मौका तो देती हैं।बकिया चर्चा शानदार च जानदार है। यह दोहराने में कौनौ नुकसान नहीं है कि ऐसी चर्चा आपै कर सकती हैं। लेकिन अफ़सोस कि शीर्षक के मुताबिक आपकी भर्त्सना और आरोप पाने की शंका पर मिनरल वाटर फ़िर गया। किसी ने निंदा नहीं की। आपकी मंशा को ठेंगा दिखा दिया लोगों ने।

  30. बी एस पाबला कहते हैं:

    @ कविता जी,क्षमा चाहूँगा, अपना मौन भंग कर रहा। लेकिन अनूप शुक्ल जी की दो बातों पर विरोध दर्ज़ किया जाए मेरा।उनका कहना है कि रचनाजी की मांग ऐसी कोई चांद-सितारे वाली मांग नहीं थी कि जिसके लिये इत्ता बबाल किया जाये।>>पोस्ट लिखकर बवाल किया नहीं गया था। करना होता तो और भी बहुत कुछ है।रचनाजी की रोमन में की हुई टिप्पणी हटाना … असहमति का जानबूझकर किया गया असम्मान लगता है। … एक टिप्पणी रोमन में भी है।>> असहमति होती, असम्मान करना होता तो रचना जी की कोई टिप्पणी वहाँ न दिखती! उनकी देवनागरी में लिखी बाकी टिप्पणियाँ मौज़ूद हैं और रोमन की एक नहीं दो टिप्पणियाँ दिखेंगी आपको, क्योंकि वह मेरे आग्रह के पहले लिखीं गईं थीं।किसी ब्लॉगर साथी को इस तरह समझाने में मुझे बहुत क्षोभ होता है।यदि बवाल हुया है तो इस तरह की टिप्पणियाँ दे कर उसे बढ़ाया क्यों जा रहा अनुभवी ब्लॉगरों द्वारा। हम तो नादान ठहरे!! बी एस पाबला

  31. अनूप शुक्ला जी ने फिर हमेशा की माफिक भड़काने का काम किया है, यह उनकी आदत है. शर्मनाक काम करते हैं वो वरिष्त होकर भी हमेशा.

  32. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    पाबला जी और स्वार्थीजी। हम अपनी बात कह चुके। अब इसके अलावा और कुछ नहीं कहना मुझे। जो इसके पहले हुआ वह भी नेट पर मौजूद है। जो इसके बाद होगा वह् भी रहेगा। जो मेरे विचार थे वे मैंने कहे। अब यह आप और दूसरे साथियों पर है कि वे इसे किस तरह लेते हैं।

  33. रचना कहते हैं:

    @dr amar when and where we ask for gender comfor previlege what woman gets from society is gender bais and "protection" to justify this bais . there is a comment on mr pablas post ऒऎ छड्ड यार, सिक्खाँ नें ज़नानियाँ दे मूँ लगदे चँगा नईं लगदा ।why cant we just discuss things as blogger to blogger gender bais is state of mind and comes out in may forms even to settle the issue we need to be told that we are settling "because you are woman" as long as it happens our grouse that "man can do any thing against woman and justify it as well " stands as its . ok i am woman , i write , someone doesnot like but does that mean you can write a post or comment on me on personal likes and dislikes , o my clothes , on my up bringing and then make ten of your friends comment on it and justify it no dont give up your issues any one dont pity me for my being a woman but target my issues , target my writings and @dr arvind we all want others to change why ? its better we change ourselfs as oer the circumstances . i did precisely that by closing my profile i was the one who encouraged woman bloggers to write with name with profile but the way things are here its better not to . @dinesh I am really intersted in knowing who told you that i have run away from hindi bloging { i never told you , i never announced it on the blog } be honest and tell me who shared with you this information because that will show how rumor mongering takes place and how we all promote it @ranjana I have to say sorry to you because when you started bloging i was against your blogging without a profile and i commented on the same may time . But my dear ranjana you sure were right then it self . its better that we dont have a profile at all in hindi bloging because i raised a comment on your personal choice on the public domain i am saying sorry also on the public domain

  34. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    @ रचना सिंह ( RS )पहले डा.कविता के चर्चा से ही कुछ अँश :" वस्तुतः यदि किसी कारण से , वे कारण स्त्री की सुरक्षा से भी जुड़े हो सकते हैं ( जिनका कारण रचना के नारी को पढने वाले अनुमानित कर सकते हैं / या न भी कोई सुरक्षा कारण हो ) कोई व्यक्ति/ विशेषतः स्त्री, यदि अपने जीवन से सम्बंधित किसी पोस्ट को हटाने की बात कहे तो ( यदि वह पोस्ट किसी सार्वजनिक हित के प्रश्न से न जुडी हो ) तो उसे हटाने में कोई बड़ी आपत्ति किसी को भी नहीं होनी चाहिए | "What can define the Gender Comfort Priviledge, more than this plea ?एक पक्ष यदि चूक कर भी रहा है तो दूसरे को अपना बड़प्पन व औदार्य दिखाते हुए बात को सम्हाल लेना चाहिए था| इन अर्थों में मैं पाबला जी से करबद्ध प्रार्थना करती हूँ कि वे इसे यहीं विराम दे कर बात को शांत करें , प्रकरण का पटाक्षेप करें और कुछ उदारता बरतें |Behind this IF ( एक पक्ष यदि चूक कर भी रहा है ) who has been pointed out ?अपने अपने कारण होते हैं अपनी अपनी `टची' होने की अलग सीमा होती है, जैसे आप दोनों की अपने अपने किसी समय रही | Does the limit of being TOUCHY has any bounds ?लड़ने और विवाद करने के लिए जीवन में बहुत से विचारणीय प्रश्न है, व्यक्तिगत जीवन को इस विवाद का आधार न बनाइये कृपया |It is the the point where we should ponder, not on trivial issues, just for the sake of deffering to differ ! You agreed to to it, Thanks Dr. Kavita !हमारे देश की राजनीति में एक नेता हुआ करते थे, स्व. श्री राजनारायण ! वह विवाद खड़े करने और विरोध का मार्ग अपना कर हमेशा सुर्खियॊं में लटके रहते थे । इस कदर कि उनको सुरक्षाकर्मी टाँग कर बाहर ले जाया करते थे । उनका यह चस्का इस क़दर बढ़ गया कि वह इन सुर्खियों पर आरूढ़ होने को सनद्ध हो बैठे, यहाँ इसी रायबरेली से चुनाव हारे, और इसे भी सुर्ख़ी बनाये रखने में अदालतों को माध्यम बनाया । क्या हुआ, पूरा प्रजातँत्र कुछ महीनों के लिये, आपातकाल के अँधेरों में डूब गया । यह उदाहरण राजनीतिज्ञ से देना मेरी बाध्यता थी ।सो, मैं नहीं मानता कि, असहमत बने रहने या असहमत दिखने के लिये ही, हर बिन्दु पर असहमति जताना कोई रचनात्मक योगदान है ।किसी असहमति पर बिना किसी तर्क के अपनी सहमति का ठप्पा लगा देना, एक बुद्धिहीन और कुटिल मज़ाक है ।रही बात " ज़नानियों दे मूँ नईं लगना " तो यह आवश्यक था, मुझे यकीन है कि इसने पाबला पर ठँडा पानी डाल दिया ।इसी सँदर्भ में मैं आपसे आग्रह करूँ कि" ज़नानियों दे मूँ नईं लगना "" बच्चों के बात पर मन छोटा नहीं करते "" बड़ों की बात का बुरा नहीं मानते "" बेचारा अनपढ़ है, उसकी बातों पर ध्यान मत दो "" बाबू जी फोकट में इत्ता पढ़े लिखे थोड़े ही हैं, तुम चुप मार जाओ "इन सब उदाहरणों को रेखाँकित करते हुये, इसके पीछे निहित मँशा पर मनन करें ।अलबत्ता, श्री अनूप कुमार शुक्ल ’ फुरसतिया जी ’ की टिप्पणी पर मैं कुछ न कहूँगा ।क्लिनिक का समय 1 से 6 का है, और भी काम हैं मुये इस ब्लागिंग के सिवा !

  35. mukti कहते हैं:

    चिट्ठाचर्चा हमेशा ही अच्छी लगती है. पर ब्लॉग-जगत के कुछ प्रसंग मन में कड़वाहट भर देते हैं और कुछ दिनों तक लिखने का मन ही नहीं करता. मुझे इस प्रसंग के विषय में नहीं पता था. हालाँकि मैंने इस बात पर ध्यान दिया था कि रचना जी की प्रोफ़ाइल नहीं दिख रही थी. सैद्धांतिक मुद्दों पर होने वाले विवादों का कोई हल नहीं होता. इसलिये सभी को अपना काम उसी तरह करते रहना चाहिये.

  36. रंजना कहते हैं:

    रचना जी,चूँकि मेरे पास आपका मेल आई डी नहीं है,इसलिए सार्वजानिक स्थल पर आपसे बात कर रही हूँ….इमानदारी से कहूँ तो इस प्रकरण से भिज्ञ होने के बाद मुझे भी लगा कि तुंरत ही अपने प्रोफाइल में से व्यक्तिगत जानकारिया तथा फोटो हटा लूँ….क्योंकि एक नारी होने के नाते किसी भी काम से आवश्यक अपनी रक्षा करना है.अनूप भाई ने अपनी टिपण्णी में जो कुछ भी कहा है शब्दशः उससे सहमत हूँ और उन शब्दों को मेरे शब्द मान लें…वैचारिक धरातल पर कुछ मुद्दों पर भले आपसे असहमति हो,परन्तु जिस किसी बात पर आपसे सहमति होती है,आपने मुझे अपने साथ पाया होगा,यह बताने की आवशयकता नहीं….जहाँ तक आपके सॉरी कहने का प्रश्न है, कृपया मुझे शर्मिंदा न करें…..मुझे तो प्रकरण याद भी नहीं…लेकिन हाँ अब जब आपने बात छेड़ी तो मुझे लगा कि यदि उस समय यह प्रसंग घटित न हुआ होता तो संभवतः आज भी मैं अंतरजाल पर हिन्दी चिठ्ठों की पाठक ही होती जैसे लेखन से पूर्व बरसों से थी….कहीं न कहीं मेरे ब्लॉग लेखन की प्रेरक आप ही हैं…इसलिए मैं तो आपकी आभारी हूँ…मेरा विश्वास है, दुःख के गर्भ में ही सुख के बीज छुपे होते हैं…और मैंने इसे आजतक सच ही पाया है…अभी मुझे यह बहुत ही अखर रहा है कि आप जैसी जीवट वाली स्त्री इस तरह से हताशा के मध्य हैं….आपसे अनुरोध है कि कृपया पूर्व की भांति पुनः अपना लेखन आरम्भ करें…क्योंकि किसी भी बात पर अड़कर अपना पक्ष रखने वाला और नारी हितों की चिंता अपने ढंग से करने वाला आपसा व्यक्तित्व ब्लॉग जगत में विरले ही है…वस्तुतः मेरे और आपके अभियान में कोई विशेष अंतर नहीं,अंतर है तो बस अभिव्यक्ति के ढंग में….मेरे जीवन का उद्देश्य भी हर पीड़ित दुखी के हित के लिए खड़े होना है….इस प्रकरण पर पानी डालें….अनावश्यक ही यह उर्जा का क्षरण कर रहा है और पूर्ण मनोयोग से पुनः लेखन कार्य में जुट जाएँ….मेरी शुभकामनाये सदा आपके साथ हैं…

  37. रचना कहते हैं:

    अभी मुझे यह बहुत ही अखर रहा है कि आप जैसी जीवट वाली स्त्री इस तरह से हताशा के मध्य हैं.हताशा is shabd ko ranjana mujh sae naa jodae naa aaj naa kabhie baaki ek sorry due thaa so dae diyaa diwali par khush ho jaayae kyuki "kuchh to mila " shubh diwali aap ko aur aap kae parivaar ko

  38. बाप रे!! दीवाली के पहले इतनी आतिशबाजी? पता नहीं क्यों , तमाम टिप्पणियां आपस में सवाल फ़िर उनके जवाब….सब पढते-पढते संसद की कार्यवाही याद आने लगी….जैसे बिना स्पीकर की संसद हो…मुझे तो अनूप जी की बात सही लग रही है…मामला इतना तूल देने वाला तो नहीं ही था.

  39. प्रकाश पाखी कहते हैं:

    I respct all emotins shared by kavita ji and rachna ji..and for all wars that are being fought on blog grounds my comments are as under—zzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzzz!it is right time to say good night!wishing all of u a happy diwali!

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