जब भी महफ़िल में नजारों की बात होती है


ब्लागर महफ़िल

जब भी महफ़िल में नजारों की बात होती है,
आसमान में चांद-सितारों की बात होती है,
उस समय लब पर तुम्हारा ही नाम आता है,
जब भी गुलशन में बहारों की बात होती है।

आज सुबह जबसे शब्दों का सफ़र देखा तबसे यही शेर आ रहा था इसकी तारीफ़ में। संयोग से इस ब्लाग की पहली पोस्ट से मैं इससे पाठक की हैसियत से जुड़ा रहा। फ़िर अजित जी से बातचीत शुरू हुई तो और परिचय खुले। कालान्तर में अजितजी हमारे बचपन के मित्र विकास तैलंग की रिश्तेदारी में बरामद हुये। कनपुरिया संबंध भी पकड़े गये हम लोगों में। यह सब न भी होता तब भी अजितजी शायद हमारे इत्ते ही अजीज होते। उनका ब्लाग हिन्दी ब्लागजगत की सबसे चमकदार उपलब्धि है। अगर किसी दूसरे माध्यम( प्रिंट मीडिया/टेलीमीडिया) से कोई सिनेमाई अंदाज में भिड़ंत हो और कोई हमसे हांके हमारे पास ये है हमारे पास वो है तो हम ऐंठ के ब्लागजगत के प्रतिनिधि की हैसियत से कह सकते हैं हमारे पास शब्दों सफ़र है। बेचारा अपना सा मुंह (हम तो देने से रहे अपना मुंह) लेकर रह जायेगा।

अजितजी ने अपने ब्लाग के दो साल के सफ़र में बकलमखुद की सौवीं पोस्ट के मौके पर शब्दों के सफ़र का लेखा-जोखा पेश किया:

शब्दों का सफर को 2 साल पूरे हो चुके हैं और इस अर्से में लगभग हर रोज यह अपडेट हुआ है। करीब 700 पोस्ट अब तक लिखी गई हैं जिनमें 100 पोस्ट का योगदान बकलमखुद के लेखकों का है। इस अवधि में करीब 8500 टिप्पणियां सफर को मिलीं जिनमें करीब 1500 टिप्पणियां बकलमखुद लिखनेवाले 15 उन साथी ब्लागरों के आत्मकथ्य पर आईं है जिन्होंने अपने व्यस्ततम वक्त में हमारे आग्रह पर शब्दों का सफर के जरिये समूचे ब्लागजगत के साथ अपनी वह अनकही साझा की जिसे अन्यथा वे कभी नहीं कहते।

शब्दों के सफ़र की खासियत उसकी नियमितता रही। यह एक राजा बेटा टाइप ब्लाग हमेशा रहा। वर्तनी दोष से पूर्णतया मुक्त इस ब्लाग का रखरखाव अजित जी ने बहुत सलीके से किया। कोई पोस्ट ऐसी नहीं दिखी जिसकी फ़ोटो गड़बड़ रही हो या फ़िर हेडिंग। सलीके और सिलसिलेवार प्रस्तुति की पाठशाला है शब्दों का सफ़र।

इन दो सालों के दौरान अजितजी ने एक बार भी थकेले होने का रोना नहीं रोया। ब्लाग पर टिप्पणियों के लिये आभारी अवश्य हुये सौजन्यता और सज्जनता के चलते लेकिन ऊ सब हरकतें नहीं करी जो आमतौर पर ब्लागर साथियों का कापीराइट मानी जाती हैं। सम्पादन कला का हुनर उनके ब्लाग पर आइने की तरह चमकता दीखता है। पोस्ट की हर सामग्री वहीं रहती है जहां उसको होना चाहिये। सुधार की गुंजाइश छोड़ने के मामले में अजीतजी भौत कंजूस हैं। कोई स्कोप नहीं सुधार का। अल्टीमेट टाइप पोस्टें!

यह बात अक्सर होती रही कि शब्दों का सफ़र और बलकलमखुद को अलग-अलग होना चाहिये क्या? लेकिन अब यह बहस बेमानी लगती है। जैसा है वैसा उचित है। अब बलकलमखुद कही और शायद उत्ता न जमें। एक सदगृह्स्थ की तरह अजित जी लगभग शुरू से ही सद्ब्लागर बने रहे। बेकार के पंगे में अपना समय बरबाद नहीं किया। अलबत्ता पंगेबाज से बकलमखुद लिखवा लिया। एकाध पोस्ट मोहल्ले और शायद एक पोस्ट कबाड़खाना पर लिखने के अलावा लगभग सारा लेखन अजितजी ने शब्दों के सफ़र पर ही किया।

आशा है कि शब्दों का सफ़र बहुत बहुत समय तक हमारे लिये नित नये शब्द भंडार और ब्लाग जगत के साथियों से परिचित कराने वाला ब्लाग बना रहेगा। अजित जी को इस मौके पर अनेकानेक शुभकामनायें।

कल शिक्षक दिवस के मौके पर तमाम लोगों ने पोस्टें लिखीं। आदर के साथ अपने गुरुजनों को याद किया। कुछ लोगों ने मौज-मजे के बहाने कुछ पोस्टें लिखीं जिस पर कुछ लोगों ने एतराज भी किया। विनीत कुमार ने इस मौके पर एफ़ एम रेडियो जाकी के द्वारा किये जा रहे सवाल क्या आपने किसी टीचर को प्रपोज किया है पर चिन्तन मनन किया और जमकर किया। गिरिजेश राव ने आज के पढ़े सारे लेखों में सर्वोत्तम लेख बताया तो इस लेख पर दिलीप मण्डल की टिप्पणी (…हर बात को समस्या न मान लें)पर सुरेश चिपलूनकर की प्रतिक्रिया है-कल को यही छिछोरा/छिछोरी रेडियो जॉकी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रक्षाबन्धन के दिन सवाल पूछेगी “क्या आपने अपनी बहन के साथ सेक्स किया है?” तब सारी धर्म-संस्कृति-सहिष्णुता पिछवाड़े से बाहर निकल आयेगी…

बकौल हेमंत शिक्षक दिवस पर पढ़ी अब तक की सबसे अच्छी पोस्ट में नयी वाली शिखा मिस के बारे में हिमांशु बाजपेयी ने बताया है। नयी वाली शिखा मिस को अपना प्रेरणास्रोत बताते हुये हिमांशु लिखते हैं:

मैं आज भी सबसे तेज़, सबसे बेहतर उत्तर देना चाहता हूँ क्यूंकि ऐसा करने के बाद मैं सचमुच ऐसा महसूस करता हूँ की मानो नयी वाली शिखा मिस मेरे गाल पर हाथ फेर रहीं हों ।

अभय तिवारी का मानना है कि : गुरु का स्वाभाविक स्वरूप स्त्री का है। और वह भी एक बच्चे के साथ या बच्चों से घिरी स्त्री का। हर स्त्री माँ हो यह ज़रूरी नहीं लेकिन हर माँ गुरु ज़रूर होती है। अपने बच्चे की प्रथम गुरु और सम्भवतः सबसे महत्वपूर्ण गुरु भी। माँ स्वाभाविक गुरु है, बच्चा स्वाभाविक शिष्य है।

ब्लागवाणी पर कुछ पोस्टों को देखकर खिन्न होकर शेफ़ालीजी ने पोस्ट लिखी तो फ़ुरसतिया की पोस्ट पर अपनी राय जाहिर करते हुये हेमपाण्डेयजी ने टिप्पणी की:अनेक ब्लोगर बन्धु पेशे से गुरु हैं. उनकी भावनाओं का तो ध्यान रखा होता.

ज्ञानजी नये-नये शब्द गड़ने का काम धड़ल्ले से करते रहते हैं। अब यह बात अलग है कि उनके द्वारा गढ़े हुये उसी अंदाज में गढ़े जाते हैं जिस अंदाज में राजभाषा वाले लोग गढ़ते हैं। वे शब्द बालू में बनायी सुन्दर कलाकृति की तरह होते हैं जो कि जहां गढ़े जाते हैं बस वहीं रहते हैं। वहां से आगे ले जाने में टूट-फ़ूट का खतरा रहता है। आज ज्ञानजी ने जो शब्द गढ़ा वह उतना ही बोधगम्य और सहज है जितना अरविन्द मिश्रजी के ब्लाग का नाम क्वचिदन्यतोअपि……….! मैंने बीस बार बिना देखे उच्चारित करने का प्रयास किया लेकिन पचीस बार सुन्दर असफ़लता हाथ लगी। ब्लागर साथियों ने उनके द्वारा सिक्कियाये गये (Coin किये गये) शब्द को कुतर-कुतर कर उसी तरह देखा जैसे हनुमानजी ने उनको दी हुयी माला कों
कुतर-कुतर कर देखा था कि उसमें कहीं राम का नाम है क्या? सारे कुतरे हुये शब्द मानसिक हलचल में ही पड़े हुये हैं।

अब जब यहां अरविन्द मिश्र जी की बात हो रही है तो जानकारी देना जरूरी हो जाता है कि खुदा ने उनका छप्पर फ़ाड़ के उनको कुछ दिया है। क्या दिया है यह उनके यहां ही देखिये।

ब्लागिंग संबंधी कई तकनीकी जानकारियां आपको आज यहां मिलेंगी।

विवेक सिंह न जाने क्यों आज पहेलिया बुझाते दिखे। डा.अमर कुमार के पास आज दिन में समय था और समय का सदुपयोग करते हुये उन्होंने विवेक सिंह की प्रहेलिका को फ़ींच कर धर दिया उनके ही ब्लाग में सुखाने के लिये। देख लीजिये!

अभय तिवारी द्वारा बनाई गयी फ़िल्म सरपत अगर आप मंगवाना चाहते हैं तो दाम-पता यहां दिये हैं। देखिये। अठारह मिनट की फ़िल्म जिसे आपके ही ब्लागर साथी ने बनाया है देखकर आपको अच्छा लगेगा।

यदि पोस्ट लिखते ही यमराज प्राण लेने आ जांय तो ? उपर से यमराज टिप्पणी भी करें !!!! तो आप का करेंगे। अरे वही करियेगा जो सतीश पंचम बताये हैं। देखिये न! उनकी समस्या सुनिये। हल करने के लिये थोड़ी न कह रहे हैं!

ताऊ की ३८ वीं पहेली की विजेता प्रेमलता पाण्डेजी चुनी गयी हैं! देखिये खबर विस्तार से। प्रेमलताजी को बधाई!

रवीशकुमार बिन पाकेट कमीज़ और पतलून में दिखे। आप भी देखिये! अंदाज शायराना हैं जी!

हिन्दी साहित्य मंच की कविता प्रतियोगिता का परिणाम घोषितहो गये। विजेताओं को हमारी भी बधाई!

भावना पाण्डेजी अपनी पहली कविता पेश करती हैं:

कभी लहराती हूँ ,
कभी छलकती हूँ ,
कभी ठहरती हूँ ,
कभी उफना जाती हूँ ,
स्त्री हूँ ,
नीर सी बहती हूँ ।

और अंत में

रात करीब साढ़े दस बजे से शुरू करके बारह बजकर पांच मिनट पर यह चर्चा पोस्ट करते हुये कामना कर रहे हैं कि आपका नया सप्ताह चकाचक बीते।

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यह प्रविष्टि Uncategorized में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

जब भी महफ़िल में नजारों की बात होती है को 24 उत्तर

  1. anitakumar कहते हैं:

    शब्दों का सफ़र हिन्दी ब्लोगजगत के शीर्ष पर है और अजीत जी की सम्पादन कला का कोई सानी नहीं इसमें तो कोई दो राय नहीं। हम आशा करते हैं कि ये सफ़र सालों साल तक चलता रहे, हम अजीत को टिप्पणियों का टॉनिक पिलाते रहेगें। ज्ञान जी के बनाये हुए नये शब्द रेत के महल होते हैं कि नहीं पता नहीं पर बहुत क्यूट होते हैं जो उस समय तो सटीक लगते हैं। अरविन्द जी के ब्लोग का नाम का उच्चारण करने का हम तो साहस भी नहीं कर सकते, आप की असफ़लता तो कम से कम सुंदर रही।

  2. venus kesari कहते हैं:

    शब्दों का सफ़र से ही हो कर आ रहे है हम तो इब्लॉग के जबरदस्त फैन हैं बहुत बढ़िया और नई जानकारी देती हुई पोस्ट पढने को मिलती है बाकी आज ब्लोगिंग कर के वापसी की राह पर चिटठा चर्चा से मुलाक़ात हुई इसलिए अधिकतर लिंक पढ़े हुए मिले जहाँ नहीं पहुच पाए ठ लिंक के जरिये टहल आये बाकी आज का दिन तो बहुत बुरा गुजरा एक सप्ताह का काम एक दिन में निपटाना पढ़ाइस लिए ब्लोगिंग का समय काट के हम तो चले सोने गुड नैट :)वीनस केसरी

  3. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    रात की तन्हाई में अचानक तुम कौंध जाते हो,सवाल बस एक ही, ऎई क्या चर्चा नहीं पढ़ोगेफींच-फाँच भूलिये और,जो हुआ उसे आप तो नज़र अन्दाज़ कीजियेबस, अब एक नये ताल्लुक का आगाज़ कीजियेशब-बख़ैर

  4. Udan Tashtari कहते हैं:

    शब्दों का सफर सही मायने में हिन्दी ब्लॉगजगत की उपलब्धि है.आज की चर्चा-बेहतरीन चर्चा.

  5. विवेक सिंह कहते हैं:

    रात्रिकालीन चर्चा सुन्दर है,अजित जी बेमिसाल हैं !घर बैठे कर लें सफर, जाना पडे न दूर । शब्दों के इस सफर में , रोचकता भरपूर ॥ रोचकता भरपूर, ज्ञान के बीज बो रहे । शब्दों के सम्बन्ध देख हम चकित हो रहे ॥विवेक सिंह यों कहें, अजित जी कमाल करते ।शब्द-समुद्र विशाल बीच स्वच्छ्न्द विचरते ॥

  6. शब्दों का सफ़र ,वास्तव में अपनी तरह का अनोखा ब्लाग है और इसी लिये यह इतना लोकप्रिय भी है।सम्पादन,प्रस्तुति के क्या कहने..बहुत-बहुत बधाई…

  7. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    "हम ऐंठ के ब्लागजगत के प्रतिनिधि की हैसियत से कह सकते हैं हमारे पास शब्दों सफ़र है। बेचारा अपना सा मुंह (हम तो देने से रहे अपना मुंह) लेकर रह जायेगा।"सारांश कह दिया है आपने । शब्दों के सफर का सफर निरन्तर जारी रहे ।

  8. Arvind Mishra कहते हैं:

    बहुत सटीक और सूक्ष्म ,ज्ञान जी को हतोस्ताहित न किया जाय वे एडिसन जैसे परिश्रमी है और निःशब्द सुवर्ण खोज और शब्द निर्माण में लगे रहते हैं एडिसन की तरह जिन्हें २०० असफल प्रयासों के बाद बल्ब बनाए की सूझ आयी -अंगार वे इसे असफलता न मान कर कहते रहे की उन्हें २०० ऐसे तरीके मालूम हो गए हैं जिनसे बल्ब नहीं बनाए जा सकते ! अजित जी के शब्द सफर का का मैं पहले से ही मुरीद रहा हूँ -उन्हें दिल से सहज ही शुभकामनाएं मिलती रहती हैं ! क्वचिदन्य्तोअपि बोलने में नहीं गूगल ट्रांस्लितेरेशन पर भी कठिन ही है मगर मुझे इस बात का गर्व रहेगा अगर कम से कम इस क्लिष्ट शब्द समास को लोगों को रटा सका -जानता हूँ अनिता जी तब भी अपवाद रहेगीं -हो सकता है मैं इस के सही उच्चारण पर एक प्रोत्साहन प्रतियोगिता ही रख दूं तब देखिएगा कैसे कूद कूद कर लोग आते हैं इसका उच्चारण करने -जाहिर है जजों में एक आप रहेगें ,एक वाचकनवी जी और अनिता जी चाहें तो प्रतियोगी या आप द्बारा नामित जज हो सकती हैं !

  9. कुश कहते हैं:

    इन दो सालों के दौरान अजितजी ने एक बार भी थकेले होने का रोना नहीं रोया।तो क्या किसी और ने रोया है..? यदि आपका जवाब हाँ है तो नाम बताइए.. अजी यहाँ नहीं बता सकते तो मेसेज ही कर दीजिये.. हम कौन बुरा मान रहे है.. अजीत जी को तो ढेरो बधाई

  10. Nirmla Kapila कहते हैं:

    शब्दों के सफर से अभिभूत हूँ उनकी कर्मनिषठा को सलाम है अजीत जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें उनका सफर ब्लाग जगत की उपलब्धि है आपका भी आभार इस सुन्दर पोस्ट के लिये।

  11. अजित वडनेरकर कहते हैं:

    अनूप जी की जै हो। चौबीस घंटों बाद ब्रॉडबैंड अब जाकर सामान्य हो पाया है। आपका और साथियों का बहुत बहुत शुक्रिया कि बकलमखुद के बहाने शब्दों का सफर को भी आशीर्वचन दे डाले।

  12. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    शब्दों के सफर का जवाब नहीं …उसके लिए अजीत जी जैसा कर्मठ ओर लगनशील व्यक्तित्व चाहिए ….निसंदेह हिंदी ब्लॉग को उनकी ये एक अमूल्य देन है ….

  13. शब्दों के सफ़र का सचमुच जवाब नहीं.और आपका भी जवाब नही जो इतनी लगन और मेहनत से चिट्ठाचर्चा को अन्जाम देते हैं.बधाई.

  14. अजित जी की मेहनत वाकई कबीले तारीफ है .शब्दों का सफ़र और बकलमखुद दोनों ही बहुत बेहतरीन उपलब्धि हैं हिंदी ब्लॉग जगत में

  15. बी एस पाबला कहते हैं:

    सच्चीशब्दों का सफर दा ज़वाब नहींऔर फिर यह कहना किहमारे पास शब्दों का सफर हैवाह वाहअस्वस्थता के दौर में कुछ ब्लॉग नज़र से चूक गए थे, यहाँ से लिंक मिल गएआभार बी एस पाबला

  16. cmpershad कहते हैं:

    "कोई सिनेमाई अंदाज में भिड़ंत हो और कोई हमसे हांके हमारे पास ये है हमारे पास वो है तो हम ऐंठ के ब्लागजगत के प्रतिनिधि की हैसियत से कह सकते हैं हमारे पास शब्दों सफ़र है।"हां जी, बिलकुल… मेरे पास माँ है—- इश्टाइल में:)

  17. Shefali Pande कहते हैं:

    शब्दों के सफ़र वाले अजीत जी को हार्दिक शुभकामनाएँ …चिटठा चर्चा बढ़िया रही …

  18. Jhataka कहते हैं:

    Many of us want to Flag Saleem Khan's Blog, So there is way….Go to this address:http://www.google.com/support/blogger/?action=flag&blog_ID=5537693433302783434&blog_URL=http%3A%2F%2Fswachchhsandesh.blogspot.com%2FAnd select this:Hate or violenceAnd continue to reporting this blog. Make Blogging Friendly And Clean Place.True IndianThanks!

  19. अजित वडनेरकर जी के शब्‍दों के सफर कोशब्‍दों में बांधना संभव नहीं हैपर वे शब्‍दों के सफर केअप्रतिम राही बने रहेंगे।

  20. अजित वडनेरकर कहते हैं:

    सभी साथियों का बहुत बहुत आभार।

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