छिच्छक दिवस

उच्च न्यायालय ने जसंवत सिंह की किताब से पाबंदी तो हटा दी है, पर सवालिया निशान इस बात का खड़ा होता है कि भारत की कार्यकारिणी ऐसे ही अपनी मर्ज़ी से क़ानून की तरोड़ मरोड़ करती रहेगी तो उसकी सज़ा का प्रावधान है या नहीं? न्यायपालिका ने तो हाथ खड़े कर ही दिए हैं, वे भारतीय विश्वविद्यालयों को सँभाल नहीं सकते, तो ऑस्ट्रेलिया वालों का क्या उखाड़ लेंगी? जूते अलग से फेंके जा रहे हैं उन पर लगातार। क्या करें आजकल तो गणेश भी गणेशा हो गए हैं और शिक्षक, षिक्षक बन गए हैं। लगता है मास्टरी के धंधे का मुनाफ़े का उनके उत्पाद से कोई लेना देना नहीं है। पर कुछ ऐसे भी गुरु जिन्हें भूलना मुश्किल है भी इस दुनिया में पाए जाते हैं, खासतौर पर वे जो शरीर रचना पढ़ाते हुए अंगस्पर्श करते हैं और फिर बाद में शायद हेनरी एल डेरिज़ियो की कविता का पाठ करते होंगे। भई इस देश में अध्यापक राष्ट्रपति, और राष्ट्रपति अध्यापक बन सकता है, गुंडे मंत्री और मंत्री गुंडे बन सकते हैं, बड़े ही एड्जस्टिंग लोग हैं इस बोगी में। हम धन्य हुए। अध्यापकों को धन्यवाद का पत्र भेजा आपने? याद किया अपने शिक्षकों को?

उबुंतु है? तो ग्रब कैसे चढ़ाएँ यह जान लो, नहीं है तो भूल जाओ, और कार्टून देखो। क्योंकि २५ हज़ार का कर्ज़े ले के तीन खाली कागज़ों पर दस्तखत कर दोगे – जिनमें से दो चेक पर हैं, तो इधर उधर चिट्ठियाँ ही लिखोगे।

पढ़ लिख कर ई-स्वामी ने अघोरियों पर तीन किताबें पढ़ मारीं। वाममार्गियों के बारे में वैसे भी चटकारे ले के पढ़ा जा सकता है। लक्ष्मीबाई की १९१५ में वीरगति प्राप्ति के बाद कुछ परंपराएँ शुरू हुईँ अरे भई संवत १९१५, ईसवीं नहीं।

संसकीरत पढ़ी थी न? या बस घोटे लगाए थे विभक्तियों के? तो अब ही जान लो मेघतूतम् के बारे में। बच्चों, अनुप्रास अलंकार का एक उदाहरण दो, पर उसमें कहीं च नहीं आना चाहिए। अब देखते हैं कैसे पहुँचे हो अगली कक्षा में।

आभासी दुनिया में रोज २-४ घंटे काट लेने वाला इंसान बाकी के घंटों में उन्हीं २-४ घंटो के चरमसुख का भोग करने की कल्पना करता रहता है, फलस्वरूप असली दुनिया में अकेला हो जाता है (हाँ अपनी बात कर रहा हूँ)। यही बात कम शब्दों में बीबीसी वालों ने कह दी है। (मजे़दार बात यह है कि गूगल के आभासी कुंजीपटल में अब पंजाबी, गुजराती, मराठी, उर्दू और नेपाली भी हैं। लेकिन हम तो अभी भी इंस्क्रिप्ट के हिमायती हैं।) अब सपने आने के लिए सोना भी ज़रूरी है। दिन में ६ कॉफ़ी पियोगे तो सपने कैसे आएँगे (फिर से अपनी बात कर रहा हूँ)। और यहाँ लोग शिक्षकों को जगा रहे हैं सोने दो भाई। आज उन्हीं का दिवस है। वही जो ब्रम्हा, महेस्वर, शाख्यत तश्माये हैं।

बाकलमखुद चिट्ठे का रंग रूप अपने को बहुत पसंद आता है, आज वहाँ दिनेशराय द्विवेदी की हनीमून संबंधी बातें लिखी गई हैं। और रामचंद्र मिश्र जी घाट घाट का पानी पीते ही रहते हैं, लगता है उन्हें तो हनीमून के लिए मंगल ग्रह ही जाना पड़ेगा, इस दुनिया में तो उनका सब कुछ देखा हूआ है। पर शायद सिविल लाइन का गिरजा न देखा हो।

आज मेरे जैसे महानगरीय तत्व को यह पता चला कि पॉपकॉर्न को भुट्टे का लावा कहते हैं। वैसे पंजाब में फुल्ले भी कहते हैं। धन्यवाद शिक्षा के लिए। हर कोई पेड़ वाली बाई नहीं बन सकता है।

जिस भाषा के पखवाड़े मनाए जाएँ, फ़र्ज़ी तौर पर, उसका कोई भविष्य हो सकता है? भविष्य है तो देव आनंद का।

कुचर्चा करोगे तो बहुत बुरे फँसोगे। तुम्हारे नाम के अंत में भी मनुस्मृतिं की तरह बिंदु लगा देंगे।

पर इस दुनिया में कोई तो है तो एकदम श्रद्धापूर्वक शिक्षक दिवस मना रहा है। आखिर एक अलग प्रजाति है शिक्षक। बस सरकारी दफ़्तर न जाना पड़े, भले ही रास्ता बद्रीनाथ की सड़क से क्यों न हो। अब स्विट्ज़रलैंड वाले तो बुध की प्रतिमा पर जूते ही टाँगेंगे, क्योंकि दादा बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया, किसी भी नेता या वर्दी वाले गुंडे से पूछ लो। सतयुग की शुरुआत हो चुकी है, हमें पहले ही पता था, बचपन में दीवारों पर लिखा होता था सतयुग आएगा। शायद बीज उर्फ़ एनजीओ ले के आएँ।

डिड यो नो कि पेट्स बच्चों की हेल्थ के लिए अच्छे होते हैं, आई मीन कि पेट्स किड्स की हेल्थ के लिए गुड होते हैं। अमाँ आप सिंपल हिंदी में क्यों नहीं एक्स्प्रेस कर सकते अपने थॉट्स को। यू आर टू दकियानूसी ऍंड लकीर का फ़कीर। तभी तो थैले में रोटी और आँखों में बेबसी है।

मेरा पन्ना के पाँच साल पूरे हो गए। उन्हें बधाई दें, पर पर्सनली नहीं, चिट्ठे पर। कल उन्होंने मुझे पर्सनली यह कहा था।

आज का कार्यक्रम यहीं समाप्त होता है। अगले शनिवार तक के लिए आज्ञा दीजिए। मैं, आर्यपुत्र, एतद्‌द्वारा यह प्रमाणित करता हूँ कि आज की चिट्ठा चर्चा केवल चिट्ठाजगत पर लेखों के शीर्षक और झलक पढ़ कर की गई है। किसी भी लेख के पहिए नहीं घिसे गए हैं। इस नायाब विधि के लिए हम अपने शिक्षकों को कोटि कोटि धन्यवाद देते हैं जिन्होंने नकलचिप्पी और एक पंक्ति के चार अनुच्छेद बनाने की कला में हमें निपुण बनाया। हो सकता है कि किसी लेख की कड़ी नकलचिप्पी करते हुए कहीं और लग गई हो। कोई बात नहीं हम सप्लिमेंटरी दे देंगे।

हैप्पी छिच्छक दिवस टु ऑल ऑफ़ यू।

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13 Responses to छिच्छक दिवस

  1. गिरिजेश राव कहते हैं:

    इतना श्रम ! बाप रे। अनोखी शैली में क्या क्या नहीं समेट दिया ! इस मंडली में और भी नाम जुड़ने चाहिए ताकि भिन्न भिन्न रुचि वाले ब्लॉग जगत की विविधता दिखा सकें।

  2. पब्लिकली बधाई देकर आते हैं कमेन्ट की सप्लीमेंट्री चर्चा की सप्लीमेंट्री के बाद

  3. वाकई बहुत श्रम के बाद लिखी महत्वपूर्ण चर्चा है।

  4. वाकई बहुत श्रम के बाद लिखी महत्वपूर्ण चर्चा है।

  5. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    जो भी हो, शिक्षक दिवस को इस प्रकार लिखा जाना निताँत अशोभनीय है ।यह हास्य तो खैर क्या पैदा करेगी, वितृष्णा अलग दे रही है ।खेद है कि, मुझे ऎसी टिप्पणी करनी पड़ रही है ।

  6. cmpershad कहते हैं:

    "लगता है मास्टरी के धंधे का मुनाफ़े का उनके उत्पाद से कोई लेना देना नहीं है। "हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ति निकाल केइस देश को रखना मेरे बच्चो सम्भाल के:)

  7. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    मैं भी पहले तो अचंभित हो चर्चा के श्रम पर चिंतन करता रहा, फिर अपनी प्रविष्टि को केवल वाक्य विन्यास की सुघरता (?) के लिये इस्तेमाल देख कर किंकर्तव्यविमूढ़ भी हो गया । अमर जी से सहमत हूँ । धन्यवाद ।

  8. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    Heading वाकई बहुत सुन्दर लिखी !

  9. महफूज़ अली कहते हैं:

    भई इस देश में अध्यापक राष्ट्रपति, और राष्ट्रपति अध्यापक बन सकता है, गुंडे मंत्री और मंत्री गुंडे बन सकते हैं, बड़े ही एड्जस्टिंग लोग हैं इस बोगी में। bilkul sahi kaha aapne……heading dekhte hi sar ke bal dauda chala aaya…….. bahut hi behtareen lekh………

  10. Vivek Rastogi कहते हैं:

    बहुत ही घुटी हुई पोस्ट बस इसे घोटकर पानी में डालकर पीना पड़ेगा, तब जाकर इतना कर्म करने की इच्छा होगी, बहुत अच्छे आलोक जी, छिच्छक दिवस पर फ़धाई।

  11. Mrs. Asha Joglekar कहते हैं:

    Aaj kee shiksha pranali aur shikshakon par achca wyang hai par apane to sabko lapete men leliya. hamare shiskshak to bade samarpit shikshak hua karate the. shri gurawe namah.

  12. भाई कमाल है । इतनी मेहनत, पढ़ कर मज़ा आ गया । फिर मिलेगें ।

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