और यह एक और शानदार जानदार चिट्ठा चर्चा

याद कर रहा था आर्यपुत्र नींबूपानी में नमक डाल के पीते हुए, वह पुराना समय जब अपनी शैय्या के ऊपर रखे दो मोबाइलों के अलार्म एक एक करके बंद हुए – एक तो अभी से ठीक बारह घंटे पहले, भारतीय मानक समय के अनुसार ब्राह्म मूहुर्त के प्रारंभ में ३ बजे और दूसरा उसके दो घंटे बाद। चुनाँचे पिछली बार की तरह ही इस बार की चर्चा भी पिछली वाली की तरह प्रशांत महासागर के निकट प्रातः तीन बजने के पहले लिखी जा रही है।

आर्यपुत्र का सोचना है कि यदि उगते सूर्य के देश में रह रहे होते तो अभी सूरज डूबा ही नहीं है तो उगेगा क्या वाले देश के समय के हिसाब से चर्चा करने में और कितना ही मज़ा आता। वैसे जापानी चुनाव के नतीजे आने वाले हैं, पता नहीं अपने मत्सु भाई ने किसके मुँह पर ठप्पा लगाया है।

किंतु इन व्यर्थ की, अनर्गल बातों में न पड़ते हुए आर्यपुत्र चिट्ठाचर्चा करने बैठ ही गए। अरे ये क्या हुआ, आज की तारीख डाली, और यहाँ तो लगता है यमराज ने काल को ग्रास कर लिया है! कहीं यह सुदर्शनचक्रधारी श्रीकृष्ण की कोई चाल तो नहीं जिससे आज की चिट्ठाचर्चा ही न हो पाए?

लेकिन फिर आर्यपुत्र को ध्यान आया कि नहीं, ये वानर रूपी पीली चमड़ी और हरी आँखों वाले अंग्रेज़ लोग तिथि को अलग अलग तरह से लिखते हैं, http://www.chitthajagat.in/?dinank=28-08-2009 को चिट्ठाजगत २९ अगस्त २०२८ मान लेता है, अब माना कि धड़ाधड़ छपाई होती है लेकिन इतनी धड़ाधड़ भी नहीं कि बीस साल बाद के लेख आज ही दिख जाएँ।

योगीश्वर कृष्ण से क्षमा माँगते हुए आर्यपुत्र ने सही तारीख डाली और ५३८ लेखों के दर्शन से लाभान्वित हुए।

अच्छा योद्धा अपने अस्त्रों का सही प्रयोग तो जानता ही है, साथ ही वह केवल अपने अस्त्रों की पूजा अर्चना ही नहीं करता है, अपितु उनका उचित प्रयोग भी करता है। आखिर जानने और करने में फ़र्क है। यह सोचते हुए आर्यपुत्र ने चिट्ठे बाँचना शुरू किया।

इंद्रप्रस्थ नगरी में यमुना नदी के तट पर पुस्तक मेला शुरू हुआ है, बता रहे हैं अमित त्यागी। वहीं दूसरी ओर रेल द्वारा आल्प्स की सैर के लिए आमंत्रित कर रहे हैं रजनीश मंगला। हम वैसे भी काफ़ी व्यस्त हैं दोनों में से कहीं भी न जा पाएँगे। खेद सहित।

नवीन केडिया जी कह रहे हैं कि हल्के की सेवा प्राथमिकता है – ठीक है, नकुल सहदेव का तो काम चल जाएगा, पर बेचारे भारी भरकम भीम का क्या होगा? कौन करेगा उसकी सेवा? कहीं गुस्से में आ के केडिया को और हल्का न कर देवे।

इस किताब को देख के नवीं कक्षा में पढ़ी महाबलीपुरम् के ऊपर कहानी – रमेश चौधरी आरिगपुड़ि की – याद आ गई। हिंदी में दक्षिण भारतीय साहित्य। लेकिन आगे देखा तो यह दक्षिणी भाषाओं के साहित्य के हिन्दी अनुवाद की बात कर रहे हैं, जब कि आरिगपुड़ि जी ने तो हिन्दी में ही लिखा था।

ईसाई मिशनरियों के हथकंडों से हम सब वाकिफ़ हैं लेकिन जो इनसे परेशान हैं उन्हें सोचना यह नहीं चाहिए कि ईसाई शाला के वाहन चालक ने ऐसा क्यों किया, बल्कि यह, कि ग़ैर-ईसाई शालाएँ बनाने वाले कहा गुम और फ़ुर्र हो गए?

इस बीच अपनी बुल्ट को टक्कर देने के लिए हार्ली डेविड्सन आने वाला है।

अरे चचा ये बताओ लोग एक ही लेख दो दो जगह क्यों छाप देते हैं? क्या उन्हें पता नहीं कि खोज में उन्हें नुकसान होगा, या क्या वे इस फ़ायदे नुकसान से परे हैं?

इस बीच गतांक से आगे मनोहर कहानियाँ भाग ३५ बाज़ार में आ गया है। अपने अखबार वाले से कह कर अपनी प्रति आज ही सुरक्षित करें।

क्या कहा, आप वैसे नहीं हैं? तो फिर प्रेमचंद के शतरंज के खिलाड़ी पढ़ लें।

एक ओर सवाल उठ रहा है कि जिहाद क्या था और क्या नहीं और दूसरी ओर खबर फैल रही है कि काबा मंदिर है कि कुछ और है। चेंपे रहो भइया। क्योंकि मनोज बाजपेयी की रात में फटती है

अंत में बस इतना ही कहेंगे कि

हाँ हाँ, बहुत ही छोटी चर्चा की आपने। कम से कम इत्ते, कम से कम इत्ती लंबी, वगैरह वगैरह। देखिए मुझे सिनेमा देखने जाना है, समझे न? और टिकट भी पहले ही ले चुका हूँ। इसलिए आप बोल लीजिए जो बोलना है लेकिन हमारे पास इतना वक्त नहीं है कि आपकी सभी फ़रमाइशें पूरी कर सकें। भला शतरंज नहीं खेलते दूसरों को इश्क लड़ाते तो देख सकते हैं। क्या कह रहे हैं टिकट दिखाएँ तभी मानेंगे? दिखा दिया तो तुम न छाप के ले जाओगे? ऑन्लाइन लिया है ऑन्लाइन। धक्का मुक्की के साथ कोई कागज़ का नहीं लिया है। क्या समझे?

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और यह एक और शानदार जानदार चिट्ठा चर्चा को 12 उत्तर

  1. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    जय हो आर्यपुत्र। चर्चा आपसे किससे कहने की हिम्मत की छोटी है। धांसू च फ़ांसू चर्चा करके डाल दी। 2028 तक टहल के आ गये ब्लाग की खोज में। इस बीच कुश को जो चाहिये उसकी फ़रियाद करते हुये चर्चा ठेल दी-बीवी उधार चाहिए.. भगवान बड़ा कारसाज है। एक दिन में दोपहर तक कोई चर्चा नहीं देता और दोपहर के बाद एक साथ दो दो चर्चा थमा देता है। एक के साथ एक फ़्री वाले अंदाज में।

  2. दरभंगिया (Darbhangiya) कहते हैं:

    जय हो, बहुत दिनों के बाद एक अलग तरह की चर्चा पढ़ने को मिली. बोनस के लिये धन्यवाद.

  3. विवेक सिंह कहते हैं:

    बैटरी डाउन न होती तो आज तीसरी चर्चा करके गिनीज बुक में अपना नाम लिखाकर गुरु जी की इच्छा पूरी कर देता !

  4. Udan Tashtari कहते हैं:

    आर्यपुत्र, ऑनलाइन टिकिट लिए हो..कौन पिक्चर का? नाम तो बताते जाओ.

  5. रचना कहते हैं:

    जापान मे अगर २००९ लिखना हैं तो वो २०१८ लिखते हैं

  6. शरद कोकास कहते हैं:

    इस चर्चा मे एक बात अच्छी लगी बहुत से लोग संयोग से ब्लॉगिंग में आ गये हैं । कृपया इसका खुलासा करें ?

  7. @ शरद कोकाससंयोग का कर लेंगे योगतब ही तो बतला पायेंगेरचना सिंह जो लिखती हैंवो न जाने क्‍यों मिट जाता हैवैसे इसे लिखने वाला औरमिटाने वाला दोनों जानते हैं।

  8. PREETI BARTHWAL कहते हैं:

    अच्छी चर्चा रही। जय हो।

  9. cmpershad कहते हैं:

    "अच्छा योद्धा अपने अस्त्रों का सही प्रयोग तो जानता ही है, साथ ही वह केवल अपने अस्त्रों की पूजा अर्चना ही नहीं करता है, अपितु उनका उचित प्रयोग भी करता है।"आर्यपुत्र..नमस्तुभ्यम्‌॥ बढ़िया अस्त्रो और वस्त्रों का प्रयोग करके शकुंतला ब्लागी को बचा लिया- सुंदर चर्चा का जामा पहना कर:) क्या पूर्व में भी शिष्य गुरुओं को प्रसन्न करने के लिए गिन्नी पुस्तक का प्रयोग करते थे???

  10. अजय कुमार झा कहते हैं:

    एक दम जानदार है प्रभु…

  11. ऋषभ कहते हैं:

    सही कहा कि आरिगपूडी ने तो हिन्दी में लिखा था.रमेश चौधरी आरिगपूडी ही नहीं आलूरी वैरागी चौधरी, बालशौरी रेड्डी, एन ई विश्वनाथ अय्यर आदि पहली पीढ़ी के दक्षिण भारतीय हिन्दी लेखकों के अतिरिक्त नई पीढ़ी के अनेक हस्ताक्षर आज भी हिन्दी साहित्य के संवर्धन में संलग्न हैं.परन्तु विजय राघव रेड्डी ने संदर्भित पुस्तक में हिन्दी में अनूदित दक्षिण भारतीय भाषाओँ के साहित्य का सर्वेक्षण किया है .

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