एक नीतिपरक पोस्ट की स्त्रीवादी समीक्षा

 

कल्पतरू पर एक पोस्ट पढी – नई बहू के ससुराल के प्रति दायित्व के बारे में ! इस नीतिपोस्ट में व्यक्त विचार हमारे अबतक के स्त्रीवादी विमर्श को उलटकर रख दे रहे हैं ! चोखेरबाली और नारी जैसे ब्लॉगों पर निरंतर चलने वाले तीखे विमर्शों से जो भूमिका तैयार होती है उसके विपरीत स्त्री की रीतिकालीन छवि को प्रस्तुत करने वाले ब्लॉग लिखे जा रहे हैं ! इस पोस्ट के रचयिता कहते हैं –

ससुराल में बहू को कुछ समय इसीलिये ही बिताना चाहिये कि वह सभी घरवालों को भली भांति समझ लें और घरवाले अपनी नई बहू को जान लें और अपने अनुकूल ढाल लें, जो संस्कार और जिन नियमों में उन्होंने अपने लड़के को पाला है बहू उन नियमों से भली प्रकार परिचित हो जाये जिससे नई दंपत्ति को असुविधा न हो। लड़के को क्या क्या चीजें खाने में पसंद हैं क्या नापसंद हैं। कैसे मूड में उससे कैसा व्यवहार करना है यह तो केवल ससुरालवाले ही बता सकते हैं। ससुराल में रहने से उसका घरवालों के प्रति अपनापन पैदा होता है, नहीं तो अगर वो कुछ दिनों के लिये ही ससुराल जायेगी तो केवल मेहमान बनकर मेजबानी करवाकर आ जायेगी,  अपनेपन से सेवा नहीं कर पायेगी।

बेशक इस पोस्ट के लेखक एक आदर्श परिवार और समाज की कल्पना करते हुए अपने इन विचारों को व्यक्त कर रहे हैं किंतु इस आदर्श का सारा जिम्मा एक अकेली दूसरे परिवार से आई स्त्री पर डाल रहे हैं ! नए परिवार में स्त्री का सम्मान और जगह इस बात से तय होगा कि वह कितने लोगों का कितना दिल जीत पाती है ! ऎडजस्टमेंट उसे ही करनी है ! परिवार के सदस्यों के मूड के आरोह अवरोह को जानकर व्यवहार करना है ! उसे अपनेपन से सेवा करनी है ! उसे उन नियम कायदों और संस्कारों को अपना लेना है !

बेचारी की ज़िंदगी मानो भाडे की हो ! एक कुशल सेविका की आदर्श भूमिका निभाकर जिसे पति के दिल और नए परिवार की टेरिटेरी में ग्रीन कार्ड हासिल करने के लिए पुरजोर अपनी पात्रता साबित करनी है ! पोस्ट के लेखक यहाँ क्यों नहीं बताते कि उस परिवार के सदस्यों को क्या क्या करना चाहिए जिसमें नई बहू आई हो ! परिवार और पति को किन किन बातों , नियमों को जान लेना चाहिए ताकि वे नई बहू का दिल जीत सकें ! उसे अपनत्व का अहसास करवा सकें !

इसमें चोखेरबाली समाज को संदेह नहीं कि हमारी पारिवारिक और सामाजिक संरचनाओं में स्त्री का दर्जा दोयम है ! उसे गर्भ में आने से लेकर मृत्यु पर्यंत अपने जीने की पात्रता को खोजते और जताते रहना पडता है ! कल्पतरू जी , आप चोखेरबाली समाज का कोई भला नहीं कर सकते तो और कुछ भी न कीजिए !

  हैरत की बात यह है कि जिस गुडी  गुडी कवर में आदर्श , नैतिकता और नियमों की बात कही है उस कवर की चमक में आठेक टिपैये भी वहां जा पहुंचे और हां हां सहमत , ठीक बात मार्का कह आए ! टिप्पनी धर्म का जो कायदा ब्लॉग जगत में अक्सर दिखाई दे जाता था उसका पालन यहां न हो पाया और कोई कंफ्रटेशन न होने पाया !  जिस अपनेपन की दुहाई में इस तरह के तर्क दिए जाते हैं उनको डिकोड करने वाले लोग ब्लॉग जगत से बाहर से थोडी ही आएंगे ? हम स्त्रियों में कई इसे डिकोड कर पाती हैं पर ज्यादातर स्त्रियां देवी , प्रेम- सेवा और शर्तों पर मिलने वाले अपनत्व को अपने जीवन की एकमात्र थाती मानती हैं ! परिवारों में इकतरफा ऎडजस्ट्मेंट के नाम पर चलने वाली शोषण व्यवस्था को दुरुस्त करना तो बाद की बात है इसे पहचानने की पहल  की पहल तो अब नेट जगत पर हो ही जानी चाहिए !

नेट पर फेमेनिज्म के स्वरों के बीच उठते हुए इस प्रकार के मंद्र स्वर भी बहुर खतरनाक हैं ! ये हमारी कलेक्टिव कॉंशियसनेस को चुपके से प्रभावित कर जाती हैं ! ब्लॉग के बहाने स्त्री मुक्ति , मानव मुक्ति और समाज मुक्ति के जो स्वर उठ रहे हैं वे निश्चय ही सराहनीय हैं ! परंतु अपनी और अन्यों की वैचारिक भटकन पर टॉर्च लाइट डालना हमारा परस्पर दायित्व है ! यहां आलोचना या निंदा हमारा काम नहीं है ! स्वस्थ प्रतिवाद करना ध्येय है ! मुझे लगता है हमारे भीतर खासकर हमारी भाषा से टपकते जातीय , नस्लवादी और स्त्री विरोधी संस्कारों को पकडने भी खासी ज़रूरत है ! जैसे दलित को चमार कहना अब कानून दंडनीय है वैसे ही स्त्री को बेचारी ,दोयम दर्जे की या उपेषिता सिद्ध करने वाली भाषिक अभिव्यक्तियां भी दंडनीय अपराधों की कोटि में आने लगेंगी -  ऎसी अपेक्षा करने की अभी आवश्यकता नहीं है हो सकता है इससे पहले ही हम चेत जाएं ! कमसे कम उत्तर आधुनिक ब्लॉग माध्यम से रीतिकालीन स्वरों की उम्मीद हमें नहीं करनी चाहिए !

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17 Responses to एक नीतिपरक पोस्ट की स्त्रीवादी समीक्षा

  1. कुश कहते हैं:

    बिलकुल ठीक कहा है आपने.. लिखा ये जाना चाहिए था कि किस प्रकार एक परिवार घर में आई नयी बहु को एडजस्ट होने में सहायता करता है.. पर अफ़सोस..!!कोई शक नहीं कि इस पोस्ट पर दस से ज्यादा कमेन्ट भी ना आये..

  2. Mired Mirage कहते हैं:

    बहन मेरी, माध्यम अति आधुनिक ही क्यों ना हो, उपयोग उसी राग को अलापने के लिए ही हो रहा है। जेट पर बैठ उड़ते लोग भी मानसिकता बैलगाड़ी वाले की ही लेकर चलते हैं। यही सबसे बड़ा खतरा है। इनके पास माध्यम भी है और वही पुरानी सोच भी! टिप्पणी देने को कसमसा रही थी किन्तु फिर सोचा चल री घुघूती, पैकिंग कर! बहरों को कुछ सुनाई नहीं देने वाला। वैसे भी सेविकाओं से टिप्पणियाँ तो अपेक्षित हैं नहीं!सेविका बासूती, नहीं, नहीं, घुघूती बासूती

  3. sanjaygrover कहते हैं:

    ब्लाग की दुनिया के बाहर अभी भी पत्रिकाएं ’गृहशोभा’ और ‘गृहलक्ष्मी’ नामों से छपती भी हैं और बिकती भी हैं।

  4. cmpershad कहते हैं:

    "बेचारी की ज़िंदगी मानो भाडे की हो ! एक कुशल सेविका की आदर्श भूमिका निभाकर जिसे पति के दिल और नए परिवार की टेरिटेरी में ग्रीन कार्ड हासिल करने के लिए पुरजोर अपनी पात्रता साबित करनी है ! "जब तक कोई भी महिला ससुराल को ‘अपना’ घर नहीं समझती, तब तक उस घर-परिवार से दूरी बनी ही रहेगी। जब तक परिवार का चलन है, नारी घर की धुरी ही बनी रहेगी, इसमें कोई भी शक नहीं है।>रही बात कुश की- कोई शक नहीं कि इस पोस्ट पर दस से ज्यादा कमेन्ट भी ना आये- तो बता दें कि अकेले विवेक जी में यह क्षमता है कि वे दस का आंकडा़ पार करा देंगे:)

  5. रंजन कहते हैं:

    मुद्दा तो ठीक था पर प्रस्तुतीकरण अलग तरह से किया जाना था.. कुछ दिन साथ रहने से ’एक दुसरे’ को समझने का अवसर मिलता है.. और एक अपनापन विकसित करता है.. लेकिन ये जिम्मेदारी दोतरफा भी हो सकती है.. जरुरत दोनों कि है.. तो रास्ता भी दोनों को मिलकर ही निकालना होगा..

  6. Udan Tashtari कहते हैं:

    समाज की जो व्यवस्था है उसमें स्त्री नये घर में आती है, उसे निश्चित ही नये लोगों को जानना होगा, उनके स्वभाव से अवगत होना होगा एवं अपने स्वभाव से अवगत करना होगा और उस परिवार के लोगों को भी उस नये सदस्य को समझने और ठीक से जानने का मौका मिलेगा, ऐसे में अगर मौका लगता है तो क्यूँ नहीं रहे ससुराल में. बिल्कुल ससुराल में रह कर समझना चाहिये. मुझे तो इसमें कोई बुराई नहीं दिखती.समझना और उसके मुताबिक अपने को ढा़लना, यह दोनों ही पक्षों को करना है किन्तु चूँकि नारी नये घर में आई है, अतः नये घर में रह कर तो समझा और समझाया जा सकता है. जिम्मेदारी स्त्री पुरुष दोनों की है, इस बात से कतई इंकार नहीं.इस वक्त मैं उन न्यूक्लियर फैमली की बात नहीं कर रहा, जिन्हें माँ बाप, भाई बहनों से बस होली दिवाली की हाय बाय तक ही साबका है.

  7. रंजना कहते हैं:

    यदि मेरी बात बुरी लगे तो कृपया क्षमा कीजियेगा…….मुझे लगता है,चिठ्ठा चर्चा का उद्देश्य ब्लॉग वाणी में प्रेषित (चौबीस घंटे में) उल्लेखनीय पोस्टों की चर्चा करना है…..नहीं ?? यदि अपनी कोई बात कहनी हो,तो अपने ब्लॉग पर बड़े आराम से अपने पसंदीदा विषय पर सारगर्भित आलेख प्रेषित कर,वाद विवाद आयोजित कर किया जा सकता है,क्योंकि मेरी जानकारी के मुताबिक प्रत्येक चर्चाकर का अपना स्वयं का ब्लॉग है…..अब जहाँ तक सवाल है इस चर्चा विशेष का तो,अभी तक हालाँकि मैंने वह पोस्ट पढ़ी नहीं है,जिसपर यह विषद चर्चा प्रस्तुत की गयी है,परन्तु प्रसंग के अंश को पढ़कर मुझे नहीं लगता कि इसमें इतने भड़कने वाली कोई बात है….कभी सोचा है आपने कि परंपरा में स्त्री को ही ब्याह के बाद पुरुष के घर जाने की प्रथा क्यों है ???? जरा सोचियेगा…….जब कोई लडकी विवाह के बाद ससुराल जाती है तो उस कुल को ,कुल की परम्पराओं को आगे ले जाने वाली मुख्य वाहिका वही होती है…….एक बहू ही परम्पराओं की पोषक होती है….और ये परम्पराएँ हमारी पहचान होती हैं,ये कूड़ा नहीं होती…जिन्हें ढोकर वह मैली हो जायेगी…..तो यदि बहू ससुराल में रहेगी नहीं,परम्पराओं को अपने रिश्ते नातेदारों को जानेगी नहीं,तो परिवार और परम्पराओं को संजोयेगी कैसे ???मुझे अपनी माँ के प्रति अंत्यंत श्रध्दा जगती थी जब उन्हें परिवार,कुल और परम्पराओं को सम्हालते देखती थी और मुझे भी एक पत्नी ,माँ और बहू के रूप में वह करना अपना परम कर्तब्य (अपनी मर्जी, अपनी खुशी से ) लगता है..और देखती हूँ मेरी कर्तब्य परायणता देख मेरे बच्चे भी हर्षित होते हैं…..अपने परिवार से जुड़ना, उनके सुख दुःख का संगी बनना,छोटा होना प्रताडित होना नहीं…..उन्हें सेवा और प्रेम देना मुझे सुख देता है……मुझे लगता है इसमें कोई हानि नहीं….समाज सेवा की बड़ी बड़ी बातें करना और अपने ही परिवार से कर्तब्य से अधिक अधिकार की अपेक्षा रखना,परिवार समाज को कितना सुखी कर पायेगा पता नहीं…….यदि कोई अत्याचार करे तो उसका विरोध करना और एक व्यक्ति के रूप में अपने से जुड़े प्रत्येक कारणों के प्रति कर्तब्य भावना रखना ही मेरी दृष्टि में मनुष्यमात्र का धर्म है…

  8. अजय कुमार झा कहते हैं:

    रंजना जी की बात से सौ प्रतिशत सहमत…बस इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना है

  9. नीलिमा जी यदि बहु कुछ समय सुसुराल मैं बिता कर सभी घरवालों को भली भांति समझ लें और घरवाले अपनी नई बहू को जान लें और अपने अनुकूल ढाल लें तो इसमें आपको क्या बुराई दिखती है ? और जब तक लड़की परिवार के साथ नहीं रहेगी तो परिवार वाले का बहु से अपनापन बढेगा ?जिस बात का आप विरोध कर रही हैं उससे तो लगता है की शादी हो और मियां बीबी अलग परिवार से कोई मतलब नहीं | यदि आप संस्कारों को भली भांति नहीं समझ रही है तो इसके लिए संस्कारों को दोषी मत ठहराइए | जिस तरह लड़की का दयित्व है अपने सास-स्वसुर का ख्याल रखना, ठीक उसी तरह लड़के का भी दायित्व है की वो अपने ससुराल के मुसीबतों मैं अपने-सास-स्वसुर के साथ खडा हो |

  10. devi prasad gaud kee kavita dekhen :1.पत्नी ने कहा,गर्मी की छुट्टियों में,कहीं घूमने चलेंगे,पति ने कहा,''माँ“ को भी साथ ले चलेंगेपत्नी ने बेलन उठायापति मुस्करायामैं तो मजाक कर रहा थाअपनी नहीं तुम्हारी ''माँ“ कीबात कर रह था ।-2-एक दिन बच्चों ने, माँ से पूछारूखे मन को कुछ इस तरह सींचा,माम, यह आपकी कैसी नादानी है,भला दादा, दादी से तुम्हें क्या परेशानी है,तुम अभी बच्चे हो, समझ के कच्चे हो,उनका तो, वही फटा पुराना हाल है,बेटा यह हमारे 'स्टेटस` का सवाल है।

  11. विवेक सिंह कहते हैं:

    रजनीकान्त की एक फिल्म में उनकी बन्दूक से गोलियाँ खत्म हो जाती हैं . ऐसे में विलेन अपनी बन्दूक से रजनीकान्त पर गोली चलाता है, रजनीकान्त उसी गोली को अपनी बन्दूक में लेकर वापस विलेन पर चला देते हैं ,पर अफसोस, असल जिन्दगी में ऐसा नहीं होता, इसलिये जब बन्दूक में गोलियाँ न हों तो विलेन के सामने नहीं जाना चाहिय .लो जी हो गयीं दस से ज्यादा, और बोलो !

  12. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    यह चर्चा पूर्वग्रसित आग्रहों को पोषित करते हुये सह-अस्तित्व और परस्पर सामँजस्य के दायरे को अनदेखा कर रही है ।रँजना जी के तर्कों में दम है, कोई नकार सके तो एक पोस्ट लिख कर सूचित कर दे !

  13. venus kesari कहते हैं:

    हम सब जानते है की क्या सही है और क्या गलत. क्या होना चाहिए और क्या नहीं और वक़्त आने पर हर कोई वैसा ही वयवहार करता है जैसा वो सोचता है मगर यहाँ तो ऐसा लग रहा है की लोग कमेन्ट करते समय साहित्य की रचना कर रहे हो अरे भाई लोग आप भी तो घर में ही रहते हो, आपका भी परिवार है और आप लोग समझदार भी हो आप खुद सोचिये आप अपने घर के लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हो फिर बात ही ख़त्म हो जायेगी अब हर किसी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती रही बात, मैंने तो औरत को अकारण पिटते भी देखा है, और आकारण पीटते भी और शायद आपने भी देखा हो 🙂

  14. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    गनीमत है कि कुश का शक गलत निकला। :)चर्चाकार अपने मूड और समय के अनुसार एक या अनेक चिट्ठों की चर्चा कर सकता है। रोचक चर्चा की नीलिमाजी ने। टिप्पणियां भी रोचक हैं और चर्चा को आगे बढ़ाने का काम करती हैं।

  15. बी एस पाबला कहते हैं:

    रंजना जी से सहमत होते हुए बस इतना ही कहना है कि यह चिट्ठाचर्चा थी या पूर्वाग्रह सहित विचार चर्चा :-)राकेश सिंह व डॉ अमर कुमार की टिप्पणियों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता नहीं?

  16. वाणी गीत कहते हैं:

    रंजनाजी की बातों से पूर्णतया सहमत !!

  17. संगीता पुरी कहते हैं:

    रंजना जी की बातों में कोई बुरार्ह नहीं दिख रही है मुझे !!

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