खानापूर्ती वाली एक चर्चा

सूर्यग्रहण आया और चला गया. न जाने कितने दिनों की तैयारी चार-पांच मिनट में खतम. कुछ-कुछ वैसे जैसा फिल्मों में दिखाई देता है. जेल में बंद हीरो से मिलने उसकी माँ पहुँचती है. माँ-मिलन चार मिनट का हुआ नहीं कि सिपाही आ पहुंचा. यह कहते हुए कि; “मिलने का वक़्त ख़त्म हुआ.”

हीरो की माँ न चाहते हुए भी वहां से चली जाती है.

लेकिन सूर्यग्रहण का ख़त्म होना टीवी पत्रकारों के लिए शुभ रहा होगा. बेचारे निदियाये, भकुआए से जगह-जगह से हमें सूर्यग्रहण दिखाने में जुटे थे.

विनीत कुमार जी की मानें तो;

“अपने रवीश ने सूर्यग्रहण के चक्कर में अपना क्या हाल बना रखा है? बिखरे हुए बाल, चेहरा उड़ा हुआ, आंखें ऐसी कि बेमन से खोल-बंद कर रहे हों, पलकों के उठने-गिरने में जबरदस्ती करनी पड़ रही हो, ताक़त लगानी पड़ रही हो। बोलने का उनका मन ही नहीं हो रहा। कभी हंसते हैं, कभी टेलीविजन प्रोफेसर बन कर ग्रहण के नाम पर पाखंड फैलानेवालों को रगेदते हैं…”

टीवी पत्रकारों की दशा से दुखी विनीत आगे लिखते हैं;

“यकीन मानिए, देश का कोई भी संवेदनशील ऑडिएंस टेलीविजन पर अपने इन पत्रकारों की ये दशा देखकर गिल्टी फील किये बिना नहीं रह सकेगा। वो इनसे एक ही सवाल करेगा कि हमें लाइव कवरेज दिखाने के लिए आपको इतनी मशक्कत करने की क्या ज़रूरत पड़ गयी? हम आपकी नींद और चैन हराम हो जाने की शर्तों पर सबसे तेज नहीं होना चाहते। भाड़ में जाए सूर्य ग्रहण के वक्त हीरे-सा दिखनेवाला छल्ला। जाने दीजिए 123 साल बाद दिखे तो दिखे ये अजूबा दृश्य। इसके पहले भी कई अजूबा हुए, हम नहीं देख पाए तो क्या जिंदा नहीं हैं, क्या कोई असर पड़ रहा है हमारी सेहत को।”

सही बात है. हम अक्सर इन पत्रकारों को तमाम और बातों के लिए कोसते रहते हैं. लेकिन जब इनकी तारीफ की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं.

जतिंदर परवाज जी की रचना पढिये. वे लिखते हैं;

यार पुराने छूट गये तो छूट गये
कांच के बर्तन टूट गये तो टूट गये

सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं
तीर कमाँ से छूट गये तो छूट गये

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गये तो टूट गये

इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये
भाग किसी के फूट गये तो फूट गये

छोड़ो रोना-धोना रिश्ते-नातों पर
कच्चे धागे टूट गये तो टूट गये

अब के बिछड़े तो मर जाएँगे ‘परवाज़’
हाथ अगर अब छूट गये तो छूट गाये

सच का सामना नामक टीवी कार्यक्रम की बड़ी चर्चा है. इस कार्यक्रम पर आज अंशुमाली रस्तोगी का लेख पढिये. अंशुमाली लिखते हैं;

“पहले सच कड़वा होता था, अब डराने लगा है। डराने वाला सच कड़वे सच से कहीं अधिक खतरनाक होता है। कड़वे सच में हमारा चरित्र ही पतित होता है, लेकिन डरावने सच में तो हमारा जीवन ही संकट में पड़ जाता है।”

पूरी पोस्ट आप उनके ब्लॉग पर पढिये.

एक अलग नजरिये से इस कार्यक्रम को देखने की उनकी कोशिश.

राखी सावंत भारत में स्वयंवर रचा रही हैं. तमाम शहरों में घूमती हुई प्रतियोगियों के परिवार जनों से मिल रही हैं. कुछ से नाराज़ दिखाई देती हैं. कुछ से खुश. अभी वे ऐसा कर ही रही हैं कि अलोक तोमर जी ने आप ब्रेकिंग न्यूज़ दी है कि;

राखी सावंत ने एनआरआई दूल्हा पटाया.

सच क्या है? पता नहीं. लेकिन यह खबर उनलोगों के लिए ठीक नहीं जो अभी भी स्वयंवर में वाइल्ड कार्ड एंट्री मारने का मन बना रहे होंगे.

आप अलोक तोमर जी की पोस्ट उनके ब्लॉग पर पढिये. यहाँ क्लिकियाइये.

बलात्कार का दलित मतलब.

बड़ा अजीब सा शीर्षक है न? शीर्षक चाहे जो हो, यह पोस्ट पढिये. आवेश जी इस पोस्ट की शुरुआती पंक्ति में लिखते हैं;

“ये मेरे अखबारी जीवन का शायद सबसे खराब दिन था.”

उन्होंने यह लाइन क्यों लिखी, इसे जानने के लिए आप उनकी पोस्ट पढिये.

अब्राहम लिंकन का पत्र पढिये जो उन्होंने अपने पुत्र के शिक्षक को लिखा था. लिंकन ने लिखा था;

मै जानता हूँ की उसे सीखना है कि
सभी लोग न्याय प्रिय नहीं होते
सभी लोग सच्चे नहीं होते
लेकिन उसे यह भी सिखाएं कि
जहाँ एक बदमाश होता है
वहीं एक नायक भी होता है

पूरा पत्र आप इस ब्लॉग पर जाकर ही पढिये.

‘दाल-रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ’ नामक गाना सुनते थे. लेकिन निखिल आनंद गिरि पूछ रहे हैं दाल कैसे खाएं? इतनी मंहगी दाल?

दालशास्त्र समझने के लिए यह पोस्ट पढें.

अनूप जी ने आज इन्द्र के दरबार का स्टिंग ऑपरेशन कर डाला है. कर के डाल दिया है. जिन्होंने नहीं पढ़ा हो, ज़रूर पढें और जाने कि इन्द्र के दरबार की हालत दिल्ली दरबार जैसी क्यों हो गई है?

क्या कहा? ट्रेलर देखना चाहते हैं? देखिये;

“दूसरा बादल अपनी परेशानियां बताता है कि उसके साथ की बदली उसको छेड़ती है और रास्ते भर कहती है- तुम तो बादल लगते ही नहीं हो। कित्ते क्यूट हो। कहां बरसने के लिये पानी लिये जा रहे हो। ये पानी मुझे दे दो न! हमें अपना मेकअप छुड़ाना है।

इन्द्र भगवान उसको समझाते हैं- असल में वो वाली बदली शापग्रस्त अप्सरा है। मेकअप करने और छुड़ाने के अलावा उसे और कुछ आता नहीं। तुम्हारे साथ इसीलिये लगाया कि तुम जैसे रूखे-सूखे के बादल के साथ रहेगी तो कुछ बरसना भी सीखेगी। वैसे भी वो एक साल के लिये ही शापित है। इसके बाद फ़िर उसे महफ़िलों में सजना है। न जाने कितने देवताओं को प्रिय है। कईयों की मुंहलगी है। उससे कुछ कहते भी नहीं बनता।”

नेट पर हिंदी इस कदर फ़ैल रही है कि पूछिए ही मत. आज बालसुब्रमण्यम जी ने इसकी जानकारी देते हुए बताया;

अब तो नाइजीरिया के फरेबी भी हिंदी बोल रहे हैं.

कहने का मतलब यह कि अब हम भारतीय केवल अंग्रेजी भाषा में ही लॉटरी नहीं जीतते. अब हमने हिंदी में भी लॉटरी जीतना शुरू कर दिया है.

जयहिंदी.

नैनो की डिलिवरी शुरू हो चुकी है. आज आदित्य को उसकी नैनो मिल गई. आदित्य ने इसके बारे में बताते हुए कहा;

“आपने पढ़ा होगा की नैनो की डिलीवरी शुरु हो गई.. तो लगे हाथ पापा मेरे लिये भी नैनो ले आये.. yellow कलर की.. वैसे होंडा सिटी भी मिल रही थी.. पर वो तो बहुत कॉमन है न.. पापा-मम्मी ने सोचा आदि के लिये कुछ ‘exclusive’ कार ले जाते है.. और नैनो से बढ़कर भला और क्या हो सकता है.. बिल्कुल छोटी सी प्यारी सी नैनो..”

आदित्य की नैनो देखिये और उससे मिठाई की मांग कीजिये. नई कार आई और आदित्य ने मिठाई नहीं खिलाई. ऐसे चलता है क्या?

अनामदास जी ने बहुत दिनों के बाद आज लेख प्रकाशित किया. उन्होंने लिखा;

आर्यभट मस्ट बी प्राउड

ऐसा उन्होंने क्यों लिखा, यह जानने के लिए उनके ब्लॉग पर पधारे. ज़रूर पधारें. वे कभी-कभी ही तो लिखते हैं.

ताऊ जी के ब्लॉग पर आज पारुल जी का परिचयनामा पब्लिश हुआ है. ज़रूर पढें.

आज अलबेला खत्री जी का जन्मदिन है. उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

आज की चर्चा में बस इतना ही.

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11 Responses to खानापूर्ती वाली एक चर्चा

  1. रंजना कहते हैं:

    Waah !! bahut badhiya charcha…..post chayan me bada kaam aayega yah charcha…Dhanyawaad..

  2. कुश कहते हैं:

    खानापूर्ति वाली टिपण्णी भी लेते जाइए..

  3. रंजन कहते हैं:

    ऎसी खाना पुर्ती होती रहे.. अच्छी है..

  4. नीरज गोस्वामी कहते हैं:

    बंधू आपके विशेष रंग में रंगी ये पोस्ट मनोरंजक है…हालाँकि लगता है की कुछ जल्दबाजी में लिखी गयी है… मैं गलत तो नहीं कह रहा?नीरज

  5. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    वैसे ..गर सच का सामना में अगर अलग अलग चैनल के मालिक को बुलाया जाये तो …….

  6. cmpershad कहते हैं:

    ये खाना-पूर्ति क्या होता है, हमे तो खाना-पूरी का पता है:)भाई अलबेला खत्री जी को जन्मदिन की बधाई॥

  7. Udan Tashtari कहते हैं:

    वाकई खाना पूर्ति है क्यूँकि हम नहीं दिखे… :)वैसे मस्त चर्चा है.

  8. संगीता पुरी कहते हैं:

    अच्‍छी चर्चा है .. खानापूर्ति नहीं कही जा सकती !!

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