इक नई उम्मीद लेके आएगी कल की सहर

आज की चर्चा अनूपजी के याद दिलाने पर सम्भव पाई… इस कारण कई चिट्ठों को पढ़ने का मौका मिला… कभी कभी हम पूरी पोस्ट पढ़ जाते हैं लेकिन कुछ पंक्तियाँ दिल को छू जाती हैं……… आज उन्हें यहाँ उतार दिया आप सबके साथ साझा करने के लिए….

दरमयां
वक्त है, खामोशी है…हमारा होना है
फ़िर भी…दरमयां कुछ भी नहीं है…

बिन दुखों के जिंदगानी, भूल जा

जब कभी छूती हूँ मैं

इन बेजां पत्थरों को

बोलने लगते हैं


मैं कैसे प्रेमाभिव्यक्ति की राह चलूँ
होठ तो काँप रहे हैं
सात्विक अनुभूति से ।

इक नयी उम्मीद लेके आएगी कल की सहर,
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से।

एक गाँव में देखा मैंने
सुख को बैठे खटिया पर

अधनंगा था, बच्‍चे नंगे,
खेल रहे थे मिटिया पर

अंतर्जाल और मेरे सम्बन्धों में इतना बड़ा अन्तराल अभी तक नही आया था –मैं उस दहशतनाक मंजर से सिहर उठा हूँ जब कहीं कुछ ऐसी अनहोनी न हो जाय कि इस आभासी दुनिया का वजूद ही न मिट जाय ! फिर हम इनके जरिये बने कितने ही मधुर रिश्तों -नातों को कैसे निबाह पायेगें ? ब्लॉग संस्कृति का क्या होगा ? क्या तब साहित्यकार ठठा के हँस नही पड़ेगे कि लो गया ब्लॉग साहित्य ,ब्लॉग साहित्य ,हुंह माय फ़ुट !

आटिज्‍म एक ऐसा विकार है, जिसका कोई निश्चित इलाज नहीं है। यदि मॉं बाप ऐसे लक्षणों के उभरते ही डॉक्‍टर से सम्‍पर्क कर लें और मनोवैज्ञानिकों तथा थेरेपिस्‍ट की भलीभांति सेवाएं लें, तो काफी हद इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

श्रेष्ठ तो वह होता है, जो दूसरों को श्रेष्ठ समझे।

धरती पर आग बरसाता
जेठ का सूरज
धधकती जमीन, प्यासे कंठ

बन्धुवर, यह गांव/शहर या सबर्ब का युग नहीं, साइबर्ब (Cyburb) का युग है। आप यहां जो देख रहे हैं – वह साहित्य नहीं है। आप को नया शब्द लेना होगा उसके लिये। क्या है वह? साइबरित्य है?

इसे हमारे समय की विडम्बना ही कहा जाएगा कि केन्द्र सरकार एक तरफ तो जेन्डर बैलेंस पर ज़ोर दे रही है वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश सरकार पिछड़ेपन की ऐसी मिसालें कायम कर रही है कि क्या कहिए।ऊपर दिए लिंक की खबर बताती है कि भोपाल मे गत 26 जून को गरीब कन्याओं के सामूहिक विवाह के समय मंडप मे जाने से पहले सभी 151 दुल्हनों के वर्जिनिटी टेस्ट कराए गए।

छत्त्तीसगढ मे महिलाओं को महीने भर की तनख्वाह सि्र्फ़ दो और चार सौ रूपये महिना मिल रही है?क्या उनके लिये आवाज़ उठाना ज़रूरी नही है?

भक्त भी अपने हिसाब से एडजस्ट करते रहते हैं। भक्ति फ्लेक्सिबल है।

२ जुलाई की मोहक शाम, मैं, मेरा कम्प्यूटर और सामने एग्रीगेटर धाम!!

एचपी / कॉम्पैक का लोगो कितना सुंदर और प्यारा सा है – एचपी-टोटल केयर. परंतु काम सीधे इसके उलट है. टोटल फेलुअर. इसलिए, दोस्तों एचपी कॉम्पैक का लैपटॉप/नोटबुक भूलकर भी न खरीदें. विवरण आगे देता हूं कि क्यों:-

जमीनें हैं कहीं सूखीं कहीं बादल बरसता है

यहाँ इतनी मुहब्ब्त है, ये दिल क्यों फिर तरसता है

लंबी लंबी उँगलियों वाली ताड़ की हथेलियाँ खूब सारी ओस समेट कर अपने जटा-जूट से लपेटे गए तने को तर कर लेती हैं और इस तरावट में सारी दोपहर हरी भरी और तरोताज़ा बनी रहती हैं।

अछा जी राम राम., कथा यहीं पर रुकती है,
चर्चा जो ना कर पाएं तो, ये बात हमें भी चुभती है…..
इसलिए कोशिश रहती है कि……रुकावट के लिए खेद है….न कहना पड़े…मगर यदि…….तो आप माफ़ कर देंगे. मुझे पता है …

पिछले कुछ महीनों से ज़िन्दगी के चक्रव्यूह में ऐसे फँसे हैं कि बाहर निकलने की कोई राह नहीं दिखाई दे रही… कई बार सोचा कि एक पोस्ट लिखी जाए कि प्रेम ही सत्य है जिसे मिटाना मेरे लिए आसान नहीं है……लेकिन अन्य चिट्ठों पर जहाँ भी हमारा नाम है उसे मिटा दिया जाए….ऐसी विनती करते हैं !

About bhaikush

attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि मीनाक्षी में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

20 Responses to इक नई उम्मीद लेके आएगी कल की सहर

  1. श्यामल सुमन कहते हैं:

    एक अच्छा प्रयास।सादर श्यामल सुमन 09955373288 http://www.manoramsuman.blogspot.comshyamalsuman@gmail.com

  2. Udan Tashtari कहते हैं:

    धन्य हुए..अच्छी चर्चा!!

  3. अजय कुमार झा कहते हैं:

    मीनू दी, चिट्ठाचर्चा का सबका अपना एक अलग अंदाज है ….और जाहिर है की स्वाद भी अलग है,,,,मुझे तो सारे स्वाद pasand आते हैं,,,,,और आपके तो kehne ही क्या…बहुत बढ़िया rahee charcha

  4. Arvind Mishra कहते हैं:

    केवल आपने मेरी भावनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझा -बहुत आभार !

  5. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    सुन्दर! अच्छा लगा कि आप नियमित लिख रही हैं! आपके परिवार के लिये मंगलकामनायें।

  6. बहुत सुंदर चर्चा। विशेष रूप से आप को चर्चा करते हुए देख और भी अच्छा लग रहा है।

  7. यह तो नया तरीका है चर्चा का। पसन्द आया। जितना इनोवेशन चिठ्ठा-चर्चा में होता है उतना ब्लॉग पोस्टों में क्यों नहीं होता!

  8. cmpershad कहते हैं:

    काव्यमई चर्चा- बढि़या!! गाँव के चित्र पर याद आया-दरवाज़े पर अंधी बुढि़याताला-जैसी लटक रही हैकोई था जो चला गया है।[धूमिल]

  9. बहुत बढ़िया अंदाज़ लगा इस चर्चा का शुक्रिया मीनाक्षी जी

  10. बवाल कहते हैं:

    आज अपनी नज़र वज़र फिर उतरवा लीजिएगा विवेक भाई। बहुत ख़ूब चर्चा कर बैठे हैं आप। हा हा।

  11. डॉ. मनोज मिश्र कहते हैं:

    अच्छे अंदाज़ में रही चर्चा.

  12. विवेक सिंह कहते हैं:

    हमारे वकील साहब ने बताया है कि हिन्दी के साथ बलात्कार हो गया है !

  13. Dr. Smt. ajit gupta कहते हैं:

    एक गाँव में देखा मैंने, सुख को बैठे खटिया पर, को आपने अपने चिठठे मे सम्मिलित किया इसके लिए आभारी हूँ।

  14. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    एक नायाब चरचा…लेकिन "प्रेम ही सत्य है" को हटाने का नौरोध समझ में नहीं आया…

  15. मीनाक्षी कहते हैं:

    किसी भी रूप में कम ज़्यादा की गई प्रशंसा मन प्रसन्न कर देती है..इसके लिए आप सबका शुक्रिया … @गौतमजी प्रेम सत्य है उसे मिटाना असम्भव है..हमने लिखा है कि अन्य चिट्ठों पर जहाँ हम नियमित नही लिख पाते , हमारा नाम निकाल दिया जाए तो अपराधभावना नहीं आएगी कि हम लिखने के लिए समय नही निकाल पाते.

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