गेंहूँ, गेंहूँ से ब्‍याहा…घुन की जान बची

अदालत का फैसला आ गया है, बात अब क्‍लोजेट से बाहर है। चर्चा के लिए कीबोर्ड थामने से पहले ही पता था कि अंगी भाव समलैंगिकता ही पाई जाएगी पर उम्‍मीद के खिलाफ यहॉं पाया कि कम लोग सीधे सीधे इसके विरोध में हैं। ब्‍लॉग समाज में  एकाएक इतनी परिपक्‍वता हमें आसानी से हजम नहीं हो रही। आधा ब्‍लॉगजगत तो हर बात बेबात धर्माधिकारी मंडल से सहमत रहता है पर गनीमत है यहॉं कम पोस्‍ट हैं जिन्‍हें वयस्‍कों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों से आपत्ति हो संजय पहले ही साफ कर चुके हैं कि इसका धर्म संस्‍कृति से नाता जोड़ना बेबुनियाद है।। दिनेशराय द्विवेदीजी बिना धमकी बिना स्‍नेह ये समझाते हैं कि दरअसल इस फैसले कि परिधि है क्‍या…

न्यायालय ने धारा 377 में से केवल निजता में वयस्कों दारा सहमति से किए गए यौनाचरण को  भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के कानून के समक्ष समता और संरक्षण के मूल अधिकार, अनुच्छेद 15 में लिंग के आधार पर विभेद के मूल अधिकार और अनुच्छेद 21 में प्रदत्त प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकार के विरुद्ध मानते हुए इसे दंडनीय श्रेणी से बाहर किया है।  मेरी समझ में इस से समाज को कोई हानि नहीं होने वाली है।  इस से सरकार को धारा 377 भारतीय दंड संहिता को इस निर्णय के प्रकाश में संशोधित करने लिए एक दिशा मिली है। इस से धारा 377 में केवल यह अपवाद जोड़ना ही पर्याप्त होगा कि, "निजता में वयस्कों द्वारा सहमति से किया गया यौनाचरण इस धारा के अंतर्गत दंडनीय नहीं होगा

फैसले का सकारात्‍मक असर कई ऐसे पक्षों पर भी पड़ेगा जो क्‍लोजेट हशअप विचारों के कारण अब तक नजरअंदाज कर दिए जाते थे। मसलन वे स्त्रियॉं जो सामाजिक दबाब के चलते उन पुरुषों से ब्‍याह दी जाती हैं जो समलैंगिक होते हैं…उम्‍मीद है अब गेंहूँ के साथ साथ इन घुनों का भी बचाव हो सकेगा।

कोई उस स्त्री की मनोदशा का अनुमान लगाए जो विवाह के बाद पाए कि उसका पति उसकी ओर से पूर्णतया उदास है। वह अपने में कमी ढूँढती है। (स्त्री है तो स्वाभाविक रूप से कमी उसमें ही होगी, पति में तो हो ही नहीं सकती!) वह पति को खुश रखने की हर संभव चेष्टा करती है। पति का परिवार उसके रूप, उसकी चाल ढाल, बातचीत में दोष ढूँढता है। जानना चाहता है कि क्या कारण है कि उनका राजा बेटा इस स्त्री से विरक्त है। राजा बेटा माता पिता को कभी नहीं बताता कि वह तो स्त्रियों में रुचि ही नहीं रखता, या कि जिस मित्र से कहकर उसे माता पिता ने विवाह के लिए उसे राजी करवाया था वही उनके बेटे का प्रेमी है।

वैसे जो अल्‍पमत अभी इसके खिलाफ है उनमें से कुछ की साधुवादी टिप्‍पणी इरफान के इस कार्टून पर देखी जा सकती है।

cartoon

 

संजय जायज सवाल उठाते हैं कि –

हम जिनसे सहमत नहीं वे कैक्टस? !!

सेंस ऑफ क्राइसिस सेंस आफ ह्यूमर का गला नहीं घोंट सकता सफेदघर पर सतीश पंचम गेविवाह  की कल्पना कर कुछ प्रेशर किस्‍म की तकलीफों की तरफ इशारा करते हैं-

अब मैं का जानूं कौन पती था और कौन पत्नी, उन दोनों में जिसको अपने आप को पती समझना हो पती माने, जिसे पत्नी मानना हो वो पत्नी माने, हमको तो जो कहा गया वही करे हम……और एक बात कहूं…….तूम जो ईतना भचर-भचर कर रहे हो, कल को का पता तुम ही कोई लडका ले आओ और कहो कि पंडितजी ईस हरिप्रसाद की शादी मुझ दीनूलाल से करवा दो तो हम मना थोडे करेंगे।

अपनी कहें तो हमें तो चिंता सता रही है कि भैया बाकी तो सब ठीक पर धरने प्रदर्शन वालों का क्‍या होगा.. जब लिहाफ आई तो किताब जलाई, फायर आई तो फिल्‍म के पोस्‍टर जले इस लॉजिक से तो संविधान का फायर इंश्‍योरेंस करवाने का वक्‍त आ गया लगता है।

इस ‘लड़ाई’ का परिचयात्‍मक इतिहास जानना हो तो नुक्‍कड़ पर जा बॉंचें-

दिल्ली स्थित नाज फाउंडेशन ने सन 2001 में हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस धारा में संशोधन की मांग की थी। अर्जी में कहा गया था कि दो व्यस्को(होमो या हेट्रो) के बीच अगर आपसी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं, यानी दो लोग अगर होमो सेक्सुआलिटी में संलिप्त हैं तो उनके खिलाफ धारा 377 का केस नहीं बनना चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय और हेल्थ मिनिस्ट्री की दलीलें भी अलग अलग थीं…गृह मंत्रालय जहां धारा 377 में संसोधन के पक्ष में था वहीं हेल्थ ने भी पक्ष लिया…इस तरह माहौल बनता चला गया..। हालांकि सरकारी वकील ने नाज की अर्जी के खिलाफ खूब दलीलें दीं..लेकिन पक्ष की दलील भारी पड़ी..जिसमें कहा गया कि धारा 377 मूलभूत अधिकारों में दखल दे रहा है।

इसी तरह हमें ये भी चिंता है कि धर्म की दुकानदारी पर भी खतरा आ बरपा होगा। इस बारे में अंशुमाली की तालाबंद राय है कि धर्म के पचड़ेबाजों ने ही समाज में तंगनजरिया बड़ासा है। वैसे तो राय तालाबंद है पर जैसा कि आप जानते हैं कि ताले सिवाए चिढ़ाने के और कुछ नहीं रोकते… (ओपेरा में खोलो कापी-पेस्‍ट)-

दरअसल, समलैंगिक संबंधों पर हमारे समाज की सोच बेहद संकुचित है। इस सोच को संकुचित बनाने में धर्मगुरुओं ने बड़ी भूमिका निभाई है। वे जरा से बदलाव से तिलमिला जाते हैं। वे हर वक्त भारतीय सभ्यता और संस्कति का वास्ता इसलिए देते रहते हैं ताकि उनकी असभ्य और अनैतिक सोच-विचार की दुकानें चलती रहें। सिर्फ समलैंगिक संबंध ही नहीं वे तो सेक्स को भी नापसंद करते हैं। सेक्स में उन्हें सिर्फ भोग नजर आता है, प्यार और समर्पण नहीं। इस मामले में ओशो को चिंतन तमाम पिछड़ी सोच के धर्मगुरुओं से बेहद अलग और प्रगतिवादी है। ओशो ने सेक्स को जीने और जिंदगी का अहम हिस्सा स्वीकार किया है। वे इसके व्यवहार और स्वीकृति पर बेहद बल देते हैं।

इतने सब संकटों के बाद भी अगर आप सोच रहे हैं कि हाईकोर्ट ने ये फैसला आखिर दिया क्‍यों है तो समझ लें कि हुआ है ताकि मीडिया वालों को चमकदार बाइट मिल सके…मटक मटककर पीटीसी (पीसटूकैमरा) दिया जा सके- जैसा कि संजयजी के विस्‍फोट पर  बताया जा  रहा है

पत्रकारों की आपस में बातचीत मजेदार थी. जिस एक फैसले पर पत्रकारों को बिफरकर विरोध करना चाहिए था वे मजे ले रहे थे. शाम को उनमें से कई पत्रकारों टीवी पर खबर पढ़ते हुए देखा तो पता चला कि अच्छा यह उस चैनल का पत्रकार है. महुआ टीवी चैनल के पत्रकार ने पीटीसी करने के लिए “आज दिल्ली हाईकोर्ट ने” इसी शब्द को कम से कम 80 बार रिकार्ड किया और फिर टेक हुआ. कोई हाईकोर्ट के दरवाजे से आगे बढ़ते हुए पीटीसी रिकार्ड कर रहा था एनडीटीवी की एक महिला पत्रकार ने जिस अंदाज में पीटीसी किया उससे लगा कि फैसला उसके लिए भी हुआ है. इसलिए उसने मटकते हुए मस्त अंदाज में पीटीसी किया. टीवी में वह कैसा दिखा, मालूम नहीं लेकिन सामने तो बहुत गजब लग रहा था

एनडीटीवी पर रवीश ने चर्चा की औरों ने भी भतेरी की इतनी की कि बाकी खबरों की चर्चा पीछे रह गई यहॉं तक कि पैट्रोल कीमत की भी। बाकी का क्‍या कहें हमारी ही चर्चा बस गे-लेस्बियन (विषयक) पोस्‍टों तक सीमित रही है, बाय।

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यह प्रविष्टि चिट्ठा चर्चा, चिट्ठाचर्चा, मसिजीवी, chithacharcha, masijeevi में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

12 Responses to गेंहूँ, गेंहूँ से ब्‍याहा…घुन की जान बची

  1. चर्चा सुंदर है। पर कुछ और भी बातों के चिट्ठे शामिल किए जा सकते थे।

  2. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    सुन्दर! हम तो इस लैंगिक चर्चा को बांचने के बाद यही कहना चाहते हैं-जैसे उनके इन बहुरे, वैसे सबके बहुरैं!

  3. Udan Tashtari कहते हैं:

    चलो, एक यहाँ बाकी थी सो आपने कर दी चर्चा. बाकी तो सब जगह देख ही रहे हैं.

  4. विवेक सिंह कहते हैं:

    भविष्य में जब समलैंगिकों का बहुमत हो जायेगा तो लड़का-लड़की की शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाएगा ! उसे अप्राकृतिक कहा जाएगा 🙂

  5. venus kesari कहते हैं:

    बढ़िया गे चर्चा 🙂

  6. venus kesari कहते हैं:

    आज की पोस्ट पर इतनी कम टिप्पडी ???

  7. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    "ब्‍लॉग समाज में एकाएक इतनी परिपक्‍वता हमें आसानी से हजम नहीं हो रही।"कुछ लेते क्यों नहीं सर? सुना है हाजमोला बड़ा काम करता है….:-)चर्चा बहुत बढ़िया रही.

  8. बी एस पाबला कहते हैं:

    यहाँ भी यही मुद्दा 😦

  9. बवाल कहते हैं:

    चर्चा करने के लिए समय भी तो खर्चा किया कीजिए, और वो ना रहा करे तो फिर चर्चा ना कीजिए। हा हा।

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