क्यूँ हमारी संगीत प्रेमी जनता महरूम है एक उत्कृष्ट संगीत चैनल से ?

टीवी पर संगीत का कोई उत्कृष्ट चैनल क्यूँ नहीं आता जिस पर सारी संगीत विधाओं को समेटने और सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रसारित करने की काबिलियत हो ? रेडिओ वाले ऍसा क्यूँ ऐसा सोचते हैं कि हिट गानों की फेरहिस्त को दिन में दस बार बजा कर वो आम श्रोताओं के दिल में बस जाएँगे।

दरअसल फिल्म संगीत (वो भी नए) के आलावा संगीत की किसी भी अन्य विधा को रुचिकर ढंग से आम जनता तक पहुँचाने की कोशिश निजी स्तर का कोई रेडिओ और टीवी चैनल कर ही नहीं रहा है और ना ही भविष्य में ऍसी कोई योजना आ रही है। ये भारत की संगीतप्रेमी जनता के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। रेडिओ तो फ्री है पर केबल टीवी के लिए तो हम सभी इन चैनलों के लिए मासिक रूप से किराया दे रहे हैं पर ये चैनल हमारी आज की पीढ़ी को हमारी विविधतापूर्ण सांगीतिक विरासत तक पहुँचने और उसका आनंद उठाने से ही वंचित कर दे रहे हैं।

ये सिर्फ एक व्यवसायिक मामला है ऐसा भी नहीं लगता। अगर समाचार चैनलों में NDTV व्यवसायिक मजबूरियों के बावजूद भी अपना एक अलग स्थान बना सकता है तो फिर इसी तरह की पहचान बनाने में हमारे संगीत के टीवी चैनल और निजी एफ एम चैनल इतने पीछे क्यूँ हैं? ये एक ऐसा प्रश्न है जो मुझे वर्षों से कचोट रहा है। हाल ही में चंदन दास पर श्रृंखला करते समय उनको भी इसी विचार को प्रतिध्वनित करते पाया तो लगा कि ये बात चिट्ठा चर्चा के पाठकों के सामने भी रखनी चाहिए। आप सब इस बारे में क्या सोचते हैं इससे अवगत जरूर कराइएगा।

तो इस बार के चिट्ठा चर्चा की शुरुआत करते हैं साहित्य शिल्पी पर अजय यादव द्वारा कैफ़ी आज़मी पर लिखे गए लेख से। इस लेख में अजय ने क़ैफी आज़मी से जुड़ी कुछ बातों के साथ उनकी एक बेहतरीन नज़्म और उनके लिखे कुछ गीत भी पेश किए हैं। अजय लिखते हैं

१० मई, २००२ में उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी शबाना आज़मी (यहाँ मुझे शबाना जी से जुड़ी एक बात याद आ गई. शबाना का जब जन्म हुआ, उस समय क़ैफ़ी साहब ज़ेल में थे और कम्युनिस्ट पार्टी नहीं चाहती थी कि ऐसी हालत में शौकत किसी बच्चे को जन्म दें. पार्टी की ओर से बाकायदा शौक़त को इस वाबत आदेश भी मिला था मगर ये उनकी ज़िद ही थी कि शबाना का जन्म हुआ और दुनिया को अदाकारी का एक अनमोल नगीना मिला.) ने अपने पति ज़ावेद अख्तर के साथ मिलकर श्रीमती शौक़त क़ैफ़ी के संस्मरणों ‘यादों की रहगुज़र’ पर आधारित एक नाटक ‘क़ैफ़ी और मैं’ का मंचन सन २००६ में देश व विदेश के कई स्थानों पर किया.

और इस बेहतरीन नज़्म की ये पंक्तियाँ देखें

एक दो भी नहीं छब्बीस दिये
एक इक करके जलाये मैंने
इक दिया नाम का खुशहाली के
उस के जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेट खाली है मिरा, ज़ेब मेरी खाली है
………………………………………………..
दूर से बीवी ने झल्ला के कहा
तेल महँगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दिये इतने जला रक्खे हैं
अपने घर में झरोखा न मुन्डेर
ताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं
आया गुस्से का इक ऐसा झोंका
बुझ गये सारे दिये-

हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है

भई वाह दिल में उतर गई ये नज़्म । नज़्म पूरी पढ़ने के लिए और गीतों को सुने यहाँ पर

हरकोना वाले रवींद्र व्यास कबाड़खाना पर मिलवा रहे हैं एक नए गायक पुष्कर लेले से, जहाँ उनकी बातचीत का विषय आज का भारतीय संगीत है। स्लमडॉग मिलयनर के संगीत के बारे में ईमानदारी से अपनी राय देते हुए पुष्कर लेले कहते हैं

स्लमडॉग मिलिनियेर का संगीत रिदम बेस्ड है। उसमें रिदम ज्यादा है, मेलड़ी कम है। इस फिल्म के लिए उन्हें ऑस्कर मिला लेकिन इसका संगीत मुझे इतना पसंद नहीं। ऑस्कर के अपने अलग मापदंड होते हैं। मुझे उनका पहले का संगीत स्लमडॉग से कई गुना बेहतर लगता है। जब से रहमान को इंटरनेशनल एक्सपोजर मिला है, उनका संगीत मेलडी से रिदम की तरफ झुका है।

ए आर रहमान के संगीत के बारे में आम संगीतप्रेमी भी यही राय रखता है। रवींद्र जी अगर आप इस पोस्ट में लेले द्वारा गाया हुआ कोई भी टुकड़ा सुनवा देते तो इस कलाकार की प्रतिभा हम तक और अच्छी तरह पहुँच पाती।

और जब आज के संगीत की बात चली है तो फिर क्यूँ ना कुछ नए एलबमों की बात की जाए। सजीव सारथी आवाज़ पर कैलाश खेर के एक नए एलबम चंदन का भीगा भीगा सा गीत सुनवा रहे हैं। सजीव लिखते हैं

दो सालों में बहुत कुछ बदल गया. कैलाश आज एक ब्रांड है हिन्दुस्तानी सूफी संगीत में, और अब वो विवाहित भी हो चुके हैं तो जाहिर है जिंदगी के बदलते आयामों के साथ साथ संगीत का रंग भी बदलेगा. एल्बम में जितने भी नए गाने हैं उनमें सूफी अंदाज़ कुछ नर्म पड़ा है, लगता है जैसे अब कैलाश नुसरत साहब के प्रभाव से हटकर अपनी खुद की ज़मीन तलाश रहे हैं ।

अब मानसून तो समय पर आया नहीं क्यूँ न हम और आप अपनेआप को कैलाश खेर की स्वरलहरियों से भिंगा लें..

तीखी तीखी सी नुकीली सी बूँदें,
बहके बहके से बादल उनिन्दें.
गीत गाती हवा में,
गुनगुनाती घटा में,
भीग गया मेरा मन…
चमके चमके ये झरनों के धारे,
तन पे मलमल सी पड़ती फुहारें,
पेड़ हैं मनचले से,
पत्ते हैं चुलबुले से,
भीग गया मेरा मन….

आज की बातें तो खूब हुई अब कुछ अतीत की तह भी तो टटोलें जनाब ! खेती बाड़ी वाले अशोक पांडे जी वाद्य यंत्र के इतिहास को ३५००० वर्ष पीछे ले गए हैं। उनकी संकलित ख़बर के अनुसार

जर्मनी में खोजकर्ताओं ने लगभग 35 हज़ार साल पुरानी बांसुरी खोज निकाली है और कहा जा रहा है कि यह दुनिया का अब तक प्राप्‍त प्राचीनतम संगीत-यंत्र है। प्रस्‍तर उपकरणों से गिद्ध की हड्डी को तराश कर बनायी गयी इस बांसुरी को दक्षिणी जर्मनी में होल फेल्स की गुफ़ाओं से निकाला गया है।

चलिए वापस आते हैं ३५००० साल पहले से करीब ४५ साल पहले के बेमिसाल प्रेम और बेवफाई से ओतप्रोत, फिल्म भीगी रात के गीत पर जिसके संगीतकार थे प्रतिभावान रौशन। इस फिल्म में था एक प्यारा सा नग्मा दिल जो ना कह सका वही राज ए दिल कहने की रात आई.. जिसे आवाज़ दी थी रफ़ी और लता जी ने दो अलग अंदाजों में
इन गीतों को सुनकर मेरे मन में तो ये खयालात उठे…

गीतकार साहिर लुधियानवी ने प्रेमिका की बेवफाई टूटे नायक के दिल में उठते मनोभावों को गीत के अलग अंतरों में व्यक्त किया हैं। नायक की दिल की पीड़ा को कभी तंज़, कभी उपहास तो कभी गहरी निराशा के स्वरों में गूँजती है और इस गूँज को मोहम्मद रफ़ी अपनी आवाज़ में इस तरह उतारते हैं कि गीत खत्म होने तक नायक का दर्द आपका हो जाता है। रफ़ी साहब का गाया गीत एक ऊंचा टेम्पो लिए हुए था वहीं मीना कुमारी पर फिल्माया ये गीत उस शांत नदी की धारा की तरह है जिसके हर सिरे से सिर्फ और सिर्फ रूमानियत का प्रवाह होता है। लता इस गीत में अपनी मीठी आवाज़ से प्रेम में आसक्त नायिका के कथ्यों में मिसरी घोलती नज़र आती हैं।

शायद आपको भी ये गीत रूमानियत से भर दें। सुन कर देखिए और बताइए।

और चलते चलते इन्हें भी एक बार सुनना ना भूलें

और जैसा कि आप सब को विदित है मशहूर पॉप गायक और स्टेज शो पर अपने मशीनी नृत्य से अचंभित करने वाले माइकल जैक्सन का गुरुवार देर रात दिल का दौरा पड़ने के कारण मात्र ५१ वर्ष की आयु में निधन हो गया। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

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यह प्रविष्टि मनीष कुमार में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

9 Responses to क्यूँ हमारी संगीत प्रेमी जनता महरूम है एक उत्कृष्ट संगीत चैनल से ?

  1. सबसे पहले तो मरहूम की जगह महरूम करें. अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो जायेगा.मरहूम का मतलब मृतक/स्वर्गीय, महरूम का मतलब वंचित.

  2. Manish Kumar कहते हैं:

    टंकण की इस गलती की ओर ध्यान दिलाने का बहुत बहुत शुक्रिया। आपने सही कहा सचमुच अर्थ का अनर्थ हो गया था।

  3. विवेक सिंह कहते हैं:

    बिजनेस के अखबार में भी कुछ समाचार तो राजनीति के रहते ही हैं :)अच्छी चर्चा !

  4. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    सही है, भाई जी..याद करने को ही रह गया है" मूझे भूल जाना इन्हें न भुलाना " – पँकज मलिक" ग़ुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा "- लता" कभी तन्हाइयों में भी हमारी याद आयेगी " – जगजीत कौरआल इन्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस से देर रात नस्ल होने वाले गाने याद आया करते हैं ।मौशिकी की तन्हाइयों में आपके ईमानदार सरोकार इस पोस्ट में पुरज़ोर तरीके से अता किये गये हैं, शुक्रिया !

  5. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    तब गीत ओर गीत लिखने वाले भी एक जिम्मेदारी महसूस करते थे ,संगीतकारों ओर लिखने वालो दोनों में एक हेल्दी कम्पीटीशन रहता था ….नीरज ने देवानंद के लिए 'शोखियों में घोली जाए थोडी सी शराब ओर फूलो के रंग से लिखा तो शैलेन्द्र ने राज कपूर को कई अमर गाने दिए …हकीक़त के गाने जिन्हें कैफी आज़मी ने लिखा रफी का गया …मै ये सोचकर उसके दर से उठा था '"अपने आप में एक नया प्रयोग था ….शायद अब भी प्रतिष्ठ स्थापित डायरेक्टर वैसे प्रयोग करने में हिचकिचाए .ऐसे में एक गीत ओर याद आता है …जो इकई मिनट लम्बा होने के बावजूद अपने फिल्मांकन ओर रफी की आवाज का बेहतरीन नमूना था ….तुम जो मिल गए हो…तो ऐसा लगता है ..बरसात को जैसे जीवित कर देता था …ख्याम का रजिया सुलतान में कब्बन मिर्जा को लेकर प्रयोग ..आशा भोसले को 'बाज़ार "में गजल गवाना ..इसके बाद गुलज़ार ओर आर डी की हिट जोड़ी …आर डी कहते थे की गुलज़ार का पता नहीं किसी दिन अख़बार उठा कर ले आयेगे ओर कहेगे .बनायो गाना .इजाज़त फिल्म के गानों को कैसे म्यूजिक दिया गया होगा…सोचने वाली बात है…मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है…..वैसे आर डी भी ने भी ऐसा ही एक प्रयोग किनारा में किया है …भूपेंदर की आवाज में उन्होंने गुलज़ार की एक नज़्म फिल्माई है …रोमांटिक…"एक ही खवाब कई बार देखा मैंने "ओर हाँ अंत में अब NDTV भी शायद व्यावसायिकता की दौड़ में शामिल हो रहा है..उसके भी नीचे …देश का सर्वश्रेष्ट चैनल जैसे टेग दिखने लगे है ..उसकी भी न्यूज़ फ़िल्मी कलाकार पढने लगे है….

  6. cmpershad कहते हैं:

    माइ का लाल गोलोकवास चला गया। मरहूम [महरूम नहीं] की आत्मा को शांति मिले॥

  7. cmpershad कहते हैं:

    डॊ. अमर कुमार जी, जिस ‘नस्ल’ के गाने ‘नश्र’ होते थे, अब भी यदा-कदा भुलेबिसरे गीत या छायागीत जैसे विविध भारती के प्रोग्रामों में सुने जा सकते हैं:)

  8. Manish Kumar कहते हैं:

    सवाल सिर्फ पुराने फिल्म संगीत का नहीं उप शास्त्रीय संगीत, ग़ज़लों भजन,कव्वाली, के कार्यक्रमोंं का भी नाममात्र का समावेश है आज के म्यूजिक चैनलों में जो टीवी में आ रहे हैं।

  9. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    टीवी पर गाने सुनता ही नहीं । वहाँ तो देखे जाने वाले गाने सुनाये (नहीं-नहीं दिखाये ) जाते हैं । चर्चा के लिये आभार ।

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