तानसेन को मिस करता देश और बोरवेल अंकल का ‘साछात्कार’

हमारे देश का जनरल नालेज उद्योग बहुत बड़ा नहीं है. वैसे तो बाकी उद्योग भी क्या उखाड़ ले रहे हैं लेकिन वह एक अलग बात है. इसलिए उसपर चर्चा न करके केवल जनरल नालेज उद्योग पर ही टिके रहें तो ठीक रहेगा. अगर आप यह कहेंगे कि जनरल नालेज उद्योग बहुत बड़ा नहीं है इससे ब्लॉग-जगत का क्या लेना-देना तो मेरा सुझाव यह है कि ऐसा तो मत ही कहिये.

आखिर देश के सिकुड़े और स्टैगनेंट जनरल नालेज उद्योग को विस्तार देने का काम अपना ब्लॉग जगत ही तो कर रहा है. पहेली, कुहेली, सहेली, हथेली वगैरह बूझने का काम जितना बढ़िया अपने ब्लॉग-जगत में होता है उतना बढ़िया और कहीं नहीं हो रहा…:-) (जो निशान मिस कर जाएँ उनके लिए शब्द लिख देता हूँ, स्माईली). इलेक्ट्रॉनिक मीडिया देश के जनरल नालेज उद्योग का हाल-चाल और उसमें हो रही प्रगति का हिसाब-किताब पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के मौसम में करता है. ऐसे में हम कैसे आशा करें कि जनरल नालेज उद्योग स्टैगनेंट नहीं रहेगा?

लेकिन अब चिंता की बात नहीं है. अब हिंदी ब्लॉग जगत इस उद्योग को मंदी के दौर से निकाल कर कहीं न कहीं पहुंचायेगा ही. (ये लीजिये, एक और स्माईली).

आज पूरे ब्लॉग जगत के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पेश किया राज कुमार ग्वालानी जी ने. प्रश्न है, महात्मा गाँधी की माँ का क्या नाम है?

उनके ब्लॉग पर आने से पहले यह प्रश्न उनके अखबार के सम्पादक जी की पहल पर उनके शहर के प्रोफेसरगण से पूछा गया था. और नतीजा जो हुआ उसके बारे में खुद उन्ही से सुनिए;

“छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जिस समाचार पत्र दैनिक हरिभूमि में हम काम करते हैं, कुछ समय पहले उसके संपादक की पहल पर राजधानी के कॉलेजों के प्रोफेसरों के साथ शिक्षा विभाग से जुड़े लोगों के अलावा और कई विभागों के अफसरों से एक सवाल किया गया था कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है? अफसोस 99 प्रतिशत लोगों को यह मालूम ही नहीं है कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है। एक प्रोफेसर ने काफी संकोच के साथ उनका नाम बताया था जो कि सही था।”

एक प्रोफेसर साहब ही बता पाए. वो भी संकोच के साथ. जैसे कह रहे हों; “उत्तर के साथ संकोच फ्री..फ्री..फ्री..”

भाई जब जवाब मालूम ही है तो इसमें संकोच कैसा? जवाब दे डालिए. लेकिन यह बात तो हम कलकत्ते में, सॉरी कोलकाता में बैठे-बैठे कह रहे हैं. हो सकता है उन प्रोफेसर साहेब के हेड ऑफ़ द डिपार्टमेंट सही जवाब न दे पाएं हों. हो सकता है कालेज के प्रिंसिपल साहेब सही जवाब न दे पाए हों. ऐसे में प्रोफेसर साहेब का संकोच करना स्वाभाविक है.

लेकिन यहाँ मामला केवल कालेज के हेड ऑफ़ द डिपार्टमेंट और प्रिंसिपल साहेब तक ही सीमित नहीं है. आखिर और भी विभागों के लोगों से भी तो पूछ-ताछ हुई. हो सकता है पूछ-ताछ के रेंज में कोई दरोगा जी आ गए हों जिन्हें सवाल का जवाब न मालूम हो. ऐसे में प्रोफेसर साहेब अगर संकोच के साथ जवाब न दें तो कहीं दरोगा जी उन्हें ‘देख लेने वालीं आँखें’ न तरेर बैठें.

खैर, इस सवाल का जवाब देने के लिए तमाम टिप्पणीदाता तैयार थे. कुछ ने जवाब दे दिया. कुछ ने इशारों में जवाब दिया. कुछ ने ऐसे प्रश्न गढे, जिनमें जवाब समाहित था. अनूप जी ने भी ऐसा ही कुछ किया. उन्होंने सुझाव देते हुए लिखा;

“मुन्नाभाई एमबीबीएस से पूछिये वो अपनी पुतली नचाते हुये फ़ट से जबाब दे देगा।”

मतलब यह कि गाँधी जी तक जाने वाला हर रास्ता अब मुन्ना भाई से होकर ही गुजरेगा.

राजकुमार जी की पोस्ट जितनी बड़ी है उससे बड़ी तो उसपर चर्चा हो गई. आप गुस्सा मत करियेगा. आज स्टॉक मार्केट का मंथली सेटलमेंट है न. इसलिए ध्यान बीच-बीच में उधर चला जा रहा है. प्रोफेशन चर्चा के आड़े आ जा रहा है और हम पता नहीं क्या-क्या लिखते चले गए.

हिंद-युग्म पर अशोक गौतम जी का व्यंग पढिये. शीर्षक है; “रिटायरमेंट, कुत्ता और मोर्निंग वाक.”

अशोक जी के व्यंग का एक अंश पढिये. वे लिखते हैं;

“अब कुत्ता और मैं अरली इन द मार्निंग घूमने निकल जाते हैं। घर की किच-किच से भी बचा रहता हूं। स्वास्थ्य लाभ इस उम्र में मुझे तो क्या होगा, पर चलो कुत्ते को अगर हो रहा है तो ये भी क्या कम है।”

रिटायरमेंट के बाद किन-किन चीजों के प्रति मोह होता है? या नहीं होता है?

एक तरफ तो कुत्ते को स्वास्थलाभ होने से हर्षित होने वाले ये सज्जन हैं और दूसरी तरफ इन सज्जन के पुलिसिया पड़ोसी जी हैं. वे क्या सोचते और कहते हैं, वो भी पढिये;

“सरकारी नौकरी में भी अगर मौज के लाले पड़ें तो लानत है ऐसी सरकारी नौकरी को। रिश्वत के बिना इस देश में किसी का गुजारा हुआ है क्या? चोर-उचक्के आज तक पकड़ में आए हैं क्या! बदनामी से बचने के लिए शरीफ ही पकड़ने पड़ते हैं। अब एक और आदेश कि हम मानवता का पाठ पढ़ें। मानव हों तो मानवता का पाठ पढ़ें। हम तो साले अभी आदमी भी नहीं हो पाए। ये उम्र है अपनी क्या पढ़ने की?”

बढ़िया पोस्ट है. ज़रूर पढें.

क्या कहा? मैंने पूरा नहीं छापा तो कैसे पढेंगे? वो देखिये…अरे वो ऊपर. अरे जहाँ इस लेख का शीर्षक लिखा हुआ है. उसपर क्लिकियाईये, सोझा लेख पर पहुँच जायेंगे. डायरेक्ट.

२३ मई के अखबार में सूचना थी कि मानसून के बादल पश्चिम बंगाल के ऊपर मंडरा रहे हैं. एक महिना हो गया. बादल कब मंडराए और गायब हो गए पता ही नहीं चला. उधर मध्य प्रदेश में भी यही हाल है. दिल्ली में पॉवर वाले लोग रहते हैं लेकिन वे बेचारे भी अभी तक मानसून नहीं ला सके.

लगभग पूरे देश की अवस्था एक सी है. लगता है जैसे पूरा देश रेलवे के वेटिंग रूम में कनवर्ट हो चुका है. ऊपर निहारते, ताकते सब यही पूछ रहे हैं; “कब आओगे? कब आओगे? बताते क्यों नहीं कब आओगे?”

देश तानसेन को बहुत मिस कर रहा है. सुना है राग मेघ-मल्हार गाते थे तो बरसात हो जाती थी. अच्छा चलिए माना कि तानसेन नहीं हैं. लेकिन क्या राग मेघ-मल्हार भी नहीं है? वो तो है ही. लेकिन लगता है सारे गाने वाले विदेश में कंसर्ट वगैरह दे रहे हैं. शास्त्रीय संगीत और गायन तो आजकल उधर ही सुना जाता है.

शायद ऐसा ही है. शास्त्रीय गायक सब विदेशों में हैं. इसीलिए कल ही टीवी पर देखा कि इंदौर के युवा हाथों में गिटार लिए पॉप म्यूजिक के गाने गा रहे थे. “अब के सावन ऐसे बरसे, बह जाए वो मेरी चुनर से” टाइप गाने. उससे भी कुछ नहीं हुआ तो अब जाकर कवि ने मैदान संभाला है.

जी हाँ, आज विवेक सिंह जी ने मानसून को शिकायत भेजते हुए कविता लिखी है. कविता का शीर्षक है; “मेरे प्यारे मानसून”.

विवेक लिखते हैं;

पलक पाँवड़े बिछा रखे थे, इन आँखों में नींद न थी ।
आते आते रुक जाओगे, ऐसी तो उम्मीद न थी ॥

कवि को अधिकार है कि वह कुछ भी बिछा सकता है. किसी को बैठाने के लिए जहाँ बाकी के लोग बिस्तर, खटिया और चटाई वगैरह बिछाने की सोचते हैं, वहीँ कवि पलक-पाँवड़े बिछाकर काम चला लेता है. लेकिन एक बात मुझे भी कहनी है.

विवेक की कविता की पहली लाइन में कौन सा अलंकार है, इसपर तो साहित्य के ज्ञाता प्रकाश डालेंगे लेकिन स्टॉक मार्केट में काम करने वाला मैं तो यही न पूछूंगा कि जब “पलक-पाँवड़े बंद करने की बजाय बिछा दोगे तो नींद कैसे आएगी? ये बिछाने के बाद नींद न आने की शिकायत क्यों?”…( डिस्क्लेमर: स्माईली लगा हुआ है.)

खैर, विवेक आगे लिखते हैं;

“यूँ तो पानी मुझमें भी है, यह भी देन तुम्हारी है ।
तुम इतना तो मानो जनता, मेरी नहीं हमारी है ॥
छोड़ा साथ अचानक तुमने, पहले से ताकीद न थी ।
आते-आते रुक जाओगे ऐसी तो उम्मीद न थी ॥”

मुझे पूरा विश्वास है कि कवि का अनुरोध और शिकायत, मानसून दोनों सुनेगा और आ जाएगा. शंका एक ही है, (आज तक पूरा-पूरा माने हंड्रेड परसेंट विश्वास किसी बात पर नहीं हुआ) और वह ये कि तानसेन के गाने से बरसात आती थी. मानसून नहीं. ऐसे में विवेक की कविता सुनकर मानसून आ सकता है लेकिन क्या साथ में बरसात भी आएगी?

खैर, विवेक ने कविता लिख दी है. अब तो जो होगा देखा जाएगा. (फुरसतिया शुकुल से उधार लिया गया वाक्य)

ट्वेंटी-ट्वेंटी विश्व कप में भारतीय टीम हार गई. क्रिकेट प्रेमी हलकान हुए. कोई नई बात नहीं है. बेचारे हर दो-चार महीने में हलकान हो लेते हैं. लेकिन क्रिकेट विश्व कप में भारत के प्रदर्शन के बारे में अगर राग दरबारी के पात्र चर्चा करेंगे तो वह कैसी होगी?

इसका एक नज़ारा मिला कृष्ण मोहन मिश्र के लेख में. राग दरबारी के भक्तगण इस लेख को ज़रूर पढें. बहुत लाजवाब लेख है. एक अंश देखिये..सॉरी पढिये;

“प्रिंसिपल साहब को शनीचर ठंडई गिलास में न देकर लोटे में पिलाया करता है । दो लोटा ठंडई पीकर प्रिंसिपल साहब वैसे ही काबू में नहीं थे । गुस्से, जोश और भंग के नशे में वो अधिकतर अपनी मादरे ज़बान अवधी का ही प्रयोग करते थे । बोले ”काहे नहीं रूप्पन बाबू, इन अंगरेज ससुरन के बुद्धि तो गांधी महात्मा गुल्ली-डंडा खिलाये खिलाये के भ्रष्ट कइ दिये रहिन । अब इ सारे का खेलहीं किरकेट-उरकेट । बांड़ी बिस्तुइया बाघन से नजारा मारे ।”

इस लेख को पढ़कर न जाने कितने तृप्त हो गए. इस बात की पुष्टि समीर भाई की टिप्पणी से होती है. उन्होंने लिखा;

“गजब सन्नाट लेखन. आनन्द आ गया. बहुत बेहतरीन!!”

आजतक का रिकार्ड है. समीर भाई ने जिस लेखन को सन्नाट बता दिया है, वो लेख ब्लॉग सिनेमाघर में सप्ताह के सप्ताह चलता रहता है. इसी बात पर लीजिये ये एक और स्माईली.

आप यह लेख ज़रूर पढें. मज़ा न आया तो अगले वृहस्पतिवार को होने वाली मेरी चर्चा में टिप्पणी मत कीजियेगा.

विनीत कुमार जी ने ‘संवादधर्मी टेलीविजन के जनक‘ एस पी सिंह की याद में होने वाली गोष्ठी की जानकारी दी है. दिल्ली में रहने वाले ब्लागर्स के लिए सूचना है.

हमारी शिकायत रहती है कि देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलप नहीं हो रहा. सरकार इस बात पर अड़ी है कि वह तो इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलप कर रही है. कितना डेवलपमेंट हो रहा है इसबात का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन-चार साल में बोरवेल में गिरकर फंसने वाले बच्चों की संख्या में गजब का इजाफा हुआ है.

सरकार की इस बात पर ध्यान देते हुए आज सैयद फैज़ हसनैन ने आज “बोरेवेल अंकल का साछात्कार” छापा है. बोरेवेल अंकल ने एक से बढ़कर एक जवाब दिए हैं. सवाल भी एक से बढ़कर एक ही हैं.

आप यह पोस्ट ज़रूर पढें. मज़ा आएगा.

ब्लॉग-जगत की चर्चा उत्तर प्रदेश के गजरौला टाईम्स में हो रही है. उसके बावजूद हम यही कहते बरामद होते हैं कि हिंदी ब्लागिंग अपने शैशवकाल में ही है. हमें तो गर्व करना चाहिए कि प्रिंट मीडिया में चर्चा हो रही है. हिंदी ब्लागिंग को और क्या चाहिए? (यहाँ भी स्माईली लगाने की ज़रुरत है क्या? शायद नहीं. क्योंकि यह कोई मज़ाक की बात नहीं है.)

आज के लिए बस इतना ही. अगले वृहस्पतिवार को फिर आता हूँ.

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attractive,having a good smile
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19 Responses to तानसेन को मिस करता देश और बोरवेल अंकल का ‘साछात्कार’

  1. mahashakti कहते हैं:

    बढि़या,मलाईदार चर्चा

  2. मिश्रा जी, इसमें कोई दो मत नहीं है कि अपने देश का जनरल नॉलेज उद्योग काफी बुरी स्थिति में है। यही वजह है कि लोग यह भी नहीं जानते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है। हमने ब्लाग बिरादरी के सामने यह प्रश्न रखा था और हमें इस बात की खुशी है कि ब्लाग बिरादरी के काफी मित्र गांधी जी की मां के नाम से अनजान नहीं हैं। वरना आज की युवा और पुरानी पीढ़ी में बहुत कम लोग पुतलीबाई का नाम जानते हैं। अक्सर यही होता है कि जब किसी से महात्मा गाँधी की मां का नाम पूछा जाता है तो लोग बेबाकी से कस्तूरबा गांधी कह देते हैं। ऐसे लोगों की अक्ल पर तरस आता है। बहरहाल आपने चिट्ठा चर्चा में महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है ? पर जो विस्तार से चर्चा की है, उसके लिए हम आपके आभारी है।

  3. रंजन कहते हैं:

    चर्चा का हर पैरा आपकी स्टाईल का स्टांप लिये है.. बहुत रोचक चर्चा..

  4. नीरज गोस्वामी कहते हैं:

    खूब मस्त लिखें हैं बिलकुल वैसा ही लिखें हैं जैसा आप लिखते हैं…हमेशा…रागदरबारी वाली पोस्ट पढ़ कर हम भी खुस हुए थे…और विवेक जी की कविता पर लगाया गया आक्षेप हमें भी सही लगा…अगली बृहस्पति का इंतज़ार करते हैं…और हिंद युग्म वाला लेख पढ़ते हैं…नीरज

  5. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    अपुन अक्खा लींक पकड़ को ईस्माइली हो रैली है ।थैन्क्यू काय को, ये अपुन का हक्क है, बाप ।धन्यवाद शिवभाई, रुच कर मनविभोर लिखी गयी चर्चा !

  6. cmpershad कहते हैं:

    "मतलब यह कि गाँधी जी तक जाने वाला हर रास्ता अब मुन्ना भाई से होकर ही गुजरेगा. "केवल मुन्ना भाई नहीं, मुन्ना भाई MBBS अर्थात मुन्ना भाई मिया,बीवी बच्चों समेत 🙂 न समझे तो इस्माइल[:)] से पुछ लिजिए!!

  7. गजरौला टाइम्स का ई-मेल आईडी चहिये। चिठ्ठाचर्चक हेल्पार्थ आगे आयें। (यह लें इस्माइली :-))

  8. Udan Tashtari कहते हैं:

    मस्त मस्त चर्चा. बजार बन्द होने के बाद करना चाहिये न जी. 🙂

  9. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    शानदार चर्चा। ज्ञानजी को कत्तई गजरौला टाइम्स का मेल आई डी न दें वर्ना ज्ञानजी कुछ करेंगे जरूर! 🙂

  10. विवेक सिंह कहते हैं:

    चर्चा में हमारे ब्लॉग को शामिल करने का धन्यवाद ! अच्छी चर्चा !

  11. शिवकुमार जी,अच्छी, व्यापक और विस्तृत चर्चा।श्री विवेक सिँह जी की कविता अच्ची लगी काश बादलों ने उनकी पुकार सुन ली हो।समीर जी टिप्पणी पढई सन्नाट लगी।सादर,मुकेश कुमार तिवारी

  12. आजकल के गांधीमुन्‍नाभाई ही हैं अब

  13. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    एक बात तो देखी है आप किसी के ब्लॉग की चर्चा कर दीजिये वो यहाँ टिपियाने आ जायेगा …वैसे भले ही अब्सेंट लगती हो यहाँ के रजिस्टर में …सब प्रभु की माया है …..

  14. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    @ अनुराग जी"एक बात तो देखी है आप किसी के ब्लॉग की चर्चा कर दीजिये वो यहाँ टिपियाने आ जायेगा …वैसे भले ही अब्सेंट लगती हो यहाँ के रजिस्टर में …सब प्रभु की माया है ….."इसी बात पर लीजिये एक और स्माईली.

  15. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    चर्चा ने तरंग में लिखी प्रविष्टि का एहसास कराया । लिंक अच्छे हैं, स्माइली तो और भी अच्छी । आभार ।

  16. अभिषेक ओझा कहते हैं:

    बड़ा स्माइली भेजे जा रहे हैं. लीजिये एक हमारी तरफ से भी :)स्माइल करते हुए ही पढ़े इसमें तो कोई शक नहीं. ये चिट्ठाचर्चक लोग फीड वीड का ध्यान कहे नहीं रखते हैं. फीड मेरे रीडर तक आते-आते पता नहीं कहाँ हेरा जाता है. पहले तो एकदम सोझा पहुचता था… डायरेक्ट ! लीजिये एक और इस्माइली 🙂

  17. लीजिए मैं यह टिप्पणी बिना यह देखे ही कर दे रहा हूँ कि मेरी पोस्ट की चर्चा यहाँ नहीं है। :)कृष्णमोहन को ढूँढ कर आप यहाँ ले आये, अच्छा किया। ये बेहतरीन लिखते हैं। पोस्ट की लम्बाई एक समस्या है जो बहुतों में है।शानदार चर्चा रही यह भी।

  18. रचना त्रिपाठी कहते हैं:

    अब महात्मा गान्धी को भी क्या कहें! गलती उन्हीं की है। वो अपने आगे-पीछे अपने पिताजी का नाम ही लपेटे रहे। उन अफसरों का भी क्या कसूर? यदि उन्होंने अपना पूरा नाम ‘मोहनदास पुतलीबाई करमचन्द गान्धी’ रख लिया होता तो क्या उनका कद छोटा हो जाता? या पद छोटा हो जाता? उनकी यह भूल आज कितनों की फजीहत करा रही है।

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