बुनाई कढाई परनिंदा के माध्यम हैं


आदित्य

पाकिस्तान क्रिकेट का टी-२० वाला विश्वकप जीत गया। पिछले साल भी जीतते-जीतते ही हारा था। कहें कि पिछले साल की फ़िसली हुई जीत को उठाने में इत्ता समय निकल गया। हरमिंदर सिंह लिखते हैं:

भारत से पिछले ट्वेंटी20 विश्व कप में मिली शिकस्त ने पाकिस्तानियों का दिल तोड़ दिया था। इसके अलावा वहां का माहौल क्रिकेट के लिए बिगड़ता जा रहा था क्योंकि पाकिस्तान में हवाओं का रुख हमेशा खतरनाक रहा है। खौफ की आंधियां कब चल पड़ें, खून के छींटे कब गिर जाएं, कोई नहीं जानता। सियासी हलचलों ने पाकिस्तान को अजीब तरह का मुल्क बना दिया है। आतंकवाद और आतंकवादियों से जूझता मुल्क जहां की सड़कें कब छींटो से लाल हो जाएं, यह भी कोई जानता नहीं। कब लाशें बिखर जाएं और मंजर खौफनाक हो जाए, नहीं मालूम।

कुदरतनामा में मोर के बारे में जानकारी देते हुये बालसुब्रमण्यम बताते हैं:

पशु-पक्षियों में मादा की अपेक्षा नर बहुधा अधिक सुंदर होते हैं। मोर के साथ भी यही बात है। आकर्षक रंग, लंबी पूंछ, माथे पर राजमुकुट सी बड़ी कलगी आदि सारी व्यवस्थाएं नरों तक सीमित हैं। मोरनी में सुंदरता के अभाव का एक जबरदस्त प्राकृतिक कारण है। खूबसूरती और आकर्षण के अभाव में वह आसानी से नहीं दिखती है। इस तरह अंडा सेते समय वह दुश्मन की नजर से बची रहती है।

यादों की खूंटी पर टंगा पजामा !!! यादों का पिटारा है रंजनाजी। वे लिखती हैं:

  • दो सप्ताह के अथक परिश्रम के बाद मुझसे किसी तरह हल्का फुल्का हाथ पैर तो हिलवा लिए गुरूजी ने पर जैसे ही आँखों तथा गर्दन की मुद्राओं की बारी आई ,उनके झटके देख मेरी ऐसी हंसी छूटती कि उन्हें दुहराने के हाल में ही मैं नहीं बचती थी.. गुरूजी बेचारे माथा पीटकर रह जाते थे…
  • माँ जितना ही अधिक मुझमे स्त्रियोचित गुण देखना चाहती थी,मुझे उससे उतनी ही वितृष्णा होती थी.पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में यह बात घर कर गयी कि बुनाई कढाई कला नहीं बल्कि परनिंदा के माध्यम हैं
  • अब हम भाई बहन चल निकले लंगोट अभियान में..माताजी के बक्से से उनके एक पेटीकोट का कपडा हमने उड़ा लिया
  • फटाफट कपडे को काटा गया और सिलकर आधे घंटे के अन्दर खूबसूरत लंगोट तैयार कर लिया गया…मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी सफलता थी..
  • जो भी हो… वह पजामा आज भे हमारी यादों की खूंटी पर वैसे ही लटका पड़ा है,जिसे देख हम भाई बहन आज भी उतना ही हंसा करते हैं.
  • आपको समसामयिक कार्टून देखने हैं तो मनोज शर्मा की निगाह से देखिये।

    एक लाईना


    1. सौ दिन

      जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया :शायद पिको करा के ही वापस करेगा

    2. कुछ यूं हुआ:परिंदों का झुण्ड राइफ़ल की नली पर बैठा मुआ
    3. जींस-टाप, फ़ादर्स-डे और टिप्पणी-चिंतन:
      जो मांगोगे वही मिलेगा
    4. ब्लॉग्गिंग के खतरे: भाग ५ :वर्ना भाग ६ दौड़ा लेगा
    5. इंतज़ार एक ठण्ड है : मुलाकात का हीटर जलाओ
    6. यादों की खूंटी पर टंगा पजामा !!! :आज तलक फ़ड़फ़ड़ा रहा है नाड़े समेत
    7. हिन्दी ब्लॉग जगत की भटकती आत्माएं ! : अरविन्द मिश्र के ब्लाग पर कब्जे की फ़िराक में हैं
    8. कौन हैं ये अज्ञात टिप्पणीकार!!:अरे बताओ शास्त्रीजी पूछ रहे हैं यार!!
    9. हिन्दी ब्लाग जगत: जैसे कोई बड़ा खजाना हाथ लग गया
    10. बिल्ली ने रास्ता काटा, रूके रहे: 4800 रूपये जुर्माना : बिल्ली से वसूलने का क्या उपाय है?

    11. कैबिनेट

    12. बेटे के पास कैदी की तरह रहती है एक मां… :इसके बावजूद वे उफ तक नहीं करती
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    19. लड़कियों को कराते और लड़कों को : तमीज
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    21. आदित्य डिसीज़न आऊट!!! : चल भाग चलें पवेलियन की ओर
    22. सपनो की है दुनिया मेरी : मेरी आँखों से देखो जरा

    और अंत में

  • ब्लाग जगत में चल रही ड्रेस कोड की बहसों को देखते हुये सरकार ने एलान कर दिया इस तरह की कोई पाबंदी नहीं लगेगी। विश्वविद्यालय में छात्र-छात्रायें अपने मन-माफ़िक वस्त्र धारण करें।
  • आज रवीश कुमार ने कामिक वर्ल्ड का जिक्र किया है।
  • ज्ञानजी की पोस्ट का जिक्र हम जानबूझकर नहीं कर रहे हैं। करेंगे तो रचनाजी कहेंगी कि मुझको इनके अलावा और कोई दिखता नहीं।
  • विवेक सिंह का दुबारा चर्चारत होना हमारे लिये खुशी और सुकून की बात है। मीनाक्षीजी आज भी व्यस्त और नेट से दूर थीं इसलिये हमको चर्चा करनी पड़ी। जैसी बन पड़ी, करके पोस्ट कर रहे हैं और मना रहे हैं कि भगवान किसी भी चर्चाकार को नेट से दूर न करें।
  • फ़िलहाल इतना ही। आप मस्त रहें। आज वुद्ध है, मन से शुद्ध रहें। बकिया जो होगा देखा जायेगा।
    ऊपर की फ़ोटॊ आदित्य की है।

    आज की तस्वीर


    मोर

    बालसुब्रमण्यम जी के ब्लाग से

    About bhaikush

    attractive,having a good smile
    यह प्रविष्टि Uncategorized में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

    16 Responses to बुनाई कढाई परनिंदा के माध्यम हैं

    1. रचना कहते हैं:

      जाने वो कैसा चोर था, दुपट्टा चुरा लिया :शायद पिको करा के ही वापस करेगा waah

    2. रचना कहते हैं:

      हिन्दी ब्लॉग जगत की भटकती आत्माएं ! : अरविन्द मिश्र के ब्लाग पर कब्जे की फ़िराक में हैंvaegyanik kaa blog aur pret aatmao kaa kabjaa

    3. डा. अमर कुमार कहते हैं:

      पहली बात तो यह की , यदि धोती टँगी होती तो ?पाज़ामा टँगा है.. तो टँगा है । पर यह आपका पाज़ामा प्रेम ज़ाहिर करता है ।आपकी यही सब हरकते पाठक को पाज़ामें से बाहर होने को प्रोत्साहित करता है ।मैं तो खैर अपवाद हूँ, काहे कि यह आज तक तय न हुआ कि मैं आदमी हूँ या पाज़ामा ?

    4. रचना कहते हैं:

      ज्ञानजी की पोस्ट का जिक्र हम जानबूझकर नहीं कर रहे हैं। करेंगे तो रचनाजी कहेंगी कि मुझको इनके अलावा और कोई दिखता नहीं।उफ़ क्या पर्दादारी हैं , कह भी दिये और घुघट बद्दस्तूर जारी हैं . और कहे तो वो लिंक भी खोज दूँ इसी चर्चा परजहां आप सप्रेम लिखे थे आज ज्ञान की पोस्ट सुबह नहीं आयी तो चर्चा शाम को होगी . अब मान भी ले वरना लिंक खोजने जाती हूँ ब्लॉग पर भटकने मे माहिर या कहलाए शातिर हूँ

    5. Aaditya कहते हैं:

      एक लाइना मजेदार है…

    6. अनूप शुक्ल कहते हैं:

      रचनाजी, मैंने लिखा होगा ऐसा आज ज्ञान की पोस्ट सुबह नहीं आयी तो चर्चा शाम को होगी। मुझे इससे इंकार नहीं हैं। अब आप समझिये कित्ती परेशानी का कारण बन जाते हैं ज्ञानजी हमारे लिये। चर्चा करो तो आफ़त न करो तो आफ़त! वैसे आप वो वाली चर्चा का लिंक खोजियेगा और बताइयेगा। मजेदार है यह भी। कोई हड़बड़ी नहीं आराम से। डा.अमर कुमार, हम तो आपको शानदार आदमी मानते हैं। ब्लागर भी आप हैं हीं। फ़िर आप जबरियन दूसरी और चीजें काहे बनने का प्रयास करते हैं। आपको बता दें आदमी और पैजामा का मात्रक अलग-अलग है। आदमी नम्बर में गिना जाता है जबकि पैजामा जोड़े में। दो नितांत अलग-अलग मात्रक वाली वस्तुओं की तुलना की इजाजत भौतिकी के नियम नहीं देते। 🙂

    7. विवेक सिंह कहते हैं:

      मोरों के पीछे क्यों पडे़ हैं ? 🙂

    8. रंजना कहते हैं:

      हास्य से युक्त सुन्दर मनोरंजक चर्चा……बहुत बहुत आभार…

    9. रचना कहते हैं:

      लो जी आप मान गए अब हम फुरसतिया तो न हैं की फिर भी लिंक खोजे . लिंक चाहिये था तो ना मानते की की लिखा

    10. रंजना कहते हैं:

      एक स्पष्टीकरण दे दूँ …….बालमन ने जो देखा था अपने चारों ओर कि महल्ले की औरतें फुर्सत के समय हाथों में बुने की सालियां ले जब भी बैठती हैं तो बस परनिंदा पुराण कितने रस लेकर बांचे जाते हैं….उसीने बुनाई के प्रति वितृष्णा उपजाई थी…यूँ अब नहीं मानती कि "बुनाई कढाई परनिंदा के माध्यम हैं"

    11. Kajal Kumar कहते हैं:

      सुंदर चर्चा के लिए धन्यवाद. मोर का चित्र वास्तव में ही मोहक है.

    12. अनूप जी,उत्तम चर्चा, रोचक तो थी ही और उत्तर प्रत्युत्तर की श्रृंखला ने उसे और जायकेदार बना दिया। एक लाईनों में ब्लॉग जगत को समेटे हुये।

    13. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

      इस चर्चा का सबसे खूबसूरत हिस्सा बालसुब्रमण्यम जी के ब्लॉग से लिय गया चित्र ही है । चर्चा ठीक रही । आभार ।

    14. Shastri कहते हैं:

      प्रिय अनूप,एकलाईने की धार अभी भी तेज है!!चित्र अच्छे बन पडे हैं, चर्चा दिल को बांध लेती हैसस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.Sarathi.info

    15. कुश कहते हैं:

      हमने तो आदमियों के लिए भी जोड़े भी सुना है.. ये डायलोग भी फेमस है कि भाईसाहब अगली बार जोड़े से आना..वैसे हम आपसे नाराज़ है ज्ञान जी की पोस्ट काहे नहीं आई.. ???

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