एक टेंशनीय चिट्ठाचर्चा

टेंशन के दिन हैं. वैसे दिन तो चुनाव और क्रिकेट के भी हैं. लेकिन जो मज़ा टेंशन लेन-देन में है, वो क्रिकेट में कहाँ? वैसे भी क्रिकेट में अब मज़ा नहीं रहा. क्रिकेट में तो केवल शाहरुख़ और शिल्पा शेट्टी बाकी बचे हैं. कहते हैं पैसा-वैसा भी है लेकिन हमें तो लगता है कि अब वो ज़माना नहीं रहा जब क्रिकेट में पैसा होता था.

अब तो पैसे में क्रिकेट है.

आज अभय जी बी सी सी आई नामक पॉवर हाउस के बारे में लिखा है. कभी-कभी लगता है कि वहां जाकर आदमी पॉवर वाला हो जाता है कि पॉवर वाला रहता है इसलिए वहां पहुँचता है?

अभय जी ने इस पॉवर हाउस की अश्पृश्यता के बारे में लिखा. वे लिखते हैं;

“आखिर क्या है बी सी सी आई? ये कोई राजसत्ता है? पैसा पैदा करने वाला एक कॉर्पोरेशन है? किसी व्यक्ति या कुछ लोगों की इजारेदारी है? क्या है? एक आम समझ यह कहती है कि देश करोड़ो-करोड़ो दिलों में बसे खेल का प्रबन्धन करने वाली संस्था का मुख्य काम देश में क्रिकेट का पोषण और संरक्षण करना होना चाहिये। मगर ऐसा सचमुच है क्या?”

अब इसके बारे में क्या कहा जाय? यह तो हमारी उस नीति की वजह से हुआ है जिसके तहत इस देश में क्रिकेट को धर्म माना जाता है. जिस चीज को धर्म मान लिया गया, उसकी ऐसी-तैसी तय है. वैसे ही इस पॉवर हाउस की ऐसी-तैसी हो रही है.

क्रिकेट की इस गवर्निंग बॉडी में जमे लोगों के बारे में अभय जी लिखते हैं;

“पवार साहब का क्रिकेट से क्या सम्बन्ध है, इस सवाल को पूछने की गुस्ताखी कौन कर सकता है भला? पवार साहब की पुरानी तमन्ना है कि वो इस देश का प्रधानमंत्री बने। अपनी इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए वे हर तिकड़म, हर जुगाड़ बैठाने को तैयार हैं। शिव सेना से लेकर माकपा तक जोड़-तोड़ चल रही है। प्रधानमंत्री बन कर पवार साहब इस देश में कैसी अर्थव्यवस्था और कैसी न्याय व्यवस्था की स्थापना करेंगे इस का नमूना आप को बी सी सी आई की गतिविधियों में मिल जाएगा।”

आप अभय जी के इस लेख को पढें और आने वाले दिनों के बारे में कल्पना करें. कल्पना ठीक से हो जाए, तो एक-आध कविता लिख मारें.

आपने ब्लागिंग के खतरों के बारे में कभी सोचा है? भैया हमने तो नहीं सोचा. खामखा टेंशन हो जाएगा.

लेकिन अभिषेक ने ब्लागिंग के खतरों के बारे में न सिर्फ सोचा बल्कि लिखना भी शुरू कर दिया. वे लिखते हैं;

“हमारे धंधे में रिस्क या जोखिम उन चीजों में निकाला जाता है जहाँ लाभ और घाटा दोनों होता है. और दोनों में से कब कौन, कैसे और कितना हो जाएगा ये पता नहीं होता है. बिल्कुल जुए जैसी बात, और वो भी अपनी औकात से कई गुना कर्ज लेने की क्षमता के साथ जुआ खेलने वाली बात. अब युद्धिष्ठिर कर्ज ले लेकर जुआ खेल सकते तो क्या होता? कर्ज नहीं ले सकते थे तब तो क्या हाल हुआ ! खैर हमारे धंधे में लोग कहते हैं कि हम वही बता देंगे जो बताना संभव ही नहीं है. अरे क्या ख़ाक बताएँगे जब कृष्ण जैसे खतरा मैनेजर युद्धिष्ठिर को नहीं रोक पाए तो कोई और क्या खतरे बता पायेगा ! तो अगर मैं कहूं की ब्लॉग्गिंग में बस ये ही खतरे हैं और इसके अलावा कुछ नहीं हो सकता तो ये एक शुद्ध झूठ के अलावा और कुछ नहीं होगा. *”

युधिष्ठिर कर्ज लेकर जुआ खेलते तो और क्या होता, द्रौपदी के साथ-साथ दो-चार मिलियन डॉलर और हार जाते. बकौल परसाई जी; “हमारे यहाँ जुआ खेलने वालों को धर्मराज कहा जाता है.”

द्रौपदी को जुए में हारने के बाद भी धर्मराज ही कहलाये. कर्ज लेकर जुआ खेलते तो भी धर्मराज ही कहलाते.

आज तो अभिषेक ने केवल भूमिका बांधी है. भूमिका के बाद वाली कहानियों के लिए सब प्रतीक्षारत हैं. आप भी भूमिका पढिये और कतार में लग जाइये.

जिन लोगों को बेनामी टिप्पणियों से टेंशन है, उन्हें समझाते हुए गगन शर्मा जी पूछते हैं;

बेनामी टिप्पणियों से टेंशन क्यों लेना?

“समीर जी, भटिया जी, शास्त्री जी, द्विवेदी जी, किसको नहीं सहने पड़े ऐसे कटाक्ष। पर इन्होंने सारे प्रसंग को खेल भावना से लिया। ये सब तो स्थापित नाम हैं। मुझ जैसे नवागत को भी शुरु-शुरु में अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा था। वह भी एक “पलट टिप्पणी” के रूप में। एक बेनामी भाई को एक ब्लाग पर की गयी मेरी टिप्पणी नागवार गुजरी और वह घर के सारे बर्तन ले मुझ पर चढ बैठे थे। मन तो खराब हुआ कि लो भाई अच्छी जगह है, न मैं तुम्हें जानता हूं ना ही तुम मुझे तो मैंने तुम्हारी कौन सी बकरी चुरा ली जो पिल पड़े। दो-एक दिन दिमाग परेशान रहा फिर अचानक मन प्रफुल्लित हो गया वह कहावत याद कर के कि “विरोध उसीका होता है जो मशहूर होता है” तब से अपन भी अपनी गिनती खुद ही मशहूरों में करने लग पड़े।”

अब तो इस बात के लिए एक ब्लॉगर कमीशन बैठाया जाय कि अपने ब्लॉग पर बेनामी टिप्पणियां करके तो लोग मशहूर नहीं हो रहे हैं? लेकिन जाने दीजिये ऐसा करने से टेंशन बढ़ने का चांस रहेगा. इसलिए मस्त रहें. पोस्ट लिखें, टिप्पणियां करें और व्यस्त रहें.

किसी महान गीतकार ने लिखा है; “टेंशन काई कू लेना का?” जवाब आया; “सही बोलता है, सही बोलता है.”

इसलिए बेनामी, अनामी, सुनामी टिप्पणियों से टेंशन न लें. आप शर्मा जी की पोस्ट पढिये और उन्हें इस सलाह के लिए धन्यवाद दीजिये.

लेकिन गाने से टेंशन दूर हो जाता तो फिर बात ही अलग होती. महान गीतकार के लिखे इस गाने को फिल्म उद्योग वाले ही नहीं याद रखते. पंकज शुक्ल जी भी टेंशनग्रसित है.

पंकज जी के टेंशन की वजह है आई पी एल. वे लिखते हैं;

“साउथ अफ्रीका में चल रहे आईपीएल के जश्न के बीच देसी मनोरंजन उद्योग का मर्सिया भी पढ़ा जा रहा है। जी हां, भले क्रिकेट मैच के शोर में हिंदी सिनेमा का ये शोक गीत किसी को सुनाई ना दे रहा हो, लेकिन जिन्हें इस उद्योग की चिंता है, वो नब्ज़ पर लगातार हाथ रखे हैं।”

समझ में नहीं आता कि क्या कहें? आधे से ज्यादा आई पी एल की टीम तो उनलोगों की है, जो फिल्म उद्योग से खुद हैं.

खैर, आप पंकज की पोस्ट पढिये. और कुछ सुझाव दीजिये जिससे फिल्म उद्योग का भला हो. देखिये आई पी एल तो साल में एक बार होता है. लेकिन फिल्में तो साल भर चलती हैं.

टेंशन की वजह से तनातनी लगी ही रहती है. डॉक्टर कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी लिखते हैं;

“अभी पिछले दिनों ब्लाग पर कुछ तना-तनी दिखी, एक टिप्पणी को लेकर। सवाल साहित्यकार को लेकर उठा जो एक विवाद के रूप में सामने आया। किसी ने उसे अपने स्वाभिमान पर लिया तो किसी ने साहित्यकार शब्द पर ही संशय कर डाला।”

डॉक्टर साहब साहित्य के विद्यार्थी हैं. अब जैसा कि विद्यार्थी सवाल पूछता है, डॉक्टर साहब भी सवाल पूछते हैं. क्या कहा? कैसा सवाल? उन्ही से सुनिए;

“चूँकि हम हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और एक सवाल हमेशा हर उस व्यक्ति से पूछते हैं जो अपने को साहित्य से जुड़ा बताता है कि ‘‘साहित्य किसे कहेंगे?’’ इस सवाल ने हमेशा हमें परेशान किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, ग़ज़ल, लघुकथा, नाटक आदि विधायें ही साहित्य हैं? साहित्य में संस्मरण, आलेखों को भी स्थान दिया जाता है, बस यहीं पर आकर सवाल फँसा देता है कि किस प्रकार के आलेखों को साहित्य में शामिल करेंगे?”

अपनी पोस्ट का समापन करते हुए डॉक्टर साहब लिखते हैं;

“पहले साहित्य का मर्म समझो, साहित्यकार की साधना समझो फिर अपने को साहित्यकार कहलवाने का दम पैदा करो। अपनी दैनिक चर्या को लिख देना, कुछ इधर-उधर की बकवास को चाशनी लगाकर लिख देना, सुंदरता, विमर्श की चर्चा कर देना, समाचारों को आधार बनाकर ब्लाग को रंग देना, तमाम सारी टिप्पणियों को इस हाथ दे, उस हाथ ले के सिद्धांत से पा लेना ही साहित्य की तथा साहित्यकार की पहचान नहीं।

जरा साहित्य पर दया करिए, हिन्दी साहित्य पर दया करिए साहित्यकारों का सम्मान कीजिए। यदि इतना कर सके तो ठीक अन्यथा साहित्य एवं साहित्यकार की लुटिया न डुबोइये।”

वैसे पोस्ट का समापन करने से पहले बहुत सारे सवाल किये हैं डॉक्टर साहब ने. आप सवालों की सूची उन्ही के ब्लॉग पर पढिये. और हो सके तो उनकी शंका का समाधान कीजिये. वैसे यहाँ मैं बता दूं कि उनके सवालों के जवाब की जगह सवाल आया है. वो भी समीर भाई से. समीर भाई ने अपनी टिप्पणी में लिखा;

“लुटिया तो बाद में डू्बेगी अव्वल तो हमें इतना पढ़ने पर भी स्पष्ट नहीं हुआ कि साहित्यकार कौन? कोई तो स्पष्ट परिभाषा होगी-हम तो साहित्य के विद्यार्थी नहीं रहे, आप ही बतायें न भई.

बेनिफिट ऑफ डाउट तो मिलना ही चाहिये-इस बेस पर तो आदमी मर्डर में छूट जाता है तो यहाँ तो पुरुस्कार की बात है. :)”

क्या नेताओं और लोकतंत्र पर आम आदमी का विश्वास कम होता जा रहा है?

यह प्रश्न पूछा है श्री बच्चन सिंह जी ने. नेताओं के खिलाफ जूतामार अभियान के बारे में लिखते हुए वे पूछते हैं;

“क्या इस तरह की घटनाओं और मतदान में लगातार आ रही कमी के बीच कोई संबंध है? क्या नेताओं और लोकतंत्र की विश्वसनीयता दिन प्रतिदिन कम हो रही है और आम आदमी का इस व्यवस्था से मोहभंग हो रहा है? वास्तविकता यही है। लोकतंत्र का मुखौटा लगाए सामंतवाद और परिवारवाद देश में तेजी से पांव पसार रहा है। आम जनता मुसीबतों में उलझती जा रही है और नेता मालामाल हो रहे हैं। नामांकन पत्र के साथ जब कोई प्रत्याशी अपनी संपत्ति का ब्यौरा दाखिल करता है तो मतदाताओं की आखें फटी रह जाती हैं। वह यह देखकर हैरान रह जाता है कि कोई प्रत्याशी अपनी लखपति से कम नहीं है। करोड़पति भी है और अरबपति भी।”

आप बच्चन सिंह जी की यह पोस्ट ज़रूर पढिये. बहुत ही बढ़िया पोस्ट है.

अनिल रघुराज जी ने आज बताया कि;

नेता को नुमाइंदा नहीं आका मानते हैं हम.

इस बात की जानकारी देते हुए वे लिखते हैं;

“अगर स्थानीय निकाय का चुनाव होता तो मैं आंख मूंदकर सोमैया को ही वोट देता। लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को गलत मानने के बावजूद उसके लोकसभा प्रत्याशी को वोट देना इसलिए सही होगा क्योंकि स्थानीय स्तर पर उसने अच्छे काम किए हैं? ये माया किसलिए, यह छलावा किसलिए? कोई दादी की साड़ी पहनकर छल कर रहा है, कोई दलालों की बूढ़ी पार्टी का युवा चेहरा बनकर। कोई अंग्रेजी को गाली देकर तो कोई अभिनेताओं, अभिनेत्रियों का मजमा जमाकर। अरे भाई, खुलकर क्यों नहीं सामने आते? नकाब क्यों लगाकर आते हो?”

नकाब बड़े काम का पहनावा है. पहनने वाला हमें देख पाता है लेकिन हम उसे नहीं देख पाते. अनिल जी की पोस्ट पढिये. आप भी देख पायेंगे नकाब लगाने वालों को. फिर कोई टेंशन बाकी नहीं रहेगी.

शादी की सालगिरह बहुत सी बातों को पीछे मुड़कर देखने के लिए उकसाती है. ब्लॉग बनाने के लिए भी….:-)

शादी की दसवीं सालगिरह पर रचना त्रिपाठी जी ने अपना ब्लॉग शुरू किया. आप उन्हें शादी की सालगिरह की मुबारकबाद टिप्पणी करके दे सकते हैं.

अनुराग अन्वेषी जी ने ब्लॉगर साथियों से एक अपील की है. जहाँ रचना जी ने शादी की सालगिरह पर अपना ब्लॉग शुरू किया, वहीँ अनुराग जी के भांजे अभिनीत ने अपना ब्लॉग शुरू किया जिसका नाम है; “गिरह”. अनुराग जी के अनुसार;

“अभिनित मेरा भांजा है. उम्र से महज १२ साल, पर बुद्धि से २१ साल वालों बड़ा.”

आप अभिनीत का स्वागत करें.

आज आदित्य के चाचा की शादी है…..मतलब यह कि आदित्य ने आज चाचा की शादी के बारे में लिखा है. फोटो वगैरह के साथ. आप आदित्य को टिप्पणी और उसके चाचा को बधाई से नवाजें.

ताऊ जी ने आज श्री नितिन व्यास का परिचयनामा छापा है. आप पढें और नितिन जी के बारे में जानें. ताऊ जी को प्रस्तुति के लिए बधाई दें.

अनिल कान्त जी आज प्रेम से अलग कुछ सप्रेम कह रहे हैं. आप ही पढिये, क्या कह रहे हैं वे.

आज के लिए बस इतना ही.

चर्चा से अगर बोरियत की प्राप्ति हो तो उसे शाम को न्यूज चैनल पर चुनावोपरांत की गई भविष्यवाणियों को देख-सुन कर दूर करें.

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15 Responses to एक टेंशनीय चिट्ठाचर्चा

  1. बड़ा टेंशन है। कमरे के बाहर का ताप ४४+ है। अभी तक लोगों ने ग्लोबल वार्मिंग पर ठेलना शुरू नहीं किया। बेनामी, अनामी, सुनामी टिप्पणियों पर ही अटके हैं!

  2. अभिषेक ओझा कहते हैं:

    इतनी गर्मी में टेंशन वाली चर्चा ? कुछ हल्का फुल्का होना चाहिए ! परा ४२ तक तो पुणे में भी पहुचने वाला है. आज आदित्य के चाचा की शादी की तसवीरें तो झकास हैं !

  3. HEY PRABHU YEH TERA PATH कहते हैं:

    शिवजीआप तो एक टेंशनीय चिट्ठाचर्चा करके बडे ही टेशन फ्रि हो गऐ है भाई,कुल मिलाकर चटकारे दार चर्चा। आभार

  4. HEY PRABHU YEH TERA PATH कहते हैं:

    दादा, टेशन लेने का नही देने का, क्या ?

  5. Udan Tashtari कहते हैं:

    इतनी बेहतरीन एयर कंडीशन्ड चर्चा के बाद काहे का टेंशन जी!!

  6. अनिल कान्त : कहते हैं:

    टेंशन काहे का जी …. अब गर्मी है तो है …कौन सी नयी बात है ….जिन्हें सुविधाएं हैं …उन्हें क्या फर्क पड़ता है …ए.सी. में बैठ पता चल ही जाता है की बाहर ४४+ डिग्री तापमान है 🙂 :)चिंता तो उन्हें है जो बाहर उसे झेलेंगे ….शायद हर साल की तरह कुछ मरेंगे भी ….हाँ चिट्ठा चर्चा टेंशन कम जरूर करती है …कुछ लिंक बढ़िया मिल जाते हैं पढने के लिए …शुक्रिया

  7. cmpershad कहते हैं:

    “द्रौपदी को जुए में हारने के बाद भी धर्मराज ही कहलाये. कर्ज लेकर जुआ खेलते तो भी धर्मराज ही कहलाते. “माडर्न धर्मराज तो बैंक लोन लेते…..हां, द्रौपदी को मार्टगेज करना पडता:)

  8. ये चवन्नियां गिनने वाली फ़िल्मी जनता..क्रिकेट में ज्यादा दिन नहीं ठहरेगी. ये ललित मोदी के झांसे में आ गए….ये सच मानकर कि एक लगाओ, दुगना पाओ.मैच हारने पर इनकी शक्ल देखी है? ऐसा लगता है मानों ‘तीसरी कसम’ फ्लॉप हो गयी हो…हर मैच हर हालत में जीतना चाहते हैं. क्रिकेट सी या डी ग्रेड फिल्म नहीं है कि कुछ भी हो…अपना खर्चा तो निकाल ही लेगी.

  9. Anil Pusadkar कहते हैं:

    चर्चा खतम टेंशन खतम्।

  10. संगीता पुरी कहते हैं:

    चिट्ठा चर्चा टेंशनीय हो ही नहीं सकती .. बहुत बढिया रही।

  11. हम तो रेलगाडी़ के टेंशन में जिए आज।

  12. अजित वडनेरकर कहते हैं:

    इधर भी क्रिकेट चिंतन। लगे रहिए।

  13. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    हम अभी तक टेशन में हैं किच चर्चा में टेंशन कहूं दखा नहीं। कहां बिला गया है?

  14. लाइफ है तो टेंशन भी रहेगा।———-सावधान हो जाइये कार्ल फ्रेडरिक गॉस

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