एक और अनेकः अशोक का कृषि दर्शन

अपने पर्सनल चिट्ठे पर जब मैं दूरदर्शन के पुराने दिनों की याद कर रहा था तो उसमें डा अनुराग ने एक टिप्पणी में कहा था, जो एक प्रोग्राम कुछ खासा अच्छा नही लगता था वो था कृषि दर्शन, कमोबेश यही हमारी भी कहानी थी। कृषि दर्शन बहुत बोरिंग लगता था क्योंकि उसकी बातें एक बच्चे की समझ से ऊपर की बातें होती थीं। लेकिन उस टिप्पणी से हमें याद आया एक ऐसा ब्लोगर जिसने इसी को अपने ब्लोगर का सबजेक्ट चुना। जी हाँ आज के हमारे एक ब्लोगर हैं, अशोक पांडेय जो खेती बाड़ी के नाम से ब्लोग लिखते हैं।

मैं अभी उनका ब्लोग देख रहा था तो जो सबसे पहली पोस्ट दिखी वो थी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जो शिक्षा से तो वैज्ञानिक था लेकिन कर्म से एक सिक्यूरिटी गार्ड वो भी कनाडा में। अशोक ने शीर्षक रखा था, “वैज्ञानिक करें सिक्‍यूरिटी गार्ड का काम, तो कैसे हो कृषि अनुसंधान !”। इस पोस्ट में कुछ टिप्पणियाँ सहानुभूति की आयी तो कुछ उस वैज्ञानिक को कोसती। सहानुभूति जताकर भी कुछ नही होने वाला ना ही उस व्यक्ति को कोसकर, इंडिया में ऐसे ना जाने कितने पढ़े लिखे हैं जिनके पास काम नही है। काम कोई भी खराब नही होता है लेकिन पढ़े लिखे लोग शायद चाहकर भी इंडिया में वो काम नही कर सकते जो दूसरे देशों में जाकर। क्योंकि अगर इंडिया में करते हैं तो आस पास का समाज ताने मार मार उसको वैसे ही मार देगा। यहाँ अमेरिका में अभी एक बड़ी कंपनी के एक CEO को पिज्जा डिलीवर करते देखा था।

अशोक लिखते हैं –

घोषित तौर पर कृषि क्षेत्र सरकार के एजेंडा में भले ही सबसे ऊपर हो लेकिन जमीनी सच्‍चाई हमेशा इसके विपरीत ही नजर आती है।

आगे उनका कहना है,

इधर अपने देश में कृषि अनुसंधान का हाल यह है कि इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों की घोर कमी है, जिसके चलते कई परियोजनाओं के ठप पड़े होने की बात कही जाती है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के विभिन्‍न संस्‍थानों के कृषि वैज्ञानिकों के करीब 38 फीसदी अर्थात 2500 पद खाली हैं।

ये तो जमीनी सच्चाई है लेकिन इन सबसे आंखे मूँदे हम गर्व करते हुए गाते हैं, मेरे देश की धरती सोना उगले। ऐसे हालात रहे और किसान आत्म हत्या करते रहे तो ये धरती क्या उगलेगी क्या निगलेगी ये तो वक्त ही बतायेगा।

ऐसा भी नही है कि एक किसान को खेती के सिवा कुछ नही सूझता, उसकी कोई संवेदना नही होती, होती है जी और ये अशोक के साथ भी है। इसलिये अपनी एक पोस्ट में आम आदमी की संवेदना पर लिखते हुए रघुवीर सहाय की कविता पेश करते हैं – आज फिर शुरू हुआ

आज फिर शुरू हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

जी भर आज मैंने शीतल जल से स्‍नान किया

आज एक छोटी-सी बच्‍ची आयी, किलक मेरे कन्‍धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्‍त तक एक पूरा गान किया

आज फिर जीवन शुरू हुआ।

लेखों में विभिन्नता बरकरार रहती है, तभी तो खेतों से खलिहान से यदा कदा जब इधर उधर पहाड़ियों पर नजर डालते हैं तो बात करने लगते हैं एक पहाड़ी पर बसे मुंडेश्‍वरी मंदिर की जो कि पुरातत्‍व के आईने में भारत का प्राचीनतम मंदिरों में आता है।

विख्‍यात इतिहासकार एनजी मजुमदार ने शिलालेख का गहन अध्‍ययन करने के उपरांत संवत्‍सर का आशय गुप्‍तकाल से लगाते हुए शिलालेख की तिथि 349 ईस्‍वी निर्धारित की। उनका विश्‍लेषण Indian Antiquity, February, 1920 Edition में प्रकाशित हुआ। श्री मजुमदार का स्‍पष्‍ट मत है कि मुंडेश्‍वरी शिलालेख समकोणीय ब्राह्मी लिपि में है, जो 500 ईस्‍वी के बाद देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। उनके मुताबिक हर्षवर्धन के काल में जिस ब्राह्मी लिपि का प्रयोग देखने को मिलता है वह न्‍यूनको‍णीय है।

यही नही प्राप्त शिलालेखों पर बताते हैं –

मुंडेश्‍वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्‍य आधार वहां से प्राप्‍त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्‍हीं महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्‍हें उसी साल कलकत्‍ता स्थित इंडियन म्‍यूजियम में भेज दिया गया। 2’8”x 1’1” का यह शिलालेख संस्‍कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। लेख की भाषा में कुछ व्‍याकरणिक अशुद्धियां हैं और शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्‍द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है। ब्राह्मी लिपि के उक्‍त शिलालेख का चित्र और बिहार राज्‍य धार्मिक न्‍यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्‍यंतरण और हिन्‍दी अनुवाद इस आलेख के साथ यहां प्रस्‍तुत किया गया है।

जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले लाल बहादुर के देश में किसानों और कृषि को शायद इग्नोर किया जा रहा है तभी तो कृषि क्षेत्र में पड़ोसियों से भी पिछड़ गया भारत, और ये बात भी एक पोस्ट के जरिये बता रहे हैं अशोक।

कृषि उत्पाद के मामले में भारत, दक्षिण एशिया का दिग्गज देश नजर आता है, लेकिन अगर पिछले आंकड़ों को देखें तो खाद्य फसलों की उत्पादनशीलता छोटे पड़ोसी देशों से भी कम है। यहां तक कि अफगानिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में भी पिछले दो दशकों में फसलों की उत्पादकता के मामले में भारत की तुलना में विकास दर ज्यादा रही है।

अशोक ने अपनी पहली पोस्ट १८ मई, २००८ के दिन लिखी थी और पोस्ट थी – लोहे की बढ़ी कीमतें हैं महंगाई का रक्तबीज। इसकी शुरूआत ही उन्होंने किसानों के बढ़ती आत्म हत्या पर बात उठाते हुए करी –

खच्चर बोझ भी ढोता है और गाली भी सुनता है। हमारे देश में किसानों की स्थिति उस निरीह जानवर से बेहतर नहीं है। पहले से ही आत्महत्या कर रहे किसानों के लिए हाल की महंगाई प्राणलेवा है, इसके बावजूद उन्हें इसका बोझ उठाने को विवश किया जा रहा है। महंगाई रोक पाने में सरकार की नाकामी का मुख्य कारण उसकी नीतिऔर नियत में यह खोट ही है।

इनकी पहली पोस्ट पर ज्ञान दत्त पांडेजी की टिप्पणी थी –

यह अत्यंत हर्ष और संतोष का विषय है कि आप जैसे खेतीबाड़ी से जुड़े लोग भी ब्लॉगोन्मुख हो रहे हैं। और आपकी पोस्ट से स्पष्ट है कि आप सम्बन्धित विषयों पर सुस्पष्ट विचार रखते हैं।

नियमित लिखते रहें और ब्लॉगों पर सब्स्टेंस वाली टिप्पणियां करते रहें। आपको निश्चय ही सशक्त ब्लॉगर बनना है।

और एक दूसरी टिप्पणी थी, डा.चंद्रकुमार जैन की –

माटी की सेवा करते हैं,
कलम से नाता गहरा है.
धरती माता के आँगन में,
ये माटी-पुत्र का पहरा है.

कुल मिलाकर बात इतनी भर है कि अगर जाने पहचाने विषयों से परे कुछ अलग सा जानना है या पढ़ना चाहते हैं तो खेती बाड़ी पर जाईये क्योंकि किसान और उसका खेत हमेशा से ही इस देश की पहचान रही है और ये पहचान बनी रहनी चाहिये।

एक और अनेक की इस दूसरी (पहली चर्चा थी, महेन की बतियाँ) चर्चा से कुछ नया इसमें जोड़ा है और वो ये कि जिस किसी भी ब्लोगर की यहाँ बात करेंगे उससे ३ सवाल भी पूछेंगे। इसी क्रम में बगैर पूर्व चेतावनी के अंतिम क्षण में हमने अशोक से ३ सवाल पूछे।

तरूणः आम आदमी के लिये जहाँ कृषि एक बोरिंग सा विषय होता है वहीं आपने इस विषय को अपने ब्लोग के लिये क्यों चुना?
अशोक पांडेयः मैं खुद एक किसान हूं और मुझे अपने गांव व खेतों से काफी लगाव है, इसलिए मैंने अपने ब्‍लॉग के लिए यही विषय चुना। मुझे लगा कि किसान का पक्ष सही तरीके से एक किसान ही रख सकता है।

तरूणः कुछ समय पहले और आजकल भी यदा कदा सुनने में आता है किसानों की आत्म हत्या के बारे में, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ये होता देख और सुन आपको कैसा लगता है? इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिये क्या कुछ किया जा सकता है?
अशोक पांडेयः इस देश में भगवान और किसान को सबसे अधिक बेवकूफ समझा जाता है और उन्‍हें सबसे अधिक छला जाता है। कृषिप्रधान देश होने के बावजूद यहां सबसे अधिक उपेक्षित कृषि और किसान ही हैं। किसान की आत्‍महत्‍या की बात सुन मेरा खून खौलने लगता है। वैसा ही दर्द होता है जैसा एक भाई के मरने पर दूसरे भाई को होता है। इस देश के बहुसंख्‍यक किसान हिन्‍दीभाषी हैं, जबकि यहां की राजकाज की भाषा (राजभाषा) व्‍यावहारिक रूप से आज भी अंगरेजी है। इसका परिणाम है कि किसान के हाथ पैर तो मुक्‍त हैं लेकिन उसकी जुबान पर ताला लगा है। किसान की जुबान का ताला खोल दो, उसके हाथों में इतनी ताकत है कि वह अपनी किस्‍मत खुद संवार लेगा। आज यदि किसानों के बेटे नक्‍सली या अपराधी बन रहे हैं तो उसका कारण उनकी यह उपेक्षा ही है। सरकार उनके लिए कुछ नहीं करती तो मजबूरी में वे अपराध या नक्‍सलवाद की डगर पकड़ते हैं।

तरूणः अगर आप से पूछा जाय कि बालीवुड, हालीवुड या आपकी भोजपुरी (बिहारवुड) में से किसी एक हिरोईन को एक शाम की डेट (एक यादगार शाम बिताने के लिये) के लिये चुनें तो आप किसे चुनेंगे? और कहाँ लेकर जायेंगे?
अशोक पांडेयः एक से काम नहीं चलेगा जी, हम तो भीड़ में रहना पसंद करते हैं। मेरा वश चले तो मैं हॉलीवुड, बॉलीवुड, पॉलीवुड सभी को बुला लूं और कहूं कि खेत की मेड़ पर घूमते हुए मटर की हरी-हरी छेमियां खाते हैं और चांदनी रात में खलिहान में बैठकर चैता, कजरी का आनंद लेते हैं।

ये था अशोकजी से पूछे गये सवाल-जवाब का सिलसिला, अगली बार फिर लेकर आयेंगे किसी एक ब्लोगर और उसकी अनेक पोस्टों को “एक और अनेक” में।

[आप में से जिन्होंने कभी भी मेरे पर्सनल चिट्ठों पर अपनी टिप्पणी नही छोड़ी, उनसे अनुरोध है कि कम से कम एक टिप्पणी वो वहाँ किसी भी एक चिट्ठे में अपने असली ईमेल एड्रैस और ब्लोग पते के साथ छोड़ दें। जिससे अगर उनको या उनके चिट्ठों का नंबर आता है तो उससे सवाल पूछने के लिये हमारे पास उसका ईमेल पता हो। ये सिर्फ आप्शनल है अगर नही भी छोड़ेंगे तो भी चर्चा तो की जायेगी, बस सवाल-जवाब वाला सेक्शन नही दे पायेंगे। इस नोट को सेल्फ प्रमोशन ना समझा जाये। ;)]

[कल की संगीत चर्चा जो कभी नही से देर भली की तर्ज पर की गयी]

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attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि chitha charcha, chitthacharcha, ek aur anek, Tarun में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

16 Responses to एक और अनेकः अशोक का कृषि दर्शन

  1. विवेक सिंह कहते हैं:

    अच्छा लगा एक और अनेक पढकर !

  2. “खेती के बातें” भले ही बोर कार्यक्रम रहा हो…ये टी0वी0 और रेडियो पर आज भी आता है. पहले बोर लगता था…पर आज के शोर और बदतमीजी भरे कार्यक्रमों के बीच कहीं अच्छा लगता है जिसमें लोग आराम से बात करते हैं और सुनते हैं..और वो भी बिना विज्ञापनों की ठांस के. अशोक पाण्डेय से मिलवाना अच्छा लगा. मैं उनके ब्लॉग से पहले से परिचित हूँ इसलिए और भी प्रसन्नता हुई. शहरों के बड़े बड़े लोग केवल आजकल ओर्गानिक फल, सब्जी, अनाज की बातें करते पाए जाते हैं. बाबा रामदेव को भी किसान और खेती की बात जोर शोर से करते सुनना अच्छा लगता है. ख़ासकर उस दौर मैं जब विकसित देशों में किसान को अंधाधुंध सब्सिडी मिलती है और भारत जैसे कृषी-प्रधान देश मैं नेता केवल औद्योगीकरण की बात करते हैं और किसान आत्महत्याएं करते हैं.

  3. हिमांशु । Himanshu कहते हैं:

    अशोक जी को सन्दर्भित यह चर्चा अच्छी लगी । धन्यवाद ।

  4. Arvind Mishra कहते हैं:

    अशोक पाण्डेय जी को केवल भारत के किसान का स्टीरीयोटाईप न समझा जाय वे किसान के साथ ही बुद्धि विद्या के धनी हैं -भारत का किसान कैसा हो ..अशोक पांडे जैसा हो ! तभी यहाँ कृषि का कल्याण है !

  5. डा० अमर कुमार कहते हैं:

    ऎसा क्या ?” यूँ ही इस गली आया करो ” का यह असर !चर्चा में सवाल ज़वाब और अशोक जी का दर्शन पढ़ कर अब तो, मन से यही निकल रहा ” हम दिल दे चुके सनम ! “.

  6. Anil Pusadkar कहते हैं:

    अरविंद जी से सहमत हूं।बचपन से पढते आ रहे है भारत कृषिप्रधान देश है।मगर कृषि को प्रधान या महत्वपूर्ण इस देश मे सिर्फ़ चुनावो मे ही माना गया है। अशोक जी इस दिशा मे किया जा रहा प्रयास प्रशंसनीय है।

  7. Udan Tashtari कहते हैं:

    बेहतरीन!!! बार बार तरुण!! 🙂

  8. , कहते हैं:

    जो कमेंट अशोक जी के ब्लाग पर किया है, वही यहाँ पेस्ट कर रही हूँ।”कनाडा के टोरांटो शहर से ही लिख रही हूँ इसलिये कनाडा के ऐसी परिस्थितियों से वाक़िफ़ भी हूँ। कई डाक्टर और इस तरह के वैज्ञानिक टोरांटो में ऐसे नौकरी कर रहे हैं जिन्हें यहाँ आड-जाब्स कहा जाता है। ये तभी तक जब तक कि वो रिक्वायर्ड क्रेडिट प्राप्त नहीं कर लेते। ये आर्टिकल आपने टोरांटो स्टार से लिया है और इस में कई अच्छी बातें भी हैं जैसे कि सिक्योरिटी गार्ड होने का न तो इन्हें दुख है, न ही पड़ोसी इन्हें नीची नज़र से देखते हैं।(“The thing about Canada is, I don’t feel I lose my dignity. People respect me for what I do.”) इनके बच्चे अब अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला पा चुके हैं और ये ख़ुद भी अपने डिग्री को यहाँ के मुताबिक अपग्रेड करने में लगे हैं आदि। मगर हाँ, किसी भी देश में इमिग्रेट करने से पहले हज़ार बार ये सोच कर आना चाहिए कि इसके क्या अच्छे और बुरे परिणाम हो सकते हैं और आपका ’गोल’ क्या है। अगर आप वो गोल हासिल नहीं कर सकते हैं तो आपका अगला क़दम क्या होना चाहिये। अल्पना जी का कमेंट काफ़ी महत्वपूर्ण है। वैसे सच है कि कुछ लोग सिर्फ़ कनाडा आने के लिये ही बस यहाँ आ जाते हैं, एक झिलमिलाती दुनिया का सपना देख कर…नई जगह में बसने के अपने हार्डशिप्स हैं और उन सबके लिये उन्हें तैयार तहना चाहिये।

  9. cmpershad कहते हैं:

    “कृषि एक बोरिंग सा विषय होता है”यही तो अंतर है मस्तिष्क[तथाकथित शिक्षित] और पेट[तथाकथित गंवार] के बीच। कृषि को पानी की जरूरत होती है और पानी के लिए बोरिंग 🙂

  10. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    अरविन्द मिश्र जी के कथन से सौ फीसदी सहमत …वैसे भी अशोक जी की टिप्पणिया उनके किसी पोस्ट को ओर बेहतर बनाने में मदद करती है….

  11. अशोक जी का ब्लॉग मुझे बहुत प्रिय है। वैसे खेती-बाड़ी को ब्लॉग ही नहीं नजदीक से जी कर देखना चाहता हूं। तभी किसान/किसानी और जुड़ी समस्यायें समझ में ठीक से आयेंगी।

  12. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    अशोक जी के बारे में अरविंद मिश्रा जी की टीपणी से बढ कर सटीक कोई टिपणि नही की जा सकती. एक किसान भी इतना बुद्धिजिविता का धनी हो सकता है इस बात को अशोक जी ने सत्य सिद्ध किया है. वो अपनी बात को बडॆ ही सधे हुये ढंग से पेश करते हैं.रामराम.

  13. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    अनूठा अंदाज़ आपका चरचा के रंग को और हसीन कर दे रहा है

  14. अशोक पाण्डेय कहते हैं:

    आप सभी का बहुत बहुत आभार।

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