इक लौ क्यूं इस तरह बुझी मेरे मौला? साप्ताहिक संगीत चिट्ठाचर्चा

एक बार फिर मैं हाजिर हूं गीत संगीत के चिट्ठों की जानकारी लेकर!
मनीष भाई और उसके बाद तरुणजी के द्वारा पिछले दो शनिवारों को संगीत चिट्ठों की चर्चा किये जाने से थोड़ा बोझ हल्का हो गया, अब कोई एकाद मित्र और तैयार हो जायें तो मजा ही आ जाये।
आज सबसे पहले बात करते हैं निठल्ला उर्फ तरुण भाई के ब्लॉग गीत गाता चल पर पोस्ट किये गीत बड़े अच्छे लगते हैं की। स्व.किशोर दा के सुपुत्र अमितकुमार भले ही फिल्मों में अपने पिता की तरह ज्यादा सफल ना हों पाये हों पर “टैलेंट” की उन में भी कोई कमी नहीं, ये इस गीत को सुनने से साफ स्पष्‍ट हो जाता है। खासकर पहले और दूसरे पैरा की पहली लाईन जब वे गाते हैं हम तुम कितने पास हैं कितने… और तुम बिन सबको छोड़के चले कैसे जाओगी? इन लाईनों को बार बार सुनने का मन करता है। इस गीत में गीत के अलावा एक और चीज जो बहुत ही बहुत कमाल करती है वो है दो पैरा के बीच का पार्श्व संगीत, काश ऐसा कोई तरीका होता जिससे मैं आपको अपने मन का हाल बता सकता।

अफलातूनजी अपने ब्लॉग आगाज़ पर काजोल की मां का मजेदार गीत बजा रहे हैं, भाई साहब काजोल की माँ तनुजा बतौर गायिका बले ही इतनी प्रसिद्ध ना हो पर कम से कम इतनी अन्जानी भी नहीं कि उनका काजोल की मम्मी के नाम से परिचय देना पड़े। अपने जमाने में तनुजा खासी प्रसिद्ध अभिनेत्री रही हैं। ये बात अलग है कि गीत ना तो सलिल दा के स्तर का है ना ही कोई खास मधुर, हां काजोल की मां का गीत के नाम से एक बार सुना जरूर जा सकता है।
इस गीत को सुनवाने के तुरंत बाद की पोस्ट में अफलातूनजी एक बार फिर मधुर गीत ओ रसिया मोरे पिया छिन ले गयो रे जिया लेकर आये हैं। इस गीत की खास बात यह है कि इसके संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर हैं और आशा दीदी गायिका! जब भाई बहनों की जोड़ी मिलती है तब यकीनन मधुर गीत बनता है, भले ही लता- हृदयनाथ हो या लता- आशा हो या फिर इस गीत की तरह आशा- हृदयनाथ।

हिन्द युग्म के साज़-ओ-आवाज़ पर शिशिर पारखी, जगजीत सिंह की खूबसूरत गज़ल आपको देख कर देखते रह गया को अपनी आवाज में सुना रहे हैं, सुनने के बाद लगता है वाकई शिशिर की गायकी में दम है।
इसी चिट्ठे पर सुजॉय चटर्जी ने ओल्ड इज गोल्ड श्रंखला में मेरे बहुत पसंदीदा गीतों में से एक गीत तेरे सुर और मेरेगीत पोस्ट किया। ये गीत यकीनन सदाबहार है। इस गीत को शायद १०० साल बाद भी सुना जायेगा तो लताजी की आवाज, पं. वसंत देसाई का संगीत और भारत रत्‍न बिस्मिल्ला खां साहब की शहनाई को सुन कर सुनने वाला झूम उठेगा।
अब मैं जिस की पोस्ट के बारे में लिख रहा हूँ उसके बारे में पिछले हफ्ते तरुणजी लिख चुके हैं पर मैं भी लिखने से अपने आप को रोक नहीं पाया क्यों कि रचना ही ऐसी कमाल की है।
महेन मेहता जी अपने इस चिट्ठे पर सबसे बढ़िया रचनायें लेकर आते हैं, चिट्ठे का नाम हैप्रत्येक वाणी में महाकाव्य…!हालांकि मैने इस चिट्ठे पर शायद कभी टिप्प्पणी ना की हो पर मैं इस चिट्ठे को बहुत पसन्द करता हूँ। इसे सबसे बढ़िया संगीत चिट्ठा कहा जा सकता है।
महेन इस हफ्ते अपने ब्लॉग पर भारत रत्न स्व. एम एस सुब्बुलक्ष्मी जी का गाया हुआ भजगोविन्दम मूढमते ले कर आये हैं। लक्ष्मीजी की आवाज को सुनना हर समय एक दिव्य अनूभूति देता है। मेरे संग्रह में सुबुलक्ष्मीजी की तमिल फिल्म मीरा के गीत हैं, उसमें एक गीत यह भी है, संभव है कि भजगोविन्दम…. को मीरा फिल्म में शामिल किया हो।
एक शाम इनके नाम!
मनीष भाई बहुत मेहनत करते हैं साल भर के गीतों को सुनना और उन्हें वार्षिक गीतमाला के रुप में प्रस्तुत करना मामूली बात नहीं। इस हफ्ते आप वार्षिक संगीतमाला का सरताज गीत ले कर आये हैं। गीत फिल्म आमिर का है। भले ही खास कमाल ना दिखा पाई हो पर फिल्म के गीत बड़े ही लाजवाब हैं। मनीष ने इस गीत
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
गर्दिशों में रहती बहती गुजरती.
. को पहले स्थान पर रखा है।

अशोक जी के चिट्ठे सुखनसाज़ पर परवेज मेहदी की सुंदर आवाज में आपने यह गज़ल सुनी कि नहीं.. जिस शहर में भी रहना उकताये हुए रहना? आवाज की गुणवत्ता भले ही थोड़ी कमजोर हो पर गज़ल सुनने में आपको आनन्द जरूर आयेगा।

संगीत की कोई भाषा नहीं होती! गुप्‍ताजी के अंग्रेजी ब्लॉग Indian Raaga पर गुप्ताजी एक से एक लाजवाब चीजें लेकर आते हैं। ये भी उन चिट्ठों में से एक है जिसे “बुकमार्क” कर रखा जा सकता है।
इस हफ्ते की पोस्ट में Four Random Songs 2 आपके ब्लॉग पर उस्ताद राशिद खां के गाये राग जोगकौंस पर आधारित गीत पीर पराई जाने ना बालमवा, मलिकार्जुन मंसूर के गाये राग बिहारी पर आधारित रचना नींद ना आये…भारत रत्‍न पं. भीमसेन जोशी की आवाज में राग खमाज पर आधारित गीत पिया ना आये.. बजे! आहा! सुनकर ही आनन्द आ गया। इनकी इस पोस्ट में राग मालती बिहाग वाला गीत बज नहीं रहा।
गीतों की महफिल वाले जिसे सबसे आलसी ब्लॉगर का एवार्ड दिया जा सकता है, महीनों जिनके ब्लॉग पर वीरानी छाई रहती है इस हफ्ते अचानक तीन-तीन पोस्ट लेकर आये। अब जैसे आलसी वे खुद हैं शायद वैसे ही आलसी इस के पाठक निकले, तीन में से दो पोस्ट तो फ्लॉप रही! एक की तो बोहनी भी तब हुई जब अपने जीमेल के स्टेट्स पर आप लिख कर बैठे थे, धत्त बोहनी भी नहीं हुई!, तब कुछ मित्रों को दया आ गई और दो तीन टीप गये। 🙂
पहली पोस्ट में महफिल में राग हमीर के दो वीडियो दिखाये गये थे और पाठकों से पहेली के रूप में पूछा गया कि इस गीत पर आधारित कौनसा प्रसिद्ध गीत है, पोस्ट करने के पांचवे मिनिट में यह पहेली फुस्स हो गई क्यों कि सही जवाब नीरज रोहिल्ला ने दे दिया था।
दूसरी पोस्ट में सूरदास का एक भजन दीनन दुख: हरन देव संतन हितकारी था जो जगजीत सिंह और पी उन्नीकृष्णन की आवाजों में था, पता नहीं क्यों यह दिव्यस्वर में गाया हुआ दिव्य भजन पाठकों को पसन्द ही नहीं आया।
तीसरी और शायद आखिरी पोस्ट में एक जमाने की मशहूर फिल्म जोगन का एक दुर्लभ गीत था। जोगन फिल्म के गीत अक्सर रेडियो या टीवी पर सुनाई दे जाते हैं पर महफिल पर पोस्ट किया हुआ गीत बहुत कम सुनाई देता है। यह गीत था तलत महमुद की आवाज में सुन्दरता के सभी शिकारी… इस पोस्ट का भी हाल बुरा ही रहा।
तो आज की चर्चा खत्म हुई अगले शनिवार मनीष जी की बारी है और उससे अगले हफ्ते टीजे उर्फ निठल्ला उर्फ तरूण जोशीजी की।

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attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि सागर चन्द नाहर, Sagar Chand Nahar में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

18 Responses to इक लौ क्यूं इस तरह बुझी मेरे मौला? साप्ताहिक संगीत चिट्ठाचर्चा

  1. सुंदर लगी संगीत चर्चा। सप्ताह में एक दिन इस का होना ही चाहिए।

  2. पंगेबाज कहते हैं:

    वाह ये निकला सागर से गागर

  3. पंगेबाज कहते हैं:

    माफ़ कीजीये गागर से सागर पढे

  4. संगीता पुरी कहते हैं:

    बहुत बढिया … संगीत प्रेमियों के लिए यह अच्‍छी शुरूआत की है आपने … सारे लिंक एक ही जगह मिल जाते हैं ।

  5. इरशाद अली कहते हैं:

    अच्छी जानकारी, इतने सुन्दर और सटीक लेखन के लिये। बहुत-बहुत बधाई

  6. MANVINDER BHIMBER कहते हैं:

    बहुत बढिया … संगीत प्रेमियों के लिए यह अच्‍छी शुरूआत है … सारे लिंक एक ही जगह मिल जाते हैं ।

  7. Raviratlami कहते हैं:

    ब्लॉग Indian Raaga तो वाकई लाजवाब है. कमाल के संगीत हैं वहां.

  8. Dr. Vijay Tiwari "Kislay" कहते हैं:

    sangeet ka aanad lete huye chittha padhaa, mazaa aa gayaa anup jee.- vijay

  9. cmpershad कहते हैं:

    “काजोल की माँ तनुजा बतौर गायिका बले ही इतनी प्रसिद्ध ना हो पर कम से कम इतनी अन्जानी भी नहीं कि उनका काजोल की मम्मी के नाम से परिचय देना पड़े।” अच्छा हुआ कि अफ्लातूनजी ने तनुजा का परिचय शोभना समर्थ की दूसरी पुत्री के नाम से नहीं कराया:)

  10. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    इस संगीत मयी चर्चा के लिये आपको बहुत धन्यवाद.रामराम.

  11. मीनाक्षी कहते हैं:

    बहुत संगीतमय चर्चा… द्विवेदीजी से हम भी सहमत है कि हफ्ते मे एक दिन तय होना ही चाहिए.. संगीत से जुड़े हर ब्लॉग़ को शामिल किया जाए (एक लाईना) की तरह तो बहुत अच्छा हो…

  12. एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी जी का भजगोविन्दम्‌ सुनते हुए यह टिप्पणी लिख रहा हूँ तो मन प्रफुल्लित है। आज की शाम कुछ अधिक पवित्र हो गयी है। हार्दिक धन्यवाद।

  13. Tarun कहते हैं:

    bahut khoob sagar bhai, me soch hi reha tha maal lad ki teyyar baitha hai gaadi aage kyon nahi bar rahi hai.

  14. Pankaj Upadhyay कहते हैं:

    Bahut khoob, bahut achhi. Main feed se Chitthacharcha padhta rahta hoon. Ek baar meri khinchai karne ke liye post aayi thi, phir aajtak shayad mere blog par aap logon ne nahin jhanka :PSaara collection bahut achha hai, especially ghazals. Mujhe bhi kuch gaane bahut achhe lagte hain..http://pupadhyay.blogspot.com/2009/03/blog-post_25.html

  15. Manish Kumar कहते हैं:

    शुक्रिया इस बेहतरीन चर्चा के लिए। तनुजा वाले गीत को सुनना बहुत आनंदायक था।सागर भाई मुझे महिने का दूसरा और चौथा शनिवार दें तो मुझे सहूलियत रहेगी।

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