क्षणे क्षणे यत् नवतां उपैति, तदेव रूपं ….


क्षणे क्षणे यत् नवतामुपैति तदेव रूपं …….
पिंकी का रूप

२१ जनवरी के पश्चात चर्चा का सुयोग आज बन पाया है। इस बीच कई मीठे व कसैले अनुभव जीवन की पुस्तिका के नए जुड़े पन्नों पर अंकित हो गए हैं , इतिहास में जम गए. जीवन का पथ इतना सुघड़ कहाँ होता है कि सब मनचाहा ही होता रहे.

अपने एक बहुत पुराने गीत की कुछ पंक्तियाँ याद रही हैं

बड़े जतन से बाँध गगरिया जल में छोड़ी
जलपूरित
हो उठी, डोर का छोर लपेटा
अपने होंठों से शीतल जल पी पाने को
तब कौशल से सम्हल सम्हल कर पास समेटा

भरे हुए कलशों का पनघट में गिर जाना
क्या जानो तुम, तुम्हें कहाँ अन्तर पड़ता है !!

तो यह कालचितेरा ऐसा ही है, सब प्रभावों से मुक्त…. तब भी हम उसे सराहते और सरापते हैं ….|

आज का दिन कईयों ने तड़के व्यग्रता में काट होगा। आने वाले कुछ दिन ब्लोगजगत में फ़िर से ऑस्कर और स्लमडॉग से सम्बंधित पोस्टों की बाढ़ आएगी… नहीं नहीं भरमार होगी। यह भी यही प्रमाणित करता है कि अभी हम `कालजयी’ नहीं हुए, 🙂

भारतीय भाषाओं वाली प्रविष्टियाँ अगली बार के लिए छोड़ रही हूँ। मध्य रात्रि से चर्चा को टुकड़ा टुकड़ा लिखते
पोस्ट करने में दोपहर बीत गई है।

विश्व से

१)

रहमान को २ एकेडेमी सम्मान से उनकी बारे में जानने वालों की जिज्ञासा व उत्कंठा स्वाभविक है। बहुत कम लोग शायद जानते हों कि ६ जनवरी १९६७ को जन्मे ए. एस. दिलीप कुमार ही (पश्चात्/अब) ए. आर. रहमान हैं।

२)

गुलजार के अनुसार वे २ कारणों से ऒस्कर में भाग लेने नहीं गए। पहला कारण दाहिने कँधे का लचक जाना ( यद्यपि वे स्वयं कहते हैं कि इसके बावजूद कँधा बाँधकर जाया जा सकता था) और दूसरा कारण ? ” वहाँ काला कोट पहनना पड़ता”(बकौल गुलजार)

३)

एक बार इन्हें भी देख लें तो कई प्रश्नचिह्न अपने मीडिया पर कुलबुलाएँगे और हँसी भी आएगी।

HONORARY AWARD

*

और यहाँ भी

वृत्तचित्र श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ चुनी यथार्थकथा की नायिका को जानिए कि –

बड़ी प्यारी और मासूम बच्ची है पिंकी लेकिन होंठ कटा होने के कारण उसे बहुत चिढ़ाया जाता था. पिंकी ने स्कूल जाना शुरु भी किया था लेकिन छोड़ना पड़ा. उसका बाल सुलभ मन खेलना तो चाहता था लेकिन दूसरे बच्चे उसके साथ खेलते नहीं थे, वो हताश रहने लगी

डॉक्टर सुबोध कुमार सिंह, पिंकी के सर्जन

चित्रावली और सम्पूर्णता के लिए यहाँ देखा जा सकता है.


अंश चर्चा : अभिलेखागार से

इस बार चर्चा के अभिलेखागार से २७ सितम्बर २००६ की एक चर्चा का कुछ अंश पढ़िए, पर एक शर्त है … आपको बूझना होगा कि आख़िर इसके कार ( अरे, अरे, वाहन नहीं ) अर्थात् चर्चाकार कौन हैं। शाजानबूझ कर हटाया गया इसका काव्यांश और शीर्षक का लिंक यथास्थान यथावत् स्थापित कर दिया जाएगा ताकि आप लोग पूरी चर्चा पढ़ सकें और जान सकें कि आपका अनुमान कितना सही है

अनूप जी व अन्य चर्चाकारों से यह आशा की ही जाती है कि तब तक कोई भी डैशबोर्ड के माध्यम से लिए इसका उत्तर नहीं जाहिर करेंगे।… और अनुमान- प्रमाण का सहारा लेंगे। तो

तैयार हो जाइए —-

तुम मेरे साथ रहो…

सुबह सुबह ही सागर भाई ने एक दुखद समाचार दिया. ‘मीरा बाई के भजन के नाम से लिखने वाली चिट्ठाकार और मेरी पत्नी श्रीमती निर्मला सागर की बुवा की १६ वर्षीय पुत्री निशा का आज सुबह सूरत में प्रात: १०.०० बजे निधन हो गया। समस्त चिठ्ठा परिवार की ओर से हम परम पिता परमेश्वर से मृत आत्मा की शान्ति हेतु तथा सब परिजनों को इस दुखद घडी को सहने की शक्ति प्रदान करने के लिये प्रार्थना करते हैं . आगे बढे तो नितिन बगला अपनी इन्द्र धनुषी खानपान की व्यथा कथा लिये पूरी रसोई बिगराये बैठे थे और एक से एक व्यंजनो की याद मे आंसू बहा रहे थे: ‘और हाँ, कुछ चीजें जिनकी खूब याद आती है..गरमागरम पोहा-जलेबी, दाल-बाटी, सादा रोटी-सब्जी ‘ आधा दर्जन से भी दो अधिक ज्यादा लोग उन्हे ढाढस बंधाते नजर आये. अब खाने की बात चली, तो लक्ष्मी जी भी पालक के बिछोह मे टेसू बहाते नजर आये:

धोने से नहीं धुलता है,
उबालने से नहीं उबलता है,
अजर अमर यह बैक्टीरिया
हमें बीमार करता है।
पालक प्रेमियों पर आफ़त आई है।

खैर हम तो खुश हैं, इसी बहाने पालक से बचे, नही तो हरी सब्जी की दुहाई देकर बनाने बी सबसे सरल आईटम हफ्ते मे दो बार तो टिकाया ही जा रहा था हमारे घर पर. उधर उन्मुक्त जी अपने वही शिगुफाई अंदाज मे आवाज लगाते दिखे: The week मनोरमा ग्रुप के द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी की पत्रिका है। इसके सबसे नये अंक (सितम्बर २५ – अक्टूबर १) के अंक में ब्लौगिंग के ऊपर लेख blogger’s park निकला है। इसमें इस बात की चर्चा है कि हिन्दुस्तान में अंग्रेजी में चिट्ठे लिखने वाले कैसे पैसा कमा रहें हैं। क्या हिन्दी चिट्ठेकारों के भी दिन फिरेंगे। अब अभी तो फिरे नही हैं, जब फिर जायें तो आप तो हईये हैं बताने के लिये, तब हम भी लाईन मे लग जायेंगे. तब तक जैसा चल रहा है वैसे ही हांके हुये हैं. रास्ते मे ही जीतू भा जुगाड लिंक मे एक ठो जुगाड लिये खडे थे, बिल्कुल सरकारी हिसाब किताब सा, एक जुगाड बताने के लिये एक पूरा पन्ना निपटा दिये. उससे ज्यादा तो उसे यहां कवर करने को लिखना पड रहा है. खैर, छोडा जाता है क्योंकि जुगाड है बेहतरीन.


आधी – आबादी

इधर गत कुछ समय से एक ऐसे चेहरे को देखने का सुयोग बना जो

पेशे से पुलिस ,धर्म से मनुष्य ,शरीर से स्त्री ,मन से उभयलिंगी और स्वभाव से प्रेमी

है।पुलिस के प्रचलित चेहरे से भिन्न व अपनी कोमलकांत संवेदनाओं को सुरक्षित सहेजे चलता हुआ।
इस चेहरे के तीन नेट-पक्ष हैं –

दिल की महफिल,

कुछ कवितायेँ कुछ हैं गीत ,

काहे नैना लागे

आप एक बार यहाँ तक हो आइये। लौटेंगे तो अवश्य मेरी बात को सच पाएँगे कि इस प्रशासनिक व क्रूर-ख्यात विभाग तक में स्त्रियों ने अपने भीतर के मनुष्य को जिलाए रखा है

मुझे सर्वाधिक रोचक लगता है सीमा जी का “काहे नैना लागे” …| यथार्थ से भरपूर और जिंदगी के बेहद करीब।

अतीत के संदर्भ वर्तमान पर इस तरह विनाशकारी धूमकेतु बन छा जाएंगे इसकी सुभद्रा को कल्पना ही नहीं थी। इतने दिनों से मन की जिन कोमल भावनाओं को उसने चारित्रिक दृढ़ता से लौह कपाटों के पीछे बन्द कर रखा था रत्नाकर के प्यार ने उन लौह कपाटों को जाने किन अदृश्य चाबियों से खोल दिया था। इतने आवेग संवेग इतनी कोमल और किसलयी भावनाएं, कामनायें जिन्हें सुभद्रा ने मृत समझ लिया था जाने कहाँं से मन में जाग गई। उसे भी यह आभास हो गया था कि किसी भी दिन रत्नाकर विवाह का प्रस्ताव रख देगा। वह स्वयं इस विषय को उठाना नहीं चाहती थी किन्तु उसने अपने आपको इसके समर्थन के लिये राजी कर लिया था।

पता नहीं बार बारगलती किसकी की लेखिका किरण बेदी अनायास याद आ रही हैं, आती ही हैं । महिला राष्ट्रपति नाम की रबर-मोहर बना कर स्त्रियों की पक्षधरता का मुखौटा पहनी सरकार एक ओजस्वी किंतु सदाशयी महिला से कैसे तो डर जाती है न… | भली स्त्रियाँ भी कैसा खतरा बन जाती हैं … अगर आप ईमानदार न हों तो। तो एक प्रकार से यदि स्त्री को स्त्री बने रहने देना चाहते हैं तो ख़ुद भले बन कर रहिए, इसे रौद्र रूप के लिए विवश मत कीजिए।

अहिल्या


अहिल्या की कथा पढ़ -पढ़ कर
सोचती रहती थी मैं अक्सर
कि
कैसे बदल जाती होगी
अक जीती जागती औरत
पाषाण की शिला में ?
कैसा होता होगा वह क्रूर शाप ?
जो
जमा देता होगा शिराओं में बहते रक्त को ।
आज अपने अनुभव से जाना,
संवेदनहीन ,प्रवंचना युक्त अंतरंगता का साक्षात्कार ,
कभी धीरे -धीरे और कभी अचानक
जमा देता है
संबंधों की उष्ण तरलता को.


जाने कितने मूक – यथार्थ इस कलम से अभिव्यक्त होने की आस लगाए है। कलम बरकार रहे।

अंत में

पता नहीं, चर्चा आपको कैसी लगती है! बहुधा अपने-अपने चिट्ठे की चर्चा से शून्य प्रमाणित होने वाली इस चर्चा से निराशा ही हाथ लगती होगी। पुनरपि आप लोग आते हैं, पढ़ते हैं, टिप्पणी करते हैं, सो, धन्यवादी हूँ। फोर्मेट की व आमंत्रित अतिथि से चर्चा की चर्चा भी नई संभावना के द्वार खोलती दिखाई पड़ती है। नवीनता का मानव सदा ही आग्रही रहा है। नवता ही सौंदर्य है।

सौन्दर्य की परिभाषा देते हुए कालिदास लिखते हैं –

क्षणे क्षणे यत् नवतामुपैति तदेव रूपं …….

मेरे तईं फ़ॊर्मेट भले ही कैसा भी हो, कन्टेंट अगर सही है तो गाड़ी सही चलती ही है।

तो मिलते हैं आगामी सप्ताह… तब तक के लिए …. ऑस्कर मुबारक!

महाशिवरात्रि समस्त कल्याणों की देनेहारी हो!!

About bhaikush

attractive,having a good smile
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क्षणे क्षणे यत् नवतां उपैति, तदेव रूपं …. को 15 उत्तर

  1. Shastri कहते हैं:

    “पता नहीं, चर्चा आपको कैसी लगती है! बहुधा अपने-अपने चिट्ठे की चर्चा से शून्य प्रमाणित होने वाली इस चर्चा से निराशा ही हाथ लगती होगी।”प्रिय कविता जी, जो लोग चर्चा को चर्चा के रूप में देखने के लिये आते हैं उनको किसी भी चर्चा में निराशा नहीं होती. पिछले एक दो महीने में चर्चा में जो विविधता दिखाई देती है वह हर कद्रदान के लिये खुशी की बात है. यह हम पाठकों का सौभाग्य है कि इस तरह के वैविध्य से युक्त सामग्री हद दिन पढने को मिल रथी है.जो साथी चिट्ठाकार बीमारी, सामाजिक परेशानियों, और परिवार के सदस्यों के असामयिक निधन के कारण दुखी हैं, उनका दुख हम सब का दुख है. शरीर के एक अंग में दर्द होता है तो सारा शरीर तडपता है. दुखी मित्रों को प्रभु सांत्वाना प्रदान करें.ऑस्कर मिला, अच्छी बात है. लेकिन गर्व की बात है या नहीं यह एक खुला प्रश्न है.सस्नेह — शास्त्री

  2. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    महाशिवरात्री और आस्कर की बधाई.आपकी चर्चा हमेशा ही एक नये आयाम मे होती है. और सही मे उसको पढना हमेशा अच्छा लगता है. बहुत शुभकामनाएं.रामराम.

  3. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    निशा का इस कम उम्र में निधन उनके माता पिता के लिए निसंदेह कष्टकारी ओर न भरने वाली शती है ,इश्वर उन्हें इस दुःख से लड़ने के लिए साहस प्रदान करे .आज ओर कुछ कहने की स्थिति नही है

  4. Udan Tashtari कहते हैं:

    * अव्वल तो लगता है कि आपकी तबीयत अब दुरुस्त है. बधाई.* सागर भाई के यहाँ यह हादसा ढाई वर्ष पूर्व हुआ था, हम सभी स्तब्ध रह गये थे उस वक्त.* चर्चा अच्छी लगी.* महाशिवरात्री और आस्कर की बधाई.

  5. हिमांशु कहते हैं:

    आपकी चर्चा पढ़कर सुखद अनुभूति हो रही है। धन्यवाद ।

  6. cmpershad कहते हैं:

    यह हमारी तीसरी ट्राई है। देखते हैं कि टिपिया पाते हैं या नहीं:)अच्छी चर्चा और अच्छॆ स्वास्थ के लिए बधाई। आज थोडे लिखे को बहुत समझना क्योंकि सिस्टम बगावत पर तुला है।

  7. cmpershad कहते हैं:

    यूरेका………..यूरेका………

  8. यहाँ फिर से आ जुड़ने पर आपका हार्दिक स्वागत। आशा है अब आप बीती बातें बिसारकर आगे की सुधि पूरि ताजगी और तन्मयता से लेंगी। आज की चर्चा तो यही संकेत दे रही है। वैसे एक व्यक्तिगत सलाह देने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। यह कि आपको अपने स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। @मध्य रात्रि से चर्चा को टुकड़ा टुकड़ा लिखते पोस्ट करने में दोपहर बीत गई है।इतने लम्बे समय तक बैठकर काम करना निश्चित रूप से शरीर पर विपरीत असर डालेगा। वैसे जब इतनी मेहनत से चर्चा की जाएगी तो सभी वाह-वाह तो करेंगे ही। धन्यवाद।

  9. अनिल कान्त : कहते हैं:

    आपकी चर्चा से बहुत कुछ जानने को मिला ….और आप अपनी सेहत का ध्यान रखें

  10. ऋषभ कहते हैं:

    दीर्घ अंतराल के बाद आपका चर्चा में पुनरागमन हर्षवर्धक रहा.अन्य भाषाओँ के ब्लॉगों के बिना भी यह चर्चा पूर्णतर है.”भरे हुए कलशों का पनघट में गिर जाना” – गीतपंक्तियाँ अत्यन्त मार्मिक और व्यंजनापूर्ण हैं.चर्चा को इससे क्लासिकी संस्पर्श मिल गया.’आधी आबादी’ की सामग्री भी पर्याप्त विचारोत्तेजक बन पड़ी है.

  11. रहमान चर्चा बहुत जगह पढ़ी। आपक इस चर्चा में बहुत विविधता थी।

  12. सतीश सक्सेना कहते हैं:

    अंततः आस्कर मिला, आभारी होना चाहिए हमें निर्णायकों का कि उनका ध्यान भारत कि और गया ! हालाँकि बेहद उच्च कोटि कि कला को सम्मान मिलना बाकी है ! सिर्फ़ एक विश्वास भरी निगाह की जरूरत है !

  13. सर्वप्रथम तो अपनी टिप्पणियों से सहयोग देने के लिए मेरा आभार स्वीकारें।स्वास्थ्य संबन्धी शुभकामनाओं व आत्मीय निर्देशों से मन गद गद हुआ। अच्छा लगता है, मित्रों का यों आत्मीय स्नेह।बूझौने का हल कल की प्रतीक्षा में है। अनूप जी राज-फ़ाश करेंगे, अपने मौजों वाले (मौज का बहुवचन है जी, पैर वाले मौजे नहीं)अन्दाज़े बयाँ में।

  14. सीमा रानी कहते हैं:

    कविता जी चिट्ठाचर्चा में उल्लेख करने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद .जब ब्लोगिंग की दुनिया में पहला कदम रखा तब से ही लगातार आपका स्नेह और मार्गदर्शन मिल रहा है ,आभारी हूं .स्वास्थ्य का ध्यान रखें .कहानियो पर आपकी बहुमूल्य राय मिलती रहेगी इसी विश्वास के साथ ……चिट्ठाचर्चा में आनंद आ गया .

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