चाहे कुछ मत काम करो लेकिन पीटो ढोल मियां

यार विवेक दिखे बाजार में, भागत सरपट जांय,
मिले लपक हम धाय के, पूछा इधर किसलिये भाय,
बोले विवेक अब क्या कहें, बात भई बहुतै है गंभीर,
हम निंदा करने को कह दिये,सो भई निंदकन की भीर,
कहते सब निंदक लोग हैं, अब कुटी छवाओ दो-चार,
न नुकुर करी जो जरा भी, तो फ़िर झेलोगे यार!

ई जो ऊपर लिखा गया उसको हमारे जमाने में मुंडलिया कहते थे। इसके खोजकार के रूप में समीरलाल का नाम लिया जाता है। तमाम इस तरह की कवितागिरी के चलते समीरलाल मुंडलिया किंग के रूप में बदनाम रहे। अब कुछ दिन से समीरलाल शरीफ़ बनने का अभ्यास कर रहे हैं सो मुंडलिया से पल्ला झाड़कर आजकल छोटी बहर, बड़ी बहर के चक्कर में पड़ गये हैं। इसीलिये कहा गया है सफ़ल आदमी किसी का सगा नहीं होता। कनपुरिये कम से कम इस मामले में ईमानदार तो हैं तो हैं जो कहते हैं- ऐसा कोई सगा नहीं,जिसको हमने ठगा नहीं! बहरहाल, जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहु्रें।

रंजू भाटिया अपने ब्लाग के माध्यम से अमृताप्रीतम और उनकी रचनाओ के बारे में जानकारी देती रहती हैं। बेवदुनिया के नये अंक में उनके ब्लाग का परिचय दिया गया। इस पर वे लिखती हैं:

अमृता पर अब तक जितना लिखा वह अपनी नजर से अपने भाव ले कर लिखा ..पर जब उस लिखे पर कोई दूसरी कलम लिखती है तो लगता है …कि हम जिस दिशा में जा रहे हैं वह सार्थक है ..उनके लिखे ने मुझे इस राह में और अधिक लिखने का होंसला दिया

रंजू भाटिया आपको केवल अमृता प्रीतम से ही रूबरू नहीं करातीं वे आज आपको सैर करा रही हैं अंटार्कटिका के मैत्री स्टेशन की।

सैर तो ममताजी भी करा रहीं हैं आपको सांप और घड़ियालों के पार्क की।

प्रभुजी ब्लागेरिया रोग से पीडि़तों की पीड़ा का बखान करते हैं विस्तार से।

विवेक जानते हैं कि लेन-देन के जमाने में बिना निंदा किये कोई निन्दा नहीं करता। अगर आप किसी की निन्दा नहीं करते तो वो क्यों करेगा? परसाईजी का मिशनरी निन्दकों का जमाना अब गया। इसीलिये विवेक अपने भक्तों का आवाहन करते हैं-भक्तगणों निंदा करिए

सुनामी के समय में ब्लागिंग उपयोग सूचना माध्यम के रूप हुआ था। कल अक्षत विचार की यह पोस्ट सवाल करती है कि कलकत्ते में पेंशन का मामला फ़ंसा है श्री मुरलीधर शर्मा ग्राम सकंड‚ नन्दप्रयाग‚ जिला चमोली‚ उत्तराखंड निवासी का। क्या उनको कोई सहायता दे सकता है? ये मामला दौड़-धूप का है। कोई कलकतिया ब्लागर बताये!

एम.सी.ए. फ़ेयरवेल में अनिलकान्त इत्ता तो भावुक हो गये कि कविता लिख मारे:

जब याद करेंगे इन लम्हों को
आँखों में आंसू भर आयेंगे

ये संग बिताये खूबसूरत पल
हम कैसे भूल पायेंगे

अनिल रघुराज समझाइश देते हैं:

लेकिन नैतिकता भी काल-सापेक्ष होती है। स्थिर हो गई नैतिकता यथास्थिति की चेरी बन जाती है, सत्ताधिकारियों का वाजिब तर्क बन जाती है। जड़ हो गई नैतिकता मोहग्रस्तता बन जाती है जिसे तोड़ने के लिए कृष्ण को गांडीवधारी अर्जुन को गीता का संदेश देना पड़ता है। मेरा मानना है कि हर किस्म की ग्लानि, अपराधबोध, मोहग्रस्तता हमें कमजोर करती है। द्रोणाचार्य एक झूठ में फंसकर, पुत्र-मोह के पाश में बंधकर अश्वथामा का शोक करने न बैठ होते तो पांडव उनका सिर धड़ से अलग नहीं कर पाते। हम जैसे हैं, जहां हैं, अगर सच्चे हैं तो अच्छे हैं।

डा.प्रवीन चोपड़ा अपने बचपन में सुने एकतारा के लुप्त हो जाने पर दुखी हैं

और इसे बेचने वाली महान आत्मा की बात ही क्या करें —- यह फ़िराक दिल इंसान इसे बजाने की कला भी खरीदने वाले हर खरीददार को सिखाये जा रहा है। लेकिन मुझे इस यंत्र होने के धीरे धीरे लुप्त होने के साथ साथ इसे बेचने वाले उस गुमनाम से हिंदोस्तानी की भी फिक्र है क्योंकि मुझे दिख रहा है कि उस की खराब सेहत उस की निश्छल एवं निष्कपट मुस्कुराहट का साथ दे नहीं पा रही है , लेकिन साथ में सब को गणतंत्रदिवस की शुभकामनायें तो कह ही रही हैं।

माले मुफ़्त दिले बेरहम शायद बैरागीजी की पोस्ट की मूल भावना है इसीलिये वे बधाइयां बांट रहे हैं क्योंकि ये उनकी नहीं हैं। लेकिन बधाइयां शुद्ध हैं इसीलिये ले लीजिये। बैरागीजी बताते भी हैं कि उन्होंने कोई मिलावट नहीं की है इन बधाइयों में:

बरसों बाद ऐसा उल्लास भरा, जगर-मगर करता, उजला-उजला गणतन्त्र दिवस अनुभव हुआ है मुझे। उस अबोध बच्चे ने मुझे जिस अयाचित अकूत सम्पत्ति से मालामाल कर दिया है, वह सबकी सब मैं आप सबको अर्पित करता हूँ।

अपनी भावनाएँ मिला दूँगा तो बधाई दूषित हो जाएंगी। सो, इस गणतन्त्र दिवस पर आप सबको, मेरे जरिए उस अपरिचित, अबोध बच्चे की, बिना मिलावटवाली, शुध्द बधाइयाँ।

लेकिन भाई आपको बतायें कि ये ताऊ मिलावटी सा हो गया है। चोरी-चकारी तो करता ही था सिखाता भी था (आज ही सोनू सुनार से कुछ लफ़ड़ा हुआ इसका) लेकिन दो दिन पहले ऐसी हरकत करी कि लगा कि ताऊ जो दूसरों को बरबाद करने चला था अब खुद हिल्ले लग गया। दो दिन पहले ताऊ ने ऐसी कवितागिरी करी कि मन्ने सरोजनी प्रीतम याद आ गयीं:

विवाह से पहले
आर्ट
विवाह के बाद
कामर्स
और बच्चों के बाद

हिस्ट्री….
समझ ना आए ऐसी है
मिस्ट्री….

अनुजा एक मौजूं सवाल उठाती हैं- जब गांधी सत्य के प्रयोग कर सकते हैं फिर स्त्री क्यों नहीं!

नीरज गोस्वामी आवाहन करते हैं:

चाहे कुछ मत काम करो
लेकिन पीटो ढोल मियां

किन रिश्तों की बात करें
सबमें दिखती पोल मियां

बातें रहतीं याद सदा
उनमें मिशरी घोल मियां

जो भी आता हाथ नहीं
लगता है अनमोल मियां

कमलेश्वरजी की पुण्यतिथि पर उनको याद कर रहे हैं कृष्ण कुमार यादव!

राधिका बुधकर का सवाल है- क्या शांभवी को मर जाना चाहिये?

मीत अपने भाई को याद करते हैं जो असमय सबको छोड़ गया!:

ये मेरे भाई का दो साल पहले republic day के दिन परेड में शामिल होने का फोटो है….इस साल उसकी जगह कोई और था…क्योंकि वो तो चला गया…सोचा आपसे बाँट लूँ…
२ दिन में हर उस जगह गया जहाँ वो और में स्कूल के बाद पूरे दिन घूमा करते थे, एक ही सायकल पर दोनों यहाँ वहां घुमते रहते थे…मेरठ के केंट इलाके में… एक-एक रोड पर उसका एहसास बसा है…पेडों पर, दीवारों पर, वहां की हवा में उसकी हँसी अब भी सुनायी देती है… मैं कोई ना कोई ऐसी बात कहता था, जिससे उसे हँसी आए और वो देर तक खिलखिलाता रहता था…

कल भूतपूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमणजी का 98 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। वे जिस समय राष्ट्रपति थे उस समय लघु संस्करणीय सरकारों का दौर था। विश्वनाथ प्रताप सिंह , चंद्रशेखर सिंह उसी समय में प्रधानमंत्री बने। वेंकटरमण जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि!

एक लाईना

  1. एक अमरीकी करोड़पति का सौ साल पहले लिया गया इन्टरव्यू: भाग दो :हमारा तो गुणा करने का मन कर रहा है
  2. आते जाते खुबसूरत आवारा सड़कों पे – ब्लागर चर्चा 1: तो हो ही सकती है
  3. अथातो जूता जिज्ञासा – 2 :किस्सा समझावन सिंह का
  4. भक्तगणों निंदा करिए : अरे निन्दा के लिये कुछ कर्म भी तो करो
  5. एम सी ए फेयरवैल पर सुनायी गयी कविता :फ़िर से सुनाओगे?
  6. “चिट्ठो में लोग कितनी मेहनत करते है” : जित्ती एक नटखट बच्चा अपने नटखटपन में करता है।
  7. डिस्काऊंट का गणतंत्र: बोले तो छुट्टियों की साझा सरकार
  8. यमराज का व्हीकल :दिल्ली की सड़कों पर, अमेरिका नतमस्तक
  9. इन के लुप्त होने का मुझे बहुत दुःख है !! : दुखी मत हो डाक्टर साहब वर्ना हमें भी होना पड़ेगा
  10. गोटू सुनार चढा ताऊ के हत्थे : अब ताऊ उससे पहेलियां बुझवायेगा
  11. जब गांधी सत्य के प्रयोग कर सकते हैं फिर स्त्री क्यों नहीं! :हां, हां क्यों नहीं! यही तो आज के स्वयंसेवक चाहते हैं
  12. लेकिन पीटो ढोल मियां: सोचो मत फ़ौरन शुरू हो जा
  13. किस्सा कुर्सी का!!:सुनाने लगे शास्त्रीजी!
  14. हिंदुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये: लेकिन यहूदी पाठयक्रम की डिग्री किधर मिलेगी जी!
  15. ख्वाहिशों का आँगन
    : में चांद,सूरज,बारिश और फ़ूल में बतझड़
  16. दिल्ली से वीरता पुरस्कार और गांव में दुत्कार : अपने यहां ऐसाइच होता है यार!
  17. बंबई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो : वाह, अब ससुर सलामी भी आउटसोर्स हो गई
  18. व्यंग्य – दुनिया में कैसे कैसे लोग होते है जिनका काम है फूट करो और राज करो ? :मतलब राज करने के लिये भी मेहनत करती पड़ती है जी!
  19. देश का ६० वाँ और मेरा पहला: साल!
  20. गणतंत्र, नेतातंत्र या परिवारतंत्र? : इनमें गजब का भाईचारा है जी
  21. किसने बाँसुरी बजायी:सामने काहे नहीं आता सुगंध की तरह छिपा है
  22. झांको खूब झांको :अरे कुछ छिपाओ तो यार
  23. किस जन-गण-मन अधिनायक की स्तुति करें..? किस भाग्यविधाता के आगे झंडी लहरायें..? : ये सवाल आउट आफ़ कोर्स है
  24. आज हुआ मन ग़ज़ल कहूँ…….. : कहो भाई लेकिन एक-एक कर कहो!

  25. गणतंत्र दिवस परेड में झाँकियों की जरूरत अब नहीं है
    : क्योंकि अब गणतंत्र बीत गया
  26. टीवी पत्रकारिता बनाम प्रिंट पत्रकारिता:आपस में भिड़े पत्रकार : अरे भिड़ने में क्या अपना क्या पराया!
  27. :
  28. :

और अंत में

आज की चर्चा का दिन कुश का है। वे व्यस्त हैं और मस्त हैं इसीलिये आपको इस पस्त चर्चा से काम चलाना पड़ रहा है। आशा है जल्द ही कुश जल्दी ही फ़िर चर्चा-वर्चा के लिये खर्चा करने के लिये कुछ समय निकाल पायेंगे।

कल तरुण ने मेरा पन्ना वाले जीतेंन्द्र चौधरी और मेरे बारे में जानकारी अपने ब्लाग में दी। ब्लागिंग जैसे तुरंता माध्यम में अजीब बात नहीं कि कल तक सबसे सक्रिय ब्लागर जीतेंन्द्र चौधरी का नाम आने पर कल को लोग पूछें कौन जीतेन्द्र चौधरी। इसलिये बालक को अब फ़िर से सक्रिय हो जाना चाहिये।

कल ही कविताजी की किताब का लोकार्पण हुआ इलाहाबाद में। जब हमने फ़ोनियाया तब उसी समय उनका कार्यक्रम निपटा था। वो बोलीं हमारी फ़ोन जस्ट इन टाइम आया। यह बात तब जब कि हम सन १९९२ से घड़ी बांधना छोड़ चुके हैं यह मानते हुये कि हमारे देश में काम कैलेन्डर के हिसाब से होते हैं। घड़ी यहां काम नहीं करती। कविता जी को फ़िर से बधाई। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी वहां मौजूद थे। वे शायद इस लोकार्पण समारोह के बारे में कुछ लिखें।

फ़िलहाल इतना ही। कल की शानदार चर्चा के लिये इंतजार करिये शिवकुमार मिश्र का।

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16 Responses to चाहे कुछ मत काम करो लेकिन पीटो ढोल मियां

  1. विवेक सिंह कहते हैं:

    पहले अनुजा जी एक व्यक्ति का नाम तो बताएं जिसने स्त्रियों को प्रयोग करने के लिए मना किया हो 🙂 और ये 27 और 28 नम्बर क्या खाली रहने के लिए बनाए थे हमारे गणितज्ञों ने ?

  2. Udan Tashtari कहते हैं:

    बेहतरीन चर्चा के लिए बधाई इन्क्लूडिंग मुण्डली के लिए. :)वेंकटरमण जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि!अब मिश्रा जी के दरबार में अर्जी लगाये इन्तजार करेंगे.

  3. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    बहुत बढ़िया चर्चा. एक लाइना तो गजब हैं.कल की चर्चा शानदार होगी, ई कैसे पता चला? हमें प्रेशराइज कर रहे हैं का?शिव प्रसाद जी की सहायता के लिए मैं तैयार हूँ. चूंकि बहुत बड़ी समस्या भाषा और शिव प्रसाद जी के कलकत्ते आने-जाने की है तो मैं कोशिश करूंगा कि कुछ अपनी कोशिश से और कुछ अपने संपर्क से उनकी समस्या का समाधान किया जा सके.

  4. एक लाइना बहुत बढ़िया रही .और आज तो हमारी पोस्ट का फोटोमय ज़िक्र हो गया धन्यवाद जी 🙂

  5. रंजन कहते हैं:

    बढीयां चर्चा.. काफी कुछ लपेट लिया..

  6. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    ठिक्कै लिखते हैं, जितू भाई..अब समय हाथ पर हाथ बाँध कर बैठने का नहीं है..आइये, हम एकजुट ( ? ) होकर पुनःब्लागिंग आरंभ करें !”छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी… एट्सेट्रा एट्सेट्रा !”पर ठहरिये पँचों, मेरा खटारा ब्लाग तो बिना धक्के के चलताइच नहीं,फ़र्स्ट हैण्ड उच्च टिप्पणी-पावर की पोस्ट न सही, पर, कुछ तो.. धक्का-उक्का लगाइये, जो कि गाड़ी खिसके..दू दिन से सुनते हैं न, बाऊ जी के.. “छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी… एट्सेट्रा एट्सेट्रा !”मुला आपकी चर्चा तो चुस्त ढिंचक टुर्रा चर्चा है !

  7. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    शिवजी चर्चा करने वाले है?! हनीमून पर नहीं गए का? 🙂

  8. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    वाह वाह ये हुई ना फ़ुरसतिया जी बिल्कुल ढिंचक चर्चा. बेहतरीन और लाजवाब.रामराम.

  9. चर्चा. बेहतरीन और लाजवाब.भाई आपके चिट्ठाचर्चा का कोई जबाब नही . ये चर्चा करना तो कोई आपसे सीखे. धन्यवाद.

  10. हिमांशु कहते हैं:

    विस्तृत चर्चा के लिये धन्यवाद. एक लाईना की २७वीं और २८वीं लाइन नहीं दिख रही. कुछ अदृश्य तो नहीं उसमें.

  11. seema gupta कहते हैं:

    इ चर्चा तो कुछ फुर्सत में लिखी गयी है…..शानदार .. और जानदार भी…Regards

  12. कार्तिकेय कहते हैं:

    उड़ी बाबा… बड़े प्रयोग किए जा रहे हैं. गाँधी बाबा तो सही टाइम पर निकल लिए, तबतक स्त्रियों ने हको-हुकूक की बात ही न की.. आज के जमाने में होते तो…….???मुंडलिया किंग समीर जी की जय हो… हाँ ये २७.: २८. : वाला फंडा हमहूँ को समझ न आया..

  13. Shastri कहते हैं:

    दो हफ्ते के बाद आपकी चर्चा पढने का मौका मिला. मन को बडा सकून मिला.सब को ब्लागेरिया से इन्फेक्ट करने के तमाम तरीके हैं आपके पास. करते रहिये, चिट्ठाजगत के लिये यह बीमारी उतनी ही जरूरी है जितना अस्पताल के चलने के लिये रोगी जरूरी हैंसस्नेह — शास्त्री

  14. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    सुंदर चरचा अनूप…और ये एक लाईना के आखिरी दो पंक्तियां किन रहस्य की ओर ले जा रही हैं?

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