साझा ब्लोगरूपी दीवार में टंगी धूल पड़ी तस्वीर हैं हम

पिछली बार अंधेरे में जब तीर चलाया तो वो किसी को जा लगा इसलिये सोचा इस बार शिकार भी हम बनते हैं और शिकारी भी। अभी कुछ समय पहले पढ़ा था हिंदी के लिये ‘आने वाला साझे ब्लोग का दौर हैं’ (शायद ऐसा ही कुछ) लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है वो दौर तो शायद जा चुका। जब नया-नया ग्रुप ब्लोग बनता है तो ज्यादातर लोगों की क्रियाशीलता बनी रहती है फिर धीरे-धीरे वो खत्म हो जाती है। अभी तक बने सभी साझा ब्लोग इसके शिकार हो चुके हैं, ज्यादातर इन ब्लोगस में या तो मोडरेटरस ब्लोग ठेले जाते हैं या कभी कभार कोई अन्य दो तीन जन। बाकि कंट्रीब्यूटरस दीवार में धूल पड़ी तस्वीर जैसे टंगे रहते हैं। हम भी कोई अपवाद नही हैं ऐसे ही २-३ ब्लोगस में हम भी टंगे हुए हैं, साथ ही साथ ऐसी कुछ तस्वीरें आप दायीं तरफ की साईड बार में टंगी हुई देख सकते हैं। चलिये टंगना टंगाना तो लगा रहेगा, अब थोड़ी चर्चा हो जाये।

कहीं का पत्थर कहीं का रोड़ा
एक नेता कितने ही घोटाले क्यों ना कर ले, उस पर अपराध के कितने ही केस क्यों ना चले, जनता और देश का तिया पांच करने में वो कोई कसर ना छोड़े, ऐसे लोग तो पहले रूखसत नही होते लेकिन अगर ऐसा हो भी जाये सबके मुँह से उनके लिये फूल ही झरते हैं सबको अचानक उनका पर्सनल व्यक्तित्व याद आ जाता है लेकिन एक आम आदमी पर, एक कड़क अफसर पर इस तरह के छींटें पड़ जायें और बदकिस्मती से रूखसत हो जाये तो –

आज का सच यह है कि गौतम गोस्वामी कैंसर से झूझते हुए, सिर्फ़ ४१ साल कि उम्र में इस दुनिया से रुखसत हो गया। बाढ़ घोटाले कि जांच चल रही है और चलती रहेगी। गौतम कि मौत कि खबरें जब अख़बारों में छपी तो उनमें कई कई बार बाढ़ घोटाले का जिक्र किया गया। गौतम कि अन्तिम संस्कार में केवल दो बड़े अधिकारी शामिल हुए। जांच पूरी होने से पहले ही गौतम को दोषी मान लिया गया था। मृत्यु के बाद भी यह लाजवाब अधिकारी वह सम्मान प्राप्त नहीं कर सका जिसका वो हक़दार था।

निर्भय होकर भय पर चिंतन कर रहे हैं प्रभात, उनका कहना है –

मानिये न मानिये बीमा कंपनियों के भय मैनेजमेंट इतना तगड़ा है कि उनके आप कायल हो जायेंगे। बच्चे से पूछा जाता है कि अगर आपके पापा गुम हो जायेंगे, तो आप क्या करेंगे।

चलिये मानना छोड़िये, अगर सच में गुम हो गये तो सोचिये क्या होगा? चारों तरफ फैले गिद्धों के बीच एक जवान विधवा का संघर्ष और समाज के ताने जिंदगी दुभर बना देंगे। कम से कम शायद ये भय बाद के लिये कुछ सहारा बन जाये। समाज अभी भी वहीं है जहाँ १९२५ में था, इसीलिये आभा कह उठती है, हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता

लड़कियों की सामाजिक हैसियत पर १९२५ में लिखे अपने उपन्यास निर्मला में प्रेमचंद ने एक सवाल उठाया था। वो सवाल आज भी जस का तस कायम है। हालात बदले हैं लेकिन लड़कियों की दशा नहीं बदली है। कुछ तबकों में बदली सी दिखती है, उन तबकों में प्रेम चंद के समय में भी बदली हुई सी थी। बड़ा वर्ग आज भी वहीं खड़ा है जहाँ १९२५ में खड़ा था। आज भी लड़कियाँ दोहरे बरताव का शिकार हैं।

पैसा ये कैसा, पैसा ये ऐसा, ये हो मुसीबत, ना हो मुसीबत, मानते हैं ना इस बात को लेकिन कभी सिक्कों का सफर सोच कर देखा है। अरे रे रे, सोचना शुरू करके दिमाग पर जुल्म ना ढायें, आपके लिये ये काम पहले ही कर दिया गया है। किसने? अजीतजी ने और कौन भला।

सत्यम की सफलता का ज्ञान बँट रहा है, अगर अभी तक मूल मंत्र नही लिया तो जाकर ले आईये, ज्ञान देते हुए ज्ञानजी लिखते हैं –

बाइबल की कथा अनुसार पतिता को पत्थर मारने को बहुत से तैयार हैं। पहला पत्थर वह मारे जो पाक-साफ हो!

ये बाइबल के जमाने की बात थी, अब जमाना बदल चुका है। अब पाक साफ लोग पत्थर नही बम मारते हैं, अब जो जहाँ रहता है वहीं ना अपने को साफ करके रखेगा, जो पाक में रहकर अपने को साफ रखे वो पाक साफ।

जब महानायक को रेखा नही मिली तो भला गरीब को कैसे मिल सकती है और वो भी जेट रेखा। लेकिन फिर भी आलोकजी अगड़म बगड़म कोशिश तो कर ही रहे हैं दिलवाने की –

फुल सूटेड बूटेड टाई वाला वह बंदा प्राइवेट जेट से उतरा और कटोरा हाथ में लिया और भीख मांगने की प्रेक्टिस करने लगा। मैंने पूछा-भई जेट से उतरे, तो भिखारी कैसे। वह बोला- कोई ढंग से खा पी ले, तो इसमें आपको क्या एतराज है। भीख मांगना प्रोफेशनल काम है, जेट चलाना पर्सनल काम है। दोनों अलग अलग हैं।

खैर डिट्टो ये बात यहाँ हम गोरों को पहले ही समझा चुके हैं शायद इसीलिये दूजी बार वो कार के लिये भीख माँगने कार में ही गये। अब भीख की बात चली है तो एक ब्रेकिंग न्यूज दे दूँ, ब्रिटेन की पोर्न इंडस्ट्रीज वालों को भी अब भीख चाहिये, मैं सोच रहा हूँ वो भीख माँगने कैसे जायेंगे।

अब लेते हैं एक कमर्शियल ब्रेक, जल्द वापस लौटते हैं, तब तक आप ये विज्ञापन बाँचिये – क्या आपके ब्लोग में लोग नही आते, क्या आपको टिप्पणी नही मिलती, क्या आपके भी मीठे मुँह से हमारी तरह लाल मिर्ची निकलती है जो आपके चाहने वालों को आपके ब्लोग के पास फटकने नही देती। अगर ऐसा है तो अब घबरायें नहीं, डाक्टर चिपलूनकर लेकर आयें हैं इस मर्ज का शर्तिया ईलाज, सुदूर हिमालय के दूरदराज ईलाकों से लायी जड़ी-बूटियों से बनायी गयी है ये गुणकारी दवा जो आपकी ब्लोगदानगी (मर्दानगी की ही तर्ज में पढ़ें) फिर से लौटा सकेगी। आपके चेहरे पर खोई मुस्कान लाने की गारंटी, दवा के लिये मिलें या लिखें, आपसे महज एक क्लिक की दूरी पर। ध्यान रहे हमारी कोई और ब्रांच नही है।

और लीजिये आदि चिट्ठाकर आलोक कुमार हाजिर हुए हैं अब तक की अपनी सबसे लंबी पोस्ट बल्कि महा लंबी पोस्ट लेकर।

राधिका ने जब लिखा हर काश पर खत्म होता एक आकाश!, तो प्रकाश मेरे पास दौड़ा चला आया और बोला कि हर काश पर तो मैं भी खत्म होता हूँ, मेरा क्या? हमने एक लम्बी श्वास भरी और कहा हम ये लिख पाते, काश…

हम चर्चा भी करते हैं तो कोई इधर देखता नही मगर, वे चाय भी पीते हैं तो बन जाती है खबर, अब आप बतायें यहाँ भी क्या हम कह सकते हैं, काश…

अगर तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहते तुम वो कहती लेकिन इतनी रोमांटिक सी बात को छोड़ शिवजी कह रहे हैं कि अगर चिट्ठाकार सरकारी मुलाजिम होता तो कुछ ऐसे ही नजारे देखने को मिलते –

चिट्ठाकारों की हड़ताल का असर सब क्षेत्रों में देखने को मिला. इस असर का असर यह हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक कमिटी का गठन किया. इस कमिटी में हिन्दी मंत्री, सांस्कृतिक मंत्री, सदाचार मंत्रालय के राज्य मंत्री थे. इस कमिटी ने चिट्ठकारों से मुलाकात की.

आंखे भी होती हैं दिल की जुबाँ, अगर ऐसा है तो फिर तस्वीर के लिये क्या कहेंगे। अमित की सुने तो कहेंगे – तस्वीर भी बोलती हैं, जो तस्वीरें इन्होंने दिखायी हैं उनमें से २ तस्वीरों ने मुझे याद दिला दिया वो विडियो जो मैने कुछ महीनों पहले बनाया था, आप भी देख लीजिये।

सब लोग उस प्रदेश के मुख्यमंत्री को गरियाने में व्यस्त रहें और वहाँ ये बोर्ड लगा रहा – सावधान प्रगति का काम चालू है। आज जब वो बोर्ड थोड़ी देर के लिये हटा तो संजय ने खबर सुनाई

भारत के किसी राज्य का अपना पहला अतिआधुनिक डेटा-सेंटर गुजरात में कार्यरत हो गया है. इस बात का महत्त्व इसलिए भी है कि देश के बाकी राज्य अभी इस पर विचार ही कर रहें है, (या उनकी मुख्यमंत्री अपने जन्मदिन के लिए चौथ उगाही में लगी है ) तो आइ.टी. का बादशाह माने जाने वाला कर्णाटक इसके लिए टेंडर निकालने तक ही पहुँच पाया है.

कहीं सुर-ताल कहीं गीत
अभिवादन में Hello एक लंबी कविता होती है और Hi होता है हाईकू, अब आप समझ ही गये होंगे तो आइये थोड़ा उदाहरण भी देख लें। अल्पना की कल्पना की ये उड़ान है हाईकू का उदाहरण –

नैनों की बातें,
कंपकंपाता मन,
हुआ मिलन

अब हाईकू के बाद जाकर हैलो भी बाँच आओ, साथ में कुछ दुलर्भ चित्र दिखा रही हैं लावण्या जी।

ज्योत्स्ना ने कहा ये आपके लिये, इसलिये बगैर कुछ और कहे आपके ही नजर कर देते हैं –

तुम्हारी याद के तकिये पर सिर रख कर के सोती हूँ
उठे गर दर्द दिल में तो तुम मुझको जगा देना

तुम्हारी महकी राहों का उजाला मैं न बन पायी
अंधेरे आयें राहों में तो तुम मुझको जला लेना

पारूल हार से थोड़ा उदास दिखती हैं, तभी तो –

वक्त के दिए घाव है
वक्त के साथ भर जायेंगें ……
हम तो इस सोच में है
ये गम लेकर किधर जायेंगें ?

लेकिन लगता है ये बात निर्मलाजी ने सुन ली, इसलिये उन्होंने प्रति उत्तर में लिखा –

जीवन को संघर्श मान जो चल पडते हैं बाँध कफन,
नहीं डोलते हार जीत से,नहीं देखते शीत तपन.
न डरते कठिनाईयों से न दुश्मन से घबराते हैं,
वही पाते हैं मंजिल देश का गौरव बन जाते हैं

मनीष बता सुना रहे हैं २००८ का पायदान संख्या 22 का गीत आँखों से ख्वाब रूठ कर

ज्ञान-विज्ञान के गलियारे
इस गलियारे में पढ़िये –

  • पायरेसी को कैसे कम किया जा सकता है.
  • अपना नाम कंप्यूटर की सिस्टम घड़ी (clock) में कैसे दिखायें
  • रब ने बना दी जोड़ी

    1. मानव शरीर किस लिए है? झुकने के लिये, इसलिये झुको न!
    2. ताऊ को मिला बराबरी का जोडीदार कौन मांडू के राक्षस रूपी पेड़ “बाओबाब”
    3. करिए जरा विचार…! क्यों ब्लाग विचार के साथ व्यभिचार
    4. किससे लड़ें – पाकिस्तानी आतंकवाद से या देशी राजनीतिक आतंकवाद से ओ बॉय दोनों आप्शन आतंक ही आतंक
    5. नेपाल तो बदलकर रहेगा, आप चाहे जो सोचें अब हम भी क्या करें आदमी ही है कि सोचता है

    नये हस्ताक्षर
    हमारी पिछली चर्चा में शास्त्रीजी ने कहा था, नये चिट्ठों को भी स्थान मिलना चाहिये इसलिये इस बार से ये नया कॉलम शुरू किया है जिसमें १ या २ चिट्ठों की बात करेंगे।
    अशोक शर्मा लेकर आये हैं प्रसिद्ध कवि विरेंददा पर समर्पित ब्लोग – विरेन्द्र डंगवाल, और साथ में ब्लोग की पहली पोस्ट ही शुरू की चेतावनी के साथ –

    अवैधानिक चेतावनी :
    ये शायद साहित्य की दुनिया की पहली जीवनी है जिसमें जीवनी से पहले चेतावनी को महत्व दिया गया है। चेतावनी इसलिये क्योंकि भूल से भी कोई इसे वीरेन डंगवाल पर शोध या वीरेन डंगवाल समग्र समझने का धोखा ना खा जाये। यह शोध इसलिये नहीं है क्योंकि इसमें निष्कर्ष नहीं है कि वीरेन डंगवाल क्या हैं? उनकी सीमाएं और संभावनाएं कहाँ तक हैं? वगैरा.. यह ब्लॉग वीरेन डंगवाल समग्र इसलिये नहीं है, क्योंकि उन्हें देखने के लिये दो आंखें और समझने के लिये एक दिमाग नाकाफी है। ये ब्लॉग उनके बारे में मोहब्बत और श्रृद्धा के उद्वेगों का नतीजा है। इसमे दिमाग की कसरत की कसर रह जाने की भी मुक्कमल संभावना है। सो इसे संभल कर ही पढ़ा जाये। लेखक की तरफ़ से किसी बात की गारंटी नही है पर यहाँ जितना लिखा है, है सभी सच ही..

    विरेंददा की कविता का एक नमूना पेश है –

    प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान!
    मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
    वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
    ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
    आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
    तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?
    अपना कारखाना बंद कर के किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान?
    कौन – सा है वह सातवाँ आसमान?
    हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान !!!

    अब अशोक का ही एक दूसरा ब्लोग इंडियन पेपराजी, अंग्रेजी में होते हुए भी हिन्दी एग्रीगेटर ब्लोगवाणी की शोभा कैसे बना है जब तक आप ये बूझिये हम कहीं और नज़र दौड़ाते हैं।

    प्रकाशित गजल लेखक चंद्रभान भारद्वाज इंदौर से लेकर आये हैं अपना ब्लोग – भारद्वाज ब्लोग, आप सोच रहे हैं ना प्रकाशित गजल लेखक क्या बला हुई? तो बता दें इसका मतलब है वो जिनकी पुस्तकें पहले प्रकाशित हो चुकी हों। दादा उम्रदराज दिखते हैं लेकिन एनर्जी ऐसी कि ब्लोग से भी छलक-छलक जाये, नमूना खूद देख लीजिये –

    मानता था मन सगा जिसको दगा देकर गया;
    प्यार अक्सर ज़िन्दगी को इक सज़ा देकर गया।

    दर्द जब कुछ कम हुआ जब दाग कुछ मिटने लगे,
    घाव फ़िर कोई न कोई वह नया देकर गया।

    जानता था खेलना अच्छा नहीं है आग से,
    पर दबी चिनगारियों को वह हवा देकर गया।

    याद आता है उमर भर प्यार का वह एक पल,
    जो उमर को आंसुओं का सिलसिला देकर गया।

    आंसुओं में डूब कर भी ढूंढ लेते हैं हँसी
    प्रेमियों को वक्त यह कैसी कला देकर गया।

    द्वार सारे बंद थे सब खिड़कियाँ भी बंद थीं,
    पर समय कोई न कोई रास्ता देकर गया।

    हम कभी बदले स्वयं वातावरण बदला कभी,
    दर्द ऐसे में खुशी का सा मज़ा देकर गया।

    अब अंत में, चर्चाकारों से एक नम्र निवेदन। कृप्या अपने हिस्से और दिन का ही माल उठायें, दूसरे के दिन के लिये आया ज्यादा बिक्री वाला माल उठाने की चेष्ठा ना करें। देखिये ना नोटपेड जी ने तेल फुलेल, इत्र पाऊडर क्या देखा ले उड़ीं और अपने हिस्से के माल को हाथ तक ना लगाया। यही नही मृत्यु, जीवन, ससुर, असुर किसी को भी ना छोड़ा, अब तीसरे खंबे वाले कुछ राय दें तो आगे सोचें।

    अब आप ब्लोगवाणी के विजेट या कोड की मदद से अपनी पोस्ट को पसंद करवा सकते हैं, ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ देखिये। हो सकता है पीछे पीछे चिट्ठाजगत का कोड भी आता होगा।

    अब अगले शनिवार तक के लिये दीजिये ईजाजत आपके दिन हँसते हुए बीते.

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    About bhaikush

    attractive,having a good smile
    यह प्रविष्टि chithha charcha, chitthacharcha, Tarun में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

    21 Responses to साझा ब्लोगरूपी दीवार में टंगी धूल पड़ी तस्वीर हैं हम

    1. अच्छी चर्चा!!!!आपके साझा ब्लॉग के बारे में विचारों से सहमत हूँ !!

    2. जितेन्द़ भगत कहते हैं:

      वि‍शद चर्चा रही और लाजवाब भी। शुक्रि‍या।

    3. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

      तरुण भाई, सर्दी मे इतनी विस्तृत चरचा करके आपने कमाल कर दिया. इतनी सर्दी मे रजाई से हाथ नही निकल रहा और आपको मालूम नही कि आपने आज सब कुछ समेट लिया है इस चर्चा में.बहुत शानदार चर्चा, धन्यवाद आपको.रामराम.

    4. विवेक सिंह कहते हैं:

      भाई रिजर्व के पेट्रोल की भी अपनी अहमियत है 🙂

    5. Arvind Mishra कहते हैं:

      साझा ब्लॉगों का पराभव चिंतित करने वाला परिदृश्य है !

    6. कुश कहते हैं:

      साझा ब्लॉग के मामले में चिट्ठा चर्चा अपवाद है.. मानता हू की एक बार ऐसा दौर अवश्य आया जब अनूप जी ही चर्चा करते थे.. पर अब स्थिति कुछ और है.. कई चर्चाकार सक्रिय रूप से फिर लिख रहे है.. और कई नये भी जुड़े.. जैसे मैं.. बाकी आज की चर्चा बढ़िया रही.. और काफ़ी विस्तृत भी.. इसका श्रेय सिर्फ़ आपको..

    7. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

      कुश की टिप्पणी में साझीदार बन जाता हूँ.

    8. डा. अमर कुमार कहते हैं:

      भाईकुश और शिवभाई के संग मेरी टिप्पणी भी शेयर की जाये..पर एक बात है, ब्लागवानी के विज़ेट को वर्डप्रेस अँगूथा क्यों दिखा रिया है ?

    9. palaas कहते हैं:

      एक नए ब्लॉग anindya.blog.co.in/ ने मुझे प्रभावित किया उसकी चर्चा भी मौजूं होती

    10. Gyan Dutt Pandey कहते हैं:

      बहुत ए-वन है यह चिठ्ठा चर्चा। बधाई।

    11. Dr.Parveen Chopra कहते हैं:

      चिट्ठा चर्चा बहुत बढ़िया रही। बहुत ही क्रिऐटिव ढंग से हो रही है यह चर्चा। शुभकामनायें।

    12. Vidhu कहते हैं:

      hmaari post nahi dekhi kyaa aapne…phir bhi badhai

    13. Udan Tashtari कहते हैं:

      गुरु, इतनी लम्बी चर्चा कर गये जरुर इत्र फुलेल लगाये होगे तभी न उड़ पाये. बेहतरीन चर्चा.

    14. चर्चा बहुत विस्तृत है, सर्दी में गरम कर गई।

    15. मसिजीवी कहते हैं:

      ब्‍लॉगर थकान एक पहचाना सच है, हम भी हफ्तों से लेकर महीनों तक तस्‍वीर सा टंगे रहने का आनंद ले चुके हैं पर साझा ब्‍लॉग में लाभ ये है कि कि इन टंगी तस्‍वीरों के बदस्‍तूर कुछ न कुछ भगीरथ इस थकान दौर को भी खींच ले जाएंगे और फिर उतसाह आ जाएगा। जबकि थकान का दौर जब निजी चिट्ठों पर आता है तो पूरा चिट्ठा ही ‘लुप्‍तप्राय:’ हो जाता है।वैसे हम निष्क्रिय तस्‍वीर वाली हालत से डरते हैं इसलिए चिट्ठाचर्चा के बाद किसी भी सामुदायिक ब्‍लॉग में लिखने के आमंत्रण से कन्‍नी काटते रहे हैं।

    16. अनूप शुक्ल कहते हैं:

      कल देखा था। आज सब लिंक देखे। अच्छा लगा। निठल्ला चिंतन की तरफ़ से बनाया गया वीडियो बहुत अच्छा लगा। इसके लिये आप साधुवाद के पात्र हैं। आलोक कुमार इसके पहले भी लम्बी पोस्ट लिखते पकड़े जा चुके हैं। साझा चिट्ठे के बारे में आपके विचार सहीं से हैं। अक्सर माडरेटर ही के जिम्मे उसको चलाने का काम आ पड़ता है। आज के दिन चिट्ठाचर्चा में यह अपवाद है क्योंकि जितने भी चर्चाकार हैं उन सबकी अपनी-अपनी शैली के कारण विविधता बनी रहती है और लोगों को इसका इंतजार रहता है।रब ने बना दी जोड़ी शानदार है। वीरेन्द्र डंगवाल पर ब्लाग की तर्ज पर और लोग भी अपने-अपने पसंदीदा लेखक/कवि के बारे में ब्लाग बनाकर लिखते रहें तब मजा है।शानदार चर्चा कहना हम भूले नहीं याद है। 🙂

    17. Dr. Smt. ajit gupta कहते हैं:

      अपनी बात कोई सुने, कोई पढ़े, यह चाहत प्रत्‍येक मन की होती है। इसलिए ब्‍लाग पर लिखी गयी बात को एक व्‍यक्ति भी पढ़ता है और उसकी सराहना करता है तब मन में बिना बसन्‍त ही फूल खिल जाते हैं। ब्‍लाग तो तभी पढ़े जाएंगे तब आप अमिताभ बने। इसलिए तस्‍वीर पर धूल कितनी ही जम जाए कोई तो आएगा और धूल को झाड़कर तस्‍वीर की सुध ले ही लेगा। आपकी इस चर्चा में आपके विडियो ने सबसे अधिक प्रभावित किया। राजा का अर्थ ही सत्ता होता है और जहॉं सत्ता होती है वहॉं तो शोषण स्‍वत: ही चला आता है। दुर्भाग्‍य है इस देश का कि हम आज भी राजा और रानी की ही कहानी सुनना चाहते हैं। बस इनके नाम बदल गए हैं कभी वे नाम नेता में तो कभी अभिनेता में बदल जाते हैं। आम आदमी अपने कर्म की बात नहीं सोचता। काश हम आम आदमी को उसके कर्तव्‍य से जोड़ पाते? अजित गुप्‍ता

    18. jayram कहते हैं:

      bahut achchha laga aapke blog par aakar….

    19. Shastri कहते हैं:

      “अब अगले शनिवार तक के लिये दीजिये ईजाजत आपके दिन हँसते हुए बीते”आप को इजाजत दी जाती है, लेकिन एक शर्त है — अगले शनिवार भी इसी प्रकार का एक अर्थपूर्ण एवं मनमोहक चर्चा प्रस्तुत करनी होगी. नही तो आईंदा इजाजत समाप्त कर दी जायगी.सस्नेह — शास्त्री

    20. अशोक पाण्डेय कहते हैं:

      मैं तो आपको इस बात के लिए धन्‍यवाद दूंगा कि गौतम गोस्‍वमी वाली ब्‍लॉगपोस्‍ट पर आपकी नजर गयी और चिट्ठा चर्चा में उसे शामिल किया। गौतम जैसी शख्सियतें बहुतों की आंखों की किरकिरी बन जाती हैं और आखिरकार उन्‍हें निशाना बना लिया जाता है।

    21. बहुत खूब. चर्चा की चर्चा क्यों करून जब ऐसा लाजवाब विडियो देखने को मिले. धन्यवाद!

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