आपको कंडोन नहीं कंडेम बोलना था

२००८
२००८

वर्ष २००८ ईस्वी सन् की अपनी अन्तिम चर्चा करते हुए भोर के ४ बजे मुझे इस कल्पना से अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि चिट्ठाचर्चा के लिए इस वर्ष का यह अन्तिम पखवाड़ा बहुत महत्वपूर्ण रहा है। क्य़ों या किन अर्थों में महत्वपूर्ण रहा है, इसका उल्लेख करने से पूर्व ही मेरी उंगलियाँ ‘कीबोर्ड्वा’ पर

ठहर ठहर जा रही हैं कि ऐसा वक्तव्य देने का अधिकार तो अनूप शुक्ल जी ही के पास है,फिर भी अच्छी बातें हर फुरसत में कह देनी चाहिएँ, इसलिए इस विचार ने मुझे जितना आह्लाद दिया है, उसे आप के साथ बाँटने के लिए इस ठिठक की अनदेखी की जा सकती है। तो मैं बता रही थी कि य पखवाड़ा चिट्ठाचर्चा के लिए महत्त्वपूर्ण किसलिए रहा। जिन्होंने अभी पिछले दिनों की चर्चाओं को प्रेमपूर्वक बाँचा है वे सब जानते ही हैं कि गत सप्ताह चर्चा का रूप अपने पूरे शबाब पर रहा; जिनमें उल्लेखनीय है –


विवेक की अधिकतम टिप्पणियों वाली चर्चा ,

कुश की करामाती सौन्दर्यदृष्टि से संपन्न इन्द्रधनुषी चर्चा


अनूप शुक्लाजी द्वारा अपने ‘आर्यपुत्र’ [:०) ] के आह्वान में पाई सफलता

इन चर्चाओं ने यह प्रमाणित किया कि स्वस्थ स्पर्धा रचनात्मकता की श्रीवृद्धि में कैसे सहायक सिद्ध हो सकती है। आपसी आत्मीयता से सम्पन्न

चर्चा मंडली

यह केवल मंडली ही नहीं है, अपितु एक परिवार की मानिंद है| चर्चा परिवार की उपर्युक्त सूची एक प्रकार से इस परिवार का वंश-वृक्ष है। जिसमें चर्चा के इतिहास में कभी न कभी, किसी न किसी रूप में न्यूनाधिक योगदान देने वाले सभी सदस्यों के नाम (रैंडमली) सम्मिलित हैं। परिवार होने की प्राथमिक शर्त (आत्मीयता) का चित्र सभी ने गत दिनों देखा ही, कि कैसे एक दूसरे से बेहतर कार्य करने की प्रक्रिया में सभी ने अपनी भरपूर क्षमताओं का प्रयोग करते हुए चिट्ठाचर्चा को समृद्ध बनाया और ऐतिहासिक उपलब्धियाँ दर्ज कराईं। मैं पूरे चर्चा परिवार को इस अवसर पर गदगद भाव से हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ देने की अपनी बलवती इच्छा को रोक नहीं पा रही हूँ। कल इलाहाबाद व पटना की लम्बी यात्रा पर निकलने के कारण, इस वर्ष की मेरी यह अन्तिम चर्चा है, इस लिए आगामी सोमावार (२९/१२.२००८) को ऐसा करना मेरे लिए सम्भव न होता, इसलिए यह शुभ कार्य आज ही करना उपयुक्त था|

यात्रा की तैयारी में व्यस्तता के कारण आज की चर्चा भी केवल आप सब से मिलने के बहाने के रूप में कर रही हूँ, किंतु बहुत संक्षेप में. केवल २ तीन चीजों का उल्लेख करूँगी।

गत वर्षों की तुलना में हिन्दी ब्लोगजगत के लिए यह वर्ष एक बड़े सार्थक परिवर्तन का वाहक बना, क्योंकि तकनीक या डायरी या मनोविनोद या शौकिया या …. आदि- आदि कारणों से हिन्दी ब्लॉग या इसका नेट पर प्रयोग अ धीरे धीरे गंभीर वैचारिक, साहित्यिक व विश्लेषणपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने की ओर बढ़ता जा रहा है। साहित्यिक दृष्टि से गंभीर लेखन करने वालों की उपस्थिति का अनुपात इस वर्ष बढ़ा है। यह बात दीगर है कि आनुपातिक दृष्टि से यह भले कम हो किंतु गत वर्षो की तुलना में इसका अनुपात निरंतर समृद्ध हुआ है।

इस दृष्टि से कुछ समय पूर्व जुड़े `पहला गिरमिटिया’ के यशस्वी लेखक व `अकार‘ के सम्पादक गिरिराज किशोर जी का ब्लॉग फिलहाल को भी इस श्रृंखला की नवीनतम कड़ी के रूप में रेखांकित किया जा सकता है|

भाषा का मूल आधार संवेदना है और उद्येश्य अभिव्यक्ति का विकास, विस्तार, संप्रेषण और परिमार्जन। दैहिक भाषा यानी बॉडी लेंग्वेज जिसका ऊपर जि़क्र किया, हाथ, पैर, मुखाकृतियां तो उसके माध्यम हैं ही लेकिन आँखे सबसे अधिक मुखर होती हैं। उनकी सीमित पर सटीक भाषा है। इस सबके बावजूद वे सब अभिव्यक्तियाँ न भाषा प्रमाण बन सकती हैं और न संवेदना का विस्तार करके उसमें कुछ जोड़ती हैं। भाषा का अर्थ है अक्षऱ समुच्य और अर्थ-समीकरण उनका विभिन्न रूपों में संप्रेषण तथा प्रक्षेपण। हर अक्षर-समुच्य की संवेदना उसी तर उससे जुड़ी़ होती है जैसे प्रत्ये जाति के आम के साथ उसका स्वाद या रस। वह दूसरे अक्षऱसमुच्य यानी शब्द के साथ मिलकर नए नए रूप धरती रहती है। घटती बढ़ती है। लड़की का विधवा होना औऱ पुरूष का विधुर होना, पिता का रहना और माँ का रहना संबंधित व्यक्ति से लेकर समाज तक अलग संदर्भों मे संप्रेषित होगा। पिता ने बेटी को प्यार किया, माँ ने किया, प्रेमी ने प्रेमिका को किया। प्यार एक ही शब्द है, संवेदना की अभिव्यक्ति के स्तर भी वज़न में समान है लेकिन हर रिश्ते के साथ प्रक्षेपण और प्रतिक्रिया अलग अलग होते हैं। भाषा एक ऐसा पिटारा है जो नए नए शब्द और नए नए अर्थ जादूगर की तरह निकालता जाता है। वे शब्द मात्र शब्द ही नहीं हैं ऊनके साथ संवेदना भी आती है। वह स्थिर नहीं होती घटती बढ़ती भी रहती है। जब घटने लगती है तो आयु की तरह वह भी समाप्त हो जाती है। यानी संवेदना विहीन शब्द विलु्प्त होते जाते हैं।


गत दिनों `पटियाला पैग लगा कर मैं तो टल्ली हो गईवाले फिल्मी गाने को भाषाई पतन के रूप में रेखांकित करते हुए हम सब ब्लोगजगत के कई लोगों ने कई बातें कीं ( एक और भी किसी पोस्ट को मैंने देखा था पर अभी स्मरण नहीं रहा है ). मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस गाने में भाषाई पतन जैसी कोई चीज नहीं है। मदिरापान करने वालों को खोज खोज कर मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि पटियाला पैग एक प्रकार की मदिरा की नस्ल (कोटि/प्रकार/वर्ग) है। अब रहा ल्ली शब्द . टल्ली का पंजाबी में अर्थ होता है`बजने वाली घंटी दूसरे समाजभाषिक सन्दर्भ में इसे `टुन्न का स्थानापन्न के रूप में भी कोई काव्यप्रयोग कर सकता है अर्थ स्पष्ट है कि अमुकअमुक को पीकर मैं अमुकअमुक हो गई इस अभिव्यक्ति को इन शब्दों द्वारा व्यक्त करने में कोई आपत्ति वाली बात नहीं है बीसियों बोलियों के शब्द हिन्दी फिल्मी संगीत में ५० साल से भी पूर्व से धड़ल्ले से प्रयोग हो रहे हैं, कई तो पूरे पूरे लोकगीत ही बोलियों से यथावत फिल्म में सम्मिलित हो गए बंदिनी का `अबकी बरस भेज भैय्या को बाबुलया `चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाले मुनिया आदि सैकड़ों मिल जाएँगे गुलजार साहब ने तो पंजाबी और फिर हरयाणवी का ऐसा छोंक लगाया है कि फिल्मों की काव्यभाषा का स्तर ऊँचा हो गया, भले ही वे चप्पा चप्पा चरखा चले हो या जुबाँ पे लागा, लागा रे नमक हों इसलिए मुझे भाषा के स्तर पर पंजाबी के अभिधात्मक प्रयोग पर आपत्ति दर्ज करने जैसा कुछ नहीं लगता हाँ, बुरा लगता है तो वह हैसांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण का तमाशा पर फिल्मों ने कब इसकी परवाह की? इस से भी भ्रष्ट, द्विअर्थी, गंदे, भौंडे अश्लील गीत फिल्मों ने समाज की थाली में परोसे और हमने धड़ल्ले से पचाए ब्लॉगजगत की इस सन्दर्भ में चिंता एक सार्थक पहल है.

अस्तु

एक और नए जुड़े चिट्ठे की चर्चा करना चाहूँगी वह है रिफ्लेक्शंज़ विशेष बात इसमें यह है कि इस के लेखक एक ८० वर्षीय बुजुर्ग हैं जो अपनी वार्धक्य जनित समस्याओं से जूझते हुए भी इसे लिख रहे हैं। जिस प्रकार हम अपनी युवा पीढी के नए जुड़े ब्लोगरों का स्वागत करते हैं, उस से अधिक हम ऐसी जिजीविषा का स्वागत करना चाहिए। अनूप जी के लिए खुशी की बात हो सकती है कि सत्यनारायण शर्मा कमल जी भी स्थायी रूप से कानपुर ही में रहते हैं।एक पुत्र हैदराबाद में होने के कारण यदाकदा हैदराबाद जाते-आते हैं.

विरह -व्यथा

बाट जोहती रही घरी घरी पुकारती
प्राण तुम चले गए पथ रही निहारती

प्रीति-पगे स्वप्न सभी अकस्मात् का गए,
नयन-पट खुले रहे कपाट बंद हो गए ।
ठगी ठगी खडी रही व्यतीति को नकारती …… बाट जोहती …..

समीकरण न हल हुए तमाम उम्र खप गयी
प्रश्न अनुत्तरित रहे जिंदगी सिमट गयी
ग्यांत सूत्र के प्रयोग रह गयी खन्गारती। …… बाट जोहती ….

प्रकाश की तलाश में हताश सांझ ढल गयी
साँस साँस में पली मिलन की आस टूलगयी ।
बुझे दिए उजास के लिए रही सवांरती । बाट जोहती ……

वो कौन श्राप था बहार का सिंगार झर गया ,
किस अदृष्ट की कुदृष्टि से शगुन बिखर गया ।
इसी रहस्य पर पड़ी परत रही उघारती । बाट जोहती ……

नियति के प्रहार की त्रासदी समेत ली ,
मीत से मिली जो पीर गीत में लपेट दी ।
घाव के रिसाव लेखनी रही उतारती । बाट जोहती रही..

पराए देश के ब्लॉगजगत से

पाकिस्तान के नागरिक अपने देश से मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सुंदरी का मज़ाक उडा रहे हैं, जिसने कहा था कि शी कंडोन्स द मुंबई अटैक यानी वह मुंबई हमलॊं की अनदेखी करती है। मिस पाकिस्तान वर्ल्ड नताशा पारचा ने इस हफ्ते सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में एक नहीं बल्कि दो बार कहा था कि वह मुम्बई हमलों की अनदेखी करती हैं। उन्होंने कहा था कि शी कंडोन्स मुम्बई अटैक्स।
एक ब्लागर कामिल यूसुफ ने लिखा है साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कई नासमझ बातें कही थीं लेकिन उनके अर्थ[भिन्न] थे। दर असल उन्होंने यह कहा था इन हमलॊं से पाकिस्तानी के तौर पर हमें खडा होना है और भारत में मुंबई के इन हमलों के ज़रिये जो कुछ हुआ उसे अनदेखा कंडोन करना है। यूसुफ ने लिखा है पहले उन्होंने सोचा कि पारचा ने कंडोन शब्द का इस्तेमाल गलती से कर दिया दिखता है और उनकी जीभ फिसल गई होगी, लेकिन उन्होंने उसी साक्षात्कार में एक बार फिर इस शब्द का इस्तेमाल किया । यूसुफ ने अपने पोस्ट डीयर मिस पाकिस्तान वर्ल्ड द वर्ड इज़ कंडेम नाट कंडोन में यह बात लिखी है।

चर्चा के अभिलेखागार से : अंश

नए ब्लॉग की सूचना सभी को चिट्ठाजगत के सौजन्य से नियमित अपने पते पर मिल ही जाती है, फिर यहाँ चर्चा में भी उनसे सचित्र भेंट का सुअवसर दिलाया जाता है। मेरी इच्छा हो रही थी कि नए जुड़े बलोगर्ज़ के लिए ब्लॉग जगत की पुरानी गतिविधियों, लिखेपढ़े ब्लोगरों आदि से परिचित होने का कोई प्रयास होना चाहिए ताकि कल की चर्चा की टिप्पणियों में हिन्दी के प्रथम ब्लोगर को लेकर अपने तईं खोज करने जैसा प्रयास किया गया होता। इस दृष्टि से चर्चा में हर बार अब से मेरा यत्न रहेगा किरैंडमलीकिसी भी एक पुरानी चर्चा के किसी अंश की पुनारावृत्ति की जाए, ताकि इस बहाने उस कालखंड का इतिहास साथ साथ हम देखतेपढ़ते जाएँ कि कौन क्या लिख रहा था या क्या घट रहा था। आज इसी श्रृंखला की पहली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है

बांगड़ू कोलाज और चाबुक की छाया

खबर लिखे जाने तक हिंदी ब्लॉग जगत में निम्नलिखित नये चिट्ठे जुड़े हैं

सभी नये साथियों का स्वागत है हिंदी चिट्ठा संसार में। आशा है कि इन साथियों का लिखना जारी रहेगा। चिट्ठों की बात करें तो यह प्रतीत होता है कि लिखने की तीव्रता में कुछ कमी सी आयी है। जो लोग लिख रहे हैं उन पर टिप्पणियों की मात्रा भी कम हुयी है। शायद लोगों की अपेक्षायें बढ़ी हैं तथा अब हर प्रविष्टि पर वाह-वाह करने की आदत लोगों ने कम कर दी है।

बहरहाल चिट्ठों के माहवार सफ़रनामे की शुरुआत चौपाल की बात से। अक्षरग्राम में अनुनाद ने नवीं अनुगूंज के विषय “आशा ही जीवन है” का अवलोकनी चिट्ठा सविस्तार लिखा। दसवीं अनुगूंज के लिये रवि रतलामी ने विषय दिया है –चिट्ठी। चिट्ठी पर चिट्ठाकारों की कलम का जादू बिखरना शुरु हो गया है। अगर आप इसे पढ़ रहे हों तो चूकें मत तथा लिख डालें पत्र अपने ब्लॉग पर। अक्षरग्राम पर ही देवनागरी की विशिष्टता बताते हुये दो लेख अनुनाद ने लिखे हैं। मधु किश्वर के दो लेखों का जिक्र विनय ने किया। दोनों ही लेख पठनीय है। जीतेन्द्र ने सूचना दी कि सन्तों और विद्वानों की सूक्तियां संग्रहीत की हैं उन्होंने। वे चाहते हैं कि और सभी लोग इस परियोजना का लाभ ले सकें।

पाकिस्तानी उलेमाओं ने फतवा जारी किया कि किसी इस्लामी देश मे सार्वजनिक स्थलों पर हमला इस्लाम की नज़र में हराम है। इस फतवे की विसंगतियों पर नज़र डाली रमण कौल ने, जिनके चिट्ठे के नये कलेवर पर ऐश्वर्या राय की दिलकश फोटो बस देखते ही रह जाने का मन करता है। (अनूप भाई, ये पंक्तियां भाभी जी तक पहुंचने न दें, कहीं आपकी शामत न आ जायेः सं०)

स्वामीजी खुन्नस निकालते हैं उन पत्रकारों पर जो भारत की छोटी-छोटी उपलब्धियों से खुश होकर देश की प्रगति का ढोल पीटने लगते हैं। वे आगे कहते हैं-

काश कोई पत्रकार ऐसा कुछ लिखे, ”अगर हर देसी, लालू और जयललिता समेत, इमानदार, मेहनती और सुपर बुद्धिमान हो जावे तो भी कम से कम १०० बरस लगेंगे इस उजडे चमन का हुलिया सुधारने के लिए और अमेरिका जैसे देशों (तथा) पाकिस्तान, चीन जैसे पडोसियों के चलते ये डेडलाईन भी मीट नही होगी! ”

स्वामीजी, जो कौम ईमानदार, मेहनती तथा बुद्घिमान होती है उसके लिये समय के पैमाने भी दूसरे होते हैं। १०० साल की फाइल को वो १० सालों में ‘जिप’ कर सकती है। वैसे स्वामीजी ने घरफूंक तमाशा देखने का शौक भी पाल लिया है। फिर बताया कि मुफ्त की सेवायें प्रदान करने वाली कंपनियां अब साथ में विज्ञापन का कचरा भी देंगी – मुफ्त में, दान के बछड़े के दांत नहीं गिना करते भई!

कविता सागर में मुनीश ने कुछ कालजयी कवितायें और प्रकाशित कीं। रवि ने हिंदी लिनक्स की कहानी बतायी। बाल विवाह रोकने के लिये सामाजिक उदासीनता का जिक्र भी किया। बाद में यह खबर मिली कि एक महिला अधिकारी ने बाल विवाह के खिलाफ लोगों में जागरुकता पैदा करने की कोशिश की तो लोगों ने उसके हाथ काट डाले। समाचार पत्र खबर को प्रकाशित करने की कर्तव्य पूर्ति करके बाकी जगह कैसे सहवाग का गिरेबां राइट ने पकड़ लिया था, इसकी जानकारी देने में मशगूल हो गये। यही पत्रकारिता है बॉस, हम चिट्ठाकार बस यूँ ही भले।


और अंत में

चर्चा में अभी कुछ चीजों को और सम्मिलित करना था, अन्य भाषाओं के चिट्ठे भी इस बार नहीं सम्मिलित कर पा रही हूँ, एक और नया प्रयोग आज आरम्भ करने वाले थी किंतु गूगल का ब्लॉगर आज पूरे असहयोग आन्दोलन पर उतारू है। कल भूमध्यसागर में नेट का केबल तीन स्थान पर कट जाने का प्रतिफल भी हो सकता है कि सर्वर का रुख सहयोगात्मक नहीं है, सभी इसके भुक्तभोगी हैं। आगामी ८-१० दिन ऐसा ही चलने वाला है। इस समस्या के चलते सुबह ४ बजे से अब ९.४० बजे तक इतना ही लिखना सम्भव हो पाया है।
लगता है कि अब आगामी वर्ष की जाने वाले अपनी सोमवासरीय चर्चा में ही उस इच्छित प्रयोग को आरम्भ कर सकूँगी।

नए ईस्वीवर्ष से पूर्व आज की अपनी इस वर्ष की अन्तिम चर्चा में आप सभी को २००९ की अग्रिम शुभकामनाएँ देती हूँ। देश विदेश में किसमस मनाने वाले सभी ब्लॉगर साथियों को उनके इस त्यौहार की भी अग्रिम शुभकामनाएँ, वैसे लगे हाथ यह बताना किसी को ज्यादती तो नहीं लगेगा कि इसी २५ दिसम्बर को हम अपने वैवाहिकजीवन के २५ वर्ष पूरे कर रहे हैं!

चर्चा में हुए विलम्ब व चर्चा में छूटी कई चीजों के लिए खेद है , किंतु तकनीकी चीजों पर अभी ऐसी विजय हमने नहीं पाई है कि सब इच्छित पूरा हो सके। इसलिए उन्हें आगामी चर्चा के लिए स्थगित करना पड़ रहा है. स्थिति यह है कि एक एक शब्द के बाद ड्राफ्ट ऑटो सेव्ड होने के चक्कर में रुक रहा है कई कई मिनट, या कुड नॉट कोंटेक्ट … का Could not contact Blogger.com. Saving and publishing may fail. Retrying… सूचनात्मक पट बीसियों दफे मुँह चिढ़ा चुका है. वर्तनी की जाँच या परिवर्तन/सम्पादन की भी गुन्जाईश नहीं दे रहा। इसलिए क्षमा चाहते हुए यों ही आप सभी से विदा लेती हूँ । आप चाहें तो आगामी सोमवार इन्हें देख सकते हैं।

आपकी हर सुबह मंगलमय हो

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23 Responses to आपको कंडोन नहीं कंडेम बोलना था

  1. गौतम राजरिशी कहते हैं:

    कविता जी की सशक्त लेखनी ने आज की चर्चा को इतना परिष्कृत कर दिया है कि असर देखते {पढते} ही बनता हैशादी की २५वीं वर्षगांठ की करोड़ों शुभकामनायें…

  2. Gyan Dutt Pandey कहते हैं:

    गिरिराज किशोर जी का ब्लॉग आपके लिंक के माध्यम से देखा। विचार के स्तर पर अभूतपूर्व! बस ब्लॉग संयोजन – रंग/फॉण्ट/पैराग्राफ स्पेसिंग और शीर्षक देना आदि ब्लॉगरोचित बिन्दु वहां नहीं हैं। उसकी अपेक्षा करना सही है या गलत, मैं कह नहीं सकता। साहित्य का ककहरा न जानने वाले के द्वारा कुछ कहना शायद ठीक न हो।

  3. @ ज्ञानदत्त जी आपकी प्रतिक्रिया एकदम उचित व सटीक है.मेरे विचार से धीरे-धीरे नेट का अभ्यस्त होते चले जाने से ऐसी स्थितियों में कमी आएगी.रही आपके द्वारा कुछ कहने न कहने की बात तो आप को ब्लॊगिंग व साहित्य दोनों पर कहने का पूरा अधिकार है, मेरी अपनी समझ के अनुसार तो.

  4. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    आज की चर्चा के लिये केवल एक शब्द.. विहंगम !

  5. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    आपके द्वारा अभी तक की गई चर्चाए जो मैने पढी हैं उन सब मे यह चर्चा बहुत उन्मुक्त और विस्तृत रुप से की गई लाजवाब चर्चा है ! आपको इसके बहुत धन्यवाद !आपको २५ वीं मैरिज एनिवर्सरी की हार्दिक बधाईयां और शुभकामनाएं ! आपका परिवार सहित जीवन सुख्मय और मगलमय हो यही शुभकामनाएं !रामराम !

  6. palaas कहते हैं:

    पुरानी चर्चा के लिंक के लिए आभार

  7. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    गिरिराज किशोर जी के लेख तो लंबे समय से पढता आया हूँ सहमति ओर असहमति एक अलग विषय है ,पर भाषा पर उनकी पकड़ ओर समाज के कई ज्वलंत विषयों पर उनके सामायिक लेख निसंदेह एक विचार प्रक्रिया को जैसे शुरू करते है ….ब्लॉग जगत में ऐसे लोगो का प्रवेश निसंदेह कुछ उपयोगी दरवाजो का खुलना है ..पड़ोस के ब्लॉग का जिक्र .नए चिट्ठो का सिलेवार झलक …..कविता जी निसंदेह आप की मेहनत प्रशंसा की हकदार है .. आज आपने भी एक अलग अंदाज में चर्र्चा की …….ओर हाँ हमारी ओर से भी बधाई स्वीकार करे

  8. seema gupta कहते हैं:

    आपको २५ वीं मैरिज एनिवर्सरी की हार्दिक बधाईयां और शुभकामनाएं Regards

  9. cmpershad कहते हैं:

    जब पटियाला पेग लिया तो टल्ली बजेगी ही, जैसे डंडा लगेगा तो गिल्ली उछलेगी ही। सही है कि सिनेमा जगत की भाषा में हमने ‘चोली के पीछे’ पचा लिया है, टल्ली तो फिर भी सुपारी की डल्ली जैसी है:)>क्रिसमस और नववर्ष की सभी कोअग्रिम बधाई के साथ साथ सफल एवं सौहार्दपूर्ण वैवाहिक जीवन की सिलवर जुबली के लिए ‘चिट्ठाचर्चाकार’ को भी अग्रिम बधाई।>अपने जीवन के आठ दशक पूर्ण करने वाले श्री सत्यनारायण शर्मा कमल की कर्मठता को शत-शत नमन।सार्थक चर्चा के लिए डॉ. कविता वाचक्नवीजी को बधाई।

  10. विनय कहते हैं:

    मान गये लल्लन————————-http://prajapativinay.blogspot.com/

  11. संगीता पुरी कहते हैं:

    बहुत अच्‍छी चर्चा हुई आज…आपको मेरी ओर से भी २५ वीं मैरिज एनिवर्सरी की हार्दिक बधाईयां और शुभकामनाएं।

  12. शादी की 25वीं वर्षगांठ की शुभकामनायें!!!!!!गिरिराज किशोर जी का ब्लॉग देखा!!बधाई!!!!!!!!!!1

  13. वैवाहिक जीवन की रजत जयंती के लिए शुभ कामनाएँ। हम अपनी आठ वर्ष पीछे छोड़ आए हैं। आप द्वारा की गई चर्चा सब से अलग और अनोखी होती है, आज की तो विलक्षण भी है।

  14. विवेक सिंह कहते हैं:

    हम अपनी तरफ से किलियर किए देते हैं कि जब हम चर्चा करते हैं तो हमारी ओर से बेहतरीन चर्चा का प्रयास अवश्य होता है किंतु यह सब किसी तथाकथित स्वस्थ या अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण है इससे हमें इनकार है .

  15. विवेक जी!बेहतर शब्द ही स्वयं में सापेक्ष है,बेहतर शब्द बना है संस्कृत के बृहत्तर से, इसी बृहत्तर से अंग्रेज़ी का Better बना है. इसे Good या Best की दरकार होगी ही होगी, यही सापेक्षता है. प्रतिस्पर्धा को आप आरोप के रूप में क्यों ले रहे हैं?स्वस्थ प्रतिस्पर्धा यानि बेहतर प्रदर्शन की भावना। इस में क्या गलत है और गलत आप को लग गया, ईश्वर जाने। और इतना गलत लग गया कि पूरी चर्चा में केवल यही एक बात रेखांकित करने योग्य पायी गई!तब तो शायद इसी तर्ज़ पर और लोग भी नाराज़ हुए बैठे हों।जिसे प्रशंसा के रूप में लिखा गया,वह चीज ही भारी पड़ गई लगती है; सो खेद है इसका। अब और क्या कहें?

  16. Arvind Mishra कहते हैं:

    परिणय की रजत जयन्ती पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं !

  17. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    विहंगम का विशेषण देने के बाद अभी शाम को सभी लिंक खँगाले,पसीने आ गये, भई ! अब तो ऎसा लग रहा है, कि कहूँ फेंटा बाँध कर की गयी चर्चा …साफ़गोई का बुरा न लें पर, पति की देहरी से सुहागिन जाने की कामना करने वाली हमारी संस्कृति आपके वैवाहिक जीवन को 25 वाँ सोपान पार करते देख आनन्दित तो है..पर बधाईयों से लाद देने की आवश्यकता नहीं देखती.. !

  18. अल्पना वर्मा कहते हैं:

    बहुत ही अच्छी चर्चा रही–केबल के काटने का असर यहाँ भी नेट और फ़ोन लइनों पर खूब है और २७ तारिख तक ऐसा ही रहेगा.कविता जी ‘शादी की ‘रजत जयंती’ [ २५ वीं ] वर्षगांठ की और नव वर्ष की ढेरों शुभकामनायें.

  19. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    वाह। सुबह से कई बार देखने के बाद अब टिपिया रहे हैं।आपकी चिट्ठाचर्चा की बात ही कुछ और है। पुराने अभिलेखागार की चर्चा पढ़ना बहुत अच्छा लगा।गिरिराज किशोर जी और सत्यनारायण शर्मा कमलजी के ब्लाग की जानकारी पाकर अच्छा लगा।दाम्पत्य जीवन की रजत जयंती पूरी करने की अभी एक बधाई ले लीजिये। २५ को फ़िर से बधाई देंगे।विवेक अपना हाल बता रहे हैं कि वे तमाम सांसारिक मायाजाल से ऊपर उठ चुके हैं। इसके लिये खेद कैसा?हमें तो चर्चा अन्य लोगों की तरह बहुत पसंद आयी। जैसी अन्य लोगों को भी लगी।

  20. विवेक सिंह कहते हैं:

    कविता जी को शादी की रजत जयंती पर बधाइयाँ .

  21. आपके शब्दों,भावनाओं,सदिच्छाओं और आशीष ने हृदय को कृतज्ञता से भर दिया है.आभार स्वीकारें। स्नेह-सद्भाव बनाए रखें।

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