गब्बर चिट्ठाचर्चाकार संवाद

(वैसे तो मूलत: यह चर्चा 19 मार्च 2007 को की गई थी. इस बीच, हिन्दी चिट्ठाकारी में हजारों पोस्टें ठेल दी गई हैं, और चिट्ठाकार पांच सौ से बढ़कर पांच हजार हो गए हैं, मगर परिस्थितियां घेला भर नहीं बदली हैं. संदर्भ – आज की चर्चा. इसी लिए इसे रीठेल कर रहे हैं. मज़े लें. गब्बर सांभा संवाद तो हर फ्रेम में, हर माहौल में फिट बैठ ही जाता है… )

गब्बर तो नहीं, परंतु समय के अनुसार सांभा ढल गया है और वह चिट्ठाचर्चाकार बन गया है. प्रस्तुत है गब्बर – सांभा संवाद के ताज़ा अंश-

गब्बर – अरे ओ सांभा
सांभा – जी, सरकार…

ग.– तो कितने हिन्दी चिट्ठाकार हैं?

सां.– जी, सरकार पांच सौ…

ग.– और दिन में कितने चिट्ठे चर्चा के लिए आ जाते हैं?
सां.– जी, सरकार, यही कोई पंद्रह बीस…

ग.– और तू पंद्रह-बीस चिट्ठों की भी ढंग से चर्चा नहीं कर पाता. ऊपर से बहाने बनाता है कि चिट्ठों पर ताला लगा है? बहूत नाइंसाफी है ये बहूत नाइंसाफ़ी.

सां.– सरकार,…

ग.– और क्यों क्या तेरे कन्ने कोई और काम धाम नईं था क्या जो तू बेमतलब और फ़ालतू चिट्ठाचर्चा लिख-लिख कर तमाम जनता को बोर करता फिरता है?
सां.– जी, सरकार…

ग.– उदर ये भासा ऊसा का क्या चक्कर है? कबी तू बंगाली मोशाय बनके लीखता होय, कबी तू मद्रासी बोन जाता है, कबी तू कविता करता है और कबी तू फ़ोकट का कुंडलियां तो कबी व्यंज़ल मारता है? कबी तू मध्याह्न में आ जाता है तो कबी फुरसत में लिखता बेठा रहेता है और कबी हैदराबादी तो कबी कुवैती बानी बोलता है. तो क्या तू पूरे देस-परदेस में घुमता फिरता है और क्या तेरे में बहुभाषी आत्मा घुस रहेला है?
सां.– हाँ, सरकार…

ग.– हाँ सरकार के बच्चे? क्या तू पाठकों को बेवकूफ़ समझता है? तू सुद्द हीन्दी क्यों नहीं लीखता है? और ई का चक्कर है कि तू कुछ चिट्ठों को तो बड़े प्रेम प्यार से बांचता है चर्चा करता है, और बाकी को छोड़ देता है? स्त्री नाम धारी चिट्ठाकारों के चिट्ठे तो तू बांच लेता है बाकी को फेंक देता है? कुछ चिट्ठों की बड़ी प्रशंसा मारता है तो कुछ चिट्ठों की खिल्ली उड़ाता है. बड़ी यारी दुसमनी निभाता है अपने चिट्ठाचर्चा के जरिए? सुना है तूने बहुत ग्रुप बना लिया है कोटरी बना लीया है?
सां.– सरकार, सरकार…

ग.– सरकार के बच्चे, ये बता तू चिट्ठाचर्चा में फोकट की खाली चरचा मारता है कि कुछ गंभीर समीक्षा-वमीक्षा भी करता है? कि बेफ़ालतू की खाली कड़ियाँ थमाकर भाग जाता है. जब तू चिट्ठाचर्चाकार बन गएला है तो अपने काम में प्रोफ़ेशनल एटीट्यूड क्यों नहीं लाता? चलताऊ काम क्यों करता है? या तो तेरे को चिट्ठाचर्चाकार नहीं बनना था, और जब बन गएला है तो गाहे-बगाहे बहाना क्यों बनाता है?
सां.– नहीं, सरकार…

ग.– चोप्प! अब सुन. अबी मेंने जो तेरे को सुनाया, उसपर ध्यान मार. भेजा उसपे लगा. मेरे को कोई कंट्रोवर्सी नईं मांगता. जो जो पिराबलम मेंने तेरे को ऊपर बताया उसे ठीक करके फिर चिट्ठाचर्चा लिखना. और, जरा जल्दी जल्दी सीख, अपने चिट्ठाचर्चा मैं स्टैंडर्ड ला. समझा क्या? और नहीं समझा तो ये बी समझ – आज मेरे सामने आदमी अकेला तू है और मेरे इस पिस्तौल में गोली पूरी की पूरी छ: है. हा हा हा हा हा हा हा हा हा …

सां.– जी, सरकार.

चिट्ठाचर्चाकार सांभा तब से अपने टर्मिनल का कुंजीपट टिपियाते बैठा है. उसकी उंगलियाँ धड़ाधड़ चल रही हैं, परंतु गोली के भय से वह एक लाइन टाइप करता है और चार लाइन मिटाता है. उसकी पोस्ट माइनस में चली गई है. वह पोस्ट करे तो करे क्या?

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यह प्रविष्टि चिट्ठाचर्चा, रविरतलामी, हिन्दी, chithha charcha में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

11 Responses to गब्बर चिट्ठाचर्चाकार संवाद

  1. Raviratlami कहते हैं:

    सभी चिट्ठा-चर्चाकार मित्रों से आग्रह है कि वे लेबल में अपना भी नाम अवश्य डालें, जैसे कि मैंने डाला है – इससे लेखक विशेष द्वारा लिखी गई सारी प्रविष्टि को छांटने व ढूंढने में सुविधा रहेगी. अभी मैं लेखकों के द्वारा प्रविष्टियों को छांटने की कोशिश में नाकाम रहा था.

  2. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    ये साँभा सुद्द हिन्दी में कब तक चर्चा लिख लेगा?:) मैं इंतजार कर रेला हूँ.

  3. Jitendra Chaudhary कहते हैं:

    ये साम्भा अगर चिट्ठा चर्चा के एजेन्डे फिक्स करने वालो के कहने पर लिखेगे तो अगली शोले का इन्तज़ार करना पड़ेगा। फिर वही लोग बवाल मचाएंगे, अब तक नही लिखे हो, कब तक लिखोगे?

  4. Srijan Shilpi कहते हैं:

    सांभा को यदि गब्बर के गिरोह में बने रहना है तो उसे उसकी बात पर ध्यान तो देना ही पड़ेगा। या फिर वह ये भी कर सकता है कि गब्बर को ठिकाने लगा दे और खुद सरदार बन जाए। आख़िर, सांभा सबसे ऊपर बैठा है और वह किसी पर भी निशाना लगा सकता है! 🙂

  5. Rakesh Khandelwal कहते हैं:

    मन्ने भी अंग्रेजी के इस्कूल में दाखिलो लिये हूँगब्बर ने बोल्या है तो अब हमने हुकुम बजाणो होग्योभासा तौ न आवे कोई, चर्चाकार बन्यो फ़िरतौ हूँगब्बर की ढपली पे ही अब हमकूँ गाणो गाण्यौ होग्यो

  6. Udan Tashtari कहते हैं:

    अरे, लेबल पर अपना, आपका सबका नाम डाल देंगे, पहले चर्चा तो करो कि लेबल पर नाम भर डाल कर गब्बर की कथा सुना कर भाग गये…व्यंजल ही में सुना दो, चलो…१-२-३ शुरु!!

  7. Raviratlami कहते हैं:

    भाई, मैंने तो अपने तरीके से चर्चा कर दी है. लिंक डाले थे, परंतु धो-पोंछ दिए कि फिर पंगा ना हो जाए. अतः अब लिंक इनविजिबल हैं. बात जहाँ तक, जिन तक पहुँचानी थी, पहुँच गई होगी यह उम्मीद है. बकिया काम अगला चिट्ठाचर्चाकार संभालें 🙂

  8. जितेन्द्र भाई,एजेन्डों पर आजतक कौन खरा उतरा है! एजेंडा बनाकर वोटबैंक बना लो।अरे साम्भा! ये लोग तो तेरे को ढंग का काम भी नहीं करने देंगे। ऐसे बहुरूपियों से बचना नहीं तो मेरे पास तो ६ गोलियाँ हैं ये ३६ लेकर तेरा भेजा भून देंगे। हाहाहाहाहा

  9. जगदीश भाटिया कहते हैं:

    बहुत अच्छी चर्चा :Dचर्चाकार अपनी मर्जी से चर्चा करें, किसी गब्बर, सांभा, जय, वीरू, ठाकुर, बसंती की परवाह किये बगैर। आप की मर्जी लिंक दें या नहीं, किसका लिंक दें, किसकी चर्चा करें, किसे छोड़ें, कविता में करें या कुंड़लियों में।हमें तो यही खुशी है कि चर्चा हो रही है। इतने सारे चिट्ठों के लिखे जाने पर भी चर्चा हो पा रही है यही बहुत है। रही चर्चा के तरीके की बात तो हर चर्चाकार का अपना अंदाज है और हमें सभी का अंदाज भाता है। ऐसी वैरायटी और कहां?

  10. Shrish कहते हैं:

    वाह बहुत खूब आजकल एक से एक मजेदार चर्चा पढ़ने को मिल रही है।लेबल में नाम डालने वाला आइडिया अच्छा है, हमें भी कभी कोई पोस्ट ढूंढनी हो तो आसानी रहेगी।

  11. PD कहते हैं:

    मैंने 2007 मार्च में जाकर ढूंढा मगर मिला नहीं..

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