लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं

चर्चा शुरू करने के पहले कुछ प्रमुख समाचार:

  1. ब्लोगीवुड की पहली फ़िल्म ” शोले ” रिलीज- बाक्स आफिस में टिकट के लिये मारामारी
  2. चुनाव के मौसम में समीरलाल का नारा- तुम तो बस नारे लगाओ!!
  3. गूगल की मदद से अब हिंदी में भी लुटना आसान
  4. ब्लागर की पहुंच का धमाल, वहां तक पहुंचा जहां कवि भी नहीं पहुंच पाता
  5. पुलिस की धर्म-निरपेक्षता का एक पहलू यह भी
  6. आलोक पुराणिक के ऊंट में मुंह में काजू बरामद
  7. इलाहाबाद में कुतिया ने दिये छोटे-छोटे पिल्ले चार

अब समाचार जरा विस्तार से। ब्लागजगत के हीरो कुश सोते-जागते ब्लाग की दुनिया में ही रहते हैं। वे ब्लाग ओढ़ते-बिछाते हैं। दुनिया की हर चीज को ब्लागर के चश्मे से देखते हैं। कल उन्होंने ब्लागईवुड की पहली फ़िल्म शोले रिलीज की। फ़िल्म देखते ही लोग इसे देखने के लिये लपक पड़े। शुरुआत गाने से हुई:

अरे मेरा ब्लॉग तेरा कमेन्ट
तेरा कमेन्ट मेरा ब्लॉग .. सुन ए मेरे यार..
जान पे भी खेलेंगे…
तेरे लिए ले लेंगे..
सबसे टिप्पणी………..
ये ब्लोगरी ..
हम नही छोड़ेंगे…

समीरलाल जहाज में अपने शाकाहारी मिशन के चलते पेट में चूहों से कबड्डी खिलवा दिये। जबलपुर पहुंचते ही इसके खिलाफ़ चुनाव के मौसम में नारे बाजी करने लगे।कहते हैं:

वजन की वजह से कहो मरणोपरांत आक्षेप लगा दें कि इनके वजन के कारण गिरा है जहाज, अतः घर वाले जुर्माना भरें. अमरीका है भई!! अपने फायदे के लिए जब सद्दाम को चूहे के बिल से पकड़ा दिखा सकता है तो हमारी क्या बिसात.

आपने देखा होगा कि लोग चोर-उचक्कों को देखते हैं तो या तो चोरों को थपड़िया देते हैं या फ़िर पुलिस को थमा देते हैं। लेकिन रवि रतलामी अलग जीव हैं। वे अपने लुटने के संदेश पर प्रसाद चढ़ा रहे हैं क्योंकि वह हिंदी में आया था।

अचानक मेरे मुंह से निकल पड़ा – आह! विश्व का पहला “हिन्दी में फ़िशिंग संदेश”!

आपने यह तो सुन ही रखा है कि जहां न जाय रवि, वहां जाय कवि। लेकिन ये ब्लागर के जमाने के पहले की बात है। आज तो ब्लागर वहां जा रहा है जहां कवि पहुंचने से इंकार कर देता है। पूजा उपाध्याय देखिये एक ब्लागर को कहां ले गईं:

“तुम्हारा और स्कॉच का कुछ रिलेशन समझ में नहीं आया” । वो मेरे ऑफिस में नई आई थी, उसके लैपटॉप पर कुछ सेटिंग करते हुए मैंने देखा कि उसने अपने आईपॉड का नाम “whiskey on the rocks” रखा था। जवाब देने के बजाये वह खिलखिला के हँस पड़ी, ये हँसी भी मेरी कुछ खास समझ में नहीं आई, लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं। जैसे कि उन्हें मालूम होता है कि हम उनकी हँसी से अपना सवाल भूल जायेंगे।

अभय तिवारी को पुलिस की धर्म-निरपेक्षता की पड़ताल करते हुये अपने विचार व्यक्त करते हैं। इस पोस्ट में उन्होंने पुलिस के पड़ताल करने के कुछ उदाहरण पेश किये हैं:

साम्प्रदायिक मानसिकता वाले अभियुक्तों के प्रति भी देश की पुलिस का पाशविक व्यवहार किस क़ानून और नीति की दृष्टि से जाइज़ है, मैं नहीं समझ सकता। अभियुक्तों ने पुलिस पर यातना की कई आरोप लगाये हैं ।

आलोक पुराणिक चुनाव के मौसम में ऊंट से पूछ रहे हैं भैया किस करवट बैठोगे? ऊंट है कि बता नहीं रहा है। अब ऊंट का नारकॊ टेस्ट तो होता नहीं सो आलोक जी ऊंट को डांटने लगे कहते हैं:

ऊंट आप विश्वसनीय नहीं रहे हैं, आपका कुछ पक्का ही नहीं है-मैंने डांटा।
मेरा पक्का नहीं है, तब ही तो तुम इंतजार कर रहे हो। जिनका सब कुछ पक्का होता है, उनमें मीडिया की दिलचस्पी नहीं रहती। पक्का तो अब मदनलाल खुरानाजी का है, कि अब कहीं नहीं जायेंगे। इसलिए मीडिया में कोई उनसे बात ही नहीं करता-ऊंट ने महीन बात कही।

ज्ञानजी के यहां वुधवार को पहले अवधिया जी अतिथि पोस्ट लिखते हैं। आज अतिथि पोस्ट रीता भाभी लिखिन हैं। बताती हैं:

सड़क की उस कुतिया ने अपनी डिलीवरी का इन्तजाम स्वयम किया था। कोई हाय तौबा नहीं। किसी औरत के साथ यह होता तो हड़कम्प मचता – गाड़ी/एम्ब्यूलेंस बुलाओ, डाक्टर/नर्सिंग होम का इन्तजाम करो, तरह तरह के इंजेक्शन-ड्रिप्स और जरा सी देर होती तो डाक्टर सीजेरियन कर चालीस हजार का बिल थमाता। फिर तरह तरह के भोजन-कपड़े-दवाओं के इन्तजाम। और पता नहीं क्या, क्या।

आगे वे संवेदनशील कामना करतीं हैं

प्रकृति अपने पर निर्भर रहने वालों की रक्षा भी करती है और उनसे ही इन्तजाम भी कराती है। ईश्वर करे; इस कुतिया के चारों बच्चे सुरक्षित रहें।

टिप्पणियां:

  1. एक और ख़ास ख़बर….सुना है फ़िल्म के कलेक्शन से प्रभावित होकर हीरोइन ने अपनी कीमत भी बढ़ा दी है! पल्लवी त्रिवेदी
  2. अगली पंक्ति में बैठ सीटी मारने में मजा आ रहा है. संजय बेंगाणी
  3. अगली बार मट्ठी और अचार ले के निकलना और सबको दिखा दिखा के खाना। आलोक कुमार
  4. क्या केने क्या केने। अभी ना मर रहे आप। जब तक हिंदी के एक एक ब्लाग पर आपकी टिप्पणी ना हो लेगी। जब तक हर नवोदित, उग चुके चुके लेखक को आप शुभकामना ना दे देंगे, तब तक आप ना मरेंगे। लिखवा कर गारंटी ले लीजियेगा। पक्की। आलोक पुराणिक
  5. ‘कोई लड़की चाहे व्हिस्की पिए या किरासन तेल’ हा हा ! ध्यान रखना पड़ेगा… ये ब्लॉग्गिंग भी…
    अभिषेक ओझा
  6. मैं कहता हूँ कि मेरे अंदर एक मुसलमान और पाकिस्तान रहता है. पंकज

एक लाइना

  1. क्या चिट्ठाकारी बेवकूफों के लिये है? अरे नहीं शास्त्रीजी, आप सबको अपने जैसा काहे समझ रहे हैं! हम लोग भी हैं चिट्ठाकारी के मैदान में!
  2. ताऊ ने चाँद पर कालोनी काटी : बुकिंग शुरू ताऊ के ब्लाग पर टिपियाने वालों को खास छूट
  3. तुम तो बस नारे लगाओ!!: हम सिर्फ़ मुंडी हिलायेंगे
  4. सफ़दर अली ख़ान लौटना चाहते हैं : त आयें न लौट के
  5. ओ पहाड़,मेरे पहाड़: बोलो भाई कुछ कहो भी तो!
  6. “ब्लॉग लिखे जाने के सात महत्वपूर्ण कारण ” : सातो एक साथ लागू होते हैं कि अलग-अलग?
  7. खुश होने के नियम: सबसे बड़ी बात किसी नियम के पचड़े में मत पड़ॊ
  8. मंदी आई है तो फिर दूर तलक जायेगी…: पहले नानी फ़िर छ्ठी का दूध याद दिलवायेगी
  9. यह आख़री सलाम मेरा तेरे नाम है : इसके बाद वाले किसके नाम होंगे?

मेरी पसंद

आपका पूरा प्रदर्शन हो गया है |
हर जगह पर दूरदर्शन हो गया है |

अब न बदलेंगे यहाँ मौसम कभी
मुल्क का वातालूकुलन हो गया है |

खिलखिलाती कुर्सियाँ आयोजनों में
लोकमत निर्बल निवेदन हो गया है |

वंश बढ़ता जा रहा है लम्पटों का
सत्य का जबरन नियोजन हो गया है |

आइये अब तो करें बातें हृदय की
देह का सम्पूर्ण शोषण हो गया है |

कांपती है एक बूढी झोंपडी
आज मलयानिल प्रभंजन हो गया है |

कवि राय जोशी

और अंत में

घर से दूर नैनीताल की उत्तराखंड अकादमी से यह चर्चा ठेलते हुये ख्याल आया कि शीर्षक लिखा जाये- नैनीताल की वादियों से दुनिया की पहली चिट्ठाचर्चा। लेकिन बचा गये। ज्यादा मुफ़ीद टाइटिल पूजा उपाध्याय की पोस्ट का लगा।

चिट्ठाचर्चा के टेम्पेलेट में कुछ बदलाव देबाशीष ने किये हैं। आप इस बारे में अपने सुझाव दें। कैसा लगा। और क्या होना चाहिये इसमें।

चर्चा शुरू किये तो नेट कनेक्शन था। अब जब समेटने की बारी आई तो मुआ गायब है, बत्ती समेत। ओट मजे की बात कि गीजर/हीटर चल रहा है लेकिन रोशनी वाली लाइन उड़ी है।

तमाम ब्लाग जिनको मैंने पढ़ रखा था और जिनके बारे में सोचा था कि उनके बारे में लिखेंगे वो इस नेट-अपंगता के चलते दिख नहीं रहे हैं। अब जो हो गया सो हो गया। इत्ता बचा के रखते हैं अपनी पेन-ड्राइव में। जहां नेट मिला, ठेल देंगे।

पिछली चर्चायें कविताजी और विवेक सिंह ने की। इस टेप्पेलेट की अच्छाई यह भी है कि आप पिछ्ली चर्चायें भीं थोड़ा दक्षिणपंथी होकर देख सकते हैं।

अब कल शिवबाबू का नम्बर है। इसके पहले जहां मौका मिला हम फ़िर फ़िर से हाजिर होंगे जो बच गया उसे ठेलने के लिये।

तब तक आप प्रसन्न रहें, मस्त रहें और बिना वजह हंसते रहें। कोई टैक्स नहीं है जी हंसने पर!

छपते-छपते: हम इसे अभी पोस्ट कर ही रहे थे कि देखा अभय भाई ने अपनी पहली चर्चा की है। अभय का चर्चा मंच से जुड़ना हमारे लिये सुखद अनुभव है। मजे की बात है कि उनकी पोस्ट का टाइटिल है –सिगरेट पीती हुई लड़कियां और हमारी इस चर्चा का शीर्षक है -लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं। मात्र संयोग है कि दोनों कनपुरियों के ब्लाग शीर्षक लड़कियों पर क्रेंद्रित हैं। अगर नये टेम्पेलेट में यह सुविधा न होती कि हाल की चर्चायें दिखें तो शायद मैं इसे अभी न पोस्ट करता। शाम को करता।

बहरहाल अब फ़ाइनली इत्ता ही। बकिया फ़िर।

About bhaikush

attractive,having a good smile
यह प्रविष्टि Uncategorized में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

28 Responses to लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं

  1. seema gupta कहते हैं:

    प्रकृति अपने पर निर्भर रहने वालों की रक्षा भी करती है और उनसे ही इन्तजाम भी कराती है। ईश्वर करे; इस कुतिया के चारों बच्चे सुरक्षित रहें। ” wah aapka bhee jvab nahe saree khbr hai aapko, aaj hum serious hoker comment kr rhe hain…. bcs aapke post mey likha hai “लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं ” to aaj hansnaa mnaa hai…” hum bhee dua krenge in char baccon ke liye ke slamtee ke liye..”Regards

  2. अनूप शुक्ल कहते हैं:

    अरे सीमाजी, आप ऐसा न करें। आप तो हंसते हुये ही बहुत अच्छी दिखती हैं। आपके लिये तो गम्भीर होना मना है!

  3. Udan Tashtari कहते हैं:

    लड़के तो बिना वजह हँस सकते हैं न!! सो हँस दिये इस मस्त चर्चा पर. आप कब लौटेंगे नैनीताल से?? वैसे वहीं से बेहतरीन लिखाई पढ़ाई चले तो वहीं रह जाईये. 🙂

  4. अशोक पाण्डेय कहते हैं:

    मस्‍त चर्चा है। समीर भाई के सुझाव में मेरी भी ‘हां’ : नैनीताल से बेहतरीन लिखाई पढ़ाई चले तो वहीं रह जाइए 🙂

  5. ताऊ रामपुरिया कहते हैं:

    हम तो २४ घंटे दांत फाड़ते रहते हैं ! 😀 वाह , आज का शीर्षक होना चाहिए ” चर्चा नैनीताल से ” ! इब राम राम !

  6. अल्पना वर्मा कहते हैं:

    bahut hi suljhi hui charcha.[yah bhi khuub hai -aaj comments ka baksa khojna pada–tukkey se 5 comments par click kar diya aur rasta mil gaya.]

  7. कुश कहते हैं:

    आपकी मेहनत को प्रणाम… नया स्वरूप बढ़िया है..

  8. Gyan Dutt Pandey कहते हैं:

    आपकी मेहनत को प्रणाम… नया स्वरूप बढ़िया है. बाकी जंझट रही कमेण्ट करने को लिंक ढूढ़ने में!लड़कियां सिगरेट पीती हैं, हंसती भी हैं और शीर्षक भी बन जाती हैं!

  9. cmpershad कहते हैं:

    बढिया चर्चा – विषम परिस्थियों में भी!!!> लडकियां हंसती अच्छी लगती है, सिगरेट पीते मर्द भी अच्छे नहीं लगते तो लडकियाँ………..???

  10. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    तो फ़ुरसतिया गुरु, आप एक इतिहास रचने से रह गये..” इतने इतने मीटर की ऊँचाई से, इतने तापमान पर लिखी गयी विश्व की प्रथम हिन्दी पोस्ट !”साथ में ही अतिथिगृह के इलेक्ट्रीकल वायरिंग का एक ख़ाका भी होता, तो सोने में सुहागा..पता नहीं आप ज्ञानदत्त जी को सीरियसली क्यों नहीं लेते ?वैसे हो भाई, आप भी जीवट वाले मनई !

  11. Shiv Kumar Mishra कहते हैं:

    शीर्षक के रूप में ‘नैनीताल की वादियों से दुनियाँ की पहली चिट्ठाचर्चा’ बहुत जंचता. खैर, बिन वजह हंसने वाली लड़किया भी जंचती हैं, सो ये शीर्षक भी अच्छा है. ब्लॉग टेम्पलेट बहुत बढ़िया लगा. और चर्चा के तो क्या कहने. बहुत बढ़िया है.ये नेट कनेक्शन भी पुराणिक जी को मिले ऊँट की तरह है. अगली बार मुलाकात हो तो उसे धमका दीजियेगा. ने कनेक्शन को. ऊँट को नहीं. वैसे भी नैनीताल में ऊँट कहाँ मिलेंगे? वो तो दिल्ली में मिलते हैं.

  12. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    यदि टेम्पलेट पर राय न भी माँगी जाती, तो भी मैं यह कहता कि..इस प्रारूप की आलोचना तो नहीं, बल्कि सुझाव है, कि..नयनाभिराम होने के बावज़ूद पोस्ट से संबन्धित टिप्पणियाँ पोस्ट के नीचे नहीं दिखतीं ।हालिया चर्चा और हालिया टिप्पणियाँ तो बड़ी सहलता से इसके विज़ेट से वैसे भी दिखलायी जा सकतीं थीं !यदि टिप्पणी पोस्ट करने की विंडो अलग टैब या अलग विंडो में आये, तो भी गनीमत है ।पाप-अप विंडो में कठिनाई तो है ही !

  13. Debashish कहते हैं:

    अमर जी आपके सुझावानुसार टिप्पणियाँ अब पॉपअप में न खुलकर पोस्ट के साथ ही दिखेंगी।

  14. Shastri कहते हैं:

    “क्या चिट्ठाकारी बेवकूफों के लिये है? अरे नहीं शास्त्रीजी, आप सबको अपने जैसा काहे समझ रहे हैं! हम लोग भी हैं चिट्ठाकारी के मैदान में!”आज पता चला कि हम से अलग किस्म के लोग भी हैं इस मैदान में. चलिये तसल्ली हुई कि चिट्ठालोक को पार लगाने के लिये (बेडा गर्क करने के लिये?) काफी मित्र मौजूद हैं!! (टांग सिर्फ हल्के सी खीची है!! आगे देखें क्या होता है)सस्नेह — शास्त्री

  15. विवेक सिंह कहते हैं:

    चर्चा का नया स्वरूप एकदम टनाटन है . पर जितना मिले उससे सन्तुष्ट हो गए तो विकास रुक जाएगा ना , इसलिए थोडी और डिमाण्ड करते हैं क्या पता पूरी हो जाय ? इसमें अगर हिन्दी टूल और मिल जाए तो टिप्पणी भेजने में सहूलियत हो जाय . फिलहाल दूसरों का तो पता नहीं पर मैं हिन्दिनी की साइट पर लिखकर कॉपी पेस्ट करता हूँ . अगर जो बॉक्स खुलता है उसी में हिन्दिनी की तरह टाइप करने का प्रोवीजन हो तो सोने पर सुहागा होगा . पहले जो टिप्पणी बॉक्स खुलता था उसमें ऑप्शन था जिसको क्लिक करके हम अपनी टिप्पणी के बाद वाली सारी टिप्पणियाँ अपने ईमेल पर सीधे पढ लेते थे . अब वह दिखाई नही देता कहीं . वैसे नियमित बाँचें वाला विकल्प शानदार है . पहले अनोनिमस भी टिप्पणी होती थी अब न होगी .यह अच्छा हुआ या बुरा इसमें भिन्न भिन्न मत हो सकते हैं . हम दोनों में राजी हैं .

  16. विवेक सिंह कहते हैं:

    अफसोस ! आज लडकियों के चक्कर में इतिहास बनते बनते रह गया . हमारी व्यक्तिगत राय है कि बुजुर्गों की टाँग अपेक्षाकृत धीरे खींची जाय :)नौवाँ एक लाइना थोडा मिस फिट लगता है , ‘आखिरी वाले के बाद वाले’ का मतलब तो कनपुरिए ही जानें . बाकी चकाचक !

  17. Shastri कहते हैं:

    @विवेक सिंहउमर के हिसाब से देखा जाये तो मैं अधिक बुजुर्ग निकलूँगा. अत: जब खिचाई मैं करूं तो अपेक्षाकृत दमदार खिचाई की जा सकती है, आपकी टिप्पणी के आधार पर.सस्नेह — शास्त्री

  18. sidheshwer कहते हैं:

    बहुत बढ़िया साहब , क्या हाल हैं नैनीताल के?

  19. Arvind Mishra कहते हैं:

    ये इस्टाईल भी पसंद आयी !

  20. Debashish कहते हैं:

    पहले जो टिप्पणी बॉक्स खुलता था उसमें ऑप्शन था जिसको क्लिक करके हम अपनी टिप्पणी के बाद वाली सारी टिप्पणियाँ अपने ईमेल पर सीधे पढ लेते थे . अब वह दिखाई नही देता कहीं विवेक: पोस्ट वाले पृष्ठ पर टिप्पणी फार्म के नीचे यह विकल्प अब भी मौजूद है, Subscribe by email की कड़ी खोजें। आप टिप्पणियाँ चिट्ठाचर्चा की टिप्पणियों की फीड द्वारा भी पढ़ सकते हैं।पहले अनोनिमस भी टिप्पणी होती थी अब न होगी चिट्ठा चर्चा पर अनाम टिप्पणियाँ प्रारंभ से ही स्वीकार्य नहीं होती हैं।

  21. विवेक सिंह कहते हैं:

    @ शास्त्री जी ! आपकी सस्नेह खिंचाई तो सबको अच्छी लगती है . आप करने के लिए तैयार हों तो लोग खुद माँग माँगकर अपनी खिंचाई करवाएंगे . हमारी भी कर दीजिए – हमारी भी कर दीजिए . मेरी ओर से तो अभी निमन्त्रण है आप रोज खिंचाई करते रहें 🙂

  22. डॉ .अनुराग कहते हैं:

    टेम्पलेट खूबसूरत है .लगता है नैनी ताल का असर है ….आपका ये नया अंदाज भी पसंद आया ….हम भी छुट्टी से लौटे है ..पर आप जैसा नसीब नही…..झील किनारे का !अभी हाजिरी देने आये थे ….फ़िर साब्को पढ़ते है एक एक करके

  23. पता लगा आज कल कनपुरिए लड़कियों के पीछे हैं। (लड़कियाँ सब सावधान हो जाएँ)। अगर नैनीताल वाला शीर्षक चेपा होता तो चर्चा ज्ञानदत्ती लगने लगती, यह सुकुल और कनपुरी ही ठीक है।

  24. विवेक सिंह कहते हैं:

    @ Debashish जी धन्यवाद ! ईमेल से टिप्पणी वाला लिंक मिल गया . आशा है बाकी माँगों पर भी विचार होगा .

  25. गरिमा कहते हैं:

    ये भी कोई सवाल है कि “लड़कियां जाने क्यों बिन वजह ही हँस देती हैं?” वैसे इसका सीधा सा त्वरित जवाब यह है कि लड़कियों को रोन्दु सुरत और बोरिंग इंसान पसन्द नही है। जब ये दोनो एक साथ इकट्ठे हो जाते हैं तो लड़कियाँ हँसकर मौसम को खुशनुमा कर देती हैं।

  26. anitakumar कहते हैं:

    लड़कियां हंसे या सिगरेट पियें, इग्नोर नहीं की जा सकती जान कर अच्छा लगा…॥:) एक लाइना तो मस्त हैं एकदम कनपुरिया इस्टाइल, और आप की पसंद की कविता भी बहुत पसंद आयी। वैसे ब्लोगिंग के प्रति आप की कमिटमेंट को एक बार फ़िर सलाम, नैनिताल की वादियों से भी चिठ्ठाचर्चा कर रहे हैं। आप की ये कमिटमेंट जितना ब्लोगिंग के क्षेत्र में प्रेरणादायी है उतनी ही असल जिन्दगी के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत है। आप की अगली चर्चा का इंतजार …:)

  27. अभिषेक ओझा कहते हैं:

    बड़ी सुंदर चर्चा रही… अब लड़कियों के बारे में तो ज्यादा पता नहीं 🙂 पर एक बात तो साफ़ है आपकी चर्चा पढ़ते समय हँसी आ ही जाती है. चाहे कितना भी टेंस मूड हो.

  28. डा. अमर कुमार कहते हैं:

    आह्हः..टनाटन टेम्प्लेट और चकाचक चर्चाअतिसुंदर एवं अतिसौम्य प्रारूप !और.. है, सच्चा लोकतंत्र,सुझाव के रूप में माँग रखी गयी..और.. मात्र 20 मिनटों में सुधरा रूप हाज़िर !धन्यवाद देबूदा, बहुत बहुत आभार !पर एक सवाल है आपसे ..आख़िर, आप अहंवादी क्यों नहीं हैं ?कम से कम हिन्दी ब्लागिंग के युगपुरुष होने का हवाला तो दे ही सकते थे..नहीं ? हाः हाः हाः ..

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